मुख्यधारा की मीडिया इससे भी अपमानजनक व पीड़ादायी नतीजों के लिए तैयार रहे!

shyamsingh rawat

2014 के लोकसभा चुनाव के बाद देशभक्ति के बहाने मोदी के नया इंडिया में सर्वत्र भयावह नज़ारा पेश किया जा रहा है। यह नया रंग-ढंग इतनी तीव्रता और इतने भयावह रूप में सामने आया है कि जागरूक पत्रकार, जागरूक वकील और प्रोफेसर सकते में आ गए हैं। उन्हें गालियां दी जा रही हैं, पीटा जा रहा और यहां तक कि उनकी हत्याएं तक कर दी जा रही हैं।

पत्रकारों से मारपीट को हम NCRB की लोकसभा में पेश हुई उस रिपोर्ट से भी समझ सकते हैं जिसमें पत्रकारों के साथ हुई हिंसा और मारपीट का जिक्र है और बताया गया है कि अब तक देश में पत्रकारों पर सबसे ज्यादा हमले उत्तर प्रदेश में हुए है, जहां 2013 से लेकर अब तक पत्रकारों पर हुए हमले के संदर्भ में 67 केस दर्ज किये गए हैं। पत्रकारों से मारपीट के 50 मामलों के साथ मध्य प्रदेश दूसरे नंबर पर है तो बिहार ऐसे 22 मामलों के साथ नंबर 3 पर है। रिपोर्ट में उप्र. को पत्रकारों के लिए सबसे असुरक्षित कहा गया है और यह भी बताया गया है कि सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही 2013 से लेकर 2019 तक 7 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है।

2017 में आयी ‘द इंडियन फ्रीडम रिपोर्ट’ के अनुसार 2017 में पूरे देश में पत्रकारों पर 46 हमले हुए। इस रिपोर्ट के अनुसार 2017 में पत्रकारों पर जितने भी हमले हुए, उनमें सबसे ज्यादा 13 हमले पुलिसवालों ने किए हैं। इसके बाद 10 हमले नेताओं तथा राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं और तीसरे नंबर पर 6 हमले अज्ञात अपराधियों ने किए हैं। इसी क्रम में पत्रकारों पर जो हमले बढ़ते जा रहे हैं उनकी बड़ी घटना दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में 17 फरवरी, 2016 को जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पेशी के दौरान अदालत परिसर में वकीलों द्वारा एक पत्रकार को पीटने के रूप में सामने आई। पत्रकारों से मारपीट करने वाले और पटियाला हाउस कोर्ट में ही प्रैक्टिस करने वाले वकील विक्रम सिंह चौहान को 19 फरवरी, 2016 को उनके साथी वकीलों ने कड़कड़डूमा कोर्ट परिसर में सम्मानित भी किया।

आजकल देशभर में भाजपा और उसके द्वारा निर्देशित शासन-तंत्र मीडिया वालों को उनकी औकात बता-दिखा रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने खुलेआम ऑन कैमरा एंकर से पूछा कि तुम्हारी औकात क्या है? इधर मुरादाबाद (उप्र.) में जिला अस्पताल में मरीजों का हालचाल जानने पहुंचे मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के दौरे की कवरेज को गये पुलिस-प्रशासन ने मीडियाकर्मियों को अस्पताल के इमर्जेंसी वॉर्ड के एक कमरे में बंद कर दिया। इससे पहले शामली (उप्र.) में एक न्यूज़ चैनल के पत्रकार को रेलवे के भ्रष्टाचार की पोल खोलने के कारण रेलवे पुलिस द्वारा नंगा करके पीटने, पेशाब पिलाने और उसे हिरासत में रखकर यंत्रणा देने का मामला सामने आ चुका है।

