Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

‘शान-ए-सहारा’ से ‘चौथी दुनिया’ तक: वीरेंद्र सेंगर की पत्रकारिता की जिद और जिंदगी

अनिल शुक्ला-

वीरेंद्र सेंगर की याद में

(दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार और हम लोगों के अभिन्न मित्र वीरेंद्र सेंगर की याद में बीते 7 नवंबर को राजधानी के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में हुए एक भव्य कार्यक्रम में उनके लिखे लेखों की 2 किताबों और उनके दोस्तों द्वारा लिखे गए संस्मरणों की एक किताब का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम में बड़ी तादाद में दिल्ली के पत्रकार, लेखक और विद्वुत जन इकठ्ठा हुए थे। मुझे मलाल है कि मेरा डायलिसिस दिन होने के चलते मैं इसमें शरीक़ न हो सका। बहरहाल, संस्मरणों की किताब में मेरा भी एक लेख है जिसे आप लोगों के लिए मैं यहां पोस्ट कर रहा हूँ।):

यह सन 1983 की बात है जब हम आगरा के लोहामंडी वाले घर में रहते थे। शाम को जब मैं घर वापस लौटा तो मनीषा ने बताया कि लखनऊ से वीरेंद्र सेंगर जी आये हैं। वीरेंद्र सेंगर तब लखनऊ की चिट फंड कंपनी ‘सहारा इंडिया’ द्वारा संचालित साप्ताहिक टेबलॉइड अख़बार ‘शान-ए-सहारा में काम करते थे। वरिष्ठ पत्रकार तड़ित कुमार उस अखबार के संपादक थे और आनंद स्वरूप वर्मा प्रबंध संपादक। कई नामचीन और उत्साही युवा पत्रकार उस अख़बार की संपादकीय टीम में काम करते थे। मैं भी स्वतंत्र पत्रकार के बतौर उसमें लिखा करता था।

यह अख़बार बेशक चिटफंड कम्पनी का था लेकिन उसके सञ्चालन में तब तक उसके मालिक सुब्रत राय का कोई हस्तक्षेप नहीं था और ये सभी ‘तुम्मनखां पत्रकार’ उसे विशुद्ध पेशेवर रूप से निकालते थे। आगे चलकर नोएडा से निकाले अपने अख़बार ‘राष्ट्रीय सहारा’ में श्री राय ने जिस तरह अपने यहाँ काम करने वाले संपादकों और पत्रकारों पर 100% दबाव बनाया, वह संभवतः लखनऊ की इसी पत्रकार टीम के खुल्लमखुल्ला पेशेवरी और मालिक को ठेंगे पर रखकर चलने से उपजी चिढ़ रही होगी।

हमारे घर की बैठक वाले जिस कमरे में सेंगर जी सो रहे थे उसमें छत वाला पंखा नहीं था और एक ‘पेड़ेसिल फैन से काम चलाया जाता था। मैं जब उस कमरे में घुसा तो देखा कि पंखे का पेडेसिल एक ओर ढुलक गया है, हवा उन तक बिलकुल नहीं पहुँच रही है, बावजूद इसके वह पसीने में सराबोर बेसुध गहरी नीद में सो रहे थे। उनकी यह फक्कड़गीरी लम्बे समय तक उनके साथ बनी रही। मैंने पंखे का डायरेक्शन ठीक किया और उन्हें जगाया।

सेंगर जी के साथ मेरी यह पहली रूबरू मुलाक़ात थी। इससे पहले कामकाजी मामलों में हम खत-ओ-खितावत और टेलीफ़ोन के जरिये ही जुड़े रहे थे। उन्होंने बताया कि वह आगरा से जुड़े क़स्बे खेरागढ़ में पत्थर की खदानों में होने वाले एक बड़े घोटाले की स्टोरी करके लौटे हैं। मैंने चिकोटी काटते हुए कहा ‘अरे यार मुझसे ही करवा लेते। उनका ‘सोर्स स्थानीय विधायक था। बाद के दौर में हम गहरे दोस्त बनते चले गए।

कम उम्र में ही उनके सिर के बाल गायब हो गए थे। धीर-गंभीर से दिखने वाले उनके चेहरे पर बड़प्पन बहुत जल्दी हावी हो गया जिसका नतीजा यह निकला कि उनके जानने वाले (चाहे वे उनसे छोटी उम्र के हों या बड़ी) उन्हें ‘सेंगर जी’ कहकर ही सम्बोधित करते थे। मैं उन चंद सौभाग्यशाली लोगों में हूँ जो उनको ‘वीरेंद्र’ कहकर ही बुलाता था और वह मुझे ‘अनिल’ कहा करते थे।

