संपादक की संस्था थोड़ी और हिल गई… (पढ़िए, विनोद मेहता के निधन पर किसने क्या कहा)

Om Thanvi :  विनोद मेहता के निधन के साथ निरंतर कमजोर होती संपादक की संस्था थोड़ी और हिल गई। डेबनेयर से लेकर आउटलुक तक मैंने उनकी विफलता और सफलता के कई मुकाम देखे। आउटलुक उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी। पंद्रह दिन के अंतराल में निकलने वाले इंडिया टुडे को आउटलुक ने न सिर्फ सफल चुनौती दी, उसे भी हफ्तेवार शाया होने को विवश किया। बेबाकी मेहताजी के स्वभाव में थी और उनकी संपादकी में भी; खुशी है कि आउटलुक उसे बराबर निभा रहा है। मुझे निजी तौर भी एक दफा उनका अप्रत्याशित समर्थन मिला। जब एडिटर्स गिल्ड में महासचिव पद से मैंने एमजे अकबर के आचरण के खिलाफ इस्तीफा दे दिया तो उन्होंने मुझे जूझने को प्रेरित किया था; गिल्ड के इतिहास में पहली दफा आपतकालीन बैठक बुलाई गई, जिसमें अकबर ने माफी मांगी और इस्तीफा वापस हुआ। मेहताजी के साथ उनका अनूठा तेवर चला गया; लोकतांत्रिक, बेबाक और जीवट वाला तेवर पहले से दुर्लभ था, उनके जाने से जमीन कुछ और पोली हो गई। विदा, बंधु, विदा!

Pankaj Singh : The departure of Vinod Mehta is a rude shock indeed ! As an intellectual, he symbolised rare courage and integrity. As an editor , he adhered to values that a lot of bigwigs in the media found hard and impractical to follow. All the while caring a fig for the ‘ powerful ‘ in the system , he considered it his duty to expose the rot and offer the reader what exactly brought the dynamics of contemporary reality to light . During relaxed sessions at friends’ houses, he would opine on things in most uncommon manner with his unique sense of humour and sharp wit. After the government raids on the offices of the Outlook , he had invited media friends, including me, to the Press Club of India and shared the details. He candidly narrated how the then PM , Atal Bihari Vajpayee had become hostile towards him and his editorial policy. He quoted from their mutual dialogue during chance encounters. Vajpayee would tell him , ” Aap tau mere paas aate hi nahin , baqi sab log aate hain …” , and Vinod would just smile away the complaint. Vinod felt, the raids were planned to teach him a lesson . Apart from his brilliant writing, he has left behind an invaluable treasure of memories with his friends and admirers.He would be hugely missed in the battles against the forces of darkness. Vinod, R I P !!

Jaishankar Gupta : विनोद मेहता के निधन का समाचार न सिर्फ दुखद बल्कि स्तब्धकारी है। विनोद जी देश में कम नहीं बल्कि समाप्त होते जा रहे उन गिने-चुने स्पष्टवादी संपादक-पत्रकारों में से थे जो सच को बोलने, लिखने और छापने के साथ ही सच के साथ खडे रहने का साहस रखते थे। उनके साथ हमारी पहली मुलाकात 1981-82 में बंबई प्रवास के दौरान हुई थी। मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी के साथ हमने उनकी मौत से कुछ ही पहले लंबा इंटरव्यू किया था। विनोद जी को वह इंटरव्यू हमने उस समय संडे आब्जर्वर में उनकी सहयोगी और हमारी मानवाधिकारवादी मित्र ज्योति पुनवानी के साथ मिलकर सुनाया था। उस इंटरव्यू को उन्होंने अनुवाद करवाकर संडे आब्जर्वर में इंटरव्यू आफ द वीक के रूप में प्रकाशित किया था। उसके बाद से यदा कदा मिलने का क्रम दिल्ली में भी बना रहा। उनके करीब होने का दावा नहीं कर सकता लेकिन सुरेंद्र प्रताप सिंह, एम जे अकबर (1984 से पहलेवाले) और राजेंद्र माथुर के बाद वही एक संपादक थे जिनसे बेहद प्रभावित हुआ। अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

Shambhunath Shukla : पत्रकार विनोद मेहता को अश्रुपूरित श्रद्घांजलि। उन्हें किस रूप में याद किया जाए। डेबोनेयर के संपादक के रूप में या इडिपेंडेंट के संपादक के रूप में अथवा आब्जर्बर के संपादक के तौर पर। उपन्यास शैली में लिखी गई उनकी आत्मकथा Lucknow Boy अदभुत है।

Chanchal Bhu : विनोद मेहता पत्रकारिता में एक दमदार हस्ताक्षर रहे। सपाट भाषा में सामाजिक सरोकारों पर उनकी टिप्पणी दुहराती जाती रहेगी। आज उनकी याद और उस याद में पत्रकारिता के गिरते स्तर के समय उनका न रहना, बहुत अखरेगा। कुछ गिने चुने पत्रकार जो आज जूझ रहे है उनका एक साथी अचानक छोड़ जायगा यकीन के बाहर लगता है। नमन विनोद जी..

