आलोक पराड़कर-
कार्यालय के मेरे पड़ोसी विधि…पत्रकारिता में जिन साथियों के साथ लंबे समय तक काम करने का अवसर मिला, विधि सिंह उनमें प्रमुख थे। पहले ‘जागरण’ और फिर ‘हिंदुस्तान’ में हम साथ थे। ‘हिंदुस्तान’ में हमारी कुर्सियां अगल-बगल रहींं। काम के दौरान बीच-बीच में हम बोलते-बतियाते, हंसी-मजाक करते। वह टिफिन लेकर आते, कई बार अलग से कोई विशेष व्यंजन भी ले आते, मुझे उनके घर का बना फर्रे बहुत पसंद था।
अनुशासित जीवन, समय का बेहतर उपयोग वह जानते थे। घर दूर था, बच्चों को पढ़ाते भी थे लेकिन हर जगह समय पर होते। थका हुआ या आलस्य में हमने उन्हें कभी नहीं पाया बल्कि इसके उलट वे हमेशा फुर्तीले, उत्साह से भरे हुए, मुस्कुराते नजर आते।
हमारे बीच हंसी मजाक एक स्थायी विषय उनके नाम को लेकर था। अक्सर लोगों को लगता कि विधि सिंह किसी स्त्री का नाम है। कई बार कार्यालय में उनसे बात करने की इच्छा रखने वालों के फोन विधि मैम को संबोधित होते। लंबे समय तक कार्यालय के वेतन बैंक खाता का विवरण मिस विधि सिंह के नाम से आता था। जब कभी यह लिफाफा हमारे हाथ लग जाता, हमें उनसे खेलने का मौका मिल जाता। विधि सिंह ने कुछ दबंगों पर एक बार जोरदार खबर लिखी। दबंगों के समर्थक बहुत नाराज हुए और उन्होंने विधि सिंह का पुतला जलाया। बताते हैं कि उन्हें महिला पत्रकार समझकर स्त्री का पुतला बनाया गया था।
विधि हमारी चुहल का कभी बुरा नहीं मानते बल्कि मुस्कुरा पड़ते। तमाम असहज परिस्थितियों में भी हमने उन्हें हंसते-मुस्कुराते ही पाया। इस छोटी उम्र में दिल की मुश्किलों से उनके यूं चले जाने पर क्या यह समझा जाना चाहिए कि जो अपने दुख और तनाव को चेहरे पर नहीं आने देते, वे उसे दिल में जज्ब करते रहते हैं!
अभिषेक उपाध्याय-
विधि सिंह का न रहना। लखनऊ की पत्रकारिता आज कांतिहीन हो गई। एक ऐसा शख्स जो जितना शानदार पत्रकार था, उससे कई गुना शानदार इंसान था। एक ऐसी सुमधुर मुस्कान का मालिक जो पहली ही मुलाकात में आपको मित्रता के ऐसे अभेद्य घेरे में गिरफ्तार कर ले, जिससे आप ता-जीवन मुक्त न हो सकते हों।
क्राइम रिपोर्टिंग का ऐसा धुरंधर पत्रकार जो अपने व्यक्तिगत जीवन में इतना मासूम और सरल हो कि अपराध की रिपोर्टिंग भी एक रोज़ उसकी कलम रोककर पूछ बैठे- “चेहरे से बुद्ध की तरह शांत दिखते हो फिर कहां से ऐसी ऐसी भारी-भरकम, एक्सक्लूसिव ख़बरें पा जाते हो। तुम्हारे सोर्सेज कितने गहरे हैं? तुमसे तुम्हारे वरिष्ठों, समकक्षों और कनिष्ठों को अभी और कितना सीखना बाकी है?”
लखनऊ में नेटवर्क 18 का ब्यूरो संभालते हुए विधि भाई से पहली मुलाकात हुई थी। मुझे अभी तक याद है कि जब भी किसी ख़बर के लिए फोन किया, उधर से जानकारी लेने और देने का ऐसा बाल सुलभ उत्साह दौड़ता था कि मानो ये क्राइम की ख़बरें न हों, उनके जीवन की धड़कन हों।
ईश्वर विधि भाई की आत्मा को शांति दे और अपने रोजनामचे में एक महाअपराध अपने हिस्से का भी दर्ज कर ले। एक हंसते खेलते शानदान इंसान को यूं उठा लेना महाअपराध ही तो है! विधि सिंह अगर आज होते तो इस ईश्वरीय अपराध की ख़बर भी वही लिखते। उनसे बेहतर कोई नहीं लिख सकता था!
