अमित मिश्रा-
लल्लनटॉप और सौरभ के बहाने…हिंदी पट्टी के एक पत्रकार को लेकर जो चर्चा चहुंओर हो रही है वह हर्षित करने वाली है। शायद ऐसा पहली बार तब हुआ था जब प्राइवेट टीवी चैनल (आज तक) पर हिंदी पत्रकारिता (एसपी सिंह और टीम) की चमक पहली बार दिखी थी।
खैर, लल्लनटॉप को मिलने वाला स्नेह और सफलता क्या सिर्फ सौरभ की वजह से थी, यह रहस्य भविष्य के गर्भ में है।
लेकिन इन सब चर्चाओं में एक बात जो छूट गई वह ये कि लल्लनटॉप के होने या ना होने में सिर्फ पत्रकार और संपादक नहीं बल्कि संसाधन का खाद–पानी उपलब्ध करने वाले मीडिया समूह के मालिकों का योगदान भी कम नहीं रहा।
पांच मीडिया संस्थानों में पत्रकार के तौर पर नौकरी करने के बाद मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि टीवी टुडे ग्रुप के अलावा कहीं और लल्लनटॉप जैसा आइडिया, मिड मैनेजमेंट लेवल पर ही कुचल दिया गया होता।
लल्लनटॉप को स्थापित करने और उसको सफल बनाने में बधाई के पात्र तत्कालीन डिजिटल प्रमुख कमलेश सिंह और समूह के मालिक अरुण पुरी–कल्ली पुरी भी हैं।
दुनिया भर में भरोसे और दमन के दोहरे संकट से जूझ रहे मीडिया बिजनेस को चलाने वालों के अच्छे प्रयासों पर चर्चा कम ही होती है, ये भी होती रहनी चाहिए।
प्रियंका दुबे-
‘छोड़ने’ के प्रसंग पर : पत्रकारिता में एक अच्छा, स्थिर और ‘सफल करियर’ अत्यंत दुर्लभ है। इसलिए अक्सर उन्हीं का हो पाता है जिन्होंने इस पेशे को कभी महज़ ‘करियर’ नहीं माना। सफल पत्रकारों के संस्थान या पत्रकारिता छोड़ने के अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं।
इस श्रेणी में अधिकतर वही लोग नौकरियाँ छोड़ते हैं जो इतना डूब के वर्षों काम करते हैं कि काम करते हुए एक अजीब से ‘transcendence’ या परे पहुँचने की स्थिति में ख़ुद को पाते हैं। सौरभ द्विवेदी के एक इंटरव्यू में मैंने उन्हें कहते हुए सुना कि नौकरी में आप छोड़ कर जाएँगे तो फट से आपका रिपलेसमेंट आ जाएगा। जीवन में नहीं आएगा। असल में कोर मीडिया में लम्बे समय तक वही काम कर सकता है या तो जिसका डेस्क पर काम हो या जो साल में एक-दो बार बड़े मौक़ों पर बड़ी टीमों के साथ बाहर निकलते हों या फिर जिनको अपनी बड़ी टीमों के साथ मिलकर कॉरपोरेट मैनेजमेंट करना सुहाता हो जो कि अमूमन ख़ालिस पत्रकारिता की तासीर वाले व्यक्ति को नहीं ही सुहाता।
SEO एक्सपर्ट इत्यादि कुछ भी हो सकते हैं लेकिन वास्तव में हैं तो सजावटी ही। मैंने अपने जीवन में हिंदुस्तान के सबसे अच्छे पत्रकारिता संस्थानों में काम किया जिनमें से एक के संपादक की मेज़ पर एक पंक्ति चस्पा रहती थी जिस पर लिखा था -one has to do journalism in order to sell journalism. SEO वाले और ग्रोथ वाले और ऐसे तमाम लोग आजकल नौकरियों पर रखे जाते हैं लेकिन उन्हें जिस चीज़ की खोज को optimise करना है, उसे बनाना असल में सबसे कठिन काम है। उस एक अदद काम के सिवा संस्थानों में सब कुछ होता है। रिपोर्टर और चंद reporter’s editors किस्म के लोग हैं जिन्हें आप उँगलियों पर गिनने लगें तो दस उँगलियाँ भी पूरी ख़त्म नहीं होंगी।
वैसे भी आजकल सारे अच्छे रिपोर्टर्स या तो स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं या फिर कोई किताब ही लिख रहे हैं। जो लोग पत्रकार होते हैं, वे कई वजहों से अपने पीक पर नौकरियाँ छोड़ते हैं। इनमें सबसे प्रमुख यह है कि किसी भी मूलतः पत्रकार मनुष्य को वैराग्य ढूँढना नहीं पड़ता, वैराग्य ख़ुद उसे ढूँढता हुआ चला आता है। वह बचपन से उस भगत सिंह की पोज़ीशन में बड़ा होता है जिसे हर परिवार पसंद तो करता है, लेकिन अपने पड़ोस के घर में। बर्न आउट की समस्या को जितना भी बड़ा आप मानते हों, वह उससे कम से कम सौ गुना ज़्यादा बड़ी और विकराल है। क्योंकि अपने घर में कोई भगत सिंह नहीं चाहता।
