अंग्रेजी अखबार भी खबर की जगह लोरी छापते हैं!

Sanjaya Kumar Singh : कानपुर में पकड़े गए 92 करोड़ रुपए के पुराने नोट वाली खबर का फॉलो अप आज हिन्दुस्तान टाइम्स में भी छपा है। मैं अंग्रेजी अखबारों को हिन्दी वालों के मुकाबले थोड़ा गंभीर मानता हूं और दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया के मुकाबले हिन्दुस्तान टाइम्स को। पर ये भी सरकार के भोंपू का ही काम करते हैं।

मूल खबर थी कि कोई व्यक्ति पुराने नोट को बदलवाने का दावा कर रहा था और उसके इस आश्वासन पर देश के भिन्न शहरों से कई लोग आए थे और मूल खबर पर यकीन किया जाए तो यह पैसा किसी एक व्यक्ति का नहीं, कई लोगों का है। इसीलिए 16 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। मूल खबर में यह नहीं बताया गया था कि पुराने नोट इस समय तक कैसे बदले जा सकते थे – जबकि रिपोर्टिंग के लिहाज से और मेरे जैसे पाठक के लिए भी यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।

अभी तक उसकी कोई चर्चा नहीं है जबकि इतना पैसा अगर कई लोगों से इकट्ठा किया गया था तो कोई भरोसेमंद कहानी जरूर बनाई गई होगी और यह कोई बहुत गोपनीय नहीं रहा होगा। वैसे भी कहा जाता है कि जिस बात को तीन लोग जान जाएं वह गोपनीय नहीं रह सकता है। यहां तो 16 लोग जानते ही थे। फिर भी उसपर कोई रोशनी नहीं है।

मूल खबर के फॉलो अप में आज हिन्दुस्तान टाइम्स में छपा है कि इस राशि पर इतना टैक्स बनेगा और चूंकि एक व्यक्ति के घर से पकड़ा गया है इसलिए वही जिम्मेदार होगा, दूसरों से पूछताछ की जाएगी और अगर बाकी लोगों ने अपना स्वीकार नहीं किया तो जिसके घर से बरामद हुआ है उसी का माना जाएगा।

देखना है कि जांच एजेंसियां पुराने नोट रखने से संबंधित नया कानून लागू करती हैं कि नहीं आदि। खास बात यह है कि आज की खबर का शीर्षक यही बनाया गया है कि पकड़े गए दलाल को 483 करोड़ रुपया जुर्माना देना हो सकता है – उसके पास इतने पैसे हैं कि नहीं और नहीं हैं तो सरकार क्या करेगी आदि ज्यादा दिलचस्प और चिन्ताजनक मामलों पर खबर लगभग मौन है।

खबर में बहुत सारी बातें हैं पर यह नहीं है कि नोट बदले कैसे जाते या लोग बदले जाने के झांसे में कैसे आ गए। मजे की बात यह है कि खबर मूल मुद्दे पर तो शांत है अधिकारियों के (यानी ईमानदार सरकार) के दावे को प्रमुखता से छाप रहा है। जैसे कि नए कानून से जिसके यहां पुराने नोट बरामद हुए उसे पांच गुना जुर्माना देना होगा। ये अखबार वाले भी सरकार की तरफ से लोरी गाने और जनता को मीठी नीन्द सुलाने का ही काम कर रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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रिजर्व बैंक के आंकड़े दे रहे गवाही, कालाधन रखना अब ज्यादा आसान हुआ!