पूरा लखनऊ उमड़ पड़ा वरिष्ठ पत्रकार Vidhi Singh जी को अंतिम विदाई देने। पत्रकार, राजनेता, सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोग,लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र बिरादरी सभी लोग,निधन की दुःखद सूचना पर बैकुंठधाम पहुंचकर उनके अंतिम संस्कार में सम्मिलित हुए। विनम्र श्रद्धांजलि -प्रदीप सिंह बबलू



एडवोकेट मोहम्मद हैदर-
Today , we lost Vidhi Singh, a journalist whose honesty, clarity, and compassion shone through every word he wrote. I may never have met him personally, but his articles in Dainik Hindustan spoke to me, and to so many others, with a sincerity that touched the heart. His ability to bring complex legal and social issues to life was a rare gift.
It is painful to know that he left us so suddenly, following a massive heart attack, just months after an angioplasty. Even then, he returned to work much earlier than he should have, not because he had to, but because journalism was in his soul. That passion defines who he was.
He leaves behind a grieving wife and a young daughter who must now face life without him. My heart goes out to them. May they find strength, love, and support in the days ahead.
The overwhelming messages pouring in across social media say more about his character than any words I could write. His kindness, integrity, and commitment to truth live on in the memories of those who followed his work.
Life, as great philosophers remind us, is fragile and unpredictable. We are not defined by the number of years we live, but by the goodness we leave behind. Vidhi Bhai’s journey reminds us to live with purpose, to serve with honesty, and to do good quietly, for it is only when we are gone that the true measure of our life becomes clear.
Rest in peace, Vidhi Bhai. You will be remembered with respect, affection, and gratitude. May your soul find eternal peace. Heartfelt condolences.
संदीप यादव-
लखनऊ के श्मशान घाट भैंसाकुंड पर आज इतनी भीड़ थी कि पैर रखने को जगह नहीं थी, सुबह ११ बजे से जो भीड़ लगनी शुरू हुई वो धीरे धीरे बढ़ती चली गई और लगभग 1.30 बजे से 2 बजे के बीच तक शहर से कई नेता, पूर्व मंत्री, वर्तमान उप मुख्यमंत्री, आईएएस, आईपीएस समेत युवा पत्रकार, वरिष्ठ पत्रकार समेत कई अखबारों के संपादक, उप संपादक, फोटोग्राफर समाजसेवी समेत शहर के तमाम लोग इकट्ठे हो गये थे।
सभी की आँखें नम थीं, जो व्यक्ति हम सब को अचानक छोड़ कर किसी और दुनिया में जा चुका था उसके ही अफ़साने बयाँ हो रहे थे। कोई उनकी मददगार छवि की बात कह रह था कोई उनके स्वभाव की तारीफ़ कर रहा था कोई उनकी शानदार रिपोर्टिंग और लेखनी की बात कर रहा था कोई उनकी ज़िंदादिली के किस्से सुना रहा था कोई उनकी मनमोहक मुस्कान की बात कर रहा था।
आज इस शहर के कई लोगों ने अपना भाई खो दिया किसी पत्रकार ने अपना गुरु खो दिया किसी पत्रकार ने अपना सीनियर खो दिया किसी ने अपना साथी खो दिया किसी ने अपना जूनियर खो दिया।
आज इस शहर और लखनऊ की पत्रकारिता जगत की सबसे मनमोहक मुस्कान का ब्रांड एंबेसडर हम सबको छोड़ कर किसी और दुनिया में चला गया। क्राइम रिपोर्टिंग की शानदार खबरों, सूत्रों और गहराई की समझ और पकड़ रखने वाले पत्रकार को पत्रकारिता जगत ने आज खो दिया।
क्राइम रिपोर्टिंग के कई युवा पत्रकार श्मशान घाट में चुपचाप सिसकते रहे आँसू बहाते रहे और कहते रहे कि ‘ये कैसे हो सकता है सर कैसे जा सकते हैं… कल शाम तक को सब ठीक था शाम को बात हुई हमारी, कुछ पूछना था मुझे वो सब बताया सर ने मुझे…!
इधर हम सब पत्रकार साथी लोग सर की बातें कर रहे थे उधर उनके अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी, वक्त बीत रहा था और आख़िर वो वक़्त आ गया जब विधि सर को चिता पर लिटा दिया गया और हम सब उनके चाहने वाले उस चिता पर लकड़ी रखने के लिए आगे बढ़े, कुछ ही देर में विधि सर की चिता को उनके पिता ने मुखाग्नि दी।
आज उस पिता के लिए कैसा प्रलयकारी समय रहा होगा जब उसे अपने बेटे को मुखाग्नि देनी पड़ी। चिता की लपटे बढ़ने लगी और हम सब लोग हाथ जोड़कर विधि सर को विदा करने के लिए शांत भाव से खड़े हो गये।
आज सोशल मीडिया पर पत्रकारों की वॉल के साथ-साथ अलग-अलग विधा से जुड़े लोगों की वॉल पर बस एक ही मुस्कुराता हुआ चेहरा दिख रहा है वो हम सबके प्रिय Vidhi Singh सर ही है।
शायद ही उनकी कोई ऐसी तस्वीर हो किसी के पास जिसमें वो उदास दिखे हों। हम जानते हैं वो जहाँ रहेंगे यूँ ही मुस्कुराते रहेंगे सबकी मदद करते रहेंगे सबको गाइड करते रहेंगे, सबकी फ़िकर करते रहेंगे।
विधि सर आपको शत शत नमन प्रणाम,विनम्र श्रद्धांजलि। आपके चाहने वाले आपको हमेशा याद करेंगे We love you sir.

