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सियासत

दस साल पहले बंगाल में जो पार्टी हाशिए पर थी अब यदि वह नंबर 1 बन गयी तो हैरानी कैसी?

सुभाष सिंह सुमन-

लोग बड़े सेंटी हो गये हैं। कुछ सुधार के साथ कहें, तो ‘लोग नहीं, खेमेबाज लोग बड़े सेंटी हो रहे हैं।’ एक खेमे की खुशियाँ अपार हुई जा रही हैं, दूसरे खेमे पर गमों का पहाड़ टूटा जा रहा है। मेरे लिए मजेदार बस इतना है कि सेंटी हुए पड़े खेमेबाजों में वैसे लोग भी शामिल हैं, जो खुद को पत्रकार कहते हैं या पत्रकार कहलाना पसंद करते हैं। ये नहीं होना चाहिए।

बंगाल में जो परिणाम आता दिख रहा है, क्या वह वास्तव में उतना अबूझ है, जितना मान लिया जा रहा है? 10 साल पहले जो पार्टी बंगाल में हाशिए पर थी, 5 साल पहले वह नंबर-2 की पार्टी बन गयी, अब वह यदि नंबर-1 बन जा रही है। इसमें किसी को हैरान नहीं होना चाहिए। हाशिए से नंबर-2 बनने के लिए उसने मेहनत की। उसके बाद भी मेहनत करती रही। जनता ने उसी मेहनत को रिवॉर्ड दिया है। अबूझ पहेली का हल वही मेहनत है। कोई रॉकेट साइंस नहीं इसमें। और ईवीएम हैक वाला रोना तो बहुत बचकाना है ही।

केंद्रीय एजेंसियों से मदद मिलने की बात स्वीकारी जा सकती है। हर सरकार अपनी एजेंसियों से मदद लेती आयी है। यह इस लोकतंत्र का स्थापित सत्य है। लेकिन यह उतना बड़ा फैक्टर नहीं होता कि व्यापक परिणाम पलट दे। व्यापक परिणाम जनता ही तय करती है। यदि ऐसा नहीं होता तो आजतक देश में और किसी राज्य में सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ होता। भाजपा के पास यदि केंद्रीय एजेंसियाँ थीं, तो तृणमूल के पास भी राज्य की मशीनरी थी।

सेंटी लोगों के सारे सेंटिमेंट भी बेकार हैं। दोनों खेमों के सेंटिमेंट। एक खेमे को लग रहा है कि इससे मुल्ले टाइट हो जायेंगे, अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ रुक जायेगा, अखंड हिन्दू राष्ट्र स्थापित हो जायेगा, बंगाल फिर से औद्योगिक राजधानी बन जायेगा, बंगाल में विशेष प्रकार की गुंडागर्दी बंद हो जायेगी आदि-इत्यादि। लेकिन होगा इनमें से कुछ भी नहीं। किसी को रत्ती भर शक-संदेह हो, ये बात लिखकर रख ले और 5 साल बाद इन पैमानों को परख ले। भाजपा के विपक्ष में खड़ी पार्टियाँ मुस्लिमों को सिर्फ डर बेचकर बदले में वोट लेने का आसान तरीका जानती हैं। भाजपा वाले उसी तरह ‘मुल्ले टाइट कर देंगे’ का गप्प बेचकर हिन्दुओं के मूर्ख हिस्से का वोट खरीदते हैं।

मोदी सरकार 12 साल में जितने अवैध बांग्लादेशियों को निकाल पायी है, उससे अधिक अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिये मनमोहन सरकार ने 10 साल में बाहर किये थे। यह तथ्य है और सरकारी आँकड़े ही यह कहानी कहते हैं। बंगाल में गुंडागर्दी अलग प्रकार की है। वहाँ गुंडई एक व्यक्ति के नेतृत्व में नहीं होती, कमेटियों के नेतृत्व में होती हैं। आगे भी होंगी। 20 साल पहले उन कमेटियों का रंग लाल था, फिर सफेद हो गया, अब भगवा हो जायेगा। इसके अलावा कोई अंतर नहीं होगा।

दूसरे खेमे के दुख भी कम सेंटिमेंटल नहीं हैं। इस खेमे को लग रहा है अब बंगाल बर्बाद होने वाला है। लेकिन बंगाल पहले से ही क्या कम बर्बाद है? एक और दुख है कि बंगाल सांप्रदायिक हो गया। लेकिन इसके लिए संस्थागत तुष्टिकरण जिम्मेदार नहीं है? सांप्रदायिकता का बीजारोपण तुष्टिकरण से होता है और वह तुष्टिकरण आपका खुद का किया-धरा है। मतलब यदि बंगाल सांप्रदायिक होता लग रहा है, तो इसके दोष भी आपके ही खाते दर्ज किये जायेंगे।

भाजपा के विपक्ष वाले खेमे की एक बड़ी गलती यह है कि वो अपने हिस्से का काम भी जनता के ऊपर छोड़ देते हैं। तृणमूल ने फिर भी बिना लड़े आत्मसमर्पण नहीं किया। कांग्रेस से लेकर सपा और राजद जैसी पार्टियाँ तो जमीन पर उतर ही नहीं पाती हैं। जबकि सामने भाजपा जैसी चुनावी मशीन है, जो सरकार में आने के बाद भी सरकार चलाना छोड़कर चुनाव लड़ने के मोड में रहती है।

अभी वाली भाजपा की एक खासियत है। यह पार्टी कम, सेल्समैन की कई टीम का संगठन अधिक है। इस संगठन की हर सेल्स टीम गंजे को कंघी और अँधे को आईना बेचने में महारत रखती है। लोकतंत्र की व्यवस्था में सफल होने की सबसे बड़ी शर्त भी तो यही है। आप कितने अच्छे से अपनी कहानी बेच पाते हैं, अपने नैरेटिव से जनता को कितना कन्विंस कर पाते हैं, यही सबसे ज्यादा फर्क पैदा करता है। इस बुनियाद पर भाजपा बाकियों से बहुत आगे है।

एक दुख मुझे भी है। यदि मेरे हाथ में निर्णय करना होता, तो मैं बंगाल में भाजपा को 10 सीट भी नहीं देता। देशहित में भाजपा का बंगाल में हारना आवश्यक था। लेकिन बंगाल के हित में तृणमूल का हारना आवश्यक था। मैं निर्णय लेने की स्थिति में होने पर व्यापक देशहित में बंगालहित को बैकसीट पर डाल सकता था। इसी कारण मैं निर्णय लेने की स्थिति में नहीं था।

बंगाल का निर्णय बंगाल को करना था। बंगाल ने अपना निर्णय किया। अब बंगाल के निर्णय का सम्मान करिये।

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