Connect with us

Hi, what are you looking for?

प्रिंट

संपादक नाम के प्राणी…. आखिर तुम कहां खो गए हो!

एक जमाना था जब किसी भी अख़बार या पत्रिका की पहचान उसके संपादक के नाम से होती थीl  धर्मवीर भारती धर्मयुग की पहचान थे तो साप्ताहिक हिंदुस्तान यानी श्याम मनोहर जोशी थेl सारिका कमलेश्वर के नाम से जानी जाती थी तो दिनमान की पहचान रघुवीर सहाय के नाम से होती थीl यही हाल अखबारों का था। इंडियन एक्सप्रेस को अरुण शौरी के नाम से पहचान मिलती थी तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया में दुआ साहब ही सब कुछ थेl बहुत पहले बंद हो गई इलस्ट्रेटेड वीकली का तो वजूद ही खुशवंत सिंह के नाम पर थाl पराग के संपादक कन्हैया लाल नंदन थे तो कादम्बिनी राजेन्द्र अवस्थी के नाम से जानी और पहचानी जाती थीl किसी अखबार या पत्रिका के मालिक को कोई जाने या न जाने पर उसके संपादक की पहचान किसी की मोहताज नहीं थीl उस ज़माने में मालिक संपादक से बात करने में भी हिचकिचाते थे, उनके काम में दखलंदाजी की बात तो दूर की बात हैl

<p>एक जमाना था जब किसी भी अख़बार या पत्रिका की पहचान उसके संपादक के नाम से होती थीl  धर्मवीर भारती धर्मयुग की पहचान थे तो साप्ताहिक हिंदुस्तान यानी श्याम मनोहर जोशी थेl सारिका कमलेश्वर के नाम से जानी जाती थी तो दिनमान की पहचान रघुवीर सहाय के नाम से होती थीl यही हाल अखबारों का था। इंडियन एक्सप्रेस को अरुण शौरी के नाम से पहचान मिलती थी तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया में दुआ साहब ही सब कुछ थेl बहुत पहले बंद हो गई इलस्ट्रेटेड वीकली का तो वजूद ही खुशवंत सिंह के नाम पर थाl पराग के संपादक कन्हैया लाल नंदन थे तो कादम्बिनी राजेन्द्र अवस्थी के नाम से जानी और पहचानी जाती थीl किसी अखबार या पत्रिका के मालिक को कोई जाने या न जाने पर उसके संपादक की पहचान किसी की मोहताज नहीं थीl उस ज़माने में मालिक संपादक से बात करने में भी हिचकिचाते थे, उनके काम में दखलंदाजी की बात तो दूर की बात हैl</p>

एक जमाना था जब किसी भी अख़बार या पत्रिका की पहचान उसके संपादक के नाम से होती थीl  धर्मवीर भारती धर्मयुग की पहचान थे तो साप्ताहिक हिंदुस्तान यानी श्याम मनोहर जोशी थेl सारिका कमलेश्वर के नाम से जानी जाती थी तो दिनमान की पहचान रघुवीर सहाय के नाम से होती थीl यही हाल अखबारों का था। इंडियन एक्सप्रेस को अरुण शौरी के नाम से पहचान मिलती थी तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया में दुआ साहब ही सब कुछ थेl बहुत पहले बंद हो गई इलस्ट्रेटेड वीकली का तो वजूद ही खुशवंत सिंह के नाम पर थाl पराग के संपादक कन्हैया लाल नंदन थे तो कादम्बिनी राजेन्द्र अवस्थी के नाम से जानी और पहचानी जाती थीl किसी अखबार या पत्रिका के मालिक को कोई जाने या न जाने पर उसके संपादक की पहचान किसी की मोहताज नहीं थीl उस ज़माने में मालिक संपादक से बात करने में भी हिचकिचाते थे, उनके काम में दखलंदाजी की बात तो दूर की बात हैl

