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सुख-दुख

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार श्याम कुमार की पत्रकारिता का 66वाँ वर्ष शुरू, पढ़िए उनके जीवन और करियर की कहानी!

Close-up of an elderly man with gray hair, a white mustache, and dark glasses, looking upward.

श्याम कुमार-

मेरी पत्रकारिता का 66वां वर्ष शुरू : 2 नवम्बर, 2026 को मेरी पत्रकारिता का छियासठवां वर्ष आरम्भ हो गया। अर्थात् मेरी पत्रकारिता को आधी शताब्दी से भी काफी अधिक समय हो चुका है।

मैं बीस वर्ष का था, जब पत्रकारिता में आया था। आज भी मुझे वह दिन याद है, जब 2 नवम्बर, 1961 को मैंने इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के विशाल लीडर प्रेस परिसर में पहली बार कदम रखा था। लीडर प्रेस नामक मीडिया प्रतिष्ठान की स्थापना महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने की थी तथा उसकी देश में बड़ी प्रतिष्ठा थी। वहाँ से देश के दो सुविख्यात राष्ट्रीय दैनिक समाचारपत्र हिन्दी में ‘भारत’ और अंग्रेजी में ‘लीडर’ प्रकाशित होते थे।

दैनिक ‘भारत’ के नित्य अनेक संस्करण प्रकाशित हुआ करते थे तथा कई राज्यों में अखबार का व्यापक प्रसार था। लीडर प्रेस परिसर में ‘भारती भंडार’ नामक देश का सबसे महत्वपूर्ण प्रकाशन केंद्र था, जहाँ से हिन्दी के लगभग सभी महान साहित्यकारों की पुस्तकें प्रकाशित होती थीं। वर्ष 1961 में ही मैं ‘जनसंसद’ साप्ताहिक का सम्पादक भी बना तथा वह साप्ताहिक विभिन्न जनपदों में काफी लोकप्रिय हो गया।

उस समय इलाहाबाद (प्रयागराज) पूरे देश का केंद्रबिंदु था तथा शिक्षा, साहित्य, विधि, पत्रकारिता, सांस्कृतिक कार्यकलापों, राजनीति आदि का देश में सबसे बड़ा गढ़ माना जाता था। प्रयागराज में छह-छह वर्ष बाद, अर्थात् हर बारह वर्ष के अंतराल पर लगने वाले महाकुम्भ एवं कुम्भ विश्वविख्यात हैं।

जिस दिन मैंने पत्रकारिता में कदम रखा, उसी दिन से मेरा जीवन अपना नहीं रहा तथा पूरी तरह पत्रकारिता को समर्पित हो गया। मुझे केवल शयन और स्नान का समय मिल पाता था। पारिवारिक परम्परा के अनुसार मेरी समाजसेवा के कार्यों में भी बहुत रुचि थी तथा उसी परम्परा का अनुसरण करते हुए समाजसेवा के कार्यों में मेरा धन और समय व्यय होने लगा। इस परोपकारी प्रवृत्ति से मेरी व्यस्तता और भी अधिक बढ़ गई थी। लोगों की समस्याएँ हल करने में मुझे सुख की अनुभूति होती थी।

मेरी यह मान्यता है कि पत्रकारिता एवं समाजसेवा परस्पर अभिन्न हैं तथा एक-दूसरे के पूरक हैं। समाचारपत्र केवल समाचारों की प्रस्तुति नहीं, बल्कि जनसेवा एवं देशहित का माध्यम भी होता है।

1961 में ही जनवरी में मैंने अखिल भारतीय सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं समाजसेवी संस्था ‘रंगभारती’ की स्थापना की थी, जिसके देशभर में दस हजार से अधिक सदस्य हो गए। उनमें देश की हर विधा की बड़ी से बड़ी हस्तियाँ शामिल थीं। ‘रंगभारती’ के कार्यकलापों की बहुत लम्बी श्रृंखला बन गई।

