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जुबीन गर्ग की गाई मन्त्र कविता को सुनिए, तभी जान सकेंगे आज हमने किसे खो दिया

कवि पिता और गायक माता ने अपने इस बेटे का नाम ख्यात संगीतकार ज़ुबीन मेहता के नाम पर रखा था. ज़ुबीन की बहन भी गाना गाती थी जिसकी एक सड़क दुर्घटना में तब मृत्यु हो गई थी जब वह एक कंसर्ट देने जा रही थी. इस त्रासदी ने जुबीन को झकझोर डाला…

अशोक पांडे-

आज भारतीय संगीत को बहुत बड़ा सदमा पहुँचा है. 2006 के साल संजय झा की फ़िल्म ‘स्ट्रिंग्स: बाउन्ड बाइ फ़ेथ’ रिलीज़ हुई थी. कहीं से मुझे इस फिल्म का म्यूजिक अल्बम हासिल हो गया. उसमें एक अद्वितीय, आधुनिक कम्पोजीशन मिली – एक मजबूत, युवा आवाज़ में हिन्दी कवि नागार्जुन की अति-प्रसिद्ध, घनघोर राजनैतिक ‘मन्त्र कविता’.

गाने वाले का नाम ज़ुबीन गर्ग. पता चला तीस-बत्तीस बरस के हैं, असम से ताल्लुक रखते हैं. गाने की शैली और दमदार आवाज़ ने मुझे दीवाना बना डाला. बाद में पता चला संगीत भी ज़ुबीन का था.

हिंदी ब्लॉगिंग उन दिनों एकदम नई-नई चीज़ थी. पॉडकास्टिंग उससे भी नई चीज़ थी. कुछ जुगत लगा कर मैंने उसे अपने ब्लॉग कबाड़खाने पर पोस्ट कर दिया. ढेर लोगों ने उस आवाज़ के जादू को पहचाना और खूब सराहा.

फिर उनका नाम छिटपुट सुनने-सुनाने को मिलता रहा लेकिन मन्त्र कविता के मोहपाश के छूट न सका. असंख्य बार सुनता और दोस्तों को सुनाता. दसेक बरस पहले किसी पत्रिका में जुबीन का इन्टरव्यू छपा था.

कवि पिता और गायक माता ने अपने इस बेटे का नाम ख्यात संगीतकार ज़ुबीन मेहता के नाम पर रखा था. ज़ुबीन की बहन भी गाना गाती थी जिसकी एक सड़क दुर्घटना में तब मृत्यु हो गई थी जब वह एक कंसर्ट देने जा रही थी. इस त्रासदी ने जुबीन को झकझोर डाला. फिर उसी बरस उन्होंने बहन की स्मृति में एक अल्बम निकाला.

उस इंटरव्यू के बाद मैंने उसके कामों पर निगाह धरना शुरू किया. मुझे उम्मीद थी कभी न कभी उसके रू-ब-रू होने का मौक़ा ज़रूर मिलेगा. धर्म और ईश्वर को लेकर उसका नज़रिया बेहद आधुनिक था और वह किसी भी तरह के कठमुल्लेपन का खुला विरोध करता था. पिछले बीसेक सालों में उसने नार्थ ईस्ट की तमाम भाषाओं के अलावा हिन्दी, अंग्रेज़ी, बांग्ला, मलयालम वगैरह को मिलाकर चालीस ज़बानों में गाने गाये और असम के सबसे लोकप्रिय गायक के तौर आर स्थापित हुआ.

तमाम सामाजिक कामों में उसने हिस्सेदारी की, जब भी असम पर कोई दैवी आपदा आई, राहत पहुंचाने वालों में जुबीन गर्ग सबसे आगे होता. कोरोना आया तो उसने प्रस्ताव दिया कि उसका गौहाटी वाला घर कोविड सेंटर में तब्दील कर दिया जाए.

एक जुनूनी संगीतकार के रूप में ज़ुबीन के बारे में तमाम दोस्त-हितैषी जानते थे कि वह खान-पान और अपनी दिनचर्या को लेकर खासा लापरवाह है. पिछले पांच सालों में उसे कम से कम तीन बार गंभीर परिस्थितियों में अस्पताल में भरती कराना पडा – दो बार तो वह गाना गाते हुए अचेत हो गया था.

इन दिनों सिंगापुर में नार्थ ईस्ट इण्डिया फेस्टिवल की अंतिम तैयारियां चल रही हैं. कल और परसों यानी 20 और 21 सिताम्बर को होने वाले इस फेस्टिवल में ज़ुबीन ने भी गाना था.

सिंगापुर में आज दोपहर उसकी साँसें थम गईं. किसी अंधड़ की तरह अचानक आए इस समाचार ने मुझे बहुत दुखी कर दिया है.

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