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आज है माखनलाल जयंती : मजीठिया मांग रहे पत्रकार इस मीडिया पर गर्व करें कि शर्म !

राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा के लिए माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा कि ‘बिजली के प्रकाश में बैठकर लिखने वाले की अपेक्षा, जो रोटी बेंचकर तेल खरीदता है और फिर लिखता है उसकी ओर ध्यान देना जरूरी है, ऐसे साहित्यिक की सेवा करते हुए जो दिखाई दे उसे मेरा वन्दन है।…गरीब साहित्यिक से बड़ा मैं दुनिया में किसी को नहीं मानता। साधनहीनता में छटपटाने वाले साहित्यिक की ओर पुरानी व नयी पीढ़ियों का ध्यान किया जाना ही चाहिए। गद्दियों और सिंहासनों को चाहे जो चुनौती दे, परन्तु मृगछाला पर बैठे बृहस्पति को कोई चुनौती नहीं दे सके, यह मेरी साध है।’ 4 अप्रैल 1925 को जब खंडवा से उन्होंने ‘कर्मवीर’ का पुनः प्रकाशन किया तो उनका आह्वान था- ‘आइए, गरीब और अमीर, किसान और मजदूर, ऊंच-नीच, जित-पराजित के भेदों को ठुकराइए। प्रदेश में राष्ट्रीय ज्वाला जगाइए और देश तथा संसार के सामने अपनी शक्तियों को ऐसा प्रमाणित कीजिए, जिस पर आने वाली संतानें स्वतंत्र भारत के रूप में गर्व करें।’ 

राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा के लिए माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा कि ‘बिजली के प्रकाश में बैठकर लिखने वाले की अपेक्षा, जो रोटी बेंचकर तेल खरीदता है और फिर लिखता है उसकी ओर ध्यान देना जरूरी है, ऐसे साहित्यिक की सेवा करते हुए जो दिखाई दे उसे मेरा वन्दन है।…गरीब साहित्यिक से बड़ा मैं दुनिया में किसी को नहीं मानता। साधनहीनता में छटपटाने वाले साहित्यिक की ओर पुरानी व नयी पीढ़ियों का ध्यान किया जाना ही चाहिए। गद्दियों और सिंहासनों को चाहे जो चुनौती दे, परन्तु मृगछाला पर बैठे बृहस्पति को कोई चुनौती नहीं दे सके, यह मेरी साध है।’ 4 अप्रैल 1925 को जब खंडवा से उन्होंने ‘कर्मवीर’ का पुनः प्रकाशन किया तो उनका आह्वान था- ‘आइए, गरीब और अमीर, किसान और मजदूर, ऊंच-नीच, जित-पराजित के भेदों को ठुकराइए। प्रदेश में राष्ट्रीय ज्वाला जगाइए और देश तथा संसार के सामने अपनी शक्तियों को ऐसा प्रमाणित कीजिए, जिस पर आने वाली संतानें स्वतंत्र भारत के रूप में गर्व करें।’ 

 

लेकिन आज कारपोरेट घरानों ने पत्रकारिता का क्या हाल बना रखा है, जग जाहिर है। उनके चाल-चलन की इस खराब नजीर और क्या हो सकती है कि उनकी करतूतों के खिलाफ पहले तो सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया। उसे भी कारपोरेट मीडिया ने अनसुना कर दिया तो अब देश भर के पत्रकार सर्वोच्च न्यायालय के दर पर दस्तक दे रहे हैं। आगामी 28 अप्रैल को उसकी सुनवाई है। इस बीच अखबार घराने, पता चला है, तरह तरह के कागजी हेर-फेर करने में लगे हैं, ताकि मीडिया कर्मी कानूनी तौर भी अपना हक हासिल न कर सकें। 

भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में माखनलाल चतुर्वेदी नाम बड़े आदरपूर्वक लिया जाता है। वह गणेश शंकर विद्यार्थी से विशेष रूप से प्रभावित रहे। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में वह सन 1921-22 के असहयोग आंदोलन में सक्रिय सहभागिता निभाते हुए जेल गए थे। वह कई प्रतिष्ठित समाचारपत्रों के संपादक रहे। उन्होंने मुख्य रूप से कर्मवीर, प्रभा, प्रताप आदि पत्रों का संपादन किया। वर्ष 1943 में उन्हें ‘हिम किरीटिनी’ पर उस समय का हिन्दी साहित्य का सबसे सम्मानित ‘देव पुरस्कार’ दिया गया था। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में उनके नाम पर स्थापित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय को कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी और भारतीय विश्वविद्यालय संगठन की सदस्यता भी प्राप्त है।  

विश्वविद्यालय की सामान्य परिषद में चेयरमैन भारतीय प्रेस आयोग, जनसंपर्क विभाग, मध्यप्रदेश वित्त मंत्रालय, नेता प्रतिपक्ष मध्यप्रदेश विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा सदस्य, ख्याति प्राप्त संपादक, शिक्षाविद, भाषाविद, आदि आते हैं। विश्वविद्यालय द्वारा पत्रकारिता, मास कम्यूनिकेशन, पब्लिक रिलेशन, एडवर्टाइजिंग, लाइब्रेरी एवं इनफॉर्मेशन साइंस, फोटोग्राफी से लेकर उच्च स्तरीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, रे़डियो, टेलीविज़न, सायबर जर्नलिज्म, वीडियोग्राफी, प्रिटिंग टेक्नोलॉजी एवं इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी जैसे विभिन्न कोर्स संचालित किये जाते हैं। 

सन 1927 में माखनलाल चतुर्वेदी भरतपुर में सम्पादक सम्मेलन के अध्यक्ष बने। माधवराव सप्रे के ‘हिन्दी केसरी’ ने सन 1908 में ‘राष्ट्रीय आंदोलन और बहिष्कार’ विषय पर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया तो खंडवा के युवा अध्यापक माखनलाल चतुर्वेदी का निबंध प्रथम चुना गया। अप्रैल 1913 में खंडवा के हिन्दी सेवी कालूराम गंगराड़े ने मासिक पत्रिका ‘प्रभा’ का प्रकाशन आरंभ किया, जिसके संपादन का दायित्व माखनलाल को सौंपा गया। सितंबर 1913 में उन्होंने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह पत्रकारिता, साहित्य और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए समर्पित हो गए। 

जयप्रकाश त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से

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