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राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे

Sanjaya Kumar Singh : मीडिया के कारनामे और मीडिया में एफडीआई… भारत को एफडीआई (विदेशी संस्थागत निवेश) तो चाहिए पर समाचार मीडिया में सिर्फ 26 प्रतिशत एफडीआई की इजाजत है। दूसरी ओर, कोई भी (भारतीय नागरिक) मीडिया मंडी में दुकान खोल ले रहा है। यहां तक तो ठीक है – पर तुरंत ही टोकरी उठाकर हांफता-कांपता कभी जेल, कभी अस्पताल पहुंच जा रहा है। पर कोई देखने वाला नहीं है। ना अस्पताल में, ना जेल में। वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन तो पुराने संस्थान नहीं देते, नए और नौसिखुओं से क्या उम्मीद? कार्रवाई किसी पर नहीं होती।

Sanjaya Kumar Singh : मीडिया के कारनामे और मीडिया में एफडीआई… भारत को एफडीआई (विदेशी संस्थागत निवेश) तो चाहिए पर समाचार मीडिया में सिर्फ 26 प्रतिशत एफडीआई की इजाजत है। दूसरी ओर, कोई भी (भारतीय नागरिक) मीडिया मंडी में दुकान खोल ले रहा है। यहां तक तो ठीक है – पर तुरंत ही टोकरी उठाकर हांफता-कांपता कभी जेल, कभी अस्पताल पहुंच जा रहा है। पर कोई देखने वाला नहीं है। ना अस्पताल में, ना जेल में। वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन तो पुराने संस्थान नहीं देते, नए और नौसिखुओं से क्या उम्मीद? कार्रवाई किसी पर नहीं होती।

देश के मीडिया उद्योग में नीरा राडिया से लेकर पीटर और इंद्राणी मुखर्जी तक ने पैसे लगाए निकाले। पत्रकार और राजनीतिज्ञ राजीव शुक्ल (पत्नी भी) मीडिया में हैं।  राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे। कॉरपोरेट की बात करूं तो सहारा से लेकर रिलायंस तक का पैसा मीडिया में है। इनके कारनामे आप सब जानते हैं। 1800 करोड़ रुपए के निवेश पर बीएमडब्लू में 1800 लोगों को नौकरी और अखबार या चैनल पैसे ना होने से बंद हो रहे हैं। कैसे-कैसों के कैसे कैसे चैनल खुल रहे हैं। मीडिया में कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, कौन रह रहा है, कौन भागने वाला है, कौन टिकने आया है, कौन पिटने वाला है, कौन भुनाने आया है, कौन जोड़ने, कौन तोड़ने, कौन धंधा करने और कौन कमाने। गंवाने भी कोई आया है क्या। कौन कमा रहा है, कैसे? नहीं कमा रहा है तो क्यो? कोई गंवा भी रहा है क्या। कहां से।

सरकारी विज्ञापनों की 8000 करोड़ रुपए की मलाई कौन और कैसे खा रहा है? कौन ललचा रहा है? किसे अंगूर खट्टे लग रहे हैं – बहुत सारे सवाल और विषय हैं। क्षेत्र तो बहुते बड़ा है। अनुसंधान का। घोटाला घपला का। बहुत मसाला होगा। फिल्म सीरियल, कहानी, उपन्यास, नाटक-नौटकी, कविता के लिए। इसपर कुछ होना चाहिए। कच्चा माल भड़ा पड़ा है। कैसे निकलेगा। दूसरी ओर, प्रिंट मीडिया में 26 प्रतिशत एफडीआई की ही अनुमति है। दूसरे कई उद्योगों में 100 प्रतिशत है। मेक इन इंडिया का नारा है। तो विदेशी संस्थान को 100 प्रतिशत निवेश से अखबार निकालने या मीडिया चैनल चलाने की इजाजत क्यों नहीं। कौन मना कर रहा है, विरोध कौन कर रहा है। कोई समर्थक भी है क्या। क्या कारण हैं। ये सब जानने का अधिकार तो हमें है। कुछ सोचो, कुछ करो। देसी मीडिया संस्थानों की दशा इतनी खराब है। फिर भी एफडीआई नहीं। आखिर क्यों? दक्षिण भारत में मीडिया और राजनीति का जो मेल है, पश्चिम भारत में क्या कहने , उत्तरपूर्व में मीडिया की अलग ही दुनिया है। बहुत ही मसालेदार।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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