जयपुर साइबर पुलिस ने डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘द सूत्र’ के दो पत्रकारों — हरीश दिवेकर और आनंद पांडे — के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। एफआईआर में नाम “अज्ञात” के रूप में दर्ज है, लेकिन सूत्रों की मानें तो यह मामला इन्हीं दोनों संपादकों से जुड़ा है।
क्या है मामला?
मामला राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी से जुड़ी कुछ खबरों के प्रकाशन से संबंधित बताया जा रहा है। एफआईआर में शिकायतकर्ता नरेंद्र सिंह राठौड़ का नाम है, जिन्होंने आरोप लगाया कि सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से सरकार और संवैधानिक पद पर बैठे लोगों की छवि धूमिल करने की कोशिश की गई।
कौन-कौन सी धाराएं लगीं
एफआईआर (नं. 0158) 28 सितंबर 2025 को साइबर पुलिस स्टेशन, जयपुर कमिश्नरेट में दर्ज की गई। इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आईटी एक्ट की कई गंभीर धाराएं शामिल हैं —
- धारा 353(2) – लोकसेवक को कार्य से रोकने का प्रयास
- धारा 356(2) और 356(3) – मानहानि व गलत सूचना का प्रसार
- धारा 308(6) – अपराध के लिए उकसाना
- धारा 61(2)(b) – इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अपराध
- आईटी एक्ट की धारा 66C और 66D – पहचान की धोखाधड़ी व फर्जीवाड़ा
एफआईआर का आधार
एफआईआर में उल्लेख है कि सोशल मीडिया पर वीडियो और कंटेंट के ज़रिए राज्य के एक शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई। शिकायत में कहा गया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर “भ्रामक सामग्री” फैलाई गई, जो समाज में भ्रम और असंतोष पैदा कर सकती है।
पत्रकारों की गिरफ्तारी पर सवाल
इस कार्रवाई के बाद पत्रकार संगठनों और मीडिया जगत में विरोध के स्वर उठने लगे हैं। कहा जा रहा है कि यह प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला है। बताया जा रहा है कि राजस्थान पुलिस ने मध्य प्रदेश में जाकर दोनों पत्रकारों को हिरासत में लिया।
फिलहाल जांच जारी
पुलिस ने मामले की जांच हवा सिंह नामक अधिकारी को सौंपी है। एफआईआर के मुताबिक, जांच साइबर शाखा द्वारा की जाएगी और इसमें सोशल मीडिया कंटेंट, वीडियो व डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण किया जाएगा।



क्या ‘अज्ञात FIR’ के नाम पर किसी को भी उठाया जा सकता है? पढ़िए कानून क्या कहता है
राजस्थान में ‘Theसूत्र’ के दो पत्रकारों — हरीश दिवेकर और आनंद पांडे — को पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने के बाद यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि आखिर क्या किसी “अज्ञात FIR” के नाम पर किसी को भी उठाया जा सकता है? एफआईआर की कॉपी में आरोपियों के नाम “अज्ञात” दर्ज हैं, लेकिन गिरफ्तारी मध्य प्रदेश से की गई। यह मामला प्रेस स्वतंत्रता और पुलिस प्रक्रिया दोनों को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
आइए जानते हैं कि कानून इस पर क्या कहता है —
क्या है ‘अज्ञात FIR’?
जब किसी घटना में आरोपी की पहचान स्पष्ट नहीं होती, तब पुलिस या शिकायतकर्ता “अज्ञात व्यक्ति” के खिलाफ FIR दर्ज करता है। इसका अर्थ यह है कि अपराध हुआ है, लेकिन अपराधी की पहचान जांच के बाद तय की जाएगी। हालांकि, FIR में “अज्ञात” लिख देने का मतलब यह नहीं होता कि पुलिस किसी को भी अपनी मर्जी से उठा सकती है।
कानून की नजर में गिरफ्तारी के लिए क्या ज़रूरी है?
भारत के नए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 35 (पूर्व में CrPC की धारा 41) के अनुसार — “पुलिस तभी किसी को गिरफ्तार कर सकती है, जब उसके पास ऐसे सबूत या परिस्थितियां हों जो उस व्यक्ति की संलिप्तता को साबित करती हों।” यानि, बिना सबूत या ठोस लिंक के गिरफ्तारी अवैध मानी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि — “सिर्फ FIR दर्ज हो जाने से किसी की स्वतः गिरफ्तारी का अधिकार पुलिस को नहीं मिल जाता।” (Arnesh Kumar vs State of Bihar, 2014)
पत्रकारों के मामलों में क्या कहा गया है
पत्रकारों के खिलाफ “अज्ञात FIR” अक्सर विवादित खबरों या रिपोर्टिंग से जुड़ी होती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने Vinod Dua vs Union of India (2021) में साफ कहा था — “मात्र सरकार की आलोचना करना या सवाल उठाना अपराध नहीं है। जब तक कोई रिपोर्ट जानबूझकर झूठी या भ्रामक साबित न हो, पत्रकार को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।” इसलिए किसी पत्रकार को सिर्फ इसलिए उठाना कि उसने किसी मंत्री, सीएम या राजनीतिक दल पर खबर की — कानूनन प्रेस स्वतंत्रता का हनन है।
अगर किसी को ‘अज्ञात FIR’ में उठाया जाए तो क्या करें
अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) — हाईकोर्ट या सेशन कोर्ट में तुरंत आवेदन किया जा सकता है। रिट याचिका (Habeas Corpus) — अगर बिना कारण हिरासत में लिया गया है, तो सीधे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी जा सकती है। मानवाधिकार आयोग या प्रेस काउंसिल में शिकायत — अगर मामला प्रेस स्वतंत्रता से जुड़ा है।
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