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जब संसार से कुछ ले ही नहीं जाना है तो फिर किसलिए हाय हाय!

यशवंत सिंह-

जब संसार से कुछ ले ही नहीं जाना है तो फिर किसलिए हाय हाय! अगर जीने खाने भर प्रबंध है तो आंतरिक यात्रा शुरू करिए। इस मजेदार यात्रा में भी बहुत सारे पड़ाव तनाव गिराव उठाव हैं लेकिन ये लर्निंग की प्रक्रिया है, साधना के स्टेजेज हैं। ये बातचीत सुनिए।

आईबी के सीनियर पोजीशन से रिटायर सुधीर जी अपनी साधना की कुछ दिक्कतों-शंकाओं को लेकर गुरुजी से डिस्कस कर रहे हैं। ऐसी बातचीत करने के लिए एक स्पिरिचुअल माहौल ज़रूरी है। ऐसा माहौल मुझे मिला तो मन यहीं का होकर रह गया है। लेकिन कल यहाँ से निकलना है। फिर बेकाबू और उपद्रवी सरकारों वाली दुनिया में प्रवेश करना है जहाँ नियम क़ानून नैतिकता सदाशयता मानवता सब कुछ को ख़त्म किया जा चुका है।

आम इंसान तक जॉम्बी हो चुके हैं। जिसे जहाँ मौक़ा मिल रहा, वहीं किसी न किसी क़िस्म के उपद्रव को जी रहा है। अतिशय गरीबी और अतिशय अमीरी में विभाजित भारत का आने वाला समय चीख़ों और चीत्कारों वाला है जिसे ईमानदार लोग सुनकर परेशान होंगे, बेईमान तो लूट खसोटकर मस्त रहता है, कोई मरे या जिए!

जिनकी खाल मोटी न हो सकी उन्हें शोक मनाने के लिए अतिरिक्त समय और संवेदना चाहिए। सब इतने दिलेर नहीं होते कि वे एक मरते कराहते समाज के साथ जी सकें। संन्यास / अध्यात्म ख़ुद को समझने और शांत हो जाने का राह दिखाता है।

इसे एक्स्प्लोर किया जाना चाहिए, पूरी गंभीरता के साथ। इसे फ़ैशन और पैशन की तरह जीना चाहिए। ये दुखी और उदास लोगों की दुनिया नहीं बल्कि दुख और उदासी ख़त्म करने के लिए ख़ुद के गहरे अंधेरे कुएं में उतरकर कहीं दबे ढँके प्रकाशमान हीरे को तलाश लाने वालों का जुटान क्षेत्र हैं! शुभ रात्रि

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