अनुभव शाक्य-
अलविदा राजीव! IIMC के हमारे साथी राजीव प्रताप अब इस दुनिया में नहीं हैं। वो 18 सितंबर को लापता हुए थे। 10 दिन बाद उनका शव नदी से बरामद किया गया। राजीव उत्तरकाशी में अपना यूट्यूब चैनल चलाते थे और स्थानीय खबरों को मुखरता से दिखाते थे।
उनकी पत्नी ने राजीव के लापता होने के पीछे किसी साजिश की आशंका जताई। राजीव ने हाल ही में उत्तरकाशी के जिला अस्पताल की बदहाली पर रिपोर्ट की थी। इसके बाद उन्हें धमकियां मिल रही थीं और वीडियो हटाने का दबाव बनाया जा रहा था। ऐसा उनके परिवार का आरोप है।
राजीव आईआईएमसी के समय से बेहद सिंसियर थे। ऐसा मैं इसलिए कह सकता हूं क्योंकि कुछ दिन मैं उनके साथ दिल्ली में रहा था। मेरी नौकरी ज़ी न्यूज़ में थी और वो अपने चैनल को लॉन्च करने की तैयारी कर रहे थे। उनके चैनल से जुड़ी कई बातें हम डिस्कस करते थे। इसके बाद मैं नोएडा शिफ्ट हो गया और वो उत्तरकाशी चले गए। इस दौरान हमारी बातें भी बहुत कम हुईं।
लेकिन राजीव के काम के प्रति समर्पण को मैंने और मेरे सभी साथियों ने देखा है। वो चाहते तो किसी अच्छे मीडिया हाउस में नौकरी कर सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने प्लेटफार्म पर क्षेत्रीय पत्रकारिता को चुना। बिना बहुत आय के बाद भी वो इसमें लगे रहे। लेकिन उनके इस तरह निधन ने हमें बहुत दुखी किया है।
सबसे बड़ा दुख ये है कि हमें उनके लापता होने के बारे में 9 दिन बाद पता चला। एक पत्रकार 9 दिन गायब था। परिवार लगातार पुलिस से मदद की गुहार लगा रहा था, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। नेशनल मीडिया में भी इसकी चर्चा नहीं हुई। जब हमने पत्रकार साथियों के साथ इस लिखना शुरू किया, पुलिस से जवाब मांगा, ख़बरें बनाईं, तब प्रशासन नींद से जागा। अगले ही दिन राजीव का शव मिल गया।
अब सवाल यही है कि एक पत्रकार के अचानक लापता होने पर पुलिस और प्रशासन ने ध्यान क्यों नहीं दिया। राजीव को न्याय मिलना ही चाहिए। उत्तराखंड सरकार को इस मामले में पारदर्शिता से जांच करानी चाहिए।
“कई जंजीरें तोड़कर आगे आया हूं मैं राजीव प्रताप हूँ.
मैं वो नहीं जो सत्ता के आगे झुक जाए,
मैं वो हूं,जो जनता के सवालों को आवाज़ दे।
न मैं विज्ञापन लेकर ख़बरों की कीमत लगाता हूं,
न नेताओं की चापलूसी करके अपने पेशे को कलंकित करता हूं।
मैं हूं जनता का पत्रकार…
जो उनकी रोज़मर्रा की जद्दोजहद को कलम में ढालता है.
स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली हो,
सड़क, पानी, बिजली की कमी हो,
या दबंगई और शोषण से जूझते लोग…
मैं वहां खड़ा हूं जहां सच्चाई दम तोड़ रही होती है।
मेरे लिए पत्रकारिता कोई नौकरी नहीं…
ये मेरा धर्म है,
और सच बोलना मेरी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी।
मैं हूं पत्रकार साहब…
और यही मेरी पहचान है।”
ये कविता कुछ दिन पहले ही राजीव ने अपने फेसबुक पर पोस्ट की थी।
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