वक़्त बदला और वो संपादक नाम का प्राणी कार्पोरेट जगत के झमेले में कहीं खो गयाl अब किस अखबार का कौन संपादक है, वो कितने दिन वहां रहेगा, कब उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा, न तो वो जानता है ना ही मालिकl जिस दिन मालिक को लगता है कि संपादक उनके लिए पैसा कमा कर नहीं ला पा रहा है, उसी दिन उस गरीब की कुर्सी चली जाती है क्योंकि अब अख़बार के मालिकों को संपादक नहीं बल्कि एक ऐसा मैनेजर चाहिए होता है जो सम्पादकीय तो देखे ही, साथ में सरकार में उनकी लायजनिंग करे, उनके फल फूल रहे दूसरे धंधों को बचाने में अपने सम्पर्कों का प्रयोग करे। उससे अपेक्षा की जाती है कि वो मैनेमेंट भी देखे, विज्ञापन लाये, सर्कुलेशन देखे, रिकवरी के लिए भी कोशिश करे यानी पीर बाबर्ची भिश्ती खर वो सबकुछ हो तब तो वो संपादक के रूप में टिक सकता है वरना ये माना जाता है कि वो किसी काम का नहीं है।

Advertisement. Scroll to continue reading.

पहले जर्नलिज्म हाउसेस हुआ करते थे जो सिर्फ और सिर्फ अखबार निकाला करते थे। उनका उद्देश्य समाज की सेवा और भूमिका वाच डॉग की होती थी। यही कारण था कि ऐसे विद्वान व्यक्ति संपादक के पद पर बैठाये जाते थे जिनका अपना एक व्यक्तित्व हुआ करता था। उनके सामने राजनेता उद्योगपति बैठने का साहस नहीं करते थे क्योंकि वे न तो कभी अपने लिए और न ही अपने मालिकों के लिए उनके दरवाजे जाते थे। उनकी लिखी गयी टिप्पणियों से देश में एक माहौल बनता था। आंदोलन खड़े हो जाते थे। वे जनता की आवाज बनकर सामने आते थे। शायद इसलिए कहा गया  था कि जहां तोप मुक़्क़मल न हो तो अखबार निकालो पर अब न तो वैसे अख़बार हैं न वैसे संपादक। अब अखबार की उम्र सुबह सात बजे से लेकर नौ बजे तक की रह गयी है।

किसका दोष मानें इसके लिएl मेरा जो अनुभव अखबारी जगत में है, उसने यही बताया है कि अब पत्रकारों को एक बैनर की जरूरत है। जब वो मालिकों के लिए लाइजनिंग करता है तो अपने भी स्वार्थ उसी बहाने पूरा कर लेता है। इसी बहाने अफसरों नेताओं से परिचय भी हो जाता है। मालिक के कामों को वो अपनी ड्यूटी में शामिल कर लेता है। मालिक के धंधों की देखरेख करना, उसमें कोई रुकावट ना आये, वो उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है। इसमें एक मुद्दा और भी है कि अब अख़बार निकालना और उसे चला पाना इतना खर्चीला है कि कोई आम पत्रकार इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता कि वो भी कभी कोई अखबार निकाल सकेगाl 

Advertisement. Scroll to continue reading.

जो छोटे मोटे अखबार निकलते भी हैं वे बड़े मगरमच्छों के सामने कहीं टिक नहीं पातेl दुनिया में अखबार एकमात्र ऐसा उत्पाद है जो अपने उत्पादन मूल्य के आधी कीमत से भी कम में बिकता है वरना दुनिया में ऐसा कोई उत्पाद नहीं है जिसमें उसका उत्पादनकर्ता अपना लाभ न जोड़ता हो। पर अख़बारों की प्रतिस्पर्धा ने अब उसे शुद्ध प्रोडक्ट बना कर रख दिया है। कोई पाठकों को कार दे रहा है तो कोई मोटर साईकल इनाम में बाँट रहा है। हर महीने घी पापड़ अचार बेड शीट गिलास चाय की पत्ती जैसी चीजें पाठकों को दी जा रही है। यही कारण है कि अब न तो पाठकों को इस बात से कोई मतलब है कि किस अख़बार में क्या छप रहा है, कौन सा अखबार किन मुद्दों को मजबूती से उठा रहा है। अब पाठक की निगाह में सबसे अच्छा अख़बार वो होता है जिसकी महीने के अंत में खासी रद्दी निकले और हर महीने इनाम में कुछ मिले। ऐसी स्थिति में संपादक का होना या न होना किसी अखबार के लिए कोई मायने नहीं रखता। कुछ और साल बीतेंगे जब संपादक का पद ही ख़त्म कर दिया जाएगा। यही चलता रहा तो वो दिन बहुत दूर नहीं है।

लेखक चैतन्य भट्ट जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क उनके मोबाइल नंबर 09424959520 के जरिए किया जा सकता है.