राजीव ओझा-
भरोसा नहीं हो रहा कि विधि सिंह से अब कभी मुलाकात नहीं हो पाएगी। यह अफसोस भी जीवन भर रहेगा कि मैं अपना एक वायदा पूरा नहीं कर पाया। विधि की एक आदत थी कि वह टिफिन लेकर ऑफिस आते थे और रोज मॉर्निंग मीटिंग के बाद अपने सभी साथियों के साथ नाश्ता करते थे। उनकी देखादेखी अन्य साथी भी टिफिन लाने लगे और फिर सब मिलकर खाते थे। एक बार मैंने उन सभी साथियों की अपने मोबाइल से फोटो ली और कहा कि विधि ने यह बहुत अच्छी परंपरा बना रखी है, मैं एक दिन फेसबुक पर इसे लिखूंगा। विधि अक्सर मुझे उलाहना भी देते कि आपने लिखा नहीं।
हे भगवान! यह कैसा विधान आपने बनाया कि इस घटना का जिक्र मैं विधि के जाने के बाद कर पा रहा हूं। विधि स्वभाव से मस्तमौला थे, लेकिन हार्ट अटैक से उनका निधन हुआ, यह विचलित करने वाला है। कल रात्रि में 2 बजे के आसपास मेरे पत्रकार मित्र मनीष श्रीवास्तव और सपा नेता फ़खरूल हसन चांद ने लगभग एक साथ ही मुझे यह दुखद खबर दी। स्तब्ध कर देने वाली इस सूचना ने साल 2012 से लेकर 2024 तक विधि के साथ बिताए समय की एक रील सी बना दी।
हिन्दुस्तान के सेवाकाल के ऐसे कई प्रसंग याद आते गए, जिनका विधि से सरोकार रहा। विधि कार्यालय में अपने साथियों को हंसाते रहते थे। कई बार वह खुद का भी मजाक उड़ाते कि मेरे पास एक फोन आया था जो मुझे विधि मैम बोल रही थीं। एक बार उन्हें कोई आमंत्रण पत्र भी मिला था जिसमें उन्हें सुश्री विधि सिंह लिखा था। यह पत्र वह स्वयं लोगों को दिखाकर हंसते थे। कभी-कभी यह भी बोलते कि लोग मेरे नाम की शपथ लेते हैं, जैसे मैं विधिपूर्वक शपथ लेता हूं कि…..
हिन्दुस्तान छोड़ने के बाद उनसे कई मुलाकातें कार्यालय के बगल के मधुरिमा रेस्टोरेंट में हुईं। उनका उलाहना देने का ढंग कभी नहीं भूल पाऊंगा। अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के समारोह की कवरेज भी हम दोनों ने साथ की थी। हिन्दुस्तान में 12 साल तक एक साथ काम करने से पहले भी हम लोग एक दूसरे से अच्छी तरह परिचित थे। विधि के संपर्क का दायरा बहुत बड़ा था। एक दिक्कत यह भी थी कि वह सबको समेट लेने की कोशिश करते थे। एक और खास बात जो मुझे बहुत प्रभावित करती थी वह यह कि वह अपने गांव से बहुत गहरा लगाव रखते थे।
मैं जब भी उनके गांव का जिक्र सुनता खुद के गांव से दूर हो जाने का मेरा दर्द उभर आता था। उनका गांव लखनऊ के बगल के जिले सीतापुर में था तो मेरा गांव यहां से 300 किलोमीटर दूर गोरखपुर में। वह गांव से इस गहराई से जुड़े थे कि हर साल गांव के बुजुर्गों की एक टीम को अपने साथ कहीं दूर की यात्रा कराते थे। उन्हें लोगों को अपने गांव ले जाने और उन्हें गांव वालों के साथ भोजन कराने का भी शौक था। उनकी एक इच्छा अधूरी रह गई। वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने गांव कष्मांडा ले जाने चाहते थे और हमेशा इसकी योजना बनाते रहते थे। मेरे साथ होने वाली बातचीत में अक्सर यह विषय उठता था। विधि के साथ इतनी यादें हैं कि उन्हें लिखने में बहुत विस्तार हो जाएगा।
प्रभु श्रीराम से प्रार्थना है कि वह दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और परिवार को यह अपार कष्ट सहन करने की शक्ति प्रदान करें। विनम्र श्रद्धांजलि…
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