रेणुका शहाणे नाम की एक सामान्य और औसत दर्जे की अभिनेत्री ने सभी पत्रकारों का अपमान किया

Shambhunath Nath : रेणुका शहाणे नाम की एक सामान्य और औसत दर्जे की अभिनेत्री ने कल एक लिंक शेयर किया जिसमें उन्होंने बताया था कि पत्रकार कितने मूर्ख, जाहिल और अपढ़ होते हैं कि वे इंटरव्यू करते समय कोई होमवर्क करके नहीं आते। इसके बाद जैसे ही यह लिंक फेसबुक पर वायरल हुआ तमाम तरह के संघी, मुसंघी और सेकुलर संघी टूट पड़े पत्रकारों के बारे में कुछ भी आँय-बाँय-साँय लिखने लगे। लगभग सभी ने कहा कि पत्रकार दलाल होते हैं, पढ़े लिखे नहीं होते और मूर्खतापूर्ण बातें करते हैं और सारे के सारे पत्रकार दंभी होते हैं। लेकिन क्या वे महान संघी, मुसंघी और सेकुलर संघी लेखक, साहित्यकार, कलाकार, राजनीतिकार बताएंगे कि क्या आज देश में बाकी के पेशे उतने ही ईमानदार बचे हैं जैसे कि उनसे अपेक्षा की जाती है? क्या स्वयं रेणुका देवी जी बता सकती हैं कि वे भावाभिव्यक्ति में कितनी माहिर हैं और कितने तरह की भावाभिव्यक्ति की जा सकती है?

क्या आज के नामी-गिरामी एक्टर या एक्ट्रेसेस यह जानते हैं कि भरत मुनि कौन थे? और कितनों ने उनका नाट्य शास्त्र पढ़ा है? आज के राजनेता जब यह तक नहीं जानते कि मुजफ्फराबाद पाक अधिकृत कश्मीर में है या भारत के कश्मीर में और तक्षशिला व नालंदा में फर्क क्या है तो आप कैसे अपेक्षा करते हैं कि पत्रकारिता दूध की धुली होगी? जिस देश में शिक्षक अनाचार सिखाते हों जहां नौकरशाह लूट मचाए हों और स्वयं पुलिस वाले थाने में बुलाकर गरीब स्त्रियों का पेटीकोट उतरवाते हों, विधायक-सांसद अपनी आमदनी दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ाते हों, नामी अस्पतालों में मरीज को आपरेशन के बहाने लिटाकर उसके अंग निकाल लिए जाते हों और इंजीनियर इमारतें गिराते हों वहां एक पत्रकार ही सच्चाई की बिना पर बिना कुछ खाये-पिये डटा रहेगा।

जहां पर संसद के अंदर बैठकर सांसद अपने वेतन-भत्ते बढ़वा लें, हर चार साल में सरकारी नौकरों के लिए नया वेतन आयोग आ जाए और जिसका जब जी चाहे हड़ताल पर चला जाता हो वहां पर पत्रकारों को न्यूनतम मजदूरी न मिलती हो वहां कौन पत्रकारिता करने आएगा? जैसा समाज होता है वैसे ही उस समाज में रहने वाले लोग। जब कुएं में भांग पड़ी हो तो होशमंद लोग कहां से लाओगे? मगर हर आदमी पत्रकार और पत्रकारिता को कोस कर चला गया। आप पत्रकारिता और पत्रकारों को कोसकर गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर उन असंख्य पत्रकारों का अपमान कर रहे हैं जिन्होंने सच्ची बात के लिए अपनी जान दी। स्वयं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, मोहनदास कर्मचंद गांधी, बाबा साहेब अंबेडकर, मोहम्मद अली जिन्ना और जवाहर लाल नेहरू पत्रकार भी रहे हैं। संघी नेताओं में अटलबिहारी बाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी पत्रकार रह चुके हैं। अत्याचार, अनाचार और कुतर्कों के विरुद्ध पत्रकार ही लड़े हैं। कोई एक्टर, एक्ट्रेसेस या फेसबुक के पठ्ठे नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला की एफबी वॉल से.

