बीएचयू के प्रोफेसर कौशल किशोर मिश्रा ने दी खुली धमकी- ‘जेएनयू के लोग इधर आए तो देख लेंगे’

Mithilesh Priyadarshy : बीएचयू के राजनीतिशास्त्र विभाग का एक प्रोफेसर कौशल किशोर मिश्रा, जो घोर दलित विरोधी भी रहा है, उसने चेतावनी दी है कि बीएचयू कैम्पस में यदि जेएनयू के लोग आएं तो उन्हें बख्शा नहीं जाएगा. मतलब ये आदमी प्रोफेसर है, गुंडा है, मवाली है, क्या है. देखिए कि संघी मानसिकता वाली सरकार के सत्ता में आते ही ऐसे ‘नफरती कनखजूरे’ कैसे अपने बिलों से एक-एक कर बाहर आने लगे हैं. अबे दीवाने, बीएचयू को भारत के नक्शे से बाहर कर उसके चौधरी बन चुके हो क्या, जो आने से मना कर रहे हो?

Virendra Yadav : बीएचयू के राजनीतिशास्त्र विभाग के एक ‘सांस्कृतिक राष्टवादी’ प्रोफ़ेसर ने कल लखनऊ में एक सांस्कृतिक राष्ट्रवादी संगठन के ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ‘ पर आयोजित सेमिनार में संघ के आलोचकों को यह धमकी दी कि बीएचयू में कदम रखा तो देख लूँगा “अगर जेएनयू के लोग बीएचयू आ जाएँ तो बख्से नही जायेंगें” (समाचारपत्रों में यह खबर प्रकाशित है). यह आयोजन लविवि के कुलपति प्रो.एसबी निमसे की अध्यक्षता में संपन्न हुआ. तो क्या बीएचयू अब ‘संघभूमि’ हो गया है जहाँ न तो भारत का संविधान लागू है और न दंड संहिता? भगवा प्रोफेसरों का गुंडे मवालियों की भाषा में बोलना सचमुच स्तब्धकारी है. इसकी निंदा करना निंदा को भी लज्जित करना है. इस ‘दिनन के फेर’ में तो फिलहाल यही सब होना है.

Chauthi Ram Yadav यह स्वनाम धन्य प्रोफेसर कौशल किशोर मिश्र ही हो सकते हैं,जो घोर एंटी मार्क्सिस्ट, दलित विरोधी रहे हैं। बीएचयू का तो पूरी तरह भगवाकरण हो ही गया है। सरकार भगवा, कुलपति भगवा और राजनीति विज्ञान विभाग उसका अड्डा है!

Abhishek Srivastava : अगर बात केके मिश्रा की हो रही है तो ज्‍यादा सीरियस लेने का मामला नहीं होना चाहिए। कौशल गुरु बनारस के उत्‍तम बोकरातों में एक हैं। झूठ बोलने में माहिर, भौकाल में 56 इंच के बाप। आप साल भर बाद देखिएगा, ये मोदी को गरियाते मिलेंगे।

Jayantibhai Manani : इस जातिवादी प्रोफ़ेसर को पता नहीं है कि ये देश मनुस्मृति के रचयिता जातिवादियो के बाप की जागीर नहीं है. ये देश 130 करोड़ भारतवासियों के बाप का है. देश का संविधान और कानून अगर लागु होता तो ये जातिवादी प्रोफ़ेसर अनापसनाप बोलकर प्रोफ़ेसर के पद पर नहीं रह सकता…

Girish Mishra : There was a time when, thanks to the efforts of Dr Shrimali, BHU was rid of communalism. It seems, communalists have once again captured it. This is the reason why BHU lost its national/international status and has been reduced to a local university.

Rajendra Tiwari : मंत्री आईआईटी में संस्कृत पढ़वाना चाहती हैं। ये प्रोफ़ेसर गुंडई से राष्ट्र परिभाषित करना चाह रहे हैं। थोड़े दिनों में एमए कौटिल्य अर्थशास्त्र, एमए चाणक्य नीति, एमएससी धन्वन्तरि ज्ञान, एमएससी वैदिक गणित, एमएससी गरुण पुराण टाइप डिग्रियाँ होंगी बीएचयू व अन्य विवि में!

Shashi Kant : शिक्षा संस्थानों का मुख्यतः जातिवादी सवर्ण, पुरुषवादी, और हिंदूवादी स्वरूप इन्हें रूढ़िवादी यथास्थितिवाद का उर्वर स्थान बनाने में सहयोगी हो रहा । समाज और प्रकृति को समझने, समझाने की सतही दृष्टियाँ और पद्धतियाँ जो अधिकांशतः जातिवादियों- कर्मकांडियों के निर्देशन में वैज्ञानिक होने का दावाकरती रहीं – इन्होंने ज्ञान के सभी क्षेत्रों में केवल रूढ़ियों का पोषण ही नहीं किया, युवापीढ़ी के सेक्यूलराइज़ेशन को अवरूद्ध किए रखा। नारियल फोड़कर वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं का उद्घाटन होता रहा और अंतरिक्ष यान भेजे जाते रहे। संस्कार भारती, सेवा भारती, इतिहास संकलन योजना, शैकक्षणिक महासंघ, ए बी वी पी आदि प्रत्यक्ष सरकारी सम्बल पाकर संगठित रूप से संघनिर्देशित और नियुक्त संस्थान प्रमुखों के सक्रिय निर्देशन में प्रकृति, विज्ञान और समाज की अधोगामी धर्मांध धारणाओं को आगे बढ़ाने के अजेंडा पर काम कर रहे। नव उदार भूमण्डलीकरण निरंतर ह्रासमान वैधता के संकट से आक्रामक संकीर्णताओं का संरक्षण, संवर्धन कर, वैज्ञानिक , मानवीय और लोकतांत्रिक चेतना की प्रक्रिया को सब्वर्ट कर निपटना चाहता है। यह स्पष्टत: चुनाव और क़ानून की आड़ में औरसहयोग से साम्प्रदायिक ताक़तों द्वारा भारतीय राज्य और समाजप्रणाली पर बलात क़ब्ज़े की कारवाई है। आर्थिक राजनैतिक अभिजन इस अवसरवादिता और आक्रामक कम्यूनलाइजेशन के दीर्घकालिक और स्थायी दुष्परिणामों से परिचित है। हम एक संकटपूर्ण अतीत की ओर धकेले जा रहे। इससे संगठित होकर भिड़ने केअलावा कोई विकल्प नहीं।

(सौजन्य : फेसबुक)

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