आकाश शर्मा-
चैनलों का पतन और सरकारी विज्ञापन की विसंगति- उत्तराखंड के संदर्भ में एक जरूरी सवाल।
भारतीय न्यूज चैनलों का संकट अब संरचनात्मक हो चुका है। दर्शक नहीं रहे, विश्वसनीयता खत्म हुई, विज्ञापन घटे और लागत बढ़ी-नतीजा यह कि दर्जनों चैनल अपने ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस सरेंडर कर रहे हैं। यह केवल बिज़नेस फेलियर नहीं, बल्कि कंटेंट फेलियर है। जनसरोकार से कटाव, एकतरफा और प्रायोजित बहसें, और स्टूडियो-शोर ने दर्शकों को डिजिटल, ओटीटी और यूट्यूब की ओर धकेल दिया जहाँ संदर्भ, संवाद और सहभागिता है।
The Economic Times (इकोनॉमिक टाइम्स), हिंदुस्तान टाइम्स (Hindustan Times) और हालिया छपी रिपोर्ट्स से पता चलता है कि 2023-2025 में करीब 50 टीवी चैनलों ने लाइसेंस सरेंडर किए, जिसमें जियोस्टार, जी एंटरटेनमेंट, एनडीटीवी, एबीपी नेटवर्क शामिल हैं।


एनडीटीवी NDTV ने ‘एनडीटीवी गुजराती’ का लाइसेंस लौटाया, एबीपी ने एबीपी न्यूज एचडी बंद किया। दर्शकों का डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर शिफ्ट होना मुख्य कारण है। इसके अलावा मुख्य कारण हैं:
- जनहित की रिपोर्टिंग से दूरी, सांप्रदायिक शोर की अधिकता
- दर्शक विश्वास का क्षरण – टीआरपी गिरावट (TRP)
- विज्ञापन राजस्व में भारी कमी, परिचालन लागत में उछाल
- डिजिटल/ओटीटी व स्वतंत्र पत्रकारों के प्लेटफॉर्म्स का उभार
- प्रादेशिक चैनलों का तेज़ी से बंद होना
अब सवाल उत्तराखंड का है।
एक छोटे और सीमित संसाधनों वाले राज्य में भी सूचना एवं लोक संपर्क विभाग उत्तराखंड (DIPR) का बड़ा हिस्सा ऐसे टीवी चैनलों को विज्ञापन देने में खर्च हो रहा है, जिनका दर्शक आधार नाममात्र है। यह नीति जनहित नहीं, जनधन का दुरुपयोग प्रतीत होती है। कम दर्शकों वाले चैनलों की सब्सक्रिप्शन/एयरटाइम खरीदकर राज्य खजाने से पैसा डालना, मूलतः डूबती नाव में ईंधन झोंकना है। अब तक सूचना विभाग देशभर के चैनलों को 500 करोड़ रुपए से अधिक विज्ञापनों की बंदरबाँट कर चुका है।
टीवी चैनलों को दिया जाने वाला हर रुपया मुख्यमंत्री के चहेते नौकरशाह सूचना महानिदेशक Banshidhar Tiwari Ias की कलम से स्वीकृत किया जाता है। इस बात की पुष्टि रिंग रोड पर स्थित तिवारी के सूचना भवन में सप्ताह में बैठने वाले दिवसों पर की जा सकती है। जिस दिन Banshidhar Tiwari जी दरबार सजाते हैं उस चैनलों के logo लगी चमचमाती महंगी गाड़ियों से सूचना भवन की पार्किंग जाम हो जाती है। कई यूट्यूब चैनल और यूट्यूबर भी जिल्ले-इलाही के रहमों करम पा जाने के लिए चहलक़दमी करते दिखाई देते हैं।
जब निजी विज्ञापनदाता कमजोर टीआरपी के कारण हाथ खींच रहे हैं, तब सरकारी विज्ञापन देकर उन्हीं चैनलों को “वेंटीलेटर” पर रखना नीति की विफलता है। यह पैसा स्थानीय डिजिटल मीडिया, फील्ड-आधारित जनसंचार, सामुदायिक रेडियो, और सत्यापन-आधारित प्लेटफॉर्म्स में लगे तो सीधी नागरिक पहुँच बनेगी और लागत भी घटेगी।
इस मामले में मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।
- Uttarakhand DIPR की विज्ञापन नीति का ऑडिट और पुनर्गठन
- व्यूअरशिप/एंगेजमेंट-आधारित मानक लागू
- कम दर्शकों वाले चैनलों को विज्ञापन बंद
- राज्य के सीमित संसाधनों को प्रभावी और मापनीय जनसंचार में निवेश
खबरों का #भविष्य बदल चुका है। राज्य नीति अगर पुराने ढर्रे पर अटकी रही, तो #गलत पेट में भोजन जाता रहेगा जिससे जवाबदेही का प्रश्न उठना लाजिमी है।
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