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सियासत

बिहार में ‘कैश-फॉर-वोट’ की गूंज : ट्रक, अंधेरा और कूड़े में वीवीपैट; आयोग पर ‘धृतराष्ट्र’ होने का ठप्पा!

अरुण श्रीवास्तव-

पैसे लो वोट दो… बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे को लेकर एक हिंदी फिल्म का गाना याद आ रहा है “जूते दो, पैसे लो”। तो क्या मतदाताओं ने पैसे ले लिए और वोट दे दिए। कुछ इसी तरह की आशंका तो विपक्ष जता रहा है और राजनीतिक हल्कों में भी ऐसी ही चर्चा जोरों पर है तो राजनीतिक ‘पंडित’ भी अचंभित हैं! ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह मतदाताओं को दी गई रिश्वत थी? अगर थी तो चुनाव आयोग देखता क्यों रहा उसका दायित्व क्या था? उसने इसे रोका क्यों नहीं? जब पब्लिक डोमेन में यह बात सामने आ गई कि सासाराम के एक मतगणना केंद्र में रात के अंधेरे में एक ट्रक घुसी, तो दूसरी मतगणना केंद्र में अचानक बत्ती गुल हो गई और बड़ी मात्रा में व वीवीपैट से निकलने वाली पर्चियां कूड़े के ढेर में पाई गईं। क्या इन सबकी निगरानी और जवाबदेही चुनाव आयोग की नहीं बनती? वह धृतराष्ट्र क्यों बना रहा?

इससे मिलते जुलते आरोप SIR को लेकर भी लगते रहे हैं पर वह उसका माकूल जवाब देता हुआ नहीं दिखता। यही नहीं वह इन सवालों का सामना भी नहीं करना चाहता तभी तो संवाददाता सम्मेलन में एक साथ पांच-पांच सवाल लिए जाते हैं ताकि अपने सवालों को संवाददाता भूल जाएं और उसका जवाब भी या उन सभी का जवाब भी याद ना आए। किसी एक सवाल का जवाब देकर अपने कर्तव्यों की ‘इतिश्री” कर ली जाती है।

किसी भी चुनाव में तीन पक्षों की भूमिका मायने रखती है। पहला मतदाता, दूसरा उम्मीदवार और तीसरा चुनाव आयोग या चुनाव संपन्न कराने वाले अधिकारीगण। बाकी निगरानी यानी पर्यवेक्षक की भूमिका में होते हैं। हस्तक्षेप का अधिकार नहीं होता अगर अधिकार होता है तो सुप्रीम कोर्ट का वो भी तब संविधान की मर्यादा रौंदी जा रही हो। बावजूद इसके कि, चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। चुनाव के नियमों का पालन करना उम्मीदवारों की जिम्मेदारी है तो नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी आयोग की है।

आयोग का काम ही निष्पक्ष चुनाव करवाना और सही मतदाता सूची तैयार कराना है। इसके लिए उसके पास असीम पावर होती है अधिसूचना जारी होने के बाद सारी प्रशासनिक व्यवस्था चुनाव आयोग के अधीन होती है। जरूरी विभाग कार्य भी चुनाव आयोग की अनुमति के बाद ही होते हैं।

चुनाव आयोग की भूमिका : हर चुनाव के आगे पीछे आयोग की भूमिका पर सवालिया निशान शुरू से ही लगते रहे हैं और बाद में भी लगेंगे। आयोग की जिम्मेदारी है कि वह सारी शंकाओं को दूर करें, लेकिन जब वह खुद ही शंका के दायरे में आ जाए तो सवालिया निशान लगेंगे ही। नए चुनाव आयुक्त ईमानदार कैसे हो सकते हैं इसका अंदाजा मुख्य आयुक्त की नियुक्ति से भी लगाया जा सकता है। कुछ महीने से मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन था। इस दौरान कोर्ट ने नया कानून बनाने का आदेश दिया और जब तक नया कानून नहीं बनता तब तक पुराने पर ही चलने की सलाह भी थी। पर सरकार ने आनंद-फानन में नया कानून बनाकर पास भी करा लिया। अब तक की परंपरा रही कि चुनाव आयोग की नियुक्ति सीबीआई के मुखिया के अनुसार होती है। पहले नियुक्ति समिति में तीन सदस्य होते थे प्रधानमंत्री नेता, प्रतिपक्ष और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश।

नए नियम के अनुसार नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री, उनके कैबिनेट का एक मंत्री और नेता प्रतिपक्ष को शामिल किया गया। इस तरह से देखें तो नियुक्ति में हमेशा सत्ता पक्ष की ही चलेगी क्योंकि दो के खिलाफ केवल एक मत ही शामिल रहेगा। इस नए नियम के तहत नियुक्ति चुनाव आयुक्त की मनमानी भी काबिले गौर है। ऐसा नहीं कि पहले मनमानी नहीं होती थी पहले भी सत्ता पक्ष के इशारे पर ही ज्यादातर कार्य चुनाव आयोग करता था बावजूद इसके उसके कार्य प्रणाली में थोड़ी तो पर्दादारी थी ही। नए चुनाव आयुक्त ने मतदाता सूची तैयार करने की घोषणा की जिसे एसआईआर के रूप में जाना जाता है। इसकी शुरुआत बिहार में की गई और उसे वक्त जब बिहार सहित पूरा देश बाढ़ की चपेट में था।

