शंभुनाथ शुक्ला-
लेखक विनोद कुमार शुक्ल को हिन्द युग्म ने 30 लाख की रॉयल्टी क्या दी, हिंदी के अधिकांश लेखक और आलोचक मिर्गी रोग की पीड़ा से छटपटाने लगे। आज का युवा भले रील्स या सोशल मीडिया में डूबा हो परंतु किताबें भी खूब पढ़ी जा रही हैं। तमाम सारे पुराने लेखक फिर से चर्चा में आए हैं। प्रकाशकों की नई पीढ़ी भी लेखक को उसका पारिश्रमिक देने में संकोच नहीं करती। अन्यथा एक जमाना वह था कि विनोद कुमार शुक्ल ने ही लिखा था कि कैसे वाणी प्रकाशन ने उन्हें 25 वर्ष में रॉयल्टी के रूप में सिर्फ़ 1.35 लाख रुपये ही दिये। और राजकमल प्रकाशन के मालिक मात्र 14000 रुपये प्रति वर्ष देते थे वह भी उनकी छह पुस्तकों के लिए। इस वर्ष विनोद कुमार शुक्ल को ज्ञानपीठ मिला और फिर से उनका साहित्य चर्चा में आया। खरीदारी भी होने लगी किंतु हमारे हिंदी समाज के इलाहाबाद और लखनऊ के अड्डेबाज़ लेखक तथा आलोचक शुक्ल के विरुद्ध यह प्रलाप कर रहे हैं।
अभी मैंने अख़्तरुल ईमान की आत्मकथा “इस आबाद ख़राबे में” पढ़नी शुरू की तो पढ़ता ही चला गया। इसका नागरी लिप्यंतरण श्री Anil Maheshwari ने किया है। हमारे देश में उर्दू को उसका श्रेय और प्रेय नहीं मिला इसलिए हम बस प्रेमचंद तक सीमित हैं। देश के प्रगतिशील कहलाने वाले लेखक तो और गुड़ गोबर किये हैं। अख़्तरुल ईमान जैसे तमाम लेखकों को पढ़िये तब पता चलेगा कि प्रेमचंद के पहले और बाद में तथा उनके समकालीन कई लेखक बहुत अच्छा लिखते रहे हैं। लेकिन उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला। अब समय आ गया है जब लेखकों को उनकी कृतियों का पूरा सम्मान मिलना शुरू हुआ है।
बधाई दीजिए ऐसे लेखकों को और ईर्ष्यालु आलोचकों से दूर रहिये।
कात्यायनी-
फेसबुक पर रमन सिंह के सामने हाथ जोड़कर विनत भाव से खड़े विनोद कुमार शुक्ल और नरेश सक्सेना की तस्वीरों को देखकर मक्सिम गोर्की की भाषा में बस यही पूछने को जी चाहता है कि ओ संस्कृति के कथित निर्माताओ! ओ कथित मानवतावादियो! तुम किसके साथ खड़े हो? अयोध्या 1992 और गुजरात 2002 के निर्माताओं के साथ, इस देश को फासिस्टी आतंक राज की धधकती ज्वाला में धकेलने वालों के साथ, या फिर भयंकर दमन, उत्पीड़न झेलती इस देश की आम जनता के साथ?
लेकिन नहीं। अब कुछ भी पूछने का कोई मतलब नहीं रह गया है। यह सारी बेशर्मी हमारे ही समय में होनी थी जब दुनिया के सबसे कोमल शब्दों में मनुष्यता, प्यार और सौन्दर्य की बातें करने वालों को हत्यारों के सानिध्य में गदगद विराजमान पाया जाना था।
और कुछ नहीं तो कम से कम लानत तो भेज ही सकते हैं! घृणा से थूक तो सकते ही हैं! घृणा के प्रचारक तो हम वैसे भी कहे जाते हैं!
