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क्या नरेंद्र मोदी परसेप्शन वॉर हार रहे हैं?

वीररस से करूण रस की यात्रा के बीच का ये कूलिंग ऑफ पीरियड है, जहां कॉरपोरेट मीडिया को दुनिया में डंका बजाने वाली छवि को भी पुनर्जीवित करना है। लेकिन इतना आसान नहीं है…

राकेश कायस्थ-

क्या आपने गौर किया है कि पिछले दो-तीन दिन में ऑपरेशन सिंदूर को लेकर चल रहा तमाशा अचानक थम सा गया है। ऐसा क्यों हुआ? मैंने ऑपरेशन सिंदूर खत्म होते ही ये लिखा था कि प्रधानमंत्री मोदी अपने राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा दांव खेल चुके हैं। अब यहां से कोई और नई कहानी कामयाब तरीके से बेच पाना उनके लिए उत्तरोत्तर कठिन होता जाएगा। इस मुद्दे पर आगे विस्तार से चर्चा करेंगे लेकिन उससे पहले जिक्र एक खबर का!

बिहार से आया नया सर्वे नींद उड़ाने वाला है। पोल ट्रैकर के हिसाब से बिहार में यूपीए की सरकार बन रही है और मुख्यमंत्री की पहली पसंद के रूप मे तेजस्वी यादव नाम पहले नंबर पर बरकरार है। लेकिन ज्यादा बड़ी खबर ये है कि युवाओं में लोकप्रियता के मामले में राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी को पीछे छोड़ दिया है। मोदी 39 प्रतिशत युवाओं की पसंद हैं तो दूसरी तरफ राहुल के पक्ष में 47 फीसदी युवा हैं।

अब लौटते हैं, मूल विषय पर। न्यू इंडिया की महागाथा मोदी ने इस देश के कॉरपोरेट मीडिया की मदद से लिखी थी। नैरेटिव बिल्डिंग की मोदी की असाधारण क्षमता को देखते हुए कई बार मुझे लगता था कि अगर मोदी खुद कोई न्यूज चैनल चलाते तो उनका संस्थान कभी नंबर टू नहीं होता और टीआरपी के सारे रिकॉर्ड तोड़ता।

न्यूज चैनलों के बीच जब गलाकाट प्रतिस्पर्धा की शुरुआत हुई थी, तब जो सबसे ज्यादा टीआरपी बटोरू चैनल के प्रमुख या शिप्ट इंचार्ज अपने विरोधियों को छकाने के लिए तरह-तरह की रणनीतियां अपनाते थे। प्रोमो किसी और खबर का चलाया जाता था और प्राइम टाइम बुलेटिन किसी दूसरी खबर से शुरू होता था।

एक खबर डुगडुगी बजाकर बेची जाती थी और उसकी देखा-देखी बाकी चैनल वहां तक पहुंचते, तब तक चैनल किसी नई खबर पर स्विच कर जाता था। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्रियेशन नरेंद्र मोदी का नैरेटिव बिल्डिंग का खेल न्यूज चैनलों की इसी रणनीति से मिलता-जुलता रहा है। एक कहानी लेकर आना और उसके पीछे पूरे देश को लगाना, विपक्ष जब तक उस कहानी की काट ढूंढे किसी नई कहानी पर आ जाना।

लेकिन स्विच हिट के महारथी मोदी के लिए ये खेल अब उतना सहज नहीं रहा। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आम जनता के बीच अपनी साख और सम्मान खो चुका है। दूसरी तरफ हर दावे को काउंटर करने के लिए सोशल मीडिया पूरी ताकत से उपस्थित है। इससे ज्यादा बड़ी बात ये है कि प्रधानमंत्री मोदी के पास अब सचमुच कोई नई कहानी नहीं है।

आपने गौर किया होगा कि पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद जब पूरे देश में युद्धोन्माद पैदा किया जा रहा था, उसी दौरान केंद्र सरकार ने जातिगत जनगणना कराने का एलान किया। ये एलान रुककर भी हो सकता था। लेकिन फैसला जल्दी में इसलिए लिया गया क्योंकि डर था कि विपक्ष इस सवाल पर बढ़त ना बना ले।