वीरेंद्र सेंगर को जानने के लिए उनके विकास को शुरू से समझना होगा। उनकी पढ़ाई-लिखाई उनके अपने गृह जनपद कानपुर (उप्र) में ही हुई। सत्तर के दशक के अंतिम वर्षों में छात्र जीवन में वह मार्क्सवादी विचारधारा के निकट आये। उनका संपर्क सीपीआई (एमएल) लिबरेशन समूहके साथ हुआ जो उन दिनों उस अंचल के युवाओं में ख़ासा सक्रिय था। वामपंथी विचारों ने ही उन्हें पत्रकारिता की डगर पर चलने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कुछ समय स्वतंत्र पत्रकारिता में बिताए। कुछ समय वह कानपुर के दैनिक जागरण के लिए काम करते रहे। ‘शान-ए- सहारा पत्रकारिता की उनकी पहली नौकरी का संस्थान बना।

शान-ए-सहारा के अल्पकाल में ही उन्होंने बड़ी शानदार रिपोर्टिंग की। छोटा अख़बार होने के बावजूद उनकी अनेक खबरे हिंदी भाषी पट्टी में ख़ासी चर्चा का विषय बनीं। खासकर उत्तर प्रदेश के पहाड़ों में चल रहे प्रथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन को लेकर छपी उनकी व्यापक रिपोर्टों पर बड़ी चर्चा हुईं। गर्मी हो या जाड़ा, वह यूपी के पहाड़ों को खंगालते रहे। पहाड़ियों के अस्त-व्यस्त, ग़रीब और खस्ताहाल जीवन के सूक्ष्म अध्ययन से उन्होंने मैदानी लोगों को बताया कि किस तरह वे उनको लूटने में मशगूल हैं और क्यों पहाड़ियों को अलग राज्य दिया जाना ज़रूरी है। वह स्वयं चूंकि मैदानी क्षेत्र के थे अन्यथा पृथक उत्तराखंड बन जाने के बाद राज्य निर्माण के लिए पत्रकारिता के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान हेतु नया राज्य उन्हें ज़रूर सम्मानित करता।

इसके अलावा और भी कई लोकतान्त्रिक और मानवाधिकार आंदोलनों की जड़ों में घुसकर उन्होंने जिस तरह की ख़बरें की, उन सब ने उन्हें हिंदी के ‘एक्टिविस्ट पत्रकार’के रूप में प्रतिष्ठित किया। अख़बार लेकिन बहुत दिन न चल सका। चिटफंड कम्पनी के अपने हित थे जिनके लिए वह अपने अख़बार का इस्तेमाल चाहती थी। उसमें काम करने वाले पत्रकार इसके लिए तैयार नहीं थे लिहाज़ा ऐसे में टकराव अवश्यम्भावी था। आख़िरकार पत्रकारों और कर्मचारियों ने बग़ावत का बिगुल बजा दिया। यहाँ खड़ा हुआ आंदोलन एक छोटे से संस्थान का एक बड़ा आंदोलन था जिसमें लखनऊ की अखबारी दुनिया की ट्रेड यूनियने तो शामिल हो ही गयी थी, दूसरे संगठनों की यूनियनों ने भी इन पत्रकारों और कर्मचारियों के पक्ष में अपना सिर घुसा दिया था। इसकी

तूती समूचे प्रदेश में गूंजी थी। इस लड़ाई झगडे का नतीजा यह हुआ कि 3 महीने अख़बार के दफ्तर का भवन ‘पेरिस कम्यून’ सरीका बन गया जहाँ का सारा प्रबंधन पत्रकारों और कर्मचारियों के हाथों में रहा। बाद में सुब्रत राय ने मुआवज़ा देकर किसी तरह से अपना पिंड छुड़ाया और अखबार को बंद कर दिया। वीरेंद्र सेंगर जुझारु नेतृत्व की अगली क़तार में शामिल थे। अख़बार बंद होने के बाद वह कुछ समय लखनऊ में इधर-उधर भटके और फिर दिल्ली आ गए। छिट-पुट स्वतंत्र पत्रकारिता के बाद वह साप्ताहिक अख़बार ‘चौथी दुनिया’ से जुड़े।

इस अख़बार का स्वामित्व उद्योगपति कमल मुरारका का था और इसके संपादक थे संतोष भारतीय जो इससे पहले ‘आनंदबाजार पत्रिका प्रकाशन’ समूह (कलकत्ता) की साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ में थे।

नया प्रकाशन शुरू करते समय वह इसी पत्रिका से वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी और रामकृपाल सिंह को भी तोड़ लाये और उन्हें अपने अख़बार के शीर्ष पदों पर बैठाया। नए अख़बार की लॉंचिंग ज़बरदस्त थी। वीरेंद्र सेंगर उसके स्टार संवाददाता थे। मानवाधिकार से लेकर साम्प्रदायिकता के सवाल पर उन्होंने जमकर रिपोर्टें कीं। उनसे पहले साम्प्रदायिकता विरोध के लिए एम० जे० अकबर (अंग्रेजी) और उदयन शर्मा (हिंदी) पत्रकारिता में चर्चित चेहरे थे।