नवीन कुमार-
विनोद कुमार सुकुल हिंदी साहित्य के नीरो हैं। छत्तीसगढ़ के आदिवासी मारे जाते रहे, मकान-दालान जलाये जाते रहे, मणिपुर के आदिवासी काटे जाते रहे, जंगल लूटे जाते रहे, गाँव के गाँव उजाड़े जाते रहे, औरतें कपड़े उतारकर घुमाई जाती रहीं और शुक्ला जी आग की अटारी के किनारे बैठे बांसुरी बजाते रहे, साहित्य की रोशनी फैलाते रहे-
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
यह रहस्योद्घाटन तो अब हुआ है कि विनोद शुक्ला के हाथ बढ़ाने और पकड़ने का मतलब क्या था। उनकी कविता ने अब अर्थ पाया है – हाथ बढ़ाना मतलब हाथ बढ़ाकर चेक लेना। और हाथ पकड़ने का मतलब ग़रीब आदिवासियों को अडानी के लिए खदेड़ने वाली सत्ता का हाथ पकड़ लेना। मतलब कोई कवि जिसका जमीनी मानवीय संदर्भों में न हाथ बढ़ाने में और थामने में कोई यकीन न हो वो इतनी फर्जी लाइनें कैसे लिख सकता है। लेकिन लिखी है और वाहवाही भी हुई है। रुपया भी बरस रहा है। शुक्ला जी हैं। हिंदी साहित्य का शुक्ल पक्ष चल रहा है। सारे पंडे ताली पीट रहे हैं। इसमें कौन सी नई बात है।
एक बनारस वाला शुक्ला है। प्रधानमंत्री। बनारस वाले कन्फ्यूज्ड हैं कि हमने किसको प्रधानमंत्री चुना है। बनारसी सुकुल ने जो पहली किताब अपने प्रधानमंत्रित्व काल में छापी वो भी एक सुकुल की थी। राम चंदर सुकुल। कमाल की बात है कि दोनों प्रधानमंत्री लोकतंत्र की छाती पर हुमचकर कुर्सी पर बैठे हैं। खैर साहित्य के सुकुल पक्ष पर सभी सुधीजनों को बधाई।
चलते-चलते, जिस दिन दिवंगत ओम प्रकाश वाल्मीकि, तुलसीराम, शिवमूर्ति, सूरजपाल चौहान, शरण कुमार लिंबाले, सुशीला टाकभौरे, कँवल भारती, धर्मवीर, दया पवार जैसे लेखकों (बहुत सारे नाम छूट रहे हैं) की मारी गई रॉयल्टी का इस तरह से खुला हिसाब होगा उसी दिन हिंदी साहित्य का अंधेरा छंटेगा। उसी दिन दुर्गंध दूर होगी। तबतक जलते छत्तीसगढ़, बनारस, लखनऊ, जयपुर, पटना, भोपाल के उजाले से निकले सुकुल पक्ष का आनंद लीजिए।

(तस्वीर हाथ बढ़ाने और हाथ पकड़ने का अर्थ जीवंत करते हुए)
ओम थानवी-
हिंदी साहित्य की दुनिया भी दिलजलों की बरात है। विनोद कुमार शुक्ल को प्रकाशक ने तीस लाख की रॉयल्टी दे दी। चैक से दी है। सरेआम दी है। किसी भी लेखक के लिए ख़ुशी की घड़ी होगी। बिरादरी भी क्यों न ख़ुश हो ले? मगर हज़ार सवाल खड़े किए जा रहे हैं। क्या इसलिए कि विनोदजी साहित्य के किसी विचारवादी खेमे में नहीं?
