कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन था। इस उपलक्ष्य में कुछ ऐसा मायाजाल रचा गया मानो गणेश विसर्जन की धूम मची हो। टीवी, अख़बार, सोशल मीडिया सब के सब जन्मदिन के विज्ञापनों से पटे पड़े थे। लेकिन इस बीच पुराने वक्त की पत्रकारिता भी याद करनी जरूरी है। नीचे पढ़ें…
शीतल पी सिंह-
Subrat Kumar Sahu, ने इसे कल अपनी वाल पर लिखा था । मेरी मित्रसूची में नहीं हैं लेकिन फ़ेसबुक ने मुझे सुबह सुबह दिखाया । एक दिन पुरानी पोस्ट है लेकिन मुझे लगता है कि बेहद महत्वपूर्ण है ।मूल पोस्ट अंग्रेज़ी में है लेकिन उसका टूटा फूटा अनुवाद प्रस्तुत है!
सुब्रत कुमार साहू-
“मीडिया और सभी प्रधानमंत्रियों के जन्मदिन
मुझे लगता है कि यह 1997 के अंत में था। मैं उस समय टीवी टुडे के साथ आजतक के लिए काम कर रहा था, जो डीडी2 पर एक दैनिक समाचार बुलेटिन था (बाद में यह एक समाचार चैनल बन गया)। वह प्रधानमंत्री आईके गुजराल का जन्मदिन था। उस शाम की लीड स्टोरी यही होनी थी।
एक बार सभी कहानियां संपादित हो गईं और तैयार हो गईं, हम एंकर के लिए स्टूडियो सेट कर रहे थे। मुख्य संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह ही एंकर भी थे, जो उस समय एक स्टार एंकर थे।
अंतिम क्षण में, राजस्थान से एक फुटेज-फीड आया। उस समय एक फीड आसानी से अगले दिन के बुलेटिन में जा सकता था। लेकिन रुको, यह कहानी एक दलित युवक के बारे में थी जिसने अपनी शादी के दौरान घोड़े की सवारी करने की हिम्मत की, पुराने ऊंची जाति के फरमान को धता बताते हुए।
एसपी सिंह, मुख्य संपादक, ने रुककर कुछ ही मिनटों में कहानी को संपादित करने के लिए कहा। फ्लोर पर सबसे अच्छे वीडियो संपादकों में से एक ने इसे वास्तव में तेजी से किया। कहानी तैयार थी।
अब सवाल यह था कि दलित व्यक्ति के शौर्य को समायोजित करने के लिए कौन सी कहानी को हटाया जाए। एसपी सिंह को कोई संदेह नहीं था। उन्होंने कहा: “प्रधानमंत्री के जन्मदिन की कैप्सूल को हटाएं।” और ऐसा ही हुआ।
उस समय मीडिया ऐसे ही था! उस समय इस स्थान पर होने पर गर्व महसूस होता था। अब इन मूर्खों को देखो, ये बेशर्म गुलाम। आज मुझे शर्म महसूस होती है जब मैं लोगों को बताता हूं कि मैंने कभी इस स्थान को साझा किया था।

इस पोस्ट पर आई कुछ प्रतिक्रियाएं भी पढ़ें…
विनोद शर्मा-
हम पत्रकार लोग अपनी आज़ादी का ढिंढोरा जभी पीटते हैं जब सरकारें कमजोर होती हैं या फिर नेता संवेदनशील। गुजराल साहब ने इंदिरा का साथ सेंसरशिप के मुद्दे पर छोड़ा था। अंदाज़ा कीजिए कि अगर आडवाणी जी पीएम होते और उनका जन्मदिन होता तो क्या होता? मोदी जी की अपेक्षित प्रतिक्रिया पर तो बहस ही व्यर्थ है।
जितेंद्र सिंह-
प्रधानमंत्री को बधाई देने के लिए टूल किट का इस्तेमाल हुआ। जाहिर है इन्हीं की तरफ से हुआ। पोस्ट और वीडियो बना के, मशहूर लोगों को बोला गया कि आप अपने सोशल मीडिया के हैंडल से पोस्ट करें। इतनी टुच्चई तो कोई सोच भी नहीं सकता।
विजय कुमार-
मनमोहन के समय अर्णब वगैरह भी बड़े सरोकारी लगते थे। कैग और सुप्रीम कोर्ट तक एक्टिविस्ट बने हुए थे। अभी सब लेट गए हैं। इस देश में पहली बात तो फासिस्ट अपने बूते सत्ता में आए और कहानी बदल गई इसलिए पहले की क्रांतियां भी अब संदेह के दायरे में हैं।
मनोज रैदास कबीर-
इस देश के 99% प्रभु वर्ग को जिस चीज़ की ज़ुस्तज़ु थी वो दशकों बाद उसे मिल गई है। ये वो वर्ग है जो कभी भी अपने विचारों/कर्मो में लोकतांत्रिक मूल्यों को महत्व नही देता है । अब जो मिल गया है तो उसका मजा कुछ वर्षों तक मिलना तय है ।
इसके नतीजे प्रभु वर्ग के .01% को छोड़कर सभी को भुगतने है। विश्व का इतिहास गवाह है कि ये प्रभुवर्ग जो क्रूर काम खुद नही करते दिखता चाहता है उसे करवाने के लिए वो अपने वर्ग से बाहर के किसी व्यक्ति को सत्ता में लाकर उसे करवाता है।
नेपोलियन से लेकर एरदोगान और मोदी तक कारनामे इसकी तस्दीक करते है।
शेरबाज यूपी-
सुब्रतो चटर्जी ने क्या खूब कहा था की कोई भी चुनी हुई सरकार इतनी जनविरोधी हो ही नहीं सकती हैं जितनी मोदी साकार हैं बीजेपी सरकार इतनी जनविरोधी इसलिए ही हैं की ये चुनी हुई नहीं हैं इन्हें विशवास हैं की ये वोट चोरी चनाव आयोग के समर्थन से से फिर से आ जाएंगे इसलिए खुलकर जनविरोधी हैं तमाम विदेशी शक्तियों अमेरिका यूरोप चीन रूस इज़राइल सभी को भी भारत ऐसी ही सरकार चाहिए जो उनके हितों में तमाम जनविरोधी काम कर सके उनके हित में अपनी ड्यूटी बीजेपी ने पूरी निष्ठा से निभाई हैं।
अजमेर सिंह-
यह चापलूसी मेरे हिसाब से एकाएक नहीं है इसकी बुनियाद आजादी के बाद जब सामंतों को भी उस संविधान सभा में शामिल किया गया और उनको प्रीवीपर्स के नाम भत्ता भी दिया गया और चुनाव हुआ तो ज्यादातर सामंत चुनकर भी आ गए।
दूसरा दौर आया नब्बे दशक के आस पास जब जाति के आधार पर पार्टियां बनी और मंडल आयोग के जवाब में कमंडल आया। और गुंडों का भरपूर दखल हुआ राजनीति में।
तीसरा चरण आया वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण अर्थात अब अपराध का पेड़ इतना बड़ा हो गया था कि हर वह ताकत जनता के पक्ष की, से टकराकर उसे ध्वस्त कर सकता था। अब वह पेड़ पूरी तरह फल फूल रहा है। अब इस पेड़ को पूरी तरह काटे बगैर कोई रास्ता बचता नहीं है।
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