इस प्रक्रिया में वोटरों को कुछ प्रपत्र जमा कर प्रमाणित करना था कि वो जायज मतदाता हैं। इसके लिए उन्हें बहुत ही कम समय दिया गया था और यह प्रक्रिया बिहार से तब शुरू की गई जब बिहार सहित देश के अधिकतर प्रदेश बाढ़ की चपेट में थे और वहां कुछ ही माह बाद चुनाव होने थे। एसआईआर चुनाव बाद भी कराए जा सकते थे। मसलन यूपी और उत्तराखंड के चुनाव बहुत दूर थे इसकी शुरुआत इन प्रदेशों से भी हो सकती थी। दूसरा पक्षपात चुनाव तिथि की घोषणा भी है। चुनाव ऐसे वक्त कराये गए जब बिहार का सबसे बड़ा पर्व छठ होता है। इस पर्व को मनाने के लिए देश के बाहर से भी बिहारवासी अपने-अपने गांव आते हैं। चाहे होली दिवाली पर न पहुंचे पाएं पर छठ पर जरूर पहुंचते हैं।

एसआईआर में तमाम खामियों के बाद भी और महाराष्ट्र व हरियाणा के चुनाव में मतदाता सूची में कथित तौर पर बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां सामने आने के बाद भी चुनाव आयोग विपक्ष की एक नहीं सुना यहीं उसका दोहरा चरित्र भी सामने आ गया।

बिहार चुनाव के दौरान तेजस्वी यादव ने अपने पास दो-दो मतदाता सूची कार्ड होने की बात कही, तब चुनाव आयोग सख्त होते हुए उन्हें चेतावनी तक दे डाली पर वहीं पर बिहार के उप मुख्यमंत्री विजय सिन्हा के पास दो मतदाता कार्ड होने की बात सामने आयी तब पर चुनाव आयोग मौन हो गया। यही नहीं अन्य विभागों के पक्षपात भी चुनाव को प्रभावित करने जैसे दिखाई दिए जैसे रेलवे ने छठ पर्व पर 12 हज़ार स्पेशल ट्रेनें चलाने की घोषणा की। चली कितनी आज तक किसी को नहीं पता। वही बिहार चुनाव के दौरान सिर्फ हरियाणा से ही की एक जिले से ही कई ट्रेनें चलाई गईं वह भी आम ट्रेनों की तरह नहीं कि उसमें सभी दर्जे की बोगी लगती हो, सारी की सारी सवारी गाड़ी की तरह। अब मानक के अनुसार बोगियां लगतीं तो पता चलता कि रिजर्वेशन करा कर कितने लोग बिहार गए और रिजर्वेशन कब कराया था।

यही नहीं जब एक विदेशी सेलिब्रेटी की फोटो हरियाणा विधानसभा चुनाव में वोटर आईडी कार्ड पर मिली वो भी कई जगहों पर। तो मतदाता सूची में बड़ी संख्या में ऐसे-ऐसे वोटर शामिल हैं जिनके पते के आगे शून्य है। आयोग का तर्क था कि जिन मतदाताओं के मकान का नंबर नहीं उनके आगे शून्य दर्ज़ किया जाता है। एक-एक कमरे के मकान में दर्जनों वोटरों के पते दर्ज़ हैं।

हद तो तब हो गई जब बिहार की मतदाता सूची में दर्शाए गए कई मतदाता मृतक की सूची में दर्ज़ हो गए। यही मरे मतदाता में से एक याचिकाकर्ता योगेन्द्र यादव के साथ सुप्रीम कोर्ट में हाजिर हो गया और कई ने तो राहुल गांधी के साथ चाय भी थी। तब भी चुनाव आयोग नहीं चेता।

ताज़ा मामला आरएसएस के प्रवक्ता रहे राकेश सिन्हा का है। वर्तमान में सिन्हा दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी कॉलेज में प्रोफेसर हैं। ज़ाहिर है कि वे नियमित पढ़ाते होंगे इसलिए दिल्ली में रहते भी होंगे ऐसी स्थिति में भी उन्होंने बिहार में अपना वोट डाला जबकि इसके पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में वोट डाल चुके थे। नियमानुसार तय अवधि के बाद ही दूसरे विधानसभा क्षेत्र में वोट डाल सकते हैं। आयोग ने इस मामले को ग़लत या सही नहीं ठहराया। अगर यही विपक्ष के नेता करते तो? इसी चुनाव में जय श्री राम के नारे लगे और श्रीराम की मंदिर की तरह सीतामढ़ी में सीता का मंदिर बनाने की बात कही गई थी जो आदर्श आचार संहिता के विरुद्ध है। पर इसकी चिंता कौन करे? रक्षक ही भक्षक बन जाए तो?

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