यह सचाई है कि विनोद कुमार शुक्ल अनूठे लेखक हैं। गद्य हो चाहे पद्य, सहज हिंदी में सादगी के लेखन वाले सरलमना लेखक हमारे बीच कितने हैं? उनके पास पैसा भी नहीं है।

प्रकाशक ने रॉयल्टी का पैसा दिया। चैक से दिया है तो बिक्री का हिसाब भी होगा। अगर उस पर संदेह हो तो बिक्रीकर-आयकर वाले पूछेंगे। हिंदी-संसार की पीड़ा देखिए कि लेखक ही लेखक की रॉयल्टी के बारे में पूछ रहे हैं।
बरसों पहले उदयप्रकाश को पाँच लाख रुपए एक हिंदी प्रकाशक ने दिए थे। बाद में अन्य प्रकाशक से भी बड़ी राशि मिली। उनके लेखन की ताक़त है। तमाम उपेक्षाओं और हमलों के बावजूद उनकी स्वीकार्यता है। ख़याल रहे, वह सफलता ऑनलाइन बिक्री के (पेपरबैक) पसारे से पहले की है।
विनोद कुमार शुक्ल को हार्दिक बधाई। उनके प्रकाशक को भी। अच्छी किताबों का प्रसार जितना ज़्यादा हो, अच्छा है। उसमें हम सबकी ख़ुशी है — होनी चाहिए।

वीरेंद्र यादव-
खबर है कि विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘ दीवार में एक खिड़की रहती थी ‘ कि अप्रैल 2025 से अब तक यानी तीस लाख रॉयल्टी दिये जाने की तिथि तक 86897 प्रतियाँ बिक गयीं। यानी औसतन 500 प्रतियों की बिक्री रोजाना हुई। यह एक चौकाने वाला और दिलचस्प आंकड़ा है। हिंदी के ये पाठक सचमुच प्रणम्य हैं, जिन्होंने इस उपन्यास को सिर माथे लिया। गोदान, मैला आँचल, झूठा सच, राग दरबारी , चित्रलेखा से लेकर सर्वाधिक बिकने वाला उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ भी 500 प्रतियाँ रोज की बिक्री का रिकार्ड नहीं बना पाया। विनोद कुमार शुक्ल जी को साहित्य से इस धनोपार्जन के लिए हार्दिक बधाई।
मेरी जिज्ञासा यह जानने की है कि यह उपन्यास हिंदी के किस इलाके के पाठकों के बीच इतना लोकप्रिय हुआ? या यह समूचे हिंदी क्षेत्र के पाठकों की पसंद है। यदि ऐसा है तो इस तथ्य का समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जाना चाहिए कि इस उपन्यास में ऐसा क्या है, जिससे पाठक इसके जादुई मोहपाश में इतना आबद्ध है। यह जानकारी भी दी जानी चाहिए कि इस उपन्यास की यह बिक्री आनलाईन हुई है या पुस्तक विक्रेताओं द्वारा। वे कौन से पुस्तक विक्रेता हैं, जिन्होंने विगत 6 माह में इसकी एक हजार से अधिक प्रतियाँ बेची हैं? यह जानकारी इसलिए भी जरुरी है कि इससे हिंदी पुस्तकों की बिक्री के तंत्र का खुलासा भी हो सकेगा। एक बार फिर इस धनवर्षा के लिए आदरणीय विनोद कुमार शुक्ल जी को हार्दिक बधाई।
सिद्धार्थ कलहंस-
संभलो, ले डूबेगा हिन्दी को ये घातक प्रचार तंत्र… साहित्य, समाज, राजनीति के बारे में हमारी समझ को धार देने वाले बड़े भाई सरीखे मित्र वीरेंद्र यादव जी ने एक चर्चित टीप लिखी फेसबुक पर दीवार में एक खिड़की रहती है की बिक्री और रायल्टी पर। इस पर एक टिप्पड़ी मैंने लिखी पुस्तकों को लेकर (खासकर हिन्दी) चल रहे प्रचार अभियान के तौर-तरीकों और शातिरपना पर।
चूंकि उस टिप्पड़ी पर 70 से ज्यादा लोगों की प्रतिक्रिया देखी और वीरेंद्र सर ने उस पर एक पोस्ट भी अलग से लिखी तो मुझे लगा कुछ और बातें भी सामने रखी जाएं और कुछ खतरों से आगाह भी किया जाए…….
चालीस दशक से ज्यादा हुए मुझे हिन्दी साहित्य की किताबें पढ़ते हुए (हालांकि मैं महज एक पाठक ही हूं, पत्रकार होने के नाते बहुत निजी आग्रह पर कुछ बार पुस्तक समीक्षाएं ही लिखीं। इससे आगे खुद को लायक नहीं पाता)। तो ये एक शाश्वत विलाप सुनता आया हूं। हो सकता है कि 40 बरस पहले भी लोगों ने सुना हो कि हिन्दी में पढ़ने वाले नहीं… हिन्दी के पाठक घट रहे हैं। हिन्दी में गंभीर साहित्य पढ़ा नहीं जाता।
खेद के साथ कुछ बातें जो मुझे लगीं वो ये हैं…..
