नरेश सक्सेना-
रायपुर से लौटकर कुछ चकित करने वाली ख़बरें मिलीं। किसी ने कहा आपको भाजपा के कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए। भाजपा?
मैं वहाँ हिन्दवी के निमंत्रण पर गया था। कैंपस कविता की ज़ूरी की हैसियत से। यह हिन्दवी और हिन्द युग्म का संयुक्त आयोजन था। दीप जलाकर इसका उद्घाटन तो मैंने किया। किसी मुख्यमंत्री या मंत्री ने तो किया नहीं। विनोद कुमार शुक्ल को तीस लाख वाला वो प्रसिद्ध चेक देने वालों में भी मैं ही था। कोई भाजपाई तो था नहीं।
तो फिर रमन सिंह.? उनके बारे में तो हमें कुछ पता ही नहीं था। न छपे हुए कार्यक्रम में उनका कोई उल्लेख था। वे निजी हैसियत से अचानक आये। मंच से विनोद कुमार शुक्ल को बधाई दी। उनसे कोई लेखक नहीं मिला। वे ख़ुद चलकर वहाँ आए जहाँ विनोद कुमार शुक्ल बैठे थे।
उन्होंने विनोद जी को बधाई दी। मैं विनोद जी के बगल में बैठा था। तो उन्होंने मेरा भी अभिवादन किया। और मैंने भी शिष्टाचार निभाया।
वे खड़े-खड़े ही चले गए। दरअसल यहाँ कुछ क्रांतिकारी मित्र हैं। जो मोदी जी के रास्ते पर चल पड़े हैं। जैसे मोदी जी कपड़ों से लोगों को पहचान लेते हैं। हमारे मित्र फोटो से पहचान लेते हैं।
फोटो के क्षण का अतीत और भविष्य भी होता है। स्थिर फोटो में ध्वनि भी नहीं होती। लेकिन जिसे सतह से नीचे जाना ही नहीं है; उसे इस सबसे क्या.?
इतना बताया है तो संक्षेप में दो-चार लाइनें और सुन लीजिए, जो मैंने वहाँ पढ़ीं-
भक्तों के सीने पर जय श्रीराम लिखा
हम सबका काम तमाम लिखा
किसे नहीं मालूम कि लाशों के सीने पर
किस क़ातिल का नाम लिखा है
दूसरी कविता का शीर्षक था- “कहीं ये सेब तुर्किए के तो नहीं”
तू तुर्किए की फ़ौज से नहीं लड़ेगा
उनकी दहशतगर्दी से नहीं लड़ेगा
तू तो सेब से लड़ेगा
तो जा तू तो कब्रों को खोद कर मुर्दों से लड़ेगा।
पूरी कविताएँ बाद में पोस्ट कर दूँगा। ये नए संग्रह की हैं। जिसका विमोचन विनोद कुमार शुक्ल ने किया। ये मेरी किसी भी किताब का पहला विमोचन था। जिसका आयोजन मैंने नहीं किया। पाठ से पहले माइक से ये भी कह दिया था कि सन 2014 के बाद से देश में क्या हो रहा है। सब जानते हैं। मैंने जब माइक छोड़ा, तो पूरे हॉल ने ज़बरदस्त शोर करके और सुनाने की माँग की।

मेरे साथ मंच पर बाबूशा कोहली थीं। जिन्होंने कहा “लोग इतना कह रहे हैं; तो चंबल सुना दीजिए। तो वह भी सुनाई। वीडियो मिलेगा तो वह भी डाल दूँगा।
यहाँ मित्रों की एक बड़ी सख़्त अदालत है जिसमें रोज़ नया चरित्र प्रमाण पत्र दाखिल करना होता है। वरना वे थूकने लगते हैं।
नरेश जी की पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स भी पढ़िए…
ओम थानवी-
उन्हें लगता है आसमान पर थूकते हैं, जबकि ख़ुद पर थूकते हैं।
दोस्त अस्मित-
