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शब्दचर्चा (14) : NBT और हिंदुस्तान, दोनों ने तोड़ी ‘गुरु’ की टाँग

पिछले कुछ दिनों से मैं ऐसे देशी-विदेशी नामों के बारे में चर्चा कर रहा हूँ जो हिंदी मीडिया में ग़लत तरीक़े से लिखे जा रहे हैं। इस सिलसिले में दो अंग्रेज़ी शब्दों Collegium और Ceasefire का भी ज़िक्र किया था जिनका सही उच्चारण है कलीजिअम (इसे कलीजियम भी लिखा जा सकता है) और सीसफ़ायर जबकि हिंदी मीडिया में लिखा जा रहा है कॉलेजियम और सीज़फ़ायर।

चलिए, ये तो अंग्रेज़ी के शब्द हैं। अगर हिंदी का कोई पत्रकार इन्हें ग़लत लिखता है तो समझ में आता है। लेकिन कल गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हिंदुस्तान और दैनिक भास्कर पर ‘गुरु’ शब्द की जो दुर्गति हुई, उससे लगता है कि वहाँ के पत्रकारों को न तो पढ़ाई के दौरान अच्छे गुरु मिले, न पत्रकारिता करते हुए।

गुरु में ‘र’ के साथ ‘उ’ लगता है, ‘ऊ’ नहीं। यानी उसे ‘गुरु’ लिखा जाएगा, ‘गुरू’ नहीं। संस्कृत में ‘गुरू’ द्विवचन में इस्तेमाल होता है (यानी जब दो गुरुओं की बात हो रही हो), एकवचन में ‘गुरु’ ही है। लेकिन हिंदुस्तान और दैनिक भास्कर में मुझे ऐसे कई समाचार मिले जिनमें ‘गुरु’ की जगह ‘गुरू’ लिखा हुआ था। यही नहीं, सुप्रसिद्ध गुरुस्तुति जिसे मोहम्मद रफ़ी के गाने — जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा (फ़िल्म – सिकंदर-ए-आज़म) — से व्यापक लोकप्रियता मिली थी, उसे भी लोग मनचाहे तरीक़े से लिख रहे हैं।

इसका शुद्ध रूप है – गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

लेकिन हिंदी के पत्रकार हैं कि गुरुर्ब्रह्मा को गुरु ब्रह्मा कर दे रहे हैं, गुरवे नमः को गुरुवे नमः कर दे रहे हैं। यानी मनचाहे तरीक़े से गुरु और संस्कृत की टाँग तोड़ रहे हैं।

और यह किसी छोटी-मोटी वेबसाइट पर नहीं, नामी-गिरामी साइटों पर हो रहा है। कल अमर उजाला, नवभारत टाइम्स, टाइम्स नाउ हिंदी और TV9 भारतवर्ष में मुझे इस स्तुति का भ्रष्ट रूप मिला। किसने किसका चुराया, यह पता नहीं लेकिन चूँकि सबमें एक जैसी ग़लती है तो स्पष्ट है कि पत्रकार बंधु एक-दूसरे का मैटर कॉपी-पेस्ट कर रहे हैं या वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी से उठा रहे हैं।

चलिए, ये तो फिर भी पत्रकार हैं। मीडिया कंपनियों ने इनको पंद्रह-बीस हज़ार पर रखा होगा तो हम इनसे भाषाई शुद्धता की उम्मीद नहीं कर सकते। लेकिन दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता! उनसे तो उम्मीद की जा सकती है कि उनके नाम से कुछ जाए तो सही-सही जाए, कम-से-कम जब मामला संस्कृत का हो। कल उनके नाम से जो ट्वीट किया गया, उसमें गुरुस्तुति तो ठीक लिखी हुई है, लेकिन गुरु को ‘शत्-शत्’ नमन लिखा हुआ है।

मैडम जी, ‘शत्-शत् कुछ नहीं होता। सही शब्द है ‘शत’। होगा शत-शत नमन। हर संस्कृत शब्द में हल् का चिह्न नहीं होता।

लेकिन भाषा की यहाँ किसको पड़ी है? मीडिया कंपनियों को चाहिए व्यूज़ और राजनीतिक कंपनियों को चाहिए वोट जिनके बल पर दोनों कमाते हैं नोट।

ऐसे में ‘गुरु’ और संस्कृत को पहुँचे चोट तो why should they give it a thought!

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