- हिन्दी में अच्छा पढ़ने की चाह रखने वालों की तादाद बढ़ी है।
- पहले से कहीं ज्यादा आज हिन्दी में पढ़ने की तमन्ना रखने वालों के पास खरीदने के लिए भी पर्याप्त पैसे हैं।
- अच्छा हो या बुरा पर हिन्दी की किताबें खूब खरीदी जा रही हैं (पुस्तक मेलों से लेकर आनलाइन खरीद के आंकड़े उठाकर देख सकते हैं।
- रीलबाजी में मशगूल पढ़े-लिखे नौजवान को पता है कि नेट में डूबे रहना गलत है (भले ही वो छुटकारा नहीं पा रहा है इस लत से)। लिहाजा वो भी हिन्दी पढ़ने-खरीदने की तमन्ना रखता है।
- इसे स्क्रीन का ही कमाल कहें पर लल्लनटाप के गमछा लपेटे आने वाले सौरभ हों या ग्रे बालों में आने वाले रवीश आज के युवा को कूल और काबिल दोनों लगते हैं तो वो उनके जैसा भी होने की चाह रखता है और उसे लगता है कि इनकी बताई किताबें इन जैसा बन जाने का रास्ता तैयार करती हैं। मैंने महज दो ही नाम लिए पर इस तरह की कई सेलेब्रिटी हैं युवाओं के बीच
- युवाओं के मां-बाप को भी लगता है कि रील्स से अच्छा उनके बेटे-बेटी कुछ किताबें पढ़ें तो वो पैसे देने को भी तैयार हैं (हमारे दौर में जुगाड़ना पड़ता था)
- बाजार की भाषा हिन्दी है (विशाल उपभोक्ता वर्ग के चलते) तो अब हिन्दी उस कदर हीनता का बोध नहीं कराती।
- अंग्रेजी के साथ हिन्दी भी आनी चाहिए इस हकीकत को अधिकांश युवा बखूबी समझता है।
फिर दिक्कत कहां है और क्यों अच्छी किताबें नहीं बिक रहीं …….
हिन्दी में अच्छा लिखने-पढ़ने वाले पाठकों से संवाद न के बराबर रखते हैं या इसे अपनी तौहीन समझते हैं। वो आज भी स्वांत: सुखाय वाले दौर में जीते हुए रच रहे हैं। उनकी नजर में बस लिखे हुए पर नजर एक समूह विशेष की पड़ जाए और चुनिंदा लोग उसका नोटिस ले लें। कुछ और भी खास लोग उस पर कहीं समीक्षा, आलोचना आदि लिख दें इतना बहुत है। क्या लिखा, क्यों लिखा और उसे क्यों और किसके द्वारा पढ़ा जाना चाहिए इससे कोई ताल्लुक नहीं रखना चाहते। प्रकाशक जनकल्याण के लिए नहीं व्यवसाय के लिए बैठा है लिहाजा कीमत अपने हिसाब से रखता है किताब की। लेखक कभी इस पर नहीं अड़ता कि कीमत वाजिब हो ताकि लोग आसानी से खरीद सकें। लिहाजा तमाम अच्छी किताबें सिर्फ मंहगी होने के चलते नहीं बिक पा रहीं।
अपने लिखे का प्रचार ज्यादातर को या तो अपमान नजर आता है या उन्हें इसके तौर-तरीके नहीं मालूम। कोई जनसंपर्क कंपनी भी कम दाम लेकर यह काम करने आगे भी नहीं आती। हालांकि बिना कंपनी के भी कालेजों, विश्वविद्यालयों, छोटी सभा-गोष्ठियों, सोशल मीडिया के जरिए ये काम बखूबी हो सकता है।
तो इन हालात में दरम्याने या यों कहे कि बहुत कूड़ा लिखने वालों की पौ-बारह है। वो दनादन फेसबुक, रील्स, इंस्टाग्राम, सभाओं, गोष्ठियों, अनगिनत विमोचन कार्यक्रमों व इस जैसे तमाम हथकंडे अपना कर प्रचार पा रहे और किताब बेच पाने में सफल हो जा रहे। जाहिर है कोई कौल, दुबे, सिंह अपनी किताब के साथ पुरस्कार विजेता शुक्ल जी को नत्थी कर लिजिटिमेसी हासिल करेगा और लगे हाथ अपनी किताब भी बेचने में सफल हो जाएगा।