Anil Singh : 2000 के नोट 1000 पर भारी, कालाधन रखना आसान! आम धारणा है कि बड़े नोटों में कालाधन रखा जाता है। मोदी सरकार ने इसी तर्क के दम पर 1000 और 500 के पुराने नोट खत्म किए थे। अब रिजर्व बैंक का आंकड़ा कहता है कि मार्च 2017 तक सिस्टम में 2000 रुपए के नोटों में रखे धन की मात्रा 6,57,100 करोड़ रुपए है, जबकि नोटबंदी से पहले 1000 रुपए के नोटों में रखे धन की मात्रा इससे 24,500 करोड़ रुपए कम 6,32,600 करोड़ रुपए थी।

यानि, रिजर्व बैंक ने सालाना रिपोर्ट के आंकड़े पेश किए हैं इससे साफ पता चलता है कि पहले सिस्टम में 1000 के नोट में जितना धन था, वह अब 2000 के नोट में रखे धन से 24,500 करोड़ रुपए कम है। तो, कालाधन खत्म हुआ या कालाधन रखने की सहूलियत बढ़ गई?

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नोटबंदी के ज़रिए कालेधन को खत्म करने का नहीं, बल्कि अपनों के कालेधन को सफेद करने का सरंजाम-इंतजाम किया गया था। सच एक दिन सामने आ ही जाएगा। ठीक जीएसटी लागू के 48 घंटे पहले जिन एक लाख शेल कंपनियों का रजिस्ट्रेशन खत्म किया गया है, उनके ज़रिए नोटबंदी के दौरान कई लाख करोड़ सफेद कराए गए हैं। मुश्किल यह है कि डी-रजिस्टर हो जाने के बाद इन एक लाख कंपनियों का कोई ट्रेस नहीं छोड़ा है मोदी एंड जेटली कंपनी ने। लेकिन सच एक न एक दिन सामने आ ही जाएगा। हो सकता है सुप्रीम कोर्ट के जरिए या सीएजी की किसी रिपोर्ट में।

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आईटीआर रिटर्न पर किसको उल्लू बना रहे हैं जेटली जी! वित्त मंत्री अरुण जेटली का दावा है कि नोटबंदी का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि देश में वित्त वर्ष 2016-17 के लिए भरे गए इनकम टैक्स ई-रिटर्न की संख्या 25% बढ़ गई है। आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 के लिए कुल दाखिल आईटीआर 2.83 करोड़ रहे हैं। यह संख्या ठीक पिछले वित्त वर्ष 2015-16 के लिए 2.27 करोड़ थी। इस तरह यह 24.7% की वृद्धि है। अच्छी बात है। लेकिन गौर करने की बात है कि इससे पहले वित्त वर्ष 2014-15 के लिए यह संख्या 2.07 करोड़ थी। अगले साल 2015-16 में यह 9.7% बढ़कर 2.27 करोड़ हो गई। वहीं, पिछले साल 2013-14 से 8.7% कम (2.25 करोड़ से घटकर 2.07 करोड़) थी। आईटीआर दाखिल करनेवालों की संख्या वित्त वर्ष 2010-11 के लिए 90.50 लाख, 2011-12 के लिए 1.64 करोड़ और 2012-13 के लिए 2.15 करोड़ रही थी। इस तरह वित्त वर्ष 2010-11 से लेकर वित्त वर्ष 2013-14 के दौरान आईटीआर दाखिल करनेवालों की संख्या क्रमशः 82.22%, 31.10% और 4.65% बढ़ी थी। अतः जेटली महाशय! वित्त मंत्री के रूप में आप किसी कॉरपोरेट घराने की वकालत नहीं कर रहे, बल्कि देश का गुरुतर दायित्व संभाल रहे हैं। इसलिए झूठ बोलने की कला यहां काम नहीं आएगी। जवाब दीजिए कि वित्त वर्ष 2010-11 और 2011-12 में कोई नोटबंदी नहीं हुई थी, फिर भी क्यों आईटीआर भरनेवालों की संख्या 82 और 31 प्रतिशत बढ़ गई? इसलिए नो उल्लू बनाइंग…

कुल दाखिल आईटीआर रिटर्न की संख्या

वित्त वर्ष  : संख्या (लाख में) : पिछले साल से अंतर (%)

