वास्तु शास्त्र की वास्तविकता : फ्रॉड या विज्ञान?

विगत 30 वर्षों में वास्तु के प्रति लोगों में जिज्ञासा बढ़ी है। वास्तु के बारे में लोगों के अलग-अलग अभिमत रहे हैं। कुछ लोग इसे प्राचीन शास्त्र मान बैठते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि यह पूरी तरीके से निराधार और अवैज्ञानिक है। चाहे जो भी हो वास्तु शास्त्र हमेशा विवाद में रहा है। मेरे एक आर्किटेक्ट मित्र नाम ना छापने की शर्त में कहते हैं कि जब पूरे मकान का नक्शा बना दिया जाता है और उसे सिविल और आर्किटेक्ट के नियमों में फिट कर दिया जाता है। उसके बाद मकान मालिक को कोई दसवीं पढ़ा हुआ तथाकथित वास्तुशास्त्री कोई सलाह देता है। तो ऐसा लगता है मानो खूबसूरत रंगोली में किसी ने पानी फेर दिया हो। आर्किटेक्ट और वास्तु के मेल का मतलब होता है विज्ञान और अंधविश्वास का मेल।

वास्तु पुरुष की कहानी?

वास्तु शास्त्र में वास्तु पुरुष की एक कथा है। देवताओं और असुरों का युद्ध हो रहा था। इस युद्ध में असुरों की ओर से अंधकासुर और देवताओं की ओर से भगवान शिव युद्ध कर रहे थे। युद्ध में दोनों के पसीने की कुछ बूंदें जब भूमि पर गिरी तो एक अत्यंत बलशाली और विराट पुरुष की उत्पत्ति हुई। उस विराट पुरुष से देवता और असुर दोनों ही भयभीत हो गए। देवताओं को लगा कि यह असुरों की ओर से कोई पुरुष है। जबकि असुरों को लगा कि यह देवताओं की तरफ से कोई नया देवता प्रकट हो गया है। इस विस्मय के कारण युद्ध थम गया और अंत में दोनों उस विराट पुरुष को लेकर ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने उस पुरुष को अपने मानसिक पुत्र की संज्ञा दी और उनसे कहा कि इसका नाम वास्तु पुरुष होगा। वास्तु पुरुष वहाँ पर एक विशेष मुद्रा में शयन के लिए लेट गए और उनके कुछ हिस्सों पर देवताओं ने तथा कुछ हिस्सों पर असुरों ने अपना वास कर लिया। ब्रह्मा जी ने यह भी आदेश दिया कि जो कोई भी भवन, नगर, तालाब, मंदिर आदि का निर्माण करते समय वास्तु पुरुष को ध्यान में रख कर काम नहीं करेगा तो असुर लोग उसका भक्षण कर लेंगे। जो व्यक्ति वास्तु पुरुष का ध्यान रख कर कार्य करेगा, देवता उसके कार्य में सहायक होंगे। इस प्रकार वास्तु पुरुष की रचना हुई।

आखिर यह वास्तु शास्त्र है क्या?

ऐसा माना जाता है कि वस्तु शब्द से वास्तु का निर्माण हुआ है । वास्तु शास्त्र पर आधारित कोई एक प्राचीन किताब नहीं है। लेकिन बहुत सारी प्राचीन किताबों से जमीन के चयन से लेकर मकान बनाने तक का संदर्भ खोज कर वास्तु शास्त्र की कई किताबें अभी लिखी जा चुकी है। इन किताबों का संदर्भ या कहें सोर्स समरांगण सूत्र, मनुस्मृति, वास्तु रत्नाकर, शिल्प शास्त्र, राजबल्लभ मंडलम, बृहद वास्तु माला, वास्तु सार संग्रह, गृह वास्तु प्रदीप, मत्स्य पुराण आदि हैं।
वास्तु शास्त्र का क्या उद्देश्य है?