ये सुझाव कतई नहीं है पर मुझे लगता है कि हिन्दी के लेखकों (जाहिर है कि अच्छा रचने वाले) हया को छोडे़ं लोगों के बीच जाने का कोई मौका न गंवाए, तकनीकी की दुनिया में मौजूद हर टूल्स का इस्तेमाल करें अपने लिखे को आगे बढ़ाने के लिए। हर संभव स्थान पर संवाद करें। प्रकाशक से कीमत को लेकर झगड़ें, प्रकाशक से कह कर प्रचार का भी बजट निकलवाएं। छोटे-बड़े शहरों तक उपलब्धता सुनिश्चित करवाएं। आनलाइन बिक्री की सुगम व्यवस्था बनवाएं।
वरना पढ़ने की तमन्ना रखने वाले युवा के सामने जो जाएगा वो कतई अरुचिकर ही होगा। वो विमुख होने लगेगा और ये धारणा पनपेगी कि हिन्दी में तो सब इसी तरह का लिखा जाता है।
बदलाव अब बरसों में नहीं आता, नैरेटिव चंद दिनों में बदल जाते हैं, रील्स चंद सेकेंडों से ज्यादा की हो जाए तो बर्दाश्त नहीं की जाती। लिहाजा ज्यादा कूड़ा फैलेगा तो मुंह फेर कर चल देगा आज तैयार हो रहा पाठक।
जय भट्टाचार्य-
साहित्य लाइव में सम्मानित होने के लिए दो साहित्यिक महान! मुंबई लिटफेस्ट 2025 विनोद कुमार शुक्ला को मिला लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड; सीतांशु यशचंद्र कवि पुरस्कार विजेता।
मुंबई, 23 सितम्बर 2025: लिटरेचर लाइव के 16वें संस्करण में भारतीय साहित्य की दो अग्रणी हस्तियों को सम्मानित किया जाएगा! इस साल मुंबई लिटफेस्ट। गोदरेज लिटरेचर लाइव! प्रसिद्ध हिंदी उपन्यासकार व कवि विनोद कुमार शुक्ला को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया जाएगा। गोदरेज लिटरेचर लाइव! प्रसिद्ध और प्रसिद्ध गुजराती कवि सीतांशु यशचंद्र द्वारा कवि पुरस्कार का आयोजन किया जाएगा, जिन्होंने मुंबई में उपयुक्त, अध्ययन और पढ़ाया था।
एक परम आदरणीय और व्यापक रूप से अनुवादित आधुनिक हिंदी उपन्यासकार और कवि, जो अपनी सबसे प्रसिद्ध पुस्तकों नौकार की कमीज और दीवर में एक खिरकी रही थी में व्यक्त लगभग जादू-यथार्थवाद की शैली के लिए जाने जाते हैं, विनोद कुमार शुक्ला ने भारत के दोनों सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार – साहित्य अकादमी पुरस्कार जीते हैं और ज्ञानपीठ पुरस्कार। वह एकमात्र भारतीय लेखक भी हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय साहित्य में उपलब्धि के लिए पेन / नाबोकोव पुरस्कार मिला है। उनके पास कृषि में एमएससी की डिग्री है जो उन्होंने विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाया था।
लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड स्वीकार करते हुए श्री शुक्ला ने कहा: “लिखना बोलने का प्रयास है, खुद को व्यक्त करने का, खुद की आवाज खोजने का। अभिव्यक्ति की इस खोज में, हम प्रतीकों, छवियों और रूपकों की मदद लेते हैं। अच्छे से पढे तो आगे भी बढते है इसलिए जरूरी है कि हम अपनी मूल आवाज को पहचानें और उस पर बार-बार लौटें। मेरे लिए परम सत्य ये है कि लिखने की शुरुआत भी कविता से हुई थी, और अंत भी कविता से ही होगा। गोदरेज लिटरेचर लाइव के लिए आप सभी का धन्यवाद करता हूँ! लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड 2025.”