2016-17 : 283 : +24.67

2015-16 : 227 : +9.66

2014-15 : 207 : (-)8.69

2013-14 : 225 : +4.65

2012-13 : 215 : +31.10

2011-12 : 164 : +82.22

2010-11 : 90.5 : +78.39

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वित्त मंत्रालय = भारत = भारतीय नागरिक! गुरुवार को इकनॉमिस्ट इंडिया समिट में एक पत्रकार ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से पूछा कि क्या ऐसा नहीं है कि नोटबंदी वित्त मंत्रालय के लिए अच्छी थी, लेकिन भारतीय नागरिकों के लिए नहीं, जिन्हें जान से लेकर नौकरी तक से हाथ घोना पड़ा और मुश्किलें झेलनी पड़ीं। इस पर जेटली का जवाब था, “मैं मानता हूं कि जो भारत के लिए अच्छा है, वही भारतीय नागरिकों के लिए अच्छा है।” धन्य हैं जेटली जी, जो आपने ज्ञान दिया कि सरकार और देश एक ही होता है। यही तर्क अंग्रेज बहादुर भी दिया करते थे। अच्छा है कि आम भारतीय अब भी सरकार को सरकार और अपने को प्रजा मानता है। वरना, जिस दिन वो इस मुल्क से सचमुच खुद को जोड़कर देखने लगेगा, उस दिन से आप जैसी सरकारों का तंबू-कनात उखड़ जाएगा, जिस तरह अंग्रेज़ों की सरकार का उखड़ा था। तब तक अंग्रेज़ों के बनाए औपनिवेशिक शासन तंत्र और कानून की सुरक्षा में बैठकर मौज करते रहिए, वित्त मंत्रालय के हित को भारत का हित बताते रहिए और विदेशी व बड़ी पूंजी का हित साधते रहिए।

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक मामलों के जानकार अनिल सिंह की एफबी वॉल से. अनिल सिंह अर्थकाम डाट काम नामक चर्चित आर्थिक पोर्टल के संस्थापक और संपादक भी हैं.

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85 से 95 परसेंट कमीशन पर अब भी बदले जा रहे हैं पुराने नोट!

Yashwant Singh : 2019 के लोकसभा चुनाव में मीडिया पर जितना पैसा बरसने वाला है, उतना कभी न बरसा होगा… कई लाख करोड़ का बजट है भाई…. मोदी सरकार भला कैसे न लौटेगी… और हां, नोट अब भी बदले जा रहे हैं.. 85 परसेंट से लेकर 95 परसेंट के रेट पर… यानि पुराना नोट लाओ और उसका पंद्रह से पांच परसेंट तक नया ले जाओ…. लाखों करोड़ रुपये का गड़बड़झाला है ये नोटबंदी… उपर से कहते हैं कि न खाउंगा न खाने दूंगा…

भइये, जब सारा का सारा अकेले खा गए तो भला दूसरे को कैसे खाने दोगे… और, जो तुम खुद खाए हो उसमें इस तरह से सरकारी, अर्द्ध सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं-एजेंसियों को मिलाए हो कि सब कुछ सरकारी, सहज, स्वाभाविक लग रहा है… किसी की औकात नहीं है जो नोटबंदी के घोटाले को उजागर कर सके जिसमें साहब एंड कंपनी ने कई लाखों करोड़ रुपये बनाए हैं और अब भी बनाए जा रहे हैं…

जी हां, काम चालू आहे… ये मेरा दावा है… ये मेरा खुला आरोप है… एनआरआई कोटे के नाम पर यह सारा धंधा चल रहा है… एनआरआई कोटा क्या है, इससे संबंधित खबर नीचे दे रहा हूं… इस घोटाले-गड़बड़झाले के तह तक जाने के लिए बूता चाहिए जो आज दुर्भाग्य से किसी मीडिया हाउस के बूते नहीं है… इतने भारी पैमाने पर पैसे देकर मीडिया हाउस खरीदे जा रहे हैं कि पूछो मत… जो नहीं बिक रहे, उन्हें लाठी-डंडे से लेकर छापे और जेल की राह की ओर धकेला जा रहा है.

