प्रभात डबराल-
एंकर नहीं इन्हें मदारी कहो: सोच रहा हूँ अब जब कहीं भी टीवी न्यूज़ एंकर लिखना हो तो मैं “एंकर “ की जगह “मदारी “ लिखूँ. क्योंकि न्यूज़ चैनलों में जो हो रहा है वो ‘पत्रकारिता’ थोड़े ही है, शुद्ध ‘खेला’ है. इसलिए इन्हें पत्रकारिता से जुड़ी नामावली से क्यों नवाज़ा जाए. संपादकों के लिए भी कोई नया शब्द ढूँढना होगा.
‘एंकर’ के लिए ‘मदारी’ शब्द कल मुझे एक ऐसे व्यक्ति से मिला जिसका पत्रकारिता से कोई लेना देना नहीं है.
हुआ ये कि कल किसी रुटीन जाँच के सिलसिले में दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में डे-केयर में दिन भर के लिये भर्ती था. विमान हादसे की ख़बर पड़ोस वाले केबिन में लेटे सज्जन से मिली जो आईपैड पर न्यूज़ देख रहे थे. मैं उनके पास चला गया.
एंकर पागलों की तरह उछल उछल कर चीख रहा था …बहुत बड़ी खबर आ रही है .. विमान गिर गया है .. २४० लोग सवार थे ..वगैरह वगैरह.
“देखिए तो” आईपैड वाले सज्जन ने कहा “ऐसी दर्दनाक खबर भी कैसे उछल उछल कर सुना रहे हैं , जैसे कोई ख़ज़ाना हाथ लग गया हो … स्साले मदारी कहीं के “.
अस्पताल की ओर आते हुए मुझे भी एक ऐसा ही अहसास हुआ था. डीएनडी फ़्लाइओवर पर सुबह की भीड़ में बगल में रेंग रही गाड़ी में आगे पीछे रिपब्लिक टीवी का स्टिकर लगा था. स्टेयरिंग पर बैठा जवान लड़का कुछ कुछ वैसे ही अकड़ा हुआ था जैसे ‘गुर्जर’, ‘जाट’ या ‘गुस्सैल हनुमान’ का स्टिकर लगाए लोग होते हैं.
यहाँ तक तो चलो ठीक है. स्टिकर होना चाहिए कि नहीं ये देखने का काम पुलिस का है. पर उस भाई ने तो अपने चैनल के नाम के साथ साथ “प्रेस” भी लिखा था. वो मुझे खल गया.
ना जी, इन चैनल वालों को पत्रकारिता से जुड़ी नामावली के इस्तेमाल का हक नहीं होना चाहिए. गेहूं के साथ घुन भी पिसेंगे पर कहीं से तो शुरुआत करनी ही होगी.

आशीष माहेश्वरी-
आप किसी की भी आलोचना करने के लिए स्वतंत्र हैं क्योंकि एक बार ब्यूरोक्रेट की तरफ हाथ मिलाने के लिए बढ़ा देने के बाद हुए थोड़ा खराब अनुभव के अलावा आपने पत्रकारिता के उस स्वर्णिम काल को जिया, जिसमें आपके लिए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री किस्म के पावर शाह को मिस्ड काल करने पर भी उस जमाने में कॉल बैक आती होगी।
मुझे आज भी याद है कि 1995 में मैं जब गर्मियों की छुट्टी में कोटद्वार गया था तो नाना जी ने आपकी शादी का कार्ड इस तरह संभाल कर रखा हुआ था और दिखाते हुए उनको इतना गर्व था कि ये उन प्रभात डबराल की शादी का कार्ड है जो लंदन से दूरदर्शन के लिए प्रभात डबराल कहते हुए टीवी पर दिखते हैं।
2000 से 2008 तक जब आप सहारा समय न्यूज के सुप्रीमो हुआ करते थे, उस वक्त कोटद्वार और आसपास के युवकों में ये उम्मीद रहती थी कि प्रभात सर नौकरी दिलवा देंगे अलबत्ता जब इंसान इतने बड़े मुकाम पर होता है तो हर किसी के लिए एक्सेसिबल नहीं ही होता है, हम जैसे कितने युवा आपको देख टीवी में आए लेकिन टीवी पर दिखने की ख्वाहिश पूरी न कर सके।
आज जब हर किसी चीज में गिरावट आई है तो आप अपने वक्त की पत्रकारिता से आज की पत्रकारिता की तुलना नहीं कर सकते। वैसे भी गैर बीजेपी सरकारों में पत्रकारों का बहुत जलवा हुआ करता था और तमाम पत्रकार उन सरकारों के दौर में बहुत उपकृत भी हुए हैं।
आज जब मीडिया undeclared रूप से सरकारों के शिकंजे में है तो आज के दौर में ज्यादातर पत्रकारों का जी हुजूरी और इस तरह की हरकतें करना बहुत आम है।
Anchor ki विशेषताएं:
- चेहरे पर गुस्सा और भृकुटियां तनी होनी चाहिए
- डिबेट में। जितना चीख चीख कर पार्टी विशेष के प्रवक्ता पर चढ़ जाने की कला होनी चाहिए
- चीख चीख कर ब्रेकिंग न्यूज पढ़ने की कला आनी चाहिए
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