गिरिजेश वशिष्ठ-
मध्यप्रदेश की पत्रकारिता तो कमाल ही कर रही है. एक के बाद एक घटनाएं सामने आ रही है जिनसे लगता है कि जो पत्रकार आज सरकार में थोड़ी बहुत पूंछ और महीने पर लिफाफा आने पर खुश हैं वो आने वाले समय में ये भी खोने वाले हैं.
एक किस्से से शुरू करता हूं. एक घायल सांप एक महात्मा के पास पहुंचा. बोला बहुत कष्ट में हूं बच्चे कभी मेरी रस्सी बनाते हैं . कभी उछालते हैं कभी कुचलते हैं. अब जीवन का अंत दिख रहा है तो आपके पास आया हूं.
महात्मा ने पूछा तेरा ये हाल कैसे हुआ.. तो सांप ने कहा, आपने ही कहा था कि मैं लोगों को हानि पहुंचाना बंद कर दूं तो लोग सम्मान करेंगे. महात्मा ने कहा कि सही कहा था लेकिन ये नहीं कहा था कि तुम काटना तो दूर फुफकारना भी छोड़ दो. लेकिन यहां तो सांप काटना फुफकारना तो दूर चरण चुंबन पर उतारू हैं.
हाल ही में तीन किस्से पता चले. तकलीफ हुई. पहला किस्सा ग्वालियर का है. पप्पू यादव की प्रेस कांफ्रेस थी, पत्रकारों को उन्होंने कह दिया कि बहुत देखे हैं तुम्हारे जैसे पत्रकार.
सोशल मीडिया पर ये शेयर करके कई शेरों ने पप्पू यादव की आलोचना की. जब मैंने वीडियो सुना तो चौंक गया. कुछ पत्रकार प्रेस कांफ्रेंस में पप्पू यादव के वक्तव्य के बीच बोल रहे थे कि भाषण मत दो सीधे काम की बात पर आओ. ये भाषा और शैली तो मध्यप्रदेश की न तो पत्रकारिता की थी न राजनीति की लेकिन पता नहीं कहां से ये विकार आ गया. किसी की प्रेस कांफ्रेंस में आप उसे सुनने आए हैं बोर हो रहे हैं तो निकल लें पर किसी को दपट कैसे सकते हैं.
दूसरा किस्सा और भी रोचक है. राजधानी भोपाल में पत्रकारों को एक बेहतरीन मौका मिला था. उनके हाथ वो धर्मेन्द्र प्रधान आ गए थे जो सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा विवादों में घिरे हैं. नकल, परीक्षा लीक जैसे विवाद सबसे बड़ी हैडलाइन हैं.
भोपाल में एक कार्यक्म था जन संवाद. सरकार के 12 साल पर मीडिया के लोगों को भी बुलाया गया था. धर्मेन्द्र प्रधान के इस कार्यक्रम में पत्रकारों के कैमरा ले जाने पर रोक थी. मोबाइल फोन तक की इजाजत नहीं थी काले कपड़े वाले पत्रकारों तक पर नजर रखी गई. भाई लोग गए . मुंह बंद करके पूरे समय बैठे रहे. धर्मेन्द्र प्रधान भाषण देकर निकल गए. संवाद ऐसा जिसमें एक वक्ता और सारे स्रोता. न कोई सवाल न जवाब. ज्ञान सुनकर सारे लौट आए.
तीसरा किस्सा जो सबको पता है. मुख्यमंत्री के पास उज्जैन के विकास की वो जानाकारी थी जिससे सैकड़ों करोड़ बनाए जा सकते थे. मुख्यमंत्री और उनके परिवार पर आरोप लगा कि उन्होंने इस जानकारी का लाभ लेकर वहीं जमीनें खरीदीं जहां के दाम आसमान पर जाने वाले थे.
इंडियन एक्सप्रेस ने खबर छापी. मध्यप्रेदश वाले ज्यादातर धुरंधर इस खबर पर कुंडली मारकर बैठ गए. पूरे देश में ये ज़मीन घोटाला था, मध्यप्रदेश वालों को पता न चल सके इसकी पूरी कोशिश अखबारों और चैनलों ने की. सोशल मीडिया न होता तो पता भी चल पाता.
आपको क्या लगता है जिस लिफाफे के कारण मुंह पर आज पट्टी है वो पिछले ईमानदार और खुर्राट पत्रकारों के खौफ के डर के कारण है. इन लच्छनों के कारण लिफाफा भी बंद होना पक्का है. इज्जत तो पहले ही जा चुकी है. भाई काट नहीं पा रहे समझ सकते हैं. पर फुंफकारना मत छोड़ो.
मैं जानता हूं कि मालिकों के मुंह में नोट ठुंसे हैं. चैनल चलें न अगर सरकारी फंडिंग न मिले लेकिन सिर्फ मालिकों को कोसे काम नहीं चलेगा. उनके मुंह में नोट ठुंसे हैं तो लिफाफे तुम्हारे घर भी पहुंचते हैं.



