अंग्रेजी अखबार भी खबर की जगह लोरी छापते हैं!

Sanjaya Kumar Singh : कानपुर में पकड़े गए 92 करोड़ रुपए के पुराने नोट वाली खबर का फॉलो अप आज हिन्दुस्तान टाइम्स में भी छपा है। मैं अंग्रेजी अखबारों को हिन्दी वालों के मुकाबले थोड़ा गंभीर मानता हूं और दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया के मुकाबले हिन्दुस्तान टाइम्स को। पर ये भी सरकार के भोंपू का ही काम करते हैं।

मूल खबर थी कि कोई व्यक्ति पुराने नोट को बदलवाने का दावा कर रहा था और उसके इस आश्वासन पर देश के भिन्न शहरों से कई लोग आए थे और मूल खबर पर यकीन किया जाए तो यह पैसा किसी एक व्यक्ति का नहीं, कई लोगों का है। इसीलिए 16 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। मूल खबर में यह नहीं बताया गया था कि पुराने नोट इस समय तक कैसे बदले जा सकते थे – जबकि रिपोर्टिंग के लिहाज से और मेरे जैसे पाठक के लिए भी यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।

अभी तक उसकी कोई चर्चा नहीं है जबकि इतना पैसा अगर कई लोगों से इकट्ठा किया गया था तो कोई भरोसेमंद कहानी जरूर बनाई गई होगी और यह कोई बहुत गोपनीय नहीं रहा होगा। वैसे भी कहा जाता है कि जिस बात को तीन लोग जान जाएं वह गोपनीय नहीं रह सकता है। यहां तो 16 लोग जानते ही थे। फिर भी उसपर कोई रोशनी नहीं है।

मूल खबर के फॉलो अप में आज हिन्दुस्तान टाइम्स में छपा है कि इस राशि पर इतना टैक्स बनेगा और चूंकि एक व्यक्ति के घर से पकड़ा गया है इसलिए वही जिम्मेदार होगा, दूसरों से पूछताछ की जाएगी और अगर बाकी लोगों ने अपना स्वीकार नहीं किया तो जिसके घर से बरामद हुआ है उसी का माना जाएगा।

देखना है कि जांच एजेंसियां पुराने नोट रखने से संबंधित नया कानून लागू करती हैं कि नहीं आदि। खास बात यह है कि आज की खबर का शीर्षक यही बनाया गया है कि पकड़े गए दलाल को 483 करोड़ रुपया जुर्माना देना हो सकता है – उसके पास इतने पैसे हैं कि नहीं और नहीं हैं तो सरकार क्या करेगी आदि ज्यादा दिलचस्प और चिन्ताजनक मामलों पर खबर लगभग मौन है।

खबर में बहुत सारी बातें हैं पर यह नहीं है कि नोट बदले कैसे जाते या लोग बदले जाने के झांसे में कैसे आ गए। मजे की बात यह है कि खबर मूल मुद्दे पर तो शांत है अधिकारियों के (यानी ईमानदार सरकार) के दावे को प्रमुखता से छाप रहा है। जैसे कि नए कानून से जिसके यहां पुराने नोट बरामद हुए उसे पांच गुना जुर्माना देना होगा। ये अखबार वाले भी सरकार की तरफ से लोरी गाने और जनता को मीठी नीन्द सुलाने का ही काम कर रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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