पहली बार कुंभ मेले में किन्नर अखाड़े के भाग लेने पर 6 जनवरी को प्रयागराज में टाइम्स ऑफ इंडिया के वरिष्ठ फोटो पत्रकार अनिंद्य चट्टोपाध्याय के साथ इसकी कवरेज के दौरान एक डीएसपी रैंक के पुलिस अधिकारी ने मारपीट की। छपरा (बिहार) में नाबालिग लड़की से छेड़खानी के आरोपी को थाने में पिटाई के बाद इलाज के लिए सदर अस्पताल लाने की रिपोर्टिंग कर रहे एक चैनल के पत्रकार को नगर थाने के एएसआइ राजीव कुमार व अन्य पुलिसकर्मियो ने पीट दिया और पिस्टल दिखाकर उसका मोबाइल छीन लिया।

ऐसा नहीं है कि यह सब कोई पहली बार हो रहा है। पहले भी 1996 में कांशीराम ने दिल्ली में अपने घर पर पहले तो खुद एक पत्रकार को थप्‍पड़ जड़ दिया। उसके बाद उनके कार्यकर्ताओं ने आशुतोष और साथ में मौजूद महिला पत्रकारों को भी धक्‍के देकर घर से बाहर निकाल दिया था। इस पर खासा विवाद और कांशीराम की काफी आलोचना हुई थी। फर्क यह है कि जहां पहले ऐसी अप्रिय घटनाएं कभी-कभार ही होती थी, अब इधर तो जैसे यह रोजमर्रा होता दिख रहा है।

यह विचारणीय है कि ऐसा अक्सर क्यों होने लगा है? इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला, मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज में सरकारी दखल बुरी तरह हावी हो गया। मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने सरकार तथा पार्टी के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को कुचलने का अभियान शुरू कर दिया। बहुत जल्दी देशभर में सत्ता का नशा पूरी भाजपा पर बुरी तारी हो गया। गांधी-नेहरू ही नहीं विपक्षियों को सार्वजनिक मंचों व शोसल मीडिया पर से गालियां दी जाने लगीं। ‘पिछले 70 साल में देश में कुछ नहीं किया गया, मोदी ही भारत है और भारत ही मोदी है’ कहने-मानने पर जोर दिया गया। भाजपाई उछृंखल और उद्दंड होते चले गये। उनके लिए दूसरों के प्रति आदर तथा मान-सम्मान, अनुशासन, मर्यादा, परंपरा सब नगण्य हो गये। इसी रौ में मीडिया पर हमले बढ़ते गये।

दूसरा, देश का मुख्यधारा का मीडिया अप्रत्याशित रूप से सत्ता को साष्टांग करता हुआ देश के जन-सरोकारों की न केवल उपेक्षा करता रहा बल्कि सरकार का ही पैरोकार बन गया। पत्रकारों ने सरकार के नजदीक आने के लिए साम, दाम, दंड, भेद सब एक किया और ऐसा बहुत कुछ किया जिससे न सिर्फ पत्रकारिता शर्मसार हुई, बल्कि उस कहावत को भी चरितार्थ किया जिसमें राजा के चौपट होने पर नगर के अंधेर नगरी बनने की बात की गई है। कह सकते हैं कि तब से लेकर आज तक पत्रकारों पर जितने भी हमले हुए, उसकी एक बड़ी वजह इसके सरकार के करीब रहते हुए सभी बुरे काम करना भी था। इसका परिणाम यह हुआ कि देश की जनता तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय मीडिया का मान-सम्मान रसातल में चला गया। मीडिया ने अपनी करनी से जनता की सहानुभूति और विश्वास खो दिया। उसके लिए ऐतिहासिक रूप से सरकारी भौंपू, सत्ता का दलाल, चाटुकार, बिका हुआ, प्रेश्या, प्रेस्टिट्यूट आदि जैसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल आम होने लगा।

इस प्रकार देखा जाये तो मीडिया पर हो रहे ये हमले उसके कुकर्मों का ही प्रतिफल है। यह एक तरह से दंड है जिसका वह पूरी तरह से हकदार है और देर-सबेर यह होना लाजिमी था। यदि देश का मुख्यधारा का मीडिया नहीं सुधरा तो इसे और भी अपमानजनक तथा पीड़ादायी नतीजों के लिए तैयार रहना चाहिये।

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार श्याम सिंह रावत का विश्लेषण. संपर्क : ssrawat.nt@gmail.com

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