सहारा समूह के वरिष्ठतम अधिकारी ओ.पी. श्रीवास्तव की गिरफ्तारी ने देश के सबसे बड़े कॉरपोरेट–लैंड स्कैम की कड़ियों को उजागर करना शुरू कर दिया है। श्रीवास्तव लंबे समय तक सहारा समूह में ऐसे पद पर रहे, जहाँ से सुब्रत रॉय और उनका पूरा परिवार भी उनके संकेत पर चलता था। अब उन पर आरोप है कि उन्होंने निवेशकों के 19,000 करोड़ रुपये की वसूली के लिए गिरवी रखी गई जमीनों को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बेचा और हवाला नेटवर्क के जरिए हजारों करोड़ रुपये देश से बाहर भेजे।
212.51 एकड़ मुजफ्फरनगर जमीन—घोटाले की सिर्फ एक झलक
2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सेबी को 19,000 करोड़ रुपये जमा कराने के लिए सहारा ने 71 संपत्तियाँ गिरवी रखी थीं, जिनकी कीमत 20,000 करोड़ रुपये से अधिक थी। इन संपत्तियों में मुजफ्फरनगर की 212.51 एकड़, और हरिद्वार (बहादराबाद-रानीपुर) की 82.93 एकड़ जमीन शामिल थी।
सेबी ने इन 71 संपत्तियों में से 32 की नीलामी करके काफी धन जुटाया। हरिद्वार वाली जमीन की नीलामी 28 जुलाई 2017 को 223 करोड़ रुपये के आरक्षित मूल्य पर होनी थी, लेकिन यह प्रक्रिया रहस्यमयी परिस्थितियों में रोक दी गई।
2017 में रुकी नीलामी, 2023 में शुरू हुई ‘सेटिंग’
2023—वही वर्ष जिसमें सुब्रत रॉय का निधन हुआ। उसी साल उनकी मौत के तुरंत बाद जमीनों की असली ‘खेल’ शुरू हुआ।
पहले मुजफ्फरनगर की जमीन कुछ बैनामियों के नाम कर दी गई। इसके बाद हरिद्वार की 82.93 एकड़ जमीन में भी यही खेल दोहराया गया।
दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा तक बिचौलियों का जाल सक्रिय रहा। जब हरिद्वार के तत्कालीन डीएम विनय शंकर पांडे को इस धांधली का पता लगा, तो उन्होंने 2 मार्च 2023 को सभी रजिस्ट्री पर रोक लगा दी।
लेकिन रोक लागू होने से पहले उसी दिन 22 लोगों के नाम 25 रजिस्ट्री कर दी गईं। यह महज़ संयोग था या संगठित साज़िश? सवाल आज भी कायम है।
ईमानदारी की कीमत: डीएम विनय शंकर पांडे का तबादला
रोक लगाने के कुछ ही दिनों बाद डीएम विनय शंकर पांडे का अचानक तबादला कर दिया गया। नए डीएम धीरज सिंह गर्ब्याल के कार्यभार संभालने के बाद सिर्फ तीन महीने में, 2 जून 2023 को रजिस्ट्री पर लगी रोक हटा दी गई।
शासन ने तर्क दिया कि “विधिक राय” ले ली गई है—जबकि सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश था कि:
जमीन 90% सर्किल रेट से कम पर नहीं बिकेगी, और पूरा पैसा सेबी–सहारा अकाउंट में जमा होगा। इसके उलट जमीनों की बिक्री जारी रही और कॉलोनियाँ काटी जाने लगीं।
जमीन की बिक्री पर झूठे दावे और बड़ी सच्चाई
कॉलोनी काटने वाले गिरोह ने दावा किया कि— “25,000 करोड़ रुपये निवेशकों को वापस मिल चुके हैं।”
जबकि सच्चाई यह है: आज तक केवल 16,000 करोड़ रुपये ही जमा हुए हैं। सेबी अभी भी 9,000 करोड़ की मांग कर रहा है। ₹5,000 करोड़ कोऑपरेटिव सोसाइटीज को सरकार ने दिए, यह सहारा की वापसी राशि नहीं थी। हवाला के जरिए 1000+ करोड़ रुपये बाहर भेजने के आरोप
सूत्रों के अनुसार इस पूरे प्रकरण की असली जड़ दिल्ली में है। हवाला मार्गों की जांच जारी है, जिनमें शामिल हो सकते हैं—
- चांदनी चौक,
- कनॉट प्लेस,
- गुरुग्राम,
- और अन्य शेल कंपनियाँ।
इन्हीं पहेलियों को सुलझाने के लिए ओ.पी. श्रीवास्तव की गिरफ्तारी हुई है।

सबसे बड़ा सवाल—सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जमीनें कैसे बिकीं?
- जब नीलामी का अधिकार केवल सेबी के पास था, तो जमीनें निजी कंपनियों को कैसे बेची गईं?
- चिरायु एस्टेट, साइरस रियल्टी, सहारा—इन पर रोक होने के बावजूद बिक्री कैसे हुई?
- एक ही दिन में 25 रजिस्ट्री कैसे हो गईं?
- और किसके इशारे पर डीएम का तबादला हुआ?
123 बीघा से अधिक जमीन पर “इंटीग्रेटेड सिटी” का निर्माण शुरू कर देना भी कई सवालों को जन्म देता है।
राजनीतिक सवाल भी उठने लगे
जहाँ ईडी विपक्षी नेताओं पर केस दर्ज करती रही है, वहीं जनता पूछ रही है— सहारा की जमीनें सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होते हुए भी कैसे गायब हो गईं? निवेशक कतार में खड़े रहे और सरकारी एजेंसियाँ खामोश क्यों रहीं?
खुलासा करने वालों पर खतरा, सच दबाने की कोशिशें
इस स्कैम को उजागर करने में पत्रकारों, आरटीआई कार्यकर्ताओं और व्हिसलब्लोअर्स को लगातार खतरा बना रहा। इतने ताकतवर हित जुड़े हैं कि सच्चाई सामने लाना आसान नहीं।
फिर भी जांच आगे बढ़ रही है—कुछ लोगों की जान की कीमत पर। अब बड़ा सवाल यह है कि—
- क्या यह घोटाला पूरी तरह खुलेगा?
- हवाला रैकेट और बड़े नाम बेनकाब होंगे?
- या यह मामला भी राजनीतिक शोर में दब जाएगा?
फिलहाल इतना तय है कि ओ.पी. श्रीवास्तव की गिरफ्तारी ने वर्षों से छाए सन्नाटे को तोड़ा है। आने वाले दिनों में जो भी सच सामने आएगा, वह देश की वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्था को झकझोर सकता है।
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