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सुख-दुख

संदर्भ- आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर की सरकारी घेराबंदी : …नहीं तो शेर खा जाएगा!

बचपन में एक कहानी सुनी थी। हांलाकि कहानी तो कहानी ही यानि मनघड़ंत होती है…मगर उससे कुछ सीख मिल जाए तो क्या बुराई है! कहानी कुछ यूं थी कि एक जंगल में चार भैंसे रहते थे। आपस में बेहद प्यार और मिलजुल कर रहते थे। वहीं एक शेर भी रहता था। जिसका मन उनका शिकार करने को हमेशा बना रहता था। लेकिन उनकी एकता के आगे उसकी कभी न चली। जब भी शेर हमला करता चारों मिलकर उसको खदड़े देते। तभी एक लोमड़ी से शेर की वार्तालाप हुई। लोमड़ी को भी शेर के शिकार में अपने पेट भरने के आसार नज़र आए और उसने शेर से कुछ वादा किया।

बचपन में एक कहानी सुनी थी। हांलाकि कहानी तो कहानी ही यानि मनघड़ंत होती है…मगर उससे कुछ सीख मिल जाए तो क्या बुराई है! कहानी कुछ यूं थी कि एक जंगल में चार भैंसे रहते थे। आपस में बेहद प्यार और मिलजुल कर रहते थे। वहीं एक शेर भी रहता था। जिसका मन उनका शिकार करने को हमेशा बना रहता था। लेकिन उनकी एकता के आगे उसकी कभी न चली। जब भी शेर हमला करता चारों मिलकर उसको खदड़े देते। तभी एक लोमड़ी से शेर की वार्तालाप हुई। लोमड़ी को भी शेर के शिकार में अपने पेट भरने के आसार नज़र आए और उसने शेर से कुछ वादा किया।

लोमड़ी ने एक भैसे से जाकर कुछ देर बात की और उसको समझाया कि तुम इस झुंड के सबसे सीधे सादे सदस्य हो और तुम्हारे हिस्से की घास दूसरे भैंसे चट कर जाते हैं। ये लोग तुम्हारे दोस्त ज़रूर हैं…. मगर हैं मतलबी। लोमड़ी ने एक एक करके चारों भैसों के पास जाकर यही बात उनसे कही।

कुछ ही दिनों बाद चारों भैसों में मनमुटाव हो गया… सभी एक दूसरे से खिचें खिचें और दूर रहने लगे। सब की कोशिश यही रहती थी कि अपना पेट भरें और दूसरे से पहले घास चर लें।

इस दौरान एक दिन शेर ने एक भैंसे पर हमला किया तो बाक़ी तीन तमाशा देखते रहे। नतीजा वही हुआ जिसको शेर का इंतज़ार था। कुछ ही दिनों में बड़े ही आराम से एक एक एक करके चारों का शेर ने शिकार कर लिया।

कहानी याद आने की वजह…. फेसबुक पर उत्तर प्रदेश के एक जुझारु और कप्शन के खिलाफ लड़ने वाले आईपीएस की वॉल पर उनका लेख है…. जिसमें उन्होने अपने ऊपर लगे रेप के झूठे इल्ज़ाम का जिक्र करते हुए शिकायत की है… कि करप्ट सिस्टम के खिलाफ बोलने वालों को झूठे मामलों में फंसाया जाता है। साथ ही इस मामले अपनी पत्नी तक को झूठे आरोपों में फंसाए जाने पर बेहद चिंता ज़ाहिर की है। 

हमारी तमाम हमदर्दी और सहयोग उनके साथ है। ये भी हम जानते हैं कि वो ईमानदार और करप्शन के खिलाफ लड़ने वाले इंसान हैं। इस मौके पर मैं निजी तौर पर उनके साथ हूं और सभी से अपील करता हूं…. कि इस लड़ाई में सड़क पर उतर कर उनका भरपूर साथ दिया जाए। नहीं तो जंगल का करप्ट सिस्टम रूपी शेर….. हमारे ही बीच मौजूद लोमड़ियों की मदद से सभी को एक एक करके खा जाएगा।

साथ ही आज मैं अपने साथियों की कोई शिकायत भी नहीं करूंगा। क्योंकि इसी करप्ट सिस्टम के खिलाफ आवाज़ उठाने की सज़ा मुझको 3 मई 2011 को कई एफआईआर और पुलिस उत्पीड़न के तौर पर सहनी पड़ी थी। और हमारे कई साथी ख़ामोश रहे थे। मेरे खिलाफ झूठे मामलों में उत्तर प्रदेश पुलिस बेनक़ाब हो चुकी है…और हाईकोर्ट के दखल के बाद मामला आज भी कोर्ट में लंबित है। लेकिन मेरे कई साथियों को उस वक्त मेरी बर्बादी का इंतज़ार था। हांलाकि उस वक्त भी भाई यशवंत और भड़ास जैसे कई जाबांज़ पत्रकार साथी पहाड़ की तरह मेरे साथ खड़े थे और आज भी वही लोग ऐसे किसी भी मुक़ाबले को हमेशा तैयार नज़र आते हैं। 

आज ज़ररूत इस बात की है कि अगर एक परिवार झूठे मामलों में फंसाया गया है तो उसका साथ दिया जाए। इस मामले में आप लोगों की तरफ से मेरे लिए कोई भी आदेश या मुझसे संपर्क करने के लिए मेरे नंबर 9718361007 पर या [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है।

आज़ाद ख़ालिद टीवी पत्रकार हैं सहारा समय, इंडिया टीवी समेत कई न्यूज़ चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। साथ ही बतौर आरटीआई एक्टिविस्ट और समाजिक कार्यकर्ता सामाजिक मुद्दों को लिए संघर्ष करते हैं।


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