मेरठ के हाशिमपुरा और मलियाना गांव (उप्र०) में पीएसी (पुलिस) द्वारा निरपराध 70 से अधिक मुस्लिमों की नृशंस हत्या की उनकी विस्फोटक रिपोर्ट ने इन लोगों को बहुत पीछे छोड़कर पूरे देश में वीरेंद्र के काम को रोशन किया। यद्यपि 33 साल बाद आये कोर्ट के फैसले ने सभी अपराधियों को बरी कर दिया था लेकिन तब वीरेंद्र की खबर से उपजे राष्ट्रव्यापी विवाद ने स्थानीय प्रशासन को मुक़दमा लिखने और अपराधियों को जेल में डालने को विवश कर दिया था।

अख़बार अच्छा-खासा निकल रहा था लेकिन तभी कुछ ‘शान-ए-सहारा’ टाइप हंगामा ‘चौथी दुनिया’ में भी हुआ। यहाँ झगड़ा संपादक बनाम रामकृपाल सिंह और क़मर वहीद नक़वी था। पूरा स्टाफ संपादक के खिलाफ उठ खड़ा हुआ। लड़ाकुओं में वीरेंद्र यहाँ भी आगे की क़तार में थे। रामकृपाल सिंह और नक़वी लड़ाई के बीच से उठकर ‘नवभारत टाइम्स’ में चले गए। अख़बार बंद हो गया और कुछ अपवादों को छोड़कर सभी पत्रकारऔर कर्मचारी सड़क पर आ गए। यद्यपि रामकृपाल सिंह और कमर वहीद नक़वी से उनके निजी सम्बन्ध (उनके स्वभाव के अनुसार) आजीवन अच्छे ही बने रहे, मुझसे मुलाक़ात में लेकिन उन्होंने कहा था “रामकृपाल जी और नक़वी जी खुद तो बेहतर जगह पहुँच गए लेकिन हम सब को पैदल बना गए।”

‘चौथी दुनिया’ बंद हो जाने के बाद कुछ दिन इधर-उधर झूलते-झालते वह साप्ताहिक ‘सन्डे मेल’ अख़बार से जुड़े। उद्योगपति संजय डालमिया की कम्पनी नए-नए ‘लॉन्च’ हुए इस अख़बार की मालिक थी। ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ समूह में साप्ताहिक ‘दिनमान’ में संपादक के पद पर काम कर रहे कन्हैयालाल नंदन इसके संपादक बने और त्रिलोकदीप कार्यकारी संपादक। ‘सन्डे मेल’ से मुझे जोड़ने का काम वीरेंद्र सेंगर ने ही किया था। मैं तब जयपुर में तालाबंदी का शिकार हो चुकी साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ से निकल कर पैदल था। दोनों संपादक ‘रविवार’ की मेरी रिपोर्टिंग से खासे प्रभावित थे। मैंने दिल्ली ‘शिफ्ट’ होने का मन बना लिया था। दीप जी को मेरे दिल्ली आ जाने का प्रस्ताव पसंद आया।

दिल्ली की अखबारी दुनिया में ट्रेड यूनियन का बाजार सर सब्ज़ था यदयपि नेतृत्व की कमज़ोरियों के चलते वे ‘एक्सप्रेस’ समूह और ‘टाइम्स’ समूहों की लड़ाईयां हार चुकी थीं तब भी सूचना माध्यमों में ट्रेड यूनियनों की तूती कुछ हद तक बरक़रार थी।

मैं जयपुर से ही पत्रकारों के राष्ट्रीय संगठन आईएफडब्ल्यूजे० में सक्रिय था। दिल्ली आकर इसकी राज्य इकाई ‘डीयूडब्ल्यूजे’ में शामिल हो गया। जल्द ही मैं इसका सचिव चुन लिया गया। आगे चलकर मैंने अपने अख़बार में ‘सन्डे मेल एम्प्लॉइज़ यूनियन’ का गठन किया और इसका संस्थापक महामंत्री बना। संपादकों और विभागीय प्रबंधकों ने अपने-अपने स्टाफ को युनियन की सदस्यता न ग्रहण करने के लिए धमकाया लेकिन धीरे-धीरे सदस्य संख्या बढ़ती चली गयी और जल्द ही एक समय ऐसा भी आ ग़या जब पूरा स्टाफ यूनियन के झंडे के नीचे खड़ा हो गया।