Advertisement. Scroll to continue reading.
Click to comment

0 Comments

  1. आनंद शर्मा शिमला।

    September 17, 2015 at 6:09 am

    आज की पत्रकारिता पर भट्ट साहब ने बिलकुल सटीक टिप्पणी की है। थोड़ा और जोड़ना जाहूंगा। आने वाले समय में हो सकता है संपादकों एवं ब्यूरो प्रमुखों के पदों पर सेवानिवृत्त कुख्यात थानेदारों या बाहुबलियों को ही तैनात कर दिया जाए जो पत्रकारों को ढोर- डंगरों की तरह हांकें। इस समय भी इन पदों पर ऐसे लोगों को ही तरजीह दी जा रही है जो निहायत बदतमीज हो और जरूरत पड़ने पर अधिनस्तों पर हाथ पैर भी आजमा सकें। जन सरोकारी पत्रकारिता अब खत्म ही समझो।

  2. yogendra verma

    September 17, 2015 at 12:12 pm

    bilkul shee meemansa kee hai chaitanya bhatt jee ne bina reed kee haddee ke sampadko ne hee patrkarita kee ye durdasha kar dee hai varana kisi malik ki ye himmat nahee ho sakti thi ki wo sampadak se vigyapan lane ki baat kare ab to halat ye hai ki sa,padako se haakron kaa kaam bhar nahee karwaya jaa raha hai warana unse wo sab kuchh karwaya jaa raha hai jo unhe nahee karana chahiye par kisi benar ke muhtaj sampadak malik ke ek gulam ki tarah vyvhar karane lage hai jo swabhimani hota hai virodh karata hai use apani naukarise hath dhona padta hai majeethia vetan aayog dene ke nirdesh supreme kort ke diya hai par koi bhee akhbar ye vetan dene tauyar nahee hai aur isaki monitring karane wale shram vibhag apani aankhe moonde huye hai patrkarita kaa jo kabada aise sampadko ne kiya hai unhe patrakrita kabhee maaf nahee karegi

  3. डा मनोज रस्तोगी ,मुर

    September 17, 2015 at 8:41 pm

    शतप्रतिशत सत्य ।

  4. deepak agrawal

    September 23, 2015 at 7:27 am

    आज की पत्रकारिता पर भट्ट साहब ने बिलकुल सटीक टिप्पणी की है। थोड़ा और जोड़ना जाहूंगा। आने वाले समय में हो सकता है संपादकों के पदों पर सेवानिवृत्त कुख्यात थानेदारों या बाहुबलियों को ही तैनात कर दिया जाए जो पत्रकारों को डंगरों की तरह हांकें। इस समय इन पदों पर ऐसे लोगों को ही तरजीह दी जा रही है जो निहायत बदतमीज हो और जरूरत पड़ने पर अधिनस्तों पर हाथ पैर भी आजमा सकें। जन सरोकारी पत्रकारिता अब खत्म ही समझो।

  5. Rakesh Bhardwaj advocate

    September 25, 2017 at 3:29 pm

    Aaj ka media poori tarah se bika huaa hai.
    Jise vastvikata se koi matlab nahi hai . , Bloody prastitute media

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Advertisement

भड़ास को मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप ग्रुप से जुड़ें- Bhadasi_Group_one

Advertisement

Latest 100 भड़ास

व्हाट्सअप पर भड़ास चैनल से जुड़ें : Bhadas_Channel

वाट्सअप के भड़ासी ग्रुप के सदस्य बनें- Bhadasi_Group

भड़ास की ताकत बनें, ऐसे करें भला- Donate

Advertisement