वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ ने दिवंगत पत्रकार और व्यवसायी रवीन्द्र किशोर सिन्हा (आरके सिन्हा) जी से अपने रिश्तों को लेकर बेहद मार्मिक लेख साझा किया है। इसी लेख के कमेंट में दो वरिष्ठ पत्रकारों चंद्र भूषण जी और विवेक शुक्ला जी ने अपनी यादें जोड़ी हैं। जिसमें कुछ टॉप के अखबारों और दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा वित्तीय खुलासा (पनामा पेपर्स घोटाला) जिसमें पनामा की एक लॉ फर्म मोसाक फोन्सेका के आंतरिक डेटाबेस से 11.5 मिलियन गोपनीय दस्तावेज चुराए या लीक किए जाने सम्बंधी कांड था। इसमें कुछ भारतीय हस्तियां जैसे अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय, सचिन तेंदुलकर जैसे लोगों की जानकारियां शामिल थीं। बताया जाता है कि उसमें हिंदुस्तान टाइम्स के मालिकों का भी नाम था, इंडियन एक्सप्रेस ने इसका खुलासा किया था, लेकिन वह HT के मालिकों का नाम पी गया था। जिसे लेकर आरके सिन्हा जी इंडियन एक्सप्रेस से नाराज हो गए थे। इसकी चर्चा नीचे… पहले राकेश कायस्थ का लिखा पढ़िए…

राकेश कायस्थ-
टॉफियों का पुल
उन्होंने लाखों नौकरियाँ सृजित कीं, न जाने कितने बच्चों की उँगलियाँ थामकर उन्हें अनिश्चितता के अँधेरे से निकाला और रोशन ज़िंदगी दी। सैकड़ों लड़कियों का कन्यादान किया और अनगिनत शवों को कंधा दिया। उद्यमी, राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता रवींद्र किशोर सिन्हा के अवसान से कई समानांतर दुनिया एक साथ सूनी हुईं। उनसे जुड़ी अनगिनत कहानियों में एक कहानी मेरी भी है।
मेरी स्मृतियाँ लौटकर बचपन तक आ गई हैं। स्मृतियों के उस कालखंड में वाकई अंधकार बहुत था। बिजली आती नहीं थी और गलती से आ गई तो वोल्टेज इतना कम होता था कि थोड़ा तड़फड़ाने के बाद ट्यूब लाइट जलने से इनकार कर देती थी। बल्ब की पीली रोशनी एक अजीब किस्म का अवसाद पैदा करती थी। इसी माहौल में पंद्रह दिन या महीने भर में हम भाई-बहनों की ज़िंदगी में एक जादू ज़रूर होता था।
दस्तक के बाद राँची के हमारे घर का दरवाज़ा खुलता। कोई एक इंसान अपने दोनों हाथों में जितना कुछ समेट सकता है, अलग-अलग किस्म के टॉफी और चॉकलेट के उतने ही पैकेट थामे वो खड़े नज़र आते थे और चिर-परिचित ऊँची आवाज़ में पूछते—देखो, कौन आया?
सबसे बड़ी मेरी माँ और उनके सात भाई-बहनों में पाँचवें नंबर के रवींद्र किशोर सिन्हा। हमारे मुँह से निकलता—टॉफी मामा!