Vir Vinod Chhabra : यकीन नहीं होता कि विनोद मेहता नहीं रहे। वो थे टी अंग्रेजी पत्रकारिता के लौह स्तंभ। मगर ख़लीफ़ागिरी हिंदी पत्रकारिता में उतनी ही थी। इसका कारण था हिंदी भाषा पर उनकी गज़ब की पकड़ और हिंदी पत्रकारिता और पाठक की उनको मान्यता।

Amitaabh Srivastava :  Sad. Very sad. We lost a true champion of freedom of speech, a fearless journalist, great editor. At a time when media credibility is at its lowest, we needed him around. Will miss you a lot sir, my favorite Lucknow boy. RIP Vinod Mehta. Its indeed a very sad day.

Nachiketa Desai : Vinod Mehta was my boss who safeguarded my freedom as a field journalist. Because of him I could report fearlessly exposing the murky deeds of powers that be. I was special correspondent of The Indian Post when a source told me about the slave-like working and living conditions of migrant labourers from Odisha engaged in the construction of Sardar Sarovar dam on the Narmada. I visited the dam site and the labour colony and reported the inhuman living condition of the workers. The promoters of the JP Group, the builders, called Vinod Mehta to complain that I had not talked to them before filing my report. Vinod Mehta called me to ask if I had visited the labour camp and interviewed the workers. I said of course I had. The next day’s Indian Post had my report on front page top eight columns ! There are several such incidents when Vinod Mehta stood by me and other reporters. He was among the last of such editors. RIP. I miss you.

Abhishek Srivastava : “When the editor’s relations with the owner are under strain, the first thing the latter does is delay clearing payments for freelancers. In the two papers I have been sacked from, this has always been the routine. The monthly freelancers’ payments amounted to around Rs 7,000. Peanuts for the management but dal-roti for the freelancers. On one occasion (at the Indian Post), I personally went down to the ground floor where the directors sat and made such a ruckus that eventually I was able to extract a backlog of five months’ payments”. (I will always remember him for the above quoted para. RIP VINOD MEHTA)

Sagarika Ghose   : My much loved @Outlookindia boss Vinod Mehta is gone: we will miss you greatly Vinod, and India will miss your irreverent valiant voice. RIP

Rajdeep Sardesai  : An iconic editor and friend passes away. Brave and irreverent till the end. Vinod Mehta RIP.

barkha dutt  : May you rest in peace Vinod Mehta. God Bless

Narendra Modi  : Frank & direct in his opinions, Vinod Mehta will be remembered as a fine journalist & writer. Condolences to his family on his demise.

Sreenivasan Jain : V sad to hear of the death of Vinod Mehta. He was an original.

Peri Maheshwer : Farewell Dear Vinod, Ye star Ye light
Lighten up heaven and edit it tight
Up above, they called you for another fight
Give the powerful in heaven some fright

Farewell my friend, on another week bright
Tis weekend and television needs your byte
Sleep well my friend, into the peaceful night
Will meet in your world, to Outlooks delight.

RIP, Vinod Mehta, Editor of Editors.

Mudit Mathur : I met Mr Vinod Mehta during Agra Summit when Indo-Pak talks between Atal Behari Vajpaiyee and Parvez Musharff was in full swing. He was candid enough to predict its outcome. He was “mast” and cordial person having no ego hassles. We shared drinks on board of Taj Express on our way back to Delhi. A bold, brave and fearless Editor whom I saw working with Pioneer and Outlook. Rest in peace Vinod Mehta you will be immortalised in our memories.

Sanjaya Kumar Singh : 25 साल के अपने चुने हुए लेखन को पुस्तक रूप में प्रकाशित करते हुए उन्होंने पुस्तक का जो नाम दिया – वह देश में पत्रकारिता और संपादकों के बारे में सब कुछ कहता है। किताब तो जो है सो है ही। एकदम मस्त विनोद मेहता जैसी। आउटलुक में आखिरी पन्ने पर छपने वाला उनका साप्ताहिक कॉलम मुझे बहुत पसंद था। खान मार्केटे के होटल और एडिटर के नामकरण की कहानी दोनों उसमें छपी थी।

Awadhesh Kumar : पत्रकार विनोद मेहता नहीं रहे… अभी-अभी आउटलूक के संस्थापक संपादक श्री विनोद मेहता के निधन की दुखद सूचना मिली है। विनोद मेहता ने आउटलूक को आरंभ कर पत्रकारिता का एक मापदंड स्थापित किया। अपने धुन के पक्के थे। उनसे सहमत होइए या असहमत वो इसकी फिक्र नहीं करते थे। जो समझ में आया उसे करना ही है। उनकी सोच से अनेक बार अपनी असहमति रही, पर मेरे मन में हमेशा उनके प्रति सम्मान रहा। पत्रकारिता का इतना लंबा जीवन क्रम उनका रहा है कि उन पर काफी कुछ लिखा जा सकता है। पर इस समय इतना ही कहूंगा कि निर्भिक, अक्खड़ और पत्रकारीय स्वतंत्रता का सम्मान करने वाला पत्रकारिता का एक स्तंभ हमेें छोड़कर चला गया। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

Vimal Kumar : हिन्दी में आलोक मेहता और अंग्रेज़ी में विनोद मेहता .दोनों आउटलुक के संपादक पर फर्क कितना था .क्या ये अंगेजी और हिन्दी का फर्क था ? क्या विनोद मेहता ने आलोक मेहता को चुना था?


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जब सब दलाल हो जाएंगे तो प्रिंट मीडिया का सत्यानाश हो जाएगा : विनोद मेहता


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