लेकिन एलान के बावजूद खुद प्रधानमंत्री मोदी अब तक इस बात का संकेत देने में नाकाम रहे हैं कि वो जातिगत जनगणना के मुद्दे को किस तरह अपना राजनीतिक हथियार बनाएंगे। नज़र बिहार के चुनाव पर है लेकिन उन्होंने अपने पक्ष में महौल बनाने के लिए भरोसा सबसे जाने-पहचाने कार्ड यानी पाकिस्तान पर किया। सामाजिक न्याय का मैदान उन्होंने लगभग खुला छोड़ दिया और राहुल गांधी अंधाधुंध बिहार यात्रा करके आरक्षण की सीमा बढ़ाने के अपने एजेंडे पर ताल ठोकते रहे। इसका नतीजा पोल ट्रैकर के सर्वे में भी दिखाई दे रहा है।

यह बात साफ तौर पर समझ में आ रही है कि ऑपरेशन सिंदूर ने बीजेपी को वैसा फायदा नहीं पहुंचाया है, जिसकी उम्मीद प्रधानमंत्री मोदी कर रहे थे। इसके उलट अपने कोर वोटरों तक के बीच मोदी की छवि को नुकसान पहुंचा है। इससे भी ज्यादा बड़ी बात ये है कि पाकिस्तान और आतंकवाद का कार्ड भी हाथ से निकल चुका है।

ऑपरेशन सिंदूर की कहानी के घिस जाने के बाद अब प्रधानमंत्री मोदी क्या करेंगे?

जब जातिगत जनगणना का एलान किया है तो गरीब का बेटा बनकर उन्हें बिहार के वोटरों के बीच जाना ही पड़ेगा। वीररस से करूण रस की यात्रा के बीच का ये कूलिंग ऑफ पीरियड है, जहां कॉरपोरेट मीडिया को दुनिया में डंका बजाने वाली छवि को भी पुनर्जीवित करना है। लेकिन इतना आसान नहीं है।

कनाडा ने शुरुआत में जी-7 की बैठक के लिए न्यौता भेजने में आना-कानी की और खबर फैल गई कि भारतीय प्रधानमंत्री बैठक में नहीं जा पाएंगे। फिर कनाडा के प्रधानमंत्री ने निमंत्रण भेजा लेकिन उसके साथ जो बाते कहीं कि वो विश्वगुरू की छवि को धक्का पहुंचाने वाली थी।

जी-7 में अंतरराष्ट्रीय मीडिया होगा और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार स्वयं प्रधानमंत्री को विदेश में इस मुद्दे पर देश का पक्ष रखना होगा और मुमकिन है, पत्रकारों के सवालों के जवाब भी देने पड़ें।

ऐसे में `डंका बज गया’ वाली छवि किस तरह और किस हद तक बची रह पाएगी? क्या गारंटी है कि प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थित में डोनाल्ड ट्रंप ये बात 14वीं बार नहीं दोहराएंगे कि व्यवसायिक हितों का हवाला देते हुए उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच सीज-फायर करवाया था?

क्या ट्रंप के साथ अब भी मोदी के वैसे रिश्ते बचे हैं कि वो उन्हें इस बात के लिए राजी कर पायें कि सार्वजनिक तौर पर मेरी किरकिरी मत करवाइयेगा।

नरेंद्र मोदी हमेशा से फ्रंटफुट पर खेलने वाले राजनेता रहे हैं। लेकिन परिस्थितियां लगातार ऐसी बनी है कि ना चाहते हुए भी उन्हें रक्षात्मक रणनीति अपनाने को मजबूर होना पड़ा है। विकल्प बहुत ज्यादा नहीं है और यहां से कदम ढलान की ओर ही जाता है। क्या प्रधानमंत्री इस राजनीतिक फिसलन को रोक पाएंगे?

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