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उत्तर प्रदेश

इस दलित-स्त्री विमर्श के स्वर्णकाल ने एक 12 साल की बच्ची को डॉक्टर के पास पहुंचा दिया

12 साल की है ये बच्ची। लेकिन, दलित नहीं है। किसी राजनीतिक दल के समर्थक भी इसके पीछे नहीं हैं। इसके पिता दयाशंकर सिंह भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष थे। एक शर्मनाक बयान दिया। उस पर तय से ज्यादा प्रतिक्रिया हुई। संसद भी चल रही थी। मोदी के गुजरात में दलितों पर कुछ अत्याचार की घटनाएं आ रही थीं। मामला दलित विमर्श के लिए चकाचक टाइप का था। उस पर महिला विमर्श भी जुड़ा, तो चकाचक से भी आगे चमत्कारिक टाइप की विमर्श की जमीन तैयार हो गई। सारे महान बुद्धिजीवी मायावती की तुलना भर से आहत हैं। देश उबल रहा है। दलित-स्त्री विमर्श अपने स्वर्ण काल तक पहुंच गया है। इस दलित-स्त्री विमर्श के स्वर्णकाल में एक 12 साल की बच्ची को डॉक्टर के पास पहुंचा दिया।

12 साल की है ये बच्ची। लेकिन, दलित नहीं है। किसी राजनीतिक दल के समर्थक भी इसके पीछे नहीं हैं। इसके पिता दयाशंकर सिंह भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष थे। एक शर्मनाक बयान दिया। उस पर तय से ज्यादा प्रतिक्रिया हुई। संसद भी चल रही थी। मोदी के गुजरात में दलितों पर कुछ अत्याचार की घटनाएं आ रही थीं। मामला दलित विमर्श के लिए चकाचक टाइप का था। उस पर महिला विमर्श भी जुड़ा, तो चकाचक से भी आगे चमत्कारिक टाइप की विमर्श की जमीन तैयार हो गई। सारे महान बुद्धिजीवी मायावती की तुलना भर से आहत हैं। देश उबल रहा है। दलित-स्त्री विमर्श अपने स्वर्ण काल तक पहुंच गया है। इस दलित-स्त्री विमर्श के स्वर्णकाल में एक 12 साल की बच्ची को डॉक्टर के पास पहुंचा दिया।

लखनऊ के हजरतगंज से लेकर देश भर से इस बच्ची को बसपा कार्यकर्ता पेश करने को कह रहे हैं। दयाशंकर की किसी भी राजनीति में इसका इकन्नी का भी योगदान नहीं है। इस बच्ची ने कभी किसी के खिलाफ कोई बयानबाजी नहीं की है। Mayawati मायावती के बाद बसपा में अब अकेले बचे बड़े नेता की अगुवाई में दयाशंकर की पत्नी और बेटी को बसपा कार्यकर्ता मांग रहे थे। दयाशंकर सिंह की पत्नी Swati Singh स्वाति सिंह का कहना है कि बसपा के लोग उनके परिवार का मानसिक उत्पीड़न कर रहे हैं। वो डरी हैं। सुरक्षा मांग रही हैं। वो कह रही हैं कि मायावती के खिलाफ FIR कराएंगी।

न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह

दलित-स्त्री विमर्श वालों को पता नहीं जरा भी शर्म आ रही है या वो खुश हैं कि चलो अब हम दयाशंकर की पत्नी-बेटी को जी भरकर अपमानित होता देख सके। बहनजी के अपमान का बदला पूरा हुआ। वो बच्ची कह रही है कि नसीम अंकल मुझे पेश होने के लिए कहां आना है, बता दीजिए। पता नहीं इस पर हम समाज के तौर पर या फिर राजनीति के तौर पर कैसे प्रतिक्रिया देंगे। दिक्कत तो ये भी है कि यूपी का चुनाव नजदीक है। भला कौन दल साहस दिखाएगा कि दयाशंकर की बेटी के अधिकारों पर भी बात कर सके।