रेणुका शहाणे ने जो फेसबुक पर लिखा है, उसका हिंदी अनुवाद ये है….
एक जाने-माने अख़बार के ‘पत्रकार’ ने मुझे फोन किया. मैं उन्हें यहां शॉर्ट में जे कहूंगी.
जे: मैम हम आपका एक इंटरव्यू करना चाहते हैं, एक कॉलम के लिए जो वरिष्ठ टीवी एक्टरों के बारे में है.
मैं: ठीक है.
जे: तो जैसा कि मुझे याद है, ‘सुरभि’ के अलावा आपने ‘स्वाभिमान’ किया था, है ना?
मैं: बहुत से सीरियल किए, लेकिन ‘स्वाभिमान’ नहीं.
जे: ओ नहीं.. तो फिर ‘शांति’ था? बहुत ही लोकप्रिय था…
मैं: हां, बहुत लोकप्रिय था, लेकिन मैं उसमें नहीं थी.
जे (लगा कि वो अचंभे में है) : अरर.. तो फिर आप किस सीरियल में थीं? प्लीज़ अपने सीरियलों के नाम बताइए?
मैं: आप होमवर्क क्यों नहीं करते?
जे: प्लीज़ मैम अभी मेरी मदद करिए.. मैं अगली बार से मैं होमवर्क करूंगा.. बस कुछ सवाल हैं.
मैं: ठीक है.
जे: जो सीरियल आप करती थीं और जो आज आते हैं, उनमें क्या फर्क है?
मैं: जिन सीरियलों में मैं काम करती थी वो वीकली (साप्ताहिक) थे.
जे: वीकली?
मैं (संयम से) : अब तो डेली सोप आते हैं.. उन्हें डेलीज़ कहते हैं क्योंकि वो रोज दिखाए जाते हैं.. मेरे सीरियल वीकली कहलाते थे, क्योंकि वो हफ्ते में एक बार दिखाए जाते थे.
जे: सिर्फ़ हफ्ते में एक बार? आपका मतलब है कि एक हफ्ते के लिए एक कहानी?
मैं: नहीं.. आपको कैसे समझाऊं? देखिए, दैनिक अख़बार होते हैं, साप्ताहिक पत्रिकाएं होती हैं, पाक्षिक होते हैं और मासिक भी होते हैं.. कुछ तो तीन महीने में भी प्रकाशित होते हैं? ठीक है?
जे: तो आपके पास तो बहुत विविध चीजें थीं जैसे साप्ताहिक, पाक्षिक.
मैं: नहीं.. नहीं.. मेरा मतलब है कि हमारे पास विविधता थी.. लेकिन मैं तो सिर्फ एनालॉजी ड्रॉ (मिसाल दे रही थी) कर रही थी, ताकि आप अपने काम के हिसाब से आप इसे समझ सकें.
पॉज
मैं: आप हैं ना?
जे: जी मैम, मैंने सोचा कि आप कुछ ड्रॉ कर रही हैं इसलिए मैं इंतज़ार कर रहा था.
मैं: हम्म्म. आप कुछ नोट भी कर रहे हैं क्या?
जे: मैम मेरी याददाश्त ज़बरदस्त है.. आपने ‘सुरभि’ में अभिनय किया था, और आपने ‘शांति’ में भी अभिनय किया था जो कि साप्ताहिक था और आपने पंद्रह दिन और तीन महीने में एक बार आने वाले सीरियलों में भी अभिनय किया था.
मैं (अपनी हंसी को दबाते हुए): आप ज़बरदस्त हैं.. आपको सब कुछ याद है.. क्या अब मैं जा सकती हूं.. ड्रॉइंग करने.. ड्रॉइंग एनालॉजी.
जे: जी मैम.. अगर आप मुझे अपनी एलर्जी की ड्रॉइंग व्हाट्स एप करेंगी तो मैं इसे आपकी हॉबीज में रखूंगा.. बहुत ही अच्छा रहेगा.
गहरी सांस.. कुछ पत्रकार बहुत मनोरंजन करते हैं.. पूरे मामले की अच्छी बात ये है कि मैंने एक कैनवास ख़रीद लिया है.. हालांकि अभी एलर्जी की ड्रॉइंग नहीं बना पाई हूं.
गौरतलब है कि इससे पहले भी रेणुका शहाणे की एक फेसबुक पोस्ट काफी चर्चा में रही थी, जिसमें उन्होंने काले हिरण के शिकार मामले में फिल्म ‘हम आपको हैं कौन’ के अपने सह-कलाकर सलमान खान को बरी किए जाने पर सवाल उठाए थे.

ओरीजनल अंग्रेजी में है जो इस प्रकार है….
Renuka Shahane : A “journalist” called on behalf of a well-known daily, I’ll call him J for short.
J: Ma’am we would like to ‘do’ your interview for a column about veteran tv actors.
Me: Okay
J: So apart from Surabhi which I remember you’ve done Swabhimaan right?
Me: Many serials but not Swabhimaan
J: Oh no no it was Shanti right? It was very popular….
Me: It sure was but I wasn’t in it?
J (sounding utterly gobsmacked): Er….then what were you in? Please tell me names of your serials?
Me: Why didn’t you do your homework?
J: Please ma’am help me now…I will do it from next time….only a few questions
Me: Okay
J: What is the difference between the serials you did & the serials today?
Me: Serials I acted in were weeklies.
J: Weeklies?
Me ( patiently): We have daily soaps now…they are called dailies because they are shown daily. My Serials were called Weeklies because they were shown once a week
J: Oh so only once a week? You mean one story for one week?
Me: No….how do I explain this? You have daily newspapers, weekly magazines, fortnightly ones & monthly ones…..some are printed quarterly? Right?
J: Oh so you had a lot of variety like Weeklies & Fortnightly
Me: No no….I mean we had variety….but I was just drawing an analogy so that you could relate it to your work
Pause
Me: Are you there?
J: Yes ma’am….I thought you were drawing something so I waited
Me: Hmmmm are you writing anything down at all?
J: Ma’am I’ve got an excellent memory…..you’ve acted in Surabhi….and you’ve acted in Shanti which was a weekly & you acted in a variety of Fortnightly & quarterly Serials too ma’am
Me (trying to hold back the mirth): You’re amazing….you’ve got it spot on….now may I please go back to er….drawing analogies
J: Sure ma’am….if you what’s app me the photo of the drawing of the “allergy” I can include it as your hobby….it’s a very unique concept.
Sigh….some journalists are a source of great entertainment…..the upside is that I’ve bought myself a canvas….still not been able to draw my “allergy” though.

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