माँ उन्हें भोजपुरी में डाँटती थी कि पूरी दुकान उठाकर लाने की क्या ज़रूरत थी, इतने टॉफी-चॉकलेट खाकर बच्चे अपने दाँत खराब कर लेंगे। जवाब में वो हँसते—होने दो खराब। दाँत टूटेंगे तो नए निकल आएँगे।
हमारे लिए वो टॉफी मामा थे और अपने भाइयों के बच्चों के लिए टॉफी पापा। अगली पीढ़ी के बच्चों के लिए वो टॉफी बाबा और टॉफी नाना बन गए। मामी को भी इसी आधार पर कई उपनाम मिले—टॉफी मामी, टॉफी मम्मी, टॉफी दादी वगैरह-वगैरह।
हमारे नाना बिहार विधानसभा में सहायक सचिव थे। पटना के गर्दनीबाग और फिर बेली रोड के सरकारी घरों में हमारे बचपन का काफी वक्त बीता। सर्दियों की धूप सेंकते टॉफी मामा स्लेट पर मुझे हिंदी और अंग्रेजी वर्णमाला के प्रारंभिक अक्षर लिखना सिखाते थे। उनके सिखाने का तरीका अनोखा था—“ये एक लाइन तुम्हारे पापा की, एक लाइन अम्मा की और बीच की लाइन तुम्हारी और इस तरह बन गया ।”
तब तक मेरे एक मामा IAS बन चुके थे। नाना की ख्वाहिश थी, तीसरा बेटा यानी रवींद्र IPS बने लेकिन उन्हें सीधा जवाब मिला—“बाबूजी हम नौकरी करे ला नइखी बनल।”
राजसी तबीयत और ठसक उन्होंने शुरू से पाई थी। धुंधली स्मृतियों में जो एक तस्वीर अब भी बची रह गई है वो ये कि नंगे बदन वाला एक बूढ़ा आदमी रिक्शा खींचता हुआ किसी मेहमान को घर लेकर आया। मामा की नज़र उस पर पड़ी और उन्होंने तुरंत अपनी वो कमीज़ उसे पहना दी जो अभी-अभी उतारकर हैंगर पर टाँगी थी। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी स्वैग भरी इसी दानवीरता के साथ जी।
पत्रकारिता छोड़कर एक देश की सबसे बड़ी सिक्योरिटी एजेंसी SIS बनाने और दस हज़ार करोड़ रुपये से अधिक का कॉरपोरेट एंपायर खड़ा कर लेने की उनसे जुड़ी अनगिनत दंतकथाएँ यहाँ-वहाँ तैर रही हैं। मैं सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि ये सब अनायास या किसी जादू से नहीं हुआ। असाधारण किस्म का अनथक संघर्ष, बरसों का परिश्रम, अनगिनत प्रयोग और अनेक विफलताएँ उनकी सहयात्री रहीं।
युवा होने के बाद हम अपने संघर्ष के रास्ते पर चले और टॉफी मामा अपना आर्थिक साम्राज्य और बड़ा बनाने निकले। सुरक्षा उपकरणों के अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में क्या हो रहा है या इंडस्ट्री का ग्लोबल ट्रेंड क्या है, ये पता करने के लिए मामा दुनिया भर की ख़ाक छानते रहे। टाई-अप, बिजनेस डील, कोलैबोरेशन, एक ऐसा समय था, जब महीने के बीस या पच्चीस दिन वो यात्राओं पर रहते।
बीच में एक दौर ऐसा भी आया जब दो-तीन साल तक हमारा संपर्क उनसे लगभग टूटा रहा। फिर एक दिन मेरे भाई के ऑफिस के पते पर उनकी एक चिट्ठी आई। उन्हें ये मालूम हुआ था कि राजेश को उसकी पहली नौकरी इंडिया टुडे में मिली है। उनकी लंबी चिट्ठी की चार-पाँच लाइनें मुझे अभी भी लगभग शब्दशः याद हैं—“सफलता का शॉर्टकट नहीं होता और मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। संघर्ष में अगर आनंद आने लगे तो जिंदगी बहुत आसान हो जाती है। धीरे-धीरे तुम यह समझ पाओगे कि जो लोग अपना काम ठीक से करते हैं, वो सिर्फ व्यस्त दिखते नहीं हैं बल्कि सचमुच व्यस्त होते हैं।”