वेब जर्नलिज्म में अभी ये संसाधन नहीं कि बड़े स्तर के खोजी अभियान चला सकें… जो बड़े घराने वेब जर्नलिज्म में आ रहे उनसे खोजी पत्रकारिता की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि वे पहले से ही गले तक दलाली और धंधेबाजी से मालामाल हुए पड़े हैं… देखते हैं… कुछ तो करना पड़ेगा.. काम मुश्किल है लेकिन किसी को तो हाथ लगाना पड़ेगा…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Shashank Singh नोटों की गिनती RBI में अभी तक चालू है… कितना रुपया आया था, अभी तक बता नहीं रहे हैं. बैंकों ने क्या बिना गिने नोट ले लिये थे? उपर से तुर्रा ये कि बच्चन से लेकर टुच्चन तक सब नोटबन्दी के गुण गा रहे हैं..

Yashwant Singh खेल चल रहा है अभी… नोट बदले जा रहे हैं… जो खुद पचासी परसेंट रख रहे हैं पुराने नोट का, वो लोग कौन हैं… इसकी शिनाख्त बस कर लीजिए… सारा खेल सबको पता चल जाएगा…

Shashank Singh आप की बात ठीक होगी… लोग पकड़े जा रहे हैं, कभी कभी खबर भी छप रही है… NRI लोगों के लिये 30 जून तक का समय दिया था नोट बदलने के लिये।

Yashwant Singh आप एनआरआई की छोड़िए, आप कोई देशी आदमी लाइए पुराने नोटों के साथ, मैं उसे पचासी प्रतिशत कमीशन पर बदलने वाले रैकेट से मिलवा दूंगा..

Vikas Yadav Journalist बीजेपी वाले खाते नहीं, लूटते हैं. डकैत हैं.

Yesh Arya इसी 85℅ के चक्कर मे सबकुछ cumputerised होने के बाबजूद भी RBI अभी तक यह नही बता रहा कि कितने 500 और 1000 के नोट जमा हुये कह रहा है गिने नही गये क्या बिना गिने जमा हो गये, मार्च में वित्त मंत्री 8 दिसंबर 2016 के आंकड़े दे रहे थे। रोज शाम को हर बैंक और करेंसी चेस्टों से RBI को नकदी की सूचना देना अनिवार्य होता है।


ये है एनआरआई कोटे से संबंधित खबर…

एनआरआई कोटे के नाम पर अब भी भारी कमीशन देकर 500-1000 के पुराने नोट बदल रहे….

मुंबई : नोटबंदी के इतने समय बाद भी आप अपने पुराने नोटों को बदल सकते है । बंद हुए 500 और 1000 रुपए के पुराने नोटों को अभी भी नए नोटों से बदला जा रहा है पर इसके लिए आपको बहुत मोटा कमीशन देना होगा। अनिवासी भारतीय (एनआरआई) को 30 जून तक पुराने नोट बदलने की अनुमति सरकार ने दे रखी है। यह एन.आर.आई. मोटा कमीशन लेकर आपके पुराने नोट बदलवाने के धंधे में लगे हुए हैं। इस धंधे से जुड़े एक व्‍यक्ति ने बताया कि इस काम के लिए प्रत्‍येक 100 रुपए पर 91 रुपए का कमीशन लिया जा रहा है। यदि आप एक करोड़ रुपए बदलवाना चाहते हैं तो आपको बदले में केवल 9 लाख रुपए के ही नए नोट मिलेंगे।