‘रंगभारती’ ने 1961 में प्रयागराज के परी भवन में देश का पहला हास्य कवि सम्मेलन आयोजित किया तथा मेरी वह ‘गंगोत्री’ देश में ‘महासागर’ का रूप धारण कर चुकी है।

वर्ष 1970 में मैंने ‘अखिल भारतीय हिन्दी पत्रकार संघ’ की स्थापना की। 12 अप्रैल, 1971 को प्रयागराज के हिन्दी साहित्य सम्मेलन में उसका भव्य उद्घाटन समारोह हुआ था, जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन नगर प्रमुख (अब महापौर) श्याम नारायण कक्कड़ ने की थी तथा मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. बेजवाड़ा गोपाल रेड्डी थे।

24 जनवरी, 1985 को प्रयागराज में ही मैंने देश में पहली बार ‘उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस’ के रूप में उत्तर प्रदेश की वर्षगाँठ का आयोजन शुरू किया। मेरे उस आयोजन का उद्देश्य था उत्तर प्रदेश के विभाजन की माँग करने वाली विभाजनकारी प्रवृत्ति को हतोत्साहित करना। उस भव्य उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति हरिश्चन्द्रपति त्रिपाठी ने की थी तथा मुख्य अतिथि महान साहित्यकार महादेवी वर्मा थीं।

वर्ष 1966 में प्रयागराज के महाकुम्भ में विराट सन्त-साहित्यकार सम्मेलन आयोजित कर मैंने इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किए जाने का अभियान शुरू किया था, जो मेरे अथक प्रयास से पूर्व राज्यपाल राम नाईक की संस्तुति पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में पूरा हुआ। मैंने अन्य अनेक कार्यकलापों की नींव पहली बार डाली, जिनकी बहुत लम्बी सूची है।

दैनिक ‘भारत’ के प्रधान सम्पादक शंकरदयालु श्रीवास्तव मेरे पिताजी के मित्र थे तथा उनका मेरे यहाँ आना होता था। लेकिन मेरी उनसे कभी भेंट नहीं हुई थी। मैं जब हाईस्कूल में था, तभी से मेरी भाषा पूर्णरूपेण मँज चुकी थी। मैं दैनिक ‘भारत’ में ‘पाठकों के पत्र’ स्तम्भ में पत्र लिखा करता था, जिससे प्रधान सम्पादक शंकरदयालु श्रीवास्तव प्रभावित थे। अचानक पिताजी का निधन होने के बाद उन्होंने मुझे ‘भारत’ में बुला लिया। उसी समय मैंने एमए किया था।

दैनिक ‘भारत’ में मुझे अपने वरिष्ठों से पत्रकारिता का अत्यंत कठोर प्रशिक्षण मिला। मैंने अपने जीवन में डॉ. धर्मवीर भारती एवं हेरम्ब मिश्र से अधिक योग्य पत्रकार फिर नहीं देखे। दैनिक ‘भारत’ में हेरम्ब मिश्र मेरे वरिष्ठ थे। अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अरविंद नारायण मिश्र के बाबा बाबूराम मिश्र भी मेरे वरिष्ठ सहयोगी थे। शंकरदयालु श्रीवास्तव उच्चकोटि के सम्पादक थे तथा उनका बड़ा नाम था।

दैनिक ‘भारत’ में मेरे प्रधान सम्पादक ने मुझे सीख दी कि देश से बड़ा कुछ नहीं होता है तथा पत्रकार के लिए देशहित सर्वोपरि होना चाहिए। उक्त वाक्य मेरे लिए मन्त्र हो गया। पत्रकारिता भाव, भाषा एवं अभिव्यक्ति का मिश्रण है, यह मेरा सिद्धान्त व आधार बना। मेरे परिवार के अन्य लोग भी वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा हम सबने हमेशा ईमानदारी, आदर्श एवं उच्चकोटि की पत्रकारिता की।