इस देश का दलित-स्त्री विमर्श यहां तक पहुंच गया है। इसके लिए समाज के ठेकेदारों को बधाई देनी चाहिए। बाबा साहब को विनम्र श्रद्धांजलि। पता नहीं वो ऐसे ही शोषित समाज का बदला लेना चाहते थे या इससे कुछ कम ज्यादा। ये सब मैं नहीं तय कर सकता। मैं तो न दलित हूं, न स्त्री। मेरी तो और सलीके से बत्ती लगा दी जाएगी। यही आज की राजनीति और समाज की सच्चाई है।

लेखक हर्षवर्धन त्रिपाठी पत्रकार और हिंदी ब्लॉगर हैं. कई चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके हैं. इन दिनों मंडी डाट काम के संपादकीय सलाहकार हैं. साथ ही DD Kisan चैनल पर एक घंटा का एक शो पेश करते हैं. हर्ष से संपर्क M: 09953404555 या Twitter: @harshvardhantri के जरिए किया जा सकता है.

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2 Comments

2 Comments

  1. Ashwini Vashishth

    July 23, 2016 at 1:45 pm

    दयाशंकर की मायावती पर की गई अभद्र टिप्पणी और उसके बाद खुद को देश की खबरों में लाइमलाइट में लाने की फिराक में बैठे बसपा नेताओं के भड़काऊ व फतवे भरे बयानों से राजनीति की गंदी सूरत व सीरत एक बार फिर उजागर हो गई है। उस पर किसी की बीवी-बहन या बेटी की अस्मत के चीथड़े उधाड़ने-जैसी बात करना… आखिर हम किस समय में रह रहे हैं, हम आजाद हैं तो क्या मानसिकता भी विकसित हो गई है? देश के विभाजन के समय क्या हुआ था? उस समय बने पाकिस्तान में हिन्दुओं की मां-बहनों-बेटियों को…! रूह कंपा देने वाला क्या-क्या नहीं हुआ?
    देश भले आजाद हो गया हो गया हो, हम अपनी सोच, मानसिकता से आजाद नहीं हो पाए। जात-पात के ऐसे कुचक्र से हम क्यों नहीं निकल पाए, क्योंकि जात-पात, सवर्ण-दलित के भेद के बल पर अपनी दुकानदारी चलाने वाले, अपने खजाने भरने वाले लोग हमीं के बीच मौजूद हैं और हमीं इन्हें बार-बार आगे आने का मौका दे रहे हैं। अब भी नहीं चेतेंगे तो इन्हीं अवसरवादियों और जात-पात को लेकर हो-हल्ला मचाने वालों के हाथों अपनी अगली पीढि़यों की भी मिट्टी-पलीत कराने में हम ही दोषी होंगे। फिर वह सवर्ण हों या दलित। क्योंकि स्वार्थ से सने-पगे हुए राजनेताओं का कोई धर्म नहीं होता। आने वाले चुनावों में ही देख लीजिएगा, पार्टियों के टिकट जातिगत आधार पर बांटते हैं या नहीं।

  2. lav kush

    July 25, 2016 at 10:45 am

    दयाशंकर के मायावती पर अभद्र तुलनात्मक बयान को मीडिया ने नहीं चलाया था और भाजपा शीर्ष ने भी मामले को संगीनता से लिया और तत्काल दयाशंकर को पार्टी से निकाल दिया, परंतु मायावती को अपनी इज्जत से ज्यादा राजनीती और वोट बैंक की चिंता थी सो उन्होंने इसे भरी सभा में उठा कर एक आम औरत और माँ बहन बेटी को गाली दी। उसके बावजूद इसका राजनीतिकरण करने के उद्धेश्य से अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतरने का आदेश दिया, मेरा मायावती से ३ सवाल है।

    १. दयाशंकर ने मायावती बसपा अध्यछ को गाली दी थी तो जवाब में मायावती या बसपा कार्यकर्ताओं ने भाजपा अध्यछ को गाली क्यों नहीं दी ? दयाशंकर के परिवार का क्या कसूर था ?

    २. जब भाजपा ने गलती मानकर माफ़ी मांग ली थी तो मायावती इसे जनता के बीच क्यों ले कर गई ? उनका उद्धेश्य क्या था ?

    ३. अगर भाजपा और अन्य दलों के कार्यकर्त्ता स्वाति सिंह की मदद कर रहे है तो बसपा क्यों नहीं कर रही क्या उसे आम औरत बहन बेटी से कोई सरोकार नहीं ?

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