वास्तुशास्त्री यह दावा करते रहे हैं कि यदि कोई जजमान वास्तु के हिसाब से मकान, दुकान, कारखाने व मंदिर बनाता है तो उसके यह स्थान खुशहाली शांति में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी किसी प्रकार की जन धन यस की हानि नहीं होगी। यही वास्तु का उद्देश्य है। किसी जजमान (जो वास्तु के हिसाब से निर्माण कराता है) कि जन धन एवं यश की गारंटी सुनिश्चित करना वास्तु का लक्ष्य है। इसमें यह दावा करते हैं कि तमाम प्रकार की विपत्ति, बीमारी, पारिवारिक कलह वास्तु के हिसाब से बनाए हुए घर में वास्तु के हिसाब से बनाए हुए घर में नहीं होती है। वास्तु के मुख्य स्तंभ। पौराणिक शास्त्रों के अध्ययन के बाद यह ज्ञात होता है कि वास्तु अपनी बात को कहने के लिए तीन आधारों का प्रयोग किया जाता है। इन आधारों या स्तंभों के बिना वास्तु की कल्पना नहीं की जा सकती। 1 जाति 2 दिशा 3 दिवस

1 जाति

यह वास्तु शास्त्र का सबसे प्रमुख नियम आधार है। जाति के आधार पर वास्तु की सलाह तय होती है। चाहे बात भूमि के चयन की हो या निर्माण सामग्री की हर पल वास्तु सलाह जाति आधार पर अलग-अलग तरह की जाती है। यदि आप ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शुद्र हैं तो सभी के लिए वास्तु के अलग-अलग नियम एवं सलाह हैं।

लंबाई, चौड़ाई व जाति : ब्राह्मणों के घरों की लंबाई चौड़ाई से 10 अंश अधिक हो, क्षत्रिय के घर की लंबाई चौड़ाई से 8 अंश अधिक, वैश्य की 6 अंश और शूद्र की 4 अंश अधिक हो :
‘दशांशयुक्तो विस्तारा-
दायामो विप्रवेश्मनाम्,
अष्टषट्चतुरंशाढ्य
क्षत्रादित्रयवेश्मनाम्.’

जाति के अनुसार घर की सीमा : वास्तुशास्त्र कहता है कि शूद्रों के लिए साढ़े 3 तल वाला भवन कल्याणकारी होता है. इस से बढ़ कर यदि शूद्र का भवन होगा तो उस के कुल का नाश हो जाएगा:

‘सार्धत्रिभूमि शूद्राणां
वेश्म कुर्याद् विभूतये,
अतोऽधिकतरं यत् स्यात्
तत्करोति कुलक्षयम्.’
(समरांगण सूत्र. 35/21)

2 दिशा
वास्तु शास्त्र नियम का दूसरा आधार है दिशा। यह एक प्रमुख आधार है। उत्तर और पूर्व दिशा के मकान शुभ माने जाते हैं। वहीं दक्षिण मुख वाले मकान अशुभ माने जाते हैं। आमतौर पर 4 और 8 दिशाओं का उपयोग वास्तु शास्त्र में किया जाता है। लेकिन विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र में 16 दिशाओं का वर्णन है। आठ दिशाएं इस प्रकार है उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम ईशान ,आग्नेय, नेतृत्व, वायव्य जाति के अनुसार कौन व्यक्ति को किस दिशा में से फल मिलेगा चेक किया जाता है।

3 दिवस
दिवस जानें तिथि का वास्तु में बड़ा महत्व है। यह एक आधार के रूप में काम करता है। इसके अंतर्गत पूर्णिमा, अमावस्या, वार का विचार किया जाता है। खासतौर पर गृह निर्माण करते समय गृह प्रवेश करते समय तिथि और दिवस का वास्तव में एक महत्वपूर्ण स्थान है। गृह वास्तु पर ग्रंथ मत्स्य पुराण में कुछ मास नक्षत्र व वार आदि को गृह निर्माण के लिए शुभ तथा कुछ को अशुभ बताया गया है इस स्थिति में माशा अनुसार गृह आरंभ के शुभ अशुभ फलों का वर्णन किया गया है ।

विज्ञान की कसौटी
वास्तु शास्त्र पर भरोसा करना यह एक व्यक्तिगत मामला है लेकिन यह एक विज्ञान है कहना विज्ञान को चुनौती देने जैसा है। अपने आप को या अन्य को ठगने जैसा है।