मेरे कहने-सुनने पर वीरेंद्र ‘सन्डे मेल एम्प्लॉयज़ यूनियन’ के सदस्य तो बन गए लेकिन ‘यूनियन’ के प्रति उनके भीतर वैसी गर्मजोशी नहीं थी जैसा कि उनका पूर्वर्ती इतिहास था या कि जैसी मैं उनसे अपेक्षा करता था। मुझसे उन्होंने ‘यूनियन’ के किसी पद या ज़िम्मेदारी संभालने से तो साफ़ इंकार कर दिया। मैं चूंकि ‘संडे मेल’ में उनका सबसे पुराण दोस्त था और लंबे समय से उनको ‘ऑब्ज़र्व’ करता आ रहा था अतः मेरे लिए यह समझ पाना मुश्किल नहीं था कि यह उनके यूनियन सम्बन्धी पुरानी असफलताओं का असर है लेकिन मुझे ताज्जुब तब हुआ जब आगे चलकर ऐसा ठंडापन उनके लेखन और उनकी पत्रकारिता में भी झलकने लगा। बाद के दौर में वह बेशक डायबिटिक हुए लेकिन क्या अकेले इसी वजह से वह शारीरिक और मानसिक तौर पर कमज़ोर होते चले गए, गहरे डिप्रेशन के रोगी बन गए? क्या इन्हीं सब बातों का उनके लेखन और उनकी जुझारू पत्रकारिता पर असर पड़ा और क्या इसी वजह से उनकी एकदम से ह्रदय गति रुक गयी? उनके जाने के बाद से मुझे यह सवाल लगातार परेशान कर रहा है।

वीरेंद्र अपनी बेटी वीरा से बेहद प्यार करते थे। यद्यपि वह जिस तरह के ‘डिप्रेशन’ का शिकार हो रहे थे उसके चलते पुत्री के प्रति अपने प्रेम को भी उसके समक्ष बहुत खुल कर प्रकट नहीं कर पाते थे। बेटी ने जब अपने लिए वर खोज लिया तो वह बहुत खुश थे। टेलीफ़ोन पर मुझसे हुई लंबी बातचीत में उन्होंने यह ख़ुशी खुल कर प्रकट की। खास कर वर पक्ष के लोगों के विवाह पूर्ण के आचरण से उन्हें बड़ी तसल्ली थी और वह यह सोचकर बेहद खुश थे कि वीरा जैसी संकोची बेटी अच्छे और संवेदनशील लोगों के यहाँ जा रही है।

विवाह के बाद लेकिन जल्द ही उनका यह भ्रम टूट गया। उन्हें समझ में आ गया कि उनका दामाद और उसके परिजन मूलतः ठग और लुटेरे क़िस्म के लोग हैं और वीरा वहां दुखी थी। बेटी की इस पीड़ा ने उन्हें पूरी तरह तोड़ दिया। अपने इस दुःख का हल्का-फुल्का ज़िक्र उन्होंने टेलीफ़ोन पर मुझसे किया था लेकिन वह भीतर से कितना दुखी हैं, यह मैं नहीं जान सका। कुछ इस वजह से और कुछ उन दिनों की मेरी गहन अस्वस्थता के चलते अंतिम दौर में काफी समय तक हम टेलीफोन वार्ता न कर सके।

अपनी मृत्यु से कुछ ही घंटे पहले उन्होंने हमारे पुराने साथियों- राजकुमार शर्मा और धर्मपाल धनकड़ से फोन पर लम्बी बातचीत में बेटी सम्बन्धी अपने दुःख का विस्तार से विवरण दिया। राजकुमार शर्मा तब यूके० में अपने बड़े बेटे-बहू के साथ बस गए थे और उन दिनों छोटे बेटे के पास मुंबई आये थे। धर्मपाल उस दिन उनसे मुलाक़ात करने मुंबई पहुंचे थे। कुछ ही घंटों के अंतराल पर ‘फेसबुक’ पर वीरेंद्र की मृत्यु की खबर पर विश्वास कर पाना उन दोनों के लिए अविश्वसनीय था। विशेषकर उन दोनों को इस बात का गहरा सदमा लगा कि वे सेंगर जी के भीतर इस हद तक उमड़ते-घुमड़ते दुःख और पीड़ा को तब क्यों न भांप सके!

अपनी युवावस्था में एक लड़ाकू और जुझारू पत्रकार का आगे चलकर इस तरह एक कमज़ोर और टूटे हुए बुज़ुर्ग की तरह अंत होगा, किसी के लिए भी यह विश्वास कर पाना मुश्किल है। मैदानों से शुरू होकर पहाड़ों तक पहुँचने वाली जवानी की उनकी यात्रा अनंत थी। उसका अंत फिर पहाड़ पर क्यों हुआ, जानना मुश्किल है। वीरेंद्र की स्मृतियाँ मुझे परेशान करती रहेंगी।

Related News…

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन