कुमार कृष्णन-
कुछ लोग चले जाने के बाद भी अनुपस्थित नहीं होते। वे अपने शब्दों, अपने सरोकारों और अपने स्पर्श से हमारे भीतर जीवित रहते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा, जिन्हें पूरा पत्रकारिता जगत केवल ‘अमरनाथ’ के नाम से जानता था, ऐसे ही व्यक्तित्व थे। 17 जून 2026 को पटना में उनके निधन का समाचार मिला तो भीतर कुछ टूट-सा गया। ऐसा लगा मानो किसी नदी का प्रवाह अचानक थम गया हो। लेकिन सच तो यह है कि नदियाँ कभी मरती नहीं, वे केवल अपना रास्ता बदलती हैं। अमरनाथ भी अपने पीछे ऐसी ही एक वैचारिक धारा छोड़ गए हैं, जो आने वाले समय तक बहती रहेगी।
मेरा उनसे परिचय पाटलिपुत्र टाइम्स के दिनों का है। वह दौर हिंदी पत्रकारिता में वैचारिक प्रतिबद्धता का दौर था। अमरनाथ की पहचान एक ऐसे रिपोर्टर की थी जो खबरों में मनुष्य की पीड़ा तलाशता था। जब पाटलिपुत्र टाइम्स डगमगाया तो वे गुवाहाटी के पूर्वांचल प्रहरी चले गए। संयोग से मैं भी कुछ समय के लिए उत्तरकाल अखबार में काम करने गुवाहाटी पहुँचा। उस अनजान शहर में दो लोगों ने सबसे अधिक आत्मीयता दी—रविशंकर रवि और अमरनाथ। पेशे की समानता और बिहार की साझा मिट्टी ने हमारे बीच ऐसा रिश्ता बनाया, जो समय के साथ और गहरा होता गया।
बाद में वे जनसत्ता से जुड़े। कोलकाता से निकलने वाले रविवारीय सबरंग में मेरे लेख लगातार प्रकाशित होते रहे और संवाद बना रहा। लेकिन धीरे-धीरे महसूस होने लगा कि अखबार की नौकरी उनके भीतर के सामाजिक कार्यकर्ता को सीमित कर रही है। उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और अपना पूरा जीवन नदी, पानी, जंगल और पर्यावरण के सवालों को समर्पित कर दिया। यह निर्णय केवल नौकरी छोड़ने का नहीं था, बल्कि पत्रकारिता को जीवन के व्यापक अर्थों में जीने का निर्णय था।
वाराणसी में अनिल प्रकाश द्वारा आयोजित गंगा मुक्ति आंदोलन के सम्मेलन की याद आज भी ताजा है। मैं, रणजीव, जनसत्ता के प्रसून लतांत, अरविंद कुमार, द डे आफ्टर मंथ के संपादक अशोक झा और अमरनाथ मिलकर नदी पर आश्रित समुदायों को सम्मेलन से जोड़ने में जुटे थे। उनके लिए नदी केवल जलधारा नहीं थी; वह सभ्यता, संस्कृति और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार थी।
भागलपुर के कहलगांव में हर वर्ष आयोजित गंगा मुक्ति आंदोलन के स्थापना दिवस पर उनसे मुलाकात लगभग तय रहती थी। नदी पर होने वाली हर चर्चा में वे तथ्यों, अनुभवों और संवेदनाओं के साथ उपस्थित रहते थे। 2024 में रांची प्रेस क्लब में पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र को समर्पित कार्यक्रम में उनसे अंतिम मुलाकात हुई। उसके बाद फोन पर बातचीत होती रही। कुछ ही दिन पहले उन्होंने मुंगेर योग पर मेरे लेख की चर्चा करते हुए कहा था—”ध्यान सीखना चाहता हूँ, मुंगेर आऊँगा।” मैंने कहा, “योग दिवस या चातुर्मास में आइए, साथ चलेंगे।”
उन्होंने सहजता से उत्तर दिया—”ज़रूर आएँगे ओर आपके साथ चलेंगे”। लेकिन जीवन की अपनी योजनाएँ होती हैं। यह यात्रा अधूरी रह गई। समाजसेवी राकेश कुमार मंडल का कहना है कि – “रांची प्रेस क्लब में सुप्रसिद्ध पर्यावरण विद अनुपम मिश्र के योगदान और पर्यावरण की चुनौतियों के सवाल पर उन्होंने जो कुछ कहा, वह कोई साधारण पत्रकार के बूते की बात नहीं था,वह एक अध्येता और गहन चिंतनशील व्यक्ति ही कह सकता है।”

26 जून को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के एनेक्सी ऑडिटोरियम में उनकी स्मृति में आयोजित की गयी । कार्यक्रम का संयोजन अभिताभ भूषण ने किया था।कला समीक्षक सुमन कुमार सिंह के अनुसार -“श्रद्धांजलि सभा में पहुँचा तो लगा जैसे किसी पत्रकार को नहीं, बल्कि एक युग को याद करने लोग आए हों।महानगर दिल्ली में किसी पत्रकार के लिए इतना भरा हुआ सभागार विरल दृश्य था। वहाँ मौजूद हर व्यक्ति अपने साथ अमरनाथ की कोई स्मृति लेकर आया था।”
कार्यक्रम का संयोजन वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह ने आत्मीयता के साथ किया। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने कहा कि अमरनाथ उन पत्रकारों में थे जो सत्ता के गलियारों से अधिक समाज के अंतिम आदमी की चिंता करते थे। उन्होंने याद किया कि बेतिया की धरती से निकला यह पत्रकार पूरी जिंदगी जमीन से जुड़ा रहा। बरिष्ठ पत्रकार और राष्ट्रीय सहारा में समूह संपादक रहे ओंकारेश्वर पांडे ने गुवाहाटी के दिनों का एक रोचक प्रसंग सुनाया। जब किसी ने कहा कि असमिया भाषा जाने बिना रिपोर्टिंग कठिन होगी, तो अमरनाथ ने तीन महीने में भाषा सीख ली। वे केवल खबर लिखने नहीं गए थे, बल्कि समाज को समझने गए थे। उन्हें पूर्वोत्तर की नदियों, वहाँ की मछलियों, जनजातीय जीवन और भूगोल का अद्भुत ज्ञान था। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार सुधीर सुधाकर, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार प्रो गौरव वल्लभ ने अमरनाथ की पत्रकारिता का स्मरण किया।
संतोष सिंह ने कहा कि पटना, गुवाहाटी, कोलकाता और दिल्ली तक अमरनाथ की पत्रकारिता का वितान फैला था। उन्होंने उल्फा और बोडो आंदोलन जैसे कठिन विषयों पर गंभीर रिपोर्टिंग की। नदी, पानी, जंगल और पर्यावरण उनके प्रिय विषय थे। संपन्न मैथिल परिवार से होने के बावजूद उन्होंने फक्कड़ जीवन जिया। निजी संघर्षों को कभी सार्वजनिक नहीं किया।
श्रद्धांजलि सभा का सबसे मार्मिक क्षण वह था जब उनकी पुत्री ऑनलाइन जुड़ीं। पिता को याद करते हुए उनकी आवाज़ भर्रा गई। सभागार में बैठे अनेक लोगों की आँखें नम थीं। उस क्षण लगा कि अमरनाथ ने केवल खबरें नहीं लिखीं, उन्होंने रिश्ते भी लिखे थे।
सभा से लौटते समय कला समीक्षक सुमन कुमार सिंह की एक बात लंबे समय तक मन में गूंजती रही—”कुछ लोगों को दो मिनट के मौन में नहीं समेटा जा सकता।” सचमुच, अमरनाथ झा उन्हीं लोगों में थे। वे पत्रकारिता को पेशा नहीं, लोकधर्म मानते थे। छात्र आंदोलन से निकला यह युवा पहले अखबारों की दुनिया में जनपक्षधर आवाज़ बना और फिर नदियों का प्रहरी।
आज जब पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा तात्कालिक चमक और दृश्य प्रभाव में उलझा दिखाई देता है, तब अमरनाथ याद दिलाते हैं कि पत्रकार का पहला दायित्व समाज के प्रति होता है। उनकी कलम में सत्ता से प्रश्न भी था और समाज के प्रति करुणा भी। वे जानते थे कि यदि नदियाँ बचेंगी तो सभ्यता बचेगी, यदि पानी बचेगा तो मनुष्य बचेगा।अमरनाथ झा अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ अब भी गंगा की धारा की तरह बह रही है। उनके शब्द आने वाली पीढ़ियों को यह बताते रहेंगे कि पत्रकारिता केवल सूचना का कारोबार नहीं, बल्कि समाज के प्रति नैतिक जिम्मेदारी है। उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि पुष्प अर्पित करना नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन और मनुष्य के पक्ष में उसी निर्भीकता से खड़ा होना है, जिस निर्भीकता से उन्होंने पूरी जिंदगी अपनी कलम चलाई।कुछ लोग इतिहास की किताबों में दर्ज होते हैं, कुछ लोगों की स्मृतियाँ लोगों के दिलों में। अमरनाथ झा दोनों जगह जीवित रहेंगे।
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