इतना मोटा कमीशन लोग क्‍यों दे रहे हैं, इस सवाल पर उस व्‍यक्ति ने बताया कि ये ऐसे लोग हैं जो सरकार को अपने धन का स्रोत नहीं बताना चाहते हैं। जिन लोगों ने अभी तक अपने धन के स्रोत का खुलासा नहीं किया है उन्‍हें डर है कि कहीं भविष्‍य में उनके आय के स्रोत का पता सरकार को न चल जाए, इसलिए वे अपना काला धन मोटा कमीशन देकर बदलवा रहे हैं। आरबीआई के एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की है। उन्‍होंने बताया कि इस तरह के नोट बदलने के बारे में उन्‍होंने भी सुना है लेकिन उन्‍होंने कहा कि इस पर रोक लगाने का अधिकार उनके पास नहीं है। अधिकारी ने बताया कि एनआरआई फुलप्रूफ डॉक्‍यूमेंट्स के साथ नोट बदल रहे हैं, ऐसे में उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती। 2 जनवरी को आर.बी.आई. ने कहा था कि एनआरआई मुंबई, दिल्‍ली, चेन्‍नई, कोलकता और नागपुर स्थित आरबीआई ऑफि‍स में 30 जून 2017 तक अपने पुराने नोट बदल सकते हैं। एन.आर.आई.के लिए नोट बदलने की सीमा फेमा कानून के मुताबिक प्रति व्‍यक्ति 25,000 रुपए है।

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बैंक ट्रांजैक्शन चार्ज के खिलाफ 6 अप्रैल को बैंक से कोई ट्रांजैक्शन न करें

कृपया सपोर्ट करें… बैंक ट्रांजैक्शन चार्ज के खिलाफ आवाज उठायें… 06 अप्रैल 2017 को कृपया बैंक से कोई ट्रांजेक्शन ना करें ताकि बैंक को पब्लिक का पावर पता चल सके. इस विरोध के कारण शायद बैंक चार्जेज हटा भी दें जो बैंकों ने अभी अभी नया लगाया है. अगर आज हम लोग एक साथ नहीं आये तो आने वाले दिनों में बैंक नए चार्जेज लगाने से नहीं डरेगी. पैसा अपना है तो फिर पैसा लेते वक़्त हम किस बात का चार्ज दें?

पहले पैसा बैंक में डलवाया फिर निकालने नहीं दिया और अब पैसे निकालने पे भी चार्ज. अब तो वक़्त आ गया है बैंकों को पब्लिक पावर दिखाने का. कृपया 6 अप्रैल को कोई भी ट्रांजैक्शन ना करें. अगर हम सब एक साथ हुए तो बैंकों को झुकना ही पड़ेगा. अगर फिर भी बैंक ना माने तो 24, 25, 26 अप्रैल को फिर से पब्लिक पावर दिखाना होगा. कृपया इस पोस्ट को व्हाट्सअप, इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्विटर, etc पे शेयर करें और सपोर्ट करें…

धन्यवाद।।।

An initiative for freedom from arbitrary decisions of Indian Banks.

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नोटबंदी के साइड इफेक्ट : असंगठित क्षेत्र के मजदूर नगदी के अभाव में न गांव में काम पाएंगे, न शहर में पनाह

-अभय नेमा
इंदौर। नोटबंदी पर प्रधानमंत्री ने खुद जनता से 50 दिन की मोहलत मांगी है लेकिन आरबीआई दिन रात भी नोट छपाई करवाए तो भी अर्थतंत्र में करेंसी की कमी पूरी होने में छह से आठ महीने लग सकते हैं। ऐसे में भवन निर्माण, कृषि समेत इनसे जुड़े काम धंधे और व्यापार व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित होंगे और खास तौर पर असंगठित क्षेत्रो में काम कर रहे मजदूर अपनी रोजी रोटी से हाथ धो बैठेंगे। ये ही लोग काम की तलाश में गांव ले शहर आते हैं लेकिन नकद के अभाव में न तो इनके पास गांवों में काम होगा न ही शहरों में इन्हें पनाह मिलेगी।

