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उत्तर प्रदेश

पत्रकार पर जानलेवा हमले के विरोध में गांधी प्रतिमा पर हुआ विरोध प्रदर्शन!

डॉ मोहम्मद कामरान-

सदियों से सुनते आए हैं कि एक अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पत्रकार सुशील अवस्थी राजन पर हुए जानलेवा हमले के विरोध में कुछ ऐसा हुआ कि इस मुहावरे के मायने ही बदल गए और समाज को एक नया प्रभात देखने को मिला।

नवंबर माह की 22 तारीख का मतलब ही दो और दो का साथ दिखता है लेकिन जब एक कलमकार साथी पर जानलेवा हमला हुआ तो दो और दो का साथ नहीं दिख रहा था, 72 घंटे गुज़र जाने के बाद भी पुलिस प्रशासन द्वारा कागजी खानापूर्ति के अलावा कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गई और अपराधी खुलेआम घूम रहे थे।

उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और भाजपा नेता नीरज सिंह द्वारा स्वयं पुलिस कमिश्नर को तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश देते हुए पत्रकार सुशील अवस्थी राजन को सुरक्षा उपलब्ध कराने हेतु कहा गया था परंतु असुरक्षा की भावना और कातिलाना हमले के सदमे से गुजर रहे परिवार को न तो पुलिस द्वारा सुरक्षा उपलब्ध कराई गई और न ही पूरे प्रकरण का खुलासा किया गया बल्कि मामूली धाराओं में दर्ज मुकदमे में केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी को गुडवर्क का नाम देकर कातिलाना हमले के प्रकरण को रफा दफा करना ही दिख रहा था।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पत्रकारों के अनेक संगठन कार्यरत है और हमला जब राष्ट्रवादी परंपराओं का निर्वहन करते हुए सुदर्शन चैनल के राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकार पर हुआ तो लगता था जैसे चैनल से जुड़े अनेक पत्रकार एवं पत्रकारों की ट्रेड यूनियन के नामचीन नेता आंदोलन और आक्रोशित रूप में अपने पत्रकार साथी पर हुए जानलेवा हमले के विरोध में लोकभवन, विधानसभा प्रेस रूम के बाहर विरोध प्रदर्शन करते दिखाई देंगे परंतु अजीब सी शोक लहर दिखाई दे रही थी, कोई भी राम नाम सत्य का पाठ पढ़ते भी नहीं दिख रहा था और न ही कोई स्थापित पत्रकार नेता जो अपने-अपने संगठनों को उत्तर प्रदेश के जिलों में घूम-घूम कर संगठित करते नजर आते हैं वो राजधानी लखनऊ में पत्रकार पर हुए कातिलाना हमले पर खामोश थे।

ऐसे में संघर्षरत पत्रकारों के हितों में आवाज उठाने वाले प्रभात ने हजरतगंज स्थित गांधी प्रतिमा पर धरने का आवाहन किया और 22 नवंबर को 2 और 2 लोगों का साथ मिलकर एक ऐसा आंदोलन बनाया जो इतिहास में नाम कर गया और सदियों से चले आ रहे मुहावरे का अर्थ बदल गया। एक अकेला प्रभात ही चला था लेकिन कौसर जहां, मनोज मिश्र, अनिल सैनी, शेखर श्रीवास्तव, आकाश शेखर शर्मा, शाश्वत तिवारी, अमन अग्रवाल, शहरयार खान, तनवीर अहमद सिद्दीकी, जितेंद्र सिंह, ज्ञानी त्रिवेदी, राजेंद्र प्रसाद, सुदर्शन न्यूज़ चैनल के स्टेट हेड रजत मिश्रा, IFWJ के राष्ट्रीय सचिव के विश्वदेव राव, आमोद, लखन मिश्रा, डॉ सेठ, पवन गुप्ता, बबीता ओबेरॉय, शरफुद्दीन, अशोक चकलाधर आदि अनेक पत्रकार जुड़ते चले गए और शासन प्रशासन के पसीने निकाल कर एक नया इतिहास बना दिया।

लखनऊ के जीपीओ स्थित गांधी प्रतिमा पर शुरू हुए शांतिपूर्वक धरने पर जब शासन प्रशासन का कोई भी वरिष्ठ अधिकारी नहीं आया तो अपनी मांगों को लेकर सभी पत्रकार साथी राज भवन की तरफ निकले लेकिन वहां पर भी कोई फरियाद सुनने वाला नहीं था, ऐसे में मुख्यमंत्री आवास के सामने अपना दर्द लेकर चल पड़े कलमकार, जो समाज के दर्द को शासन प्रशासन के सामने लाता था आज उसकी आवाज सुनने वाला कोई अधिकारी नहीं था, लेकिन प्रभात के कदम रुक नहीं रहे थे, बोला प्रभात, चीखा प्रभात, गिरा प्रभात, साथ जो छोड़ गए थे ऐसे मित्र शेखर श्रीवास्तव का जब मिला साथ तो दौड़ा प्रभात, कदम से कदम मिलाकर चलती कौसर जहां ने भड़काया हौसला प्रभात का और अंधकार में खो गए अनेक प्रश्नों को फिर से दिखाया एक नया प्रभात।

  • कहां गई पत्रकारों द्वारा चयनित उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति जो राष्ट्रवादी चैनल के राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त वीडियो जर्नलिस्ट पर हुए कातिलाना हमले पर खामोश है, एक ज्ञापन भी नहीं?
  • कहां गए वो पत्रकार जिन्होंने गांधी प्रतिमा पर इलेक्ट्रॉनिक चैनल के प्रतिनिधि पर पुलिसिया बर्ताव के खिलाफ प्रदर्शन किया जिसके कारण पुलिस हिरासत से बचकर योगी सरकार में जनप्रतिनिधि के रूप में स्थापित है कलमकार?
  • आखिर कब तक चुप रहेंगे राजधानी के वरिष्ठ, गरिष्ठ, यूनियन, प्रेस क्लब के सम्मानित पत्रकार और नेतागण?
  • आखिर कब होगा खुलासा, कब होगी अभियुक्तों की गिरफ्तारी, कब मिलेगी पत्रकार को सुरक्षा?

मूल खबर…

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