एक प्रसिद्ध और प्रसिद्ध गुजराती कवि और नाटककार, सीतांशु यशचंद्र को उनके प्रसिद्ध काव्य संग्रह जटायु के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उन्हें पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया है, जो एक उच्च भारतीय नागरिक सम्मान है। उसकी शैली को असली के रूप में व्याख्या की गई है। उनका लंबे समय से मुंबई के साथ संबंध रहा है, सेंट जेवियर्स कॉलेज में अध्ययन किया, मुंबई विश्वविद्यालय से मास्टर्स और पीएच.डी. डिग्री प्राप्त की और मीठीबाई कॉलेज (साथ ही कई अन्य भारतीय कॉलेज और विश्वविद्यालयों में) में पढ़ाया। उन्होंने अमेरिका और यूरोप में भी अध्ययन और लिखा है जहां वह सोरबोन में एक आगंतुक साथी थे।
महोत्सव के कवि पुरस्कार विजेता नियुक्त होने पर श्री यशचंद्र ने कहा: “गोदरेज लिटरेचर लाइव के साथ खुशी क्या है! 2025 कवि पुरस्कार विजेता मेरी समझ है कि यह “पुरस्कर” नहीं, यह “पारितोषिक” है: “पुरस-करण” या “दूसरों के सामने स्थान” के किसी शक्ति संबंधी कार्य को घोषित करने वाला पुरस्कार नहीं, बल्कि “परितोष” की अभिव्यक्ति या मेरे कुछ समकालीन लेखकों द्वारा महसूस की गई खुशी है। मैं खुश और आभारी हूं कि आपने इस भावना को सार्वजनिक रूप से मेरे साथ साझा किया है”।
एमी फर्नांडिस और कासर ठाकोर पदमसी, साहित्य के सह-निर्देशक लाइव! मुंबई लिटफेस्ट ने कहा: “यह हमारे लिए सम्मान की बात है कि भारतीय साहित्य के दो प्रतीक इस वर्ष हमारे सम्मान को स्वीकार करते हैं – विनोद कुमार शुक्ला, जो कृषि और ग्रामीण वास्तविकताओं में निहित हैं, जबकि कल्पना और शब्दों में बढ़ कर लाखों लोगों को मन में ले रहे हैं; और सीतांशु यशचंद्र, एक प्रेरणादायक कवि और शिक्षक हैं। क्रमशः हिंदी और गुजराती में लिखना, और हमारे त्योहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होने के नाते, विभिन्न भाषाओं में कार्यों के महत्व और संबंधों में हमारे विश्वास को मजबूत करता है। ”
गोदरेज इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक नादिर गोदरेज ने कहा: “हमें सौभाग्य है कि भारतीय साहित्यिक मंच के दो ऐसे दिग्गजों ने इस साल के लिटरेचर लाइव में लाइफटाइम अचीवमेंट और पोएट लॉरेट पुरस्कार स्वीकार किए हैं! मुंबई लिटफेस्ट। विनोद कुमार शुक्ला और सीतांशु यशचंद्र हिंदी और गुजराती साहित्य की दुनिया में सम्मानित नाम हैं और उत्सव में उनका होना न केवल गर्व की बात है बल्कि भारत के साहित्यिक कैनवास की समृद्धि और विविधता पर प्रकाश डालता है। ”
साहित्य लाइव के पिछले प्राप्तकर्ताओं! लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड में शामिल हैं: प्रतिभा राय, सी एस लक्ष्मी, महेश एल्कुंचवार, अनीता देसाई, रस्किन बॉन्ड, शांता गोखले, सर मार्क टुली, गिरीश कर्नाड, अमिताभ घोष, किरण नगरकर, एम टी वासुदेवन नायर, खुशवंत सिंह, सर वी एस नैपौल, महाश्वेता देवी।
पूर्व कवि पुरस्कार विजेताओं में शामिल हैं: अरविंद कृष्ण मेहरोत्रा, ममंग दाई, गिव पटेल, आदिल जुसावाला, जावेद अख्तर, के. सत्यचिदानंदन, जयंता महापात्रा, गुलज़ार, केकी दारुवाला, विक्रम सेठ, जॉय गोस्वामी।