सामाजिक और आर्थिक मसलों पर अनुसंधान करने वाले जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल स्टूडीज़ (दिल्ली) की  शोध विभाग की प्रमुख डॉ. जया मेहता ने यह बात प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से हाल ही में आयोजित एक परिचर्चा में कही। डॉ. जया मेहता ने नोटबंदी की वैधता, गोपनीयता, सरकार द्वारा इस संकट के निपटने के बारे में किए जा रहे दावों पर भी सवाल उठाए।

उन्होंने बताया कि देश में नोट छापने के छापेखानों की क्षमता 2200 करोड़ नोट प्रति वर्ष छापने की है। जबकि नोटबंदी के कारण 2300 करोड़ नोट बैंकों में वापस आए हैं। एेसे में नोट प्रेस में साल भर छपाई हो और दोगुनी रफ़्तार से भी हो और यह भी मानकर चला जाए कि इस बीच छोटे नोट यानी की 100, 50, 20 और 10 के नोट नहीं छपेंगे या कम छपेंगे तो भी बाजार में पूरे नोट वापस आने में 6 से 8 महीने लगेंगे।

यानी छह से आठ महीने तक बाजार में नकदी का संकट बना रहेगा और इसका सबसे बुरा असर भवन निर्माण क्षेत्र पर पड़ेगा। भवन निर्माण यानी कंस्ट्रक्शन में करीब साढ़े चार करोड़ मजदूरों को काम मिलता है। इसमें संगठित क्षेत्र में 1.4 करोड़ मजदूर और असंगठित क्षेत्र में 3 करोड़ मजदूर हैं। मुद्रा की कमी से ये लोग अपने रोजगार से हाथ धो बैठेंगे और इनसे संबंधित अन्य उद्योग, व्यापार, व्यवसाय भी प्रभावित होने लगेंगे। इसके असर की खबरें भी आने लगी हैं। सीमेंट और निर्माण कंपनी लार्सन एंड टूब्रो ने 14 हजार लोगों को हटा दिया है। भीलवाड़ा से लेकर दिल्ली तक की औद्योगिक इकाइयों में उत्पादन आधा रह गया है जिसके कारण मजदूरों को काम से हटाया जा रहा है।

हमारी कृषि पर भी नोटबंदी की मार पड़ने वाली है। अभी खरीफ की बिक्री और रबी की बुवाई का समय है। किसानों को मुद्रा चाहिए लेकिन पहले तो नोटबंदी के नाम पर किसानों की सारी मुद्रा उनके बैंकों में रखवा ली और अब यह नियम लगा दिया है कि पुराने पांच और हजार के नोट से काॅपरेटिव से  बीज खरीद सकेंगे लेकिन अब किसानों के पास मुद्रा ही नहीं है तो वे कहां से बीज खरीदेंगे। कृषि क्षेत्र में 10 करोड़ मजदूर हैं। खेतिहर मज़दूर गांव से शहर भी आते हैं लेकिन शहरों में काम नहीं मिलने पर इन्हें वापस गांव जाना पड़ रहा है। गौर करने वाली बात यह है कि इन मजदूरों की आवाज और इनके दुख-तकलीफों की बात न तो कोई मीडिया, न सोशल मीडिया और न ही कोई अखबार करता है।  एेसे में यह पता भी नहीं चलेगा कि ये मजदूरों की पूरी जमात और उनके दुख तकलीफ कहां गुम हो जाएंगे।

डॉ. जया मेहता ने नोटबंदी के निर्णय की वैधता के बारे में सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह के हवाले से कहा कि रिजर्व बैंक की धारा 26 (2) में यह प्रावधान है कि आप नोटबंदी में कोई खास सीरीज को बंद कर सकते हैं लेकिन पूरे नोट ही बंद नहीं कर सकते हैं। सरकार ने पांच सौ और हजार के नोटों की पूरी की पूरी सीरीज ही बंद कर दी जो कि गलत है। इसके पहले जब दो बार नोटबंदी हुई तो ब्रिटिश सरकार ने और फिर मोरारजी देसाई ने अध्यादेश का सहारा लिया था। इस बार इस फैसले के लिए अध्यादेश का सहारा क्यों नहीं लिया गया। इस तरह एक बड़े फैसले को लेने में संसद की उपेक्षा की गई।

उन्होंने कहा कि नोटबंदी का फैसला कतई गोपनीय नहीं था। यह फैसला रिजर्व बैंक बोर्ड के डायरेक्टर करते हैं जिन्हें एक महीने पहले इसकी सूचना देनी पड़ती है और बैठक का एजेंडा बताना पड़ता है। रिजर्व बैंक के बोर्ड़ में तीन डायरेक्टर निजी कंपनियों से जुड़े हैं और इन्हें नियमानुसार नोटबंदी के एजेंडा की जानकारी एक महीने पहले दे गई होगी। ऐसे में सरकार द्वारा इस मामले को गोपनीय रखने की बात गले से उतरती नहीं है। आरबीआई के डायरेक्टर डा. नचिकेता आईसीआईसीआई बैंक से जुड़े रहे हैं। डा. नटराजन टीसीएस टाटा कंसल्टेंसी सर्विस के एमडी और सीईओ रह चुके हैं। भरत नरोत्तम दोषी महिंद्रा एंड महिंद्रा लि, के सीईओ रह चुके हैं। वे गोदरेज से भी जुड़े रहे हैं। रिजर्व बैंक के नियमों के तहत मौद्रिक नीति संबंधी किसी भी निर्णय का फैसला रिजर्व बैंक का बोर्ड़ करता है और फिर केंद्र सरकार से इसे लागू करने के लिए कहता है। इस बोर्ड में कार्पोरेट से जुड़ी निजी कंपनियों के चार डायरेक्टर थे एेसे में सरकार का यह दावा करना कि इस निर्णय को पूरी तरह से गोपनीय रखा गया संदेह पैदा करता है।

8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा के बाद से ही सरकार रोज ही नई अधिसूचना ला रही है अब तक 10 अधिसूचनाएं आ चुकी हैं। सरकार ये नए नियम अपनी विवेक के आधार पर कर रही है जो यह कहता है कि पुराने नोट विमान में बैठने वालों को चलते रहेंगे, पेट्रोल पंपों पर चलते रहेंगे लेकिन कोआपरेटिव बैंक में नहीं चलेंगे। गौर करने वाली बात है कि सरकार यह कैसे तय कर रही है कि पुराने नोटों से विमान में यात्रा करने करने की छूट रहेगी लेकिन कोआपरेटिव में इन नोटों को बदलने की छूट नहीं रहेगीा। यह सब जानते हैं कि विमान में कौन सा वर्ग बैठता है और कोआपरेटिव बैंक पर में गरीब और किसान वर्ग के लोग निर्भर रहते हैं। इसी तरह से अब बिग बाजार से डेबिट कार्ड के जरिए दो हजार रुपए निकालने की छूट दे दी गई है। बिग बाजार ही क्यों सरकार ने चुना, यह भी सवाल है।

परिचर्चा में महिला हितों की पैरवीकार कल्पना मेहता ने कहा कि नोटबंदी के कारण महिलाओं को अपनी छोटी-मोटी बचत से हाथ धोना पड़ा है। यह पैसा उनके पास रहता था जो आड़े वक्त में उनके काम आता था। परिचर्चा में प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव विनीत तिवारी, बैंक एंप्लाइज आफिसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अालोक खरे,  प्रगतिशील लेखक संघ इंदौर के अध्यक्ष एसके दुबे, अशोक दुबे, राकेश सिंह,  अजय लागू, सुलभा लागू, मनोज मेहता व अभय नेमा ने भी भाग लिया।

Nema Abhay
nemaabhay@gmail.com

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