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ख्वाबों का तर्क, वास्तविकता की व्यवस्था और मनुष्य को सपने आने की वजह पर Ayush Singh का चिंतन!

आयुष सिंह इस बात पर जोर देते हैं कि वास्तविकता का यह व्यवस्थित दिखना जरूरी नहीं कि ब्रह्मांड का अंतिम सत्य हो. यह भी संभव है कि वास्तविकता कई रूपों में मौजूद हो. अव्यवस्थित और विरोधाभासी दुनियाएं भी हो सकती हैं…

यशवंत सिंह-

मीडियम पर प्रकाशित अपने एक लेख में आयुष सिंह सपनों और वास्तविकता के बीच के फर्क को समझाते हुए एक बुनियादी सवाल उठाते हैं कि मनुष्य सपने क्यों देखता है और जागी हुई दुनिया इतनी व्यवस्थित क्यों दिखाई देती है. यह लेख किसी वैज्ञानिक रिपोर्ट की तरह नहीं बल्कि एक दार्शनिक पड़ताल की तरह सामने आता है जो पाठक को रोजमर्रा की वास्तविकता पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर करता है.

आयुष सिंह बताते हैं कि सपनों की दुनिया देखने में अजीब और अव्यवस्थित लग सकती है लेकिन सपने के दौरान हमें यह सब गलत या असंभव महसूस नहीं होता. सपने में हम अचानक किसी और जगह पहुंच जाते हैं. कोई व्यक्ति पल भर में किसी और का रूप ले लेता है. समय आगे पीछे हो सकता है. मरे हुए लोग जीवित नजर आ सकते हैं. इन सबके बावजूद सपने के भीतर हमें कोई विरोधाभास नहीं दिखता. उस समय दिमाग इन घटनाओं को पूरी सहजता से स्वीकार कर लेता है.

लेखक का कहना है कि इसका कारण यह है कि सपनों की अपनी एक तर्क प्रणाली होती है. यह तर्क हमारे जागते हुए जीवन के नियमों से अलग होता है लेकिन अनुभव के स्तर पर पूरी तरह काम करता है. जैसे सपने में अगर इंसान उड़ रहा है तो वह यह सवाल नहीं करता कि गुरुत्वाकर्षण कहां गया. उस दुनिया में उड़ना सामान्य होता है. इससे यह समझ आता है कि चेतना बिना कठोर नियमों के भी अनुभव रच सकती है.

इसके उलट जब हम जागते हैं तो हमारा दिमाग एक बिल्कुल अलग जिम्मेदारी निभा रहा होता है. जागी हुई अवस्था में हमें सुरक्षित रहना होता है. फैसले लेने होते हैं. भविष्य का अनुमान लगाना होता है. इसके लिए जरूरी है कि दुनिया स्थिर और भरोसेमंद दिखे. हमें पता होना चाहिए कि आग छूने से जलन होगी. ऊंचाई से गिरने पर चोट लगेगी. समय पीछे नहीं जाएगा. यही वजह है कि हमारा दिमाग वास्तविकता को नियमों और व्यवस्था के रूप में अनुभव करता है.

आयुष सिंह इस बात पर जोर देते हैं कि वास्तविकता का यह व्यवस्थित दिखना जरूरी नहीं कि ब्रह्मांड का अंतिम सत्य हो. यह भी संभव है कि वास्तविकता कई रूपों में मौजूद हो. अव्यवस्थित और विरोधाभासी दुनियाएं भी हो सकती हैं. लेकिन मानव मस्तिष्क ऐसी वास्तविकता में लंबे समय तक टिक नहीं सकता. इसलिए वह एक ऐसी दुनिया को प्राथमिकता देता है जो दोहराई जा सके और अनुमान के दायरे में रहे.

लेख में यह भी कहा गया है कि वैज्ञानिक नियम भी हमेशा वैसे काम नहीं करते जैसे हमें पढ़ाया जाता है. प्रयोगशालाओं में हालात को नियंत्रित करके नियमों को सही साबित किया जाता है. असली जीवन में चीजें अक्सर इन नियमों की सीमाओं से बाहर चली जाती हैं. इससे संकेत मिलता है कि नियम और व्यवस्था शायद वास्तविकता की मूल प्रकृति नहीं बल्कि हमारी समझ को आसान बनाने का तरीका हैं.

आयुष सिंह के अनुसार सपने आने की एक अहम वजह यही है कि दिमाग को कभी कभी इस व्यवस्थित वास्तविकता से बाहर निकलने का मौका मिले. सपने एक तरह की मानसिक प्रयोगशाला होते हैं जहां दिमाग बिना किसी खतरे के यह जांच सकता है कि अगर कारण और परिणाम का रिश्ता टूट जाए. अगर पहचान स्थिर न रहे. अगर समय और स्थान बदल जाएं. तो अनुभव कैसा होगा. यह प्रयोग जागी हुई अवस्था में संभव नहीं होता.

इसी कारण सपनों में विरोधाभास हमें परेशान नहीं करते. एक ही व्यक्ति अलग अलग रूपों में दिखाई दे सकता है. एक जगह दूसरी जगह बन सकती है. दिमाग उस समय व्यवस्था की मांग नहीं करता क्योंकि उसे जीवित रहने या निर्णय लेने की जिम्मेदारी नहीं निभानी होती. सपनों में चेतना स्वतंत्र रूप से संभावनाओं को टटोलती है.

लेख का निष्कर्ष यह है कि सपने हमें यह याद दिलाते हैं कि वास्तविकता केवल एक ही तरह की नहीं होती. व्यवस्था और अव्यवस्था दोनों ही अनुभव योग्य हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि हमारा दिमाग किस तरह की दुनिया को स्थायी रूप से चुनता है. जागी हुई दुनिया हमें इसलिए ज्यादा सच्ची और ठोस लगती है क्योंकि वही हमारे अस्तित्व के लिए उपयोगी है. सपनों की दुनिया हमें यह दिखाती है कि इसके अलावा भी अनुभव के कई रास्ते संभव हैं. यही समझ इस लेख को सपनों की चर्चा से आगे ले जाकर वास्तविकता की प्रकृति पर एक गंभीर और विचारोत्तेजक विमर्श बना देती है.

मीडियम पर पब्लिश आयुष का मूल आर्टिकल पढ़ें…

Logic of Dreams and Why Reality Appears Ordered

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