वो वाकई बहुत व्यस्त थे और इसकी कीमत परिवार और उनका खुद का अपना शरीर चुका रहा था। अधेड़ होने से पहले ही उन्हें बीपी और डायबिटीज जैसी अनगिनत बीमारियों ने घेर लिया था लेकिन तमाम बीमारियों को मुँह चिढ़ाते और भूँजे की तरह आधा दर्जन टैबलेट फाँककर वो काम पर निकल पड़ते। काम यानी एक दिन में तीन-चार फ्लाइट बदलकर अलग-अलग शहरों में मौजूद अपने दफ्तरों के दौरे, दर्जनों मीटिंग और इन सबके बीच शाम को पार्टी भी। कवि, शायर और गायकों की महफिल सजाने और दरबार लगाने का उन्हें बहुत शौक था।
टॉफी मामा अपनी दुनिया में रमे थे लेकिन प्रयोजन रहित बतकही के लिए सिर्फ एक कॉल की दूरी पर थे, मेरे लिए संबंधों का सबसे सुंदर पक्ष यही था। हमारी स्मृतियों में बहुत कुछ साझा था। इसकी बड़ी वजह मेरी अम्मा थी, जो हमें पकड़-पकड़कर इतनी बार अपने बचपन, दादा, परदादाओं की कहानियाँ सुनाती थीं कि सब कुछ कंठस्थ हो गया था। मामा ये बात जानते थे और जब भी कोई पुरानी बात याद ना आए तो मुझे फोन घुमा देते थे। वो व्यस्त थे, गतिशील थे लेकिन हर सुख-दुख में किसी चमत्कार की तरह उपलब्ध थे।
वो हर किसी को बाल-सुलभ उत्साह से बताते थे कि मेरी दीदी के तीनों बच्चे विनीता, राजेश और राकेश मुझे देखकर ही पत्रकार बने हैं। उनकी ये बात एक हद तक ठीक भी थी। धर्मयुग और माया जैसी पत्रिकाओं के कई पुराने अंक हमारे घर में बहुत हिफाजत से रखे थे, जिनमें उनकी कवर स्टोरी छपी थी।
“मेरे परिवार के सारे बच्चे मेरी ही तरह सेल्फ मेड हैं”—ये उनका एक और पसंदीदा डायलॉग था जो हर किसी के सामने दोहराते थे। उनके औद्योगिक साम्राज्य, राजनीतिक जीवन और विभिन्न प्रकार के सामाजिक कार्यक्रमों में से ज्यादातर से मेरी दूरी बनी रही। राजनीति को लेकर मेरी राय से भी वो परिचित थे लेकिन इन बातों ने उन्हें कभी मेरे प्रति असहज नहीं किया।
जीवन के उत्तरार्ध में वो बिल्कुल अलग व्यक्ति हो चुके थे। उनके बेटे ऋतुराज ने SIS को ऑस्ट्रेलिया से सिंगापुर तक फैली ढाई लाख कर्मचारियों वाली एक MNC बना दिया। अब उनके पास अपने पारिवारिक सामाजिक कामों के लिए वक्त ही वक्त था। वो अपना कुनबा सहेजने के फिक्रमंद एक बुजुर्ग बन चुके थे, जो दूर-दराज तक के रिश्तेदारों को ढूँढकर संबंधों को पुनर्जीवित कर रहा था। वो फैमिली री-यूनियन के मौके ढूँढते और रिश्तेदारों को एक-दूसरे से मिलवाते।
बाद में भारतीय जनता पार्टी का नेता होना उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया था लेकिन सच ये है कि पार्टियों से परे हर जगह उनकी मित्रता थी। दुनिया ने उन्हें एक रसूखदार आदमी के तौर पर देखा जिसकी शवयात्रा तक में मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की भीड़ नज़र आई लेकिन भीतर की मनुष्यता से हर कोई परिचित नहीं था। निरपेक्ष भाव से देखूँ तब भी यही लगता है कि मेरे मामा सही मायने में बड़े आदमी थे। राजाओं जैसा उनका व्यवहार भ्रम पैदा कर सकता था लेकिन असल में वो कोमलता से और करुणा से भरे एक ऐसे इंसान थे, जिसके भीतर केवल सकारात्मकता थी।
टॉफी मामा देहरादून के अपने इंडियन पब्लिक स्कूल को ‘दून’ से बड़ा बनाना चाहते थे। IPS एक मशहूर संस्थान बना लेकिन ज्यादा बड़ी बात ये है कि इसने ऐसे सैकड़ों बच्चों की जिंदगियाँ बदल दीं, जिसकी कल्पना उनके माता-पिता नहीं कर सकते थे।