कालान्तर में लीडर प्रेस पर सुविख्यात उद्योगपति घनश्याम दास बिरला का स्वामित्व हो गया था। उतना विशाल परिसर देश के किसी समाचारपत्र के पास नहीं था। उसमें पत्रकारों के लिए आवासीय बंगले भी बने हुए थे। उस समय मेरा दिल्ली, मुम्बई व अन्य महत्वपूर्ण नगरों में प्रायः जाना होता था तथा सभी जगह अखबारों में पत्रकारों व सम्पादकों से मेरी घनिष्ठता थी। जितने अधिक योग्य पत्रकार ‘भारत’ में थे, उतने कहीं भी नहीं थे। हेरम्ब मिश्र, कृष्ण बिहारी श्रीवास्तव और कुसुम कुलश्रेष्ठ पत्रकारिता के बेजोड़ रत्न थे।

वहाँ विश्वम्भर नाथ जिज्जा थे, जो पत्रकारिता ही नहीं, पुरानी राजनीतिक गतिविधियों के भी जीवंत इतिहास थे। हिन्दी की पहली कहानी उन्होंने लिखी थी। जब मैं ‘भारत’ परिवार में शामिल हुआ, तब जिज्जा जी 70 वर्ष के थे तथा स्वभाव के बड़े कड़क थे। मजाल नहीं थी कि कोई नया पत्रकार टेलीप्रिंटर छू ले। लेकिन ‘भारत’ में अधिकतर पत्रकार घोर अर्थाभाव में थे। मैं सम्पन्न परिवार का था, इसलिए उस गरीबी को देखकर दहल गया था।

उस समय अधिकांश समाचार ‘पीटीआई’ एवं ‘यूएनआई’ से टेलीप्रिंटर पर अंग्रेजी में आते थे। ‘हिन्दुस्थान समाचार’ व ‘नाफेन’ आदि समाचार अभिकरण हिन्दी में समाचार भेजते थे, किन्तु उनके समाचारों की मात्रा नगण्य थी। सम्पादकीय मेज पर हर पत्रकार को नित्य अंग्रेजी से हिन्दी में चार अखबारी कॉलम के समाचारों का अनुवाद करना होता था। उस समय अखबार बड़े आकार के होते थे। ‘भारत’ में लगभग सभी सहयोगी कठोर परिश्रमी थे। सामान्य ड्यूटी में कठिन परिश्रम करने के बाद आर्थिक लाभ के लिए वे ‘डबल ड्यूटी’ किया करते थे।

जब मैं वहाँ नया था, तो एक दिन मेरे वरिष्ठ सहयोगी गणेश भारती मुझे अनुवाद के लिए थोक में समाचार देते जा रहे थे। मैं बोल पड़ा कि इतनी मेहनत करने पर मर जाऊँगा, तो भारतीजी ने उत्तर दिया था—‘मेहनत करने से कोई नहीं मरता।’ उनका वह वाक्य मैंने आत्मसात कर लिया और अस्वस्थता में भी, जब तक बिल्कुल मजबूर न हो जाऊँ, मैं सारे कार्य यथावत करता रहता हूँ।

पत्रकारिता में मेरी लगन, परिश्रम एवं समर्पण का ही फल है कि मुझे निकट से जानने वाले जो थोड़े लोग बचे हैं, वे आज भी पत्रकार के रूप में मेरे योगदान को अद्भुत मानते हैं और भूरि-भूरि सराहना करते हैं। मैं हमेशा आम लोगों से निकट रूप से जुड़ा रहा तथा मेरी पत्रकारिता का सरोकार विशेष रूप से आम जनजीवन रहा है। इसीलिए जनता में मुझे सदैव भरपूर सराहना मिली तथा मेरी छह दशक से अधिक की पत्रकारिता में वही सराहना मेरा सबसे बड़ा सम्मान सिद्ध हुई। देशहित का लक्ष्य लेकर मेरी पत्रकारिता अभी भी सक्रिय रूप में है।

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