ज़्यादातर वास्तु शास्त्री जिनमें कुछ आर्किटेक्ट भी होते हैं। वास्तु को विज्ञान के रूप में प्रचारित करते हैं । लेकिन वे भूल जाते हैं कि विज्ञान का एक नियम होता है। विज्ञान की कसौटी पर कसने के लिए उसका परीक्षण, प्रयोग, प्रवृत्ति, अनुमान, डाटा संग्रहण करना होता है। यदि हर बार एक ही परिणाम आए तो उसे विज्ञान कहेंगे नहीं तो तुक्का या अंधविश्वास कहा जाता है।

वास्तुशास्त्र के नियम अनुसार किसी भी बिल्डिंग का प्रवेश द्वार दक्षिण की ओर नहीं होना चाहिए यह अशुभ माना जाता है। ऐसा होने पर विनाश अटल है लेकिन किसी भी गांव शहर में घनी आबादी में देखें तो सैकड़ों सालों से दक्षिण मुखी मकान मिलेंगे और वे अच्छे से फल-फूल रहे हैं। उसी प्रकार दुकान भी सड़कों के दोनों ओर खुली रहती है। एक तरफ उत्तर दिशा दूसरी तरफ दक्षिण दिशा मुख वाली। लेकिन दोनों अच्छा बिजनेस कर रही होती हैं।

शराब की दुकान

शराब की दुकान किसी भी दिशा की ओर हो सड़क पर हो या भीतर की गलियों में हो अच्छी भीड़ होती है । इसमें वास्तु का नियम फिट नहीं होता। वास्तु विज्ञान टाय टाय फिस हो जाता है। आखिर इस मामले में वास्तु का नियम क्यों लागू नहीं होता? जाहिर है वास्तु शास्त्री इस पर भी कोई तुक्का फिट करने की कोशिश करेंगे।

अमेरिका का वाइट हाउस

अमेरिका का वाइट हाउस का प्रवेश द्वार भी दक्षिणमुखी है और पूरी बिल्डिंग वास्तु के नियम के हिसाब से नहीं बनाई गई है। लेकिन अमेरिका का राष्ट्र अध्यक्ष जो वाइट हाउस में निवास करता है। संसार का सबसे प्रबल सत्ता का प्रमुख होता है और कई सालों से पूरे विश्व का सबसे शक्तिशाली देश कहलाने का खिताब उसके नाम पर है।

पुणे का किला शनिवार वाड़ा।

पेशवा ब्राह्मणों के द्वारा पुणे में उनके निवास के लिए एक किला बनाया गया जिसका नाम शनिवारवाड़ा है। शनिवार वाडा पूरी तरह से वास्तु के अनुरूप बनाया गया है। यह एक राजमहल है। फिर भी हमेशा इनके ऊपर मुसीबतों का पहाड़ गिरता रहा। वह कर्ज के बोझ से लदे हुए थे। परिवार के सदस्यों को जान से हाथ धोना पड़ता रहा है। प्रश्न यह उठता है कि यदि वास्तु के अनुरूप है तो फिर पेशवाओं इतनी तकलीफ क्यों झेलनी पड़ी।

वास्तु के इतने सारे उदाहरणों से साफ हो जाता है कि वास्तु एक नए प्रकार का अंधविश्वास है। इसलिए इसे सुडो साइंस इंग्लिश में और हिंदी में छद्म विज्ञान कहते हैं। वास्तु का यह रोग सिर्फ हिंदुओं में नहीं है मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध भी इसकी जद में आ गए हैं। ज्योतिष की तरह यह भी देश में अंधविश्वास को बढ़ावा देकर घुन की तरह खोखला कर रहा है।

उपभोक्ता कानून के अंतर्गत लाने की जरूरत
जिस प्रकार भवन निर्माण कार्य को उसकी गुणवत्ता के अनुसार कानून की परिधि में लाया गया है। उसी प्रकार यदि वास्तुशास्त्र एक विज्ञान है तो उसके द्वारा किए गए परिवर्तन एवं दावों का दस्तावेज बनाने और उसे उपभोक्ता कानून की जद में लाने की जरूरत है। ताकि भोले भाले नागरिक को न्याय दिलाया जा सके। लोग ठगों के चंगुल से बाहर निकल सके और विज्ञान का बढ़ावा हो सके।

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