मामा का पूरा पर्सनल स्टाफ, कुक, ड्राइवर, माली डोमेस्टिक हेल्प, पिछले बीस साल में इन सबके सैकड़ों बच्चों ने इंडियन पब्लिक स्कूल में मुफ्त में तालीम पाई। इतना ही नहीं सामाजिक हैसियत के निचले पायदान पर खड़े कई मेधावी बच्चों को बड़ी स्कॉलरशिप के साथ एडमिशन देने की पॉलिसी भी उन्होंने लागू की। इनमें से कुछ बच्चे IIT और IIM तक पहुँचे। कई बच्चे डॉक्टर और CA भी बने। निजता का हनन नहीं करना चाहता इसलिए नाम नहीं लिख रहा लेकिन बरसों से मामा की तीमारदारी करने वाले भइया ने बताया कि उनके दोनों बच्चे IPS से निकलकर अब UK में पढ़ रहे हैं।
शायद ही देश में कोई और ऐसा उद्योगपति या राजनेता होगा जिसने अपने आसपास के लोगों की जिंदगियाँ इस तरह बदली हों। अपने पुराने पत्रकार साथियों की भी उन्होंने खुले दिल से मदद की।
दो बार किडनी ट्रांसप्लांट के बावजूद वो जी भरकर जीते थे। डायबिटीक होने के बावजूद मीठा जमकर खाते थे। माँ उनसे 11 साल बड़ी थी। वो जब लगभग मृत्युशय्या पर थी, तब वो ज़िद करके उन्हें अपने साथ अयोध्या लेकर गए क्योंकि कभी उन्होंने इस बात की इच्छा जताई थी।
किसी एक व्यक्ति की मृत्यु उसकी मौत नहीं होती, उसके साथ पीढ़ियों से संचित स्मृतियाँ चली जाती हैं। मेरी माँ के दादाजी मेरे लिए तब जीवित थे, जब तक माँ थीं। मामा के साथ भी बहुत कुछ चला गया। मृत्यु एक जैविक प्रक्रिया है, इसमें कुछ भी अजूबा नहीं। फिर भी मुझे रह-रहकर ऐसा लग रहा है कि मैं फिर से पाँच साल का हो गया हूँ और टॉफियों के पुल पर बिल्कुल अकेला खड़ा हूँ। ये एहसास किसी बच्चे के हाथ से गुब्बारे के छूट जाने जैसा है।
यहां पढ़िए पनामा पेपर्स केस संबंधी दो वरिष्ठ पत्रकारों की कमेंट चर्चा…
चंद्र भूषण-
मेरे मित्र, वरिष्ठ पत्रकार विवेक शुक्ल उन्हें बहुत पसंद करते थे लेकिन मेरी अच्छी राय उनके बारे में कभी नहीं बन पाई। खासकर उस घटना के बाद से, जब पनामा पेपर्स या किसी और घपले में अपना नाम आने पर उन्होंने यह लिखकर कुछ बोलने से मना कर दिया था कि आज उनका मौन व्रत है! यह मौन व्रत कभी नहीं टूटा। अभी सोचता हूं, उनके जीते जी यह संस्मरण पढ़ पाता तो आर के सिन्हा के प्रति मन में नफरत कुछ कम होती।
Chandra Bhushan जी पनामा पेपर वाले मामले में मेरी उनसे बात हुई थी उनके ईस्ट ऑफ कैलाश वाले ऑफिस में। वे इंडियन एक्सप्रेस से नाराज़ थे। वजह थी कि उस केस में हिंदुस्तान टाइम्स के मालिकों का भी नाम था पर उसका जिक्र नहीं किया गया। ऐसा उनका कहना था। उन्होंने यहां तक कहा था, विवेक गोयनका के अखबार को खरीद लूंगा। पहली बार वे अपनी मनी पॉवर दिखा रहे थे। फिर उनकी ओर से दर्जनों अखबारों में आरोपों का खंडन छपा था विज्ञापन की शक्ल में।
-विवेक शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार
चंद्र भूषण-
Vivek Shukla विज्ञापन दिए होंगे, सवालों के जवाब तो नहीं दिए। विदेशी खातों की शक्ल में गैरकानूनी काम जिन लोगों ने भी किए उन्हें जवाब देने चाहिए थे और कानूनी कार्रवाई का सामना करना चाहिए था। लेकिन जब सरकार ही ऐसे तीन बड़े खुलासों पर चुप्पी साध गई हो तो सिन्हा जी जैसे खाते वालों को क्या कहा जाए।
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