दरअसल असली भाजपाई तो यही थूकनेवाले लोग है। भाजपा के दौर में ही आलोचना का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि दो लोगों को तस्वीर में एक साथ देख लो तो तुरंत उनके बीच कोई कारस्थान जन्म लेता है, सार्वजनिक चर्चा का विषय बन जाता है, लोग दो हिस्सों में बंट जाते हैं, आरोप-प्रत्यारोप करते हैं (आजकल थूकने भी लगे हैं… वाह, यह तो भाजपा राज में ही हो सकता है) और फिर किसी नए क्रिमिनल को ढूंढने निकल पड़ते हैं। इन्हें शायद छोटीसी कोई क्रांति करने का सुख मिल जाता होगा जिसका हक़ अपनी क्रांति के प्रति की entitlement के चलते भाजपाइयों ने इनसे छीन लिया है। कुंठित हैं, इन्हें माफ कर दीजिए।
दयानंद पांडेय-
थूकने वालों ने यह, कोई पहली बार तो थूका नहीं है। यह तो उन की परंपरा भी है और उन का पथ्य भी। आप को क्या लगता है, थूकने वालों पर आप की ऐसी थू से काम चल जाएगा? आप की एक कविता की ही लय में जो कहूं तो इस जाल में हर बार आप मछली बन कर उपस्थित रहते हैं। और पानी जाल से बाहर निकल जाता है। अपनी कविता में जैसे सीढ़ी खोजते हैं, किले के भीतर उतरने और उसे उड़ाने के लिए, कोई उपाय खोजिए यह जाल काटने के लिए। क्यों कि हर बार थूक के इस अभद्र और अपमानजनक जाल में फ़ंस कर, मछली की तरह तड़पना और इस तरह सफ़ाई देना, गुड बात नहीं है।
कुमार अंबुज-
नरेश जी, आपके शब्दों से ज़हिर है : यहाँ ये क्षण औचक, अप्रत्याशित परिस्थितियों के हैं। आपकी प्रतिबद्धताएँ और सदाशयताएँ दोनों अपनी जगह स्पष्ट हैं। असंदिग्ध हैं। दुख है कि आपको यह सब लिखना पड़ा। पुनश्च :आयोजक यदि आपको यह बता देते कि उन्होंने मुख्य मंत्री/मंत्रियों आदि को आमंत्रित किया है तो शायद आपकी सजगता कुछ काम आती। या तब आप अपना समानांतर कोई निर्णय ले सकते थे। अब आयोजकों के साथ भी कुछ सावधानी बरतने की ज़रूरत है।
मुदित मिश्रा-
हम सब इसके साक्षी रहे हैं सर, किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता ही नहीं, अफसोस कि हम ऐसी बातों को मुद्दा बना रहे हैं जिनका कोई औचित्य ही नहीं हमको भी नहीं पता था कि अचानक वहाँ रमन सिंह आयेंगे और आपनें एक सहज मानवीय शिष्टाचार का ही परिचय दिया, आपकी जगह कोई भी सहृदय व्यक्ति नमस्कार का उत्तर नमस्कार में ही देता।
अनामिका चक्रवर्ती-
यही सब करक करके साहित्य का बेड़ा ग़र्क कर रखा है। यदि कोई नेता आ ही जाए तो वह भी तो इंसान है उसे भी तो कोई साहित्यकार पसंद या नापसंद हो सकता है। एक ही राज्य में एक बड़ा साहित्यकार जिससे मिलने एक व्यक्ति आता है इत्तेफाक से वह पूर्व मुख्यमंत्री होता है तो इसमें गलत कैसे हो जाता है। आप बिल्कुल सही हैं।
रमाकांत यादव-
आप अपनी जगह ठीक हो सकते हैं परन्तु लोग आपको प्रतिरोध के अगुआ की तरह देखने की मंशा रखते हैं। वहां कोई चूक -कमी नज़र आती है तो उन्हें धक्का लगता है। मुझे लगता है आपके किरदार को थोड़ी सावधानी, सतर्कता की जरूरत है।असल में बात आपकी कविता से ऊपर की है। जहां आपको खुद को लड़ते हुए दिखाना पड़ेगा। आखिर आप ही तो बचे हैं जिस पर हम सब उम्मीद रखते हैं!
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हरनाम सिंह
September 26, 2025 at 7:07 pm
नरेश जी आपको चाहने वाले ऐसी घटनाओं से विचलित हो जाते हैं। आप हम सबके आदर्श हैं, परिस्थितिवश घटी घटना परआप को स्पष्टीकरण देने की जरूरत नहीं है।