ख़ैर, मैंने हर ओल्ड स्कूल OG क़िस्म के पत्रकार में एक गहरा निसंगताबोध और ह्यूमर देखा है। प्रसिद्धि जिनको वास्तव में मिलती है, उनको बहुत जल्द मालूम चल जाता है कि उसका कोई मतलब नहीं है। कहीं न कहीं आपको यह भी महसूस होता है कि इसमें ख़ुद को खपा के परिणाम आप अकेले ही झेलते हैं। आप पर लिखने के लिए मुकदमे हो, आप जेल में सालों पड़े रहें या फिर स्वतंत्र रूप से लिखे गए अपनी तमाम रिपोर्टों के भुगतान हेतु महीनों संस्थानों को पत्र लिखते रहें। मैंने तो देश की प्रमुख और जनपक्षधरता की क्रांतिकारी पत्रकारिता का दम भरने वाले अंग्रज़ी संस्थानों तक को महीनों पत्र लिखे हैं। अंत में यहाँ तक लिखना पड़ा कि मुझे वज़ीफ़े पर पढ़ने बाहर जाना है और उन ठंडे देशों में लगने वाले ठंड के कपड़े ख़रीदने हैं, कृपया मेरी लंबी रिपोर्टों के पैसे जारी करें।
कुल मिलाकर यह नेकी कर और ख़ुद को दरिया में डुबो कर चलने वाला मामला है जिसमें लोगों की आपसे एक उम्मीद रहती है कि आप डटे रहें। मुझे यह उम्मीद बहुत अन्यायपूर्ण भी लगती रही है। मैंने भी जब-जब नौकरियाँ छोड़ी तब कई मित्र फ़ोन कर-कर के समझाते। अंतिम नौकरी छोड़ने के दौरान तो किसी ने यहाँ तक कहा कि जो पक्की नौकरी आप छोड़ रही हैं उसको पाने के लिए दिल्ली में आज की तारीख़ में चार सौ से अधिक पत्रकार कुछ भी करने को तैयार हो सकते हैं। लेकिन मैंने बार-बार चीज़ें छोड़ दीं। और मुझे कभी कोई अफ़सोस नहीं हुआ।
छोड़ना एक बहुत शक्तिशाली क्रिया है। सामर्थ्य, प्रसिद्धि और कीर्ति के बीच में खड़े होकर चीज़ों को छोड़ना: नौकरियाँ, शहर, उन शहरों और नौकरियों से जुड़े संसार, यह भीतर बहुत गहरी ताक़त विकसित करने के बाद ही संभव हो पाता है। मुझे यह हमेशा उस ‘अंतिम छोड़ने’ का रियाज़ भी लगा है।
द सोशल साइंटिस्ट का ट्वीट-
कल से लल्लनटॉप और सौरभ द्विवेदी के ऊपर अश्रुपूरित नेत्रों से लिखे गए ट्वीट्स पढ़ रहा हूँ।
मालूम पड़ता है कि दोस्तोवस्की या लियोन ट्रॉटस्की के समकक्ष किसी महान विभूति ने अपने कार्यक्षेत्र को अलविदा कह दिया। एक ऐसी रिक्ति छोड़ दी है जो कभी पूर्ण ना हो सकेगी।
अंग्रेजी मीडिया में ऐसी लोकप्रियता शेखर गुप्ता जैसे पत्रकारों की थी परंतु उनके जमाने में हिंदी पट्टी के लड़कों के पास इंटरनेट नहीं पहुँचा था तो ऐसा भावोन्माद भी कहाँ से देखने को मिलता और फिर वो अपने पास देसी गमछा भी नहीं रखते थे जिसे लहराकर नीलोत्पल मृणाल और सौरभ पुराने जमाने के सोवियत लेखकों वाला फील लेते थे।
सौरभ और विकास दिव्यकीर्ति, दोनों ही गत 10 वर्षों में हिंदी पट्टी के लड़कों की पहली पसंद रहे हैं, इसमें कोई दो मत नहीं। एक ऐसा वर्ग जो चीजों की सरफेस नॉलेज रखता है और उम्मीद करता है कि चीज़े थोड़ी और बेहतर ढंग से बतायी जाएं।
ये वह वर्ग है जो खान सर, ओझा जैसे वरिष्ठ बकैतों से ऊपर उठ चुका है और थोड़ी रिफाइन्ड शैली का कंटेंट सुनना चाहता है। सौरभ ने इस वर्ग को टैप किया और भारी फॉलोइंग बनाई।
उनके पॉलिटिकल किस्से, उर्दू की छौंक लगी तत्सम वाली हिंदी, वाणी में ठहराव और गम्भीर भंगिमा ने उस पत्रकार की कमी पूरी की जो हिंदी पट्टी का युवा 2014 के बाद से खोज रहा था। सुधीर चौधरी भी कमोबेश ऐसे ही प्रेजेंटर थे लेकिन उन्होंने धड़ल्ले से आमदनी करने के चक्कर में इस वर्ग के बीच अपनी साख गंवा दी।
इसीके समानांतर विकास दिव्यकीर्ति भी लच्छेदार शैली से अपने कोचिंग में लोगों को जोड़ते गए और आज ऐसा कोई शहर नहीं जहाँ कॉरपोरेट ऑफिस को मात देती दृष्टि की बिल्डिंग ना दिखे। यूट्यूब पर, रील्स में उनका जलवा सर चढ़कर बोलता था और शायद आज भी बोलता हो।
दोनों अपने फील्ड में बेहतर रहे, जमकर प्रसिद्धि, सम्मान कमाया और साथ ही जमकर वो काम भी किये जिन्हें जानकर उनका भोलाभाला दर्शक हार्टब्रोकन महसूस करने लगेगा।
लल्लनटॉप डिजिटल मीडिया का बढ़िया संस्थान है, ध्रुवीकरण के माहौल में मंकी बैलेंसिंग अच्छी की परंतु दिव्यकीर्ति और सौरभ, दोनों की जो छवि आम लोगों के मन में है, वास्तविकता उससे काफी जुदा है।
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