‘सरबजीत’: एक अच्छे विषय पर बुरी फिल्म

Sushil Upadhyay : ज्यादातर अखबारों ने फिल्म ‘सरबजीत’ को पांच में से तीन स्टार दिए हैं। कल मेरे पास खाली वक्त था, फिल्म देख आया। इस फिल्म के बारे में कुछ बातों को लेकर जजमेंटल होने का मन कर रहा है। आखिर इस फिल्म को क्यों देखा जाए? खराब पंजाबी के लिए! बुरी उर्दू जबान के लिए! जो लोग पंजाबी नहीं जानते, उन्हें भी पता है कि ‘न’ को ‘ण’ में तब्दील करने से पंजाबी नहीं बन जाती। पाकिस्ताण, हिन्दुस्ताण, हमणे….जैसे शब्दों को बोलते हुए ऐश्वर्या राय निहायत नकली लगती हैं। उनकी तुलना में रणदीप और ऋचा के संवाद ज्यादा सधे हुए और भाषा का टोन पंजाबियों वाला हैं। ऐश्वर्या के ज्यादातर संवाद उपदेश की तरह लगते हैं। वे सरबजीत की बहन दलबीर के तौर पर किसी भी रूप में प्रभावी नहीं हैं।

जिन्हें पाकिस्तान का विरोध पसंद है, वे इस फिल्म को जरूर देख सकते हैं। क्योंकि पुरानी फिल्मों की तरह ही यह फिल्म भी पाकिस्तान के नकारात्मक चेहरे पर फोकस करती है। फिल्मकार ने कुछ ‘मासूम‘ गलतियां भी की हैं। पंजाब के अमृतसर के भिक्कीविंड गांव की दलबीर पाकिस्तान में अपने भाई को हिंदी में चिट्ठी लिखती है और वो सही पते पर पहुंच भी जाती है! पाकिस्तानियों के हिंदी जानने की दाद देनी होगी।

इस फिल्म की बजरंगी भाईजान से तुलना करें तो वहां पर पाकिस्तान का ज्यादा स्वाभाविक चित्रण था। इस फिल्म में सब कुछ नकली जैसा लगता है। ये सवाल लगातार उठता है कि ये फिल्म किस श्रेणी की है-आर्ट मूवी, बायोपिक, फीचर फिल्म, डाक्युड्रामा, पालिटिकल या कोई और श्रेणी? मुझे लगा कि ये ‘यूं ही टाइप’ की फिल्म है। किसी फिल्म में संभवतः पहली बार ऐसा देखा जब पंजाब के मुख्यमंत्री को गैर-सिख के तौर पर दिखाया गया। आखिर तक यह समझ में नहीं आता कि ‘रवींद्र ंिसह‘ केंद्र का मंत्री है, पंजाब का मुख्यमंत्री है, किसी पार्टी का नेता है या कुछ और?

अमृतसर में तैनात पुलिस इंसपैक्टर पंजाबी की बजाय बिहारी ज्यादा लगता है। जहां तक मेरी जानकारी है 1998 र्में ZEE NEWS पर सुधीर चैधरी वैसे नहीं दिखते थे जैसे कि आज नजर आते हैं। उनकी लेटेस्ट फुटेज को 18 साल पहले की प्रस्तुत करना हास्यास्पद लगता है। तब और भी हास्यास्पद लगत है जब ZEE NEWS पर अंग्रेजी बुलेटिन का प्रसारण दिखने लगता है। और हां, पाकिस्तान से जुड़ी फिल्मों में जब तक कोई दरगाह/मजार और उस पर कव्वाली न हो तो निर्माताओं को लगता है कि फिल्म अधूरी है। इसमें भी एक दरगाह/मजार पर कव्वाली का जुगाड़ किया गया है। मेरी टिप्पणी ये है कि ‘सरबजीत’ एक अच्छे विषय पर बुरी फिल्म है।

पत्रकार और शिक्षक रहे सुशील उपाध्याय के एफबी वॉल से.

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