फिर मिले 1994-95 वाले आईआईएमसीएन!

विकास मिश्रा-

करीब सवा दो साल बाद मिले हम। कोरोना की वजह से हमारे आईआईएमसी वाले बैच की बैठकी नहीं हो पाई थी। कोरोना ने थोड़ी राहत दी तो शनिवार का दिन पक्का हो गया। 1994-95 का बैच है हमारा। इतना पुराना साथ अपनेपन के ऐसे फेविकोल से जुड़ा है कि हर साल ये रिश्ता और भी मजबूत होता जाता है।

इस बार हमारी बैठकी हुई दिल्ली के सुंदर वन में। पहली बार कार्यक्रम दिन में रखा गया। मुलाकात तो शनिवार को थी, लेकिन मिलने की इच्छा तो काफी पहले से ही हिलोर मार रही थी। मिलने का वक्त तय था दोपहर 1 बजे। ग्रुप में आयोजन समिति के साथी राजीव रंजन, अमरेंद्र किशोर, पवन जिंदल और समर पहले से ही पहुंचे थे। रवीश कुमार भी समय से पहुंच गया। जब हम लोग मिले तो बस 1995 वाले दौर में पहुंच गए। इतना आनंद आया कि उसे शब्दों में वर्णित कर पाना असंभव है।

1 बजे से ठहाकों और गप्पों का सिलसिला देर शाम तक चलता रहा। मनोज बाबू सीतामढ़ी से आए थे। एक बार फिर सुरीली तान ली मनोज ने। 26 साल पहले की तरह सुर अभी भी सधे हुए हैं। अमृता के भीतर मिलने का ऐसा उत्साह था कि कैमरा ही जयपुर में भूल आईं। अमरेंद्र ने फोटोग्राफर की भूमिका निभाई। ऐसी ऐसी जगहों पर जाकर ऐसे ऐसे एंगल से तस्वीर ली कि खुद तस्वीर बन गया। सुभाष बाबू ने जीवन का ज्ञान दिया तो उत्पल चौधरी ने रिटायरमेंट प्लान पर फोकस करने का ज्ञान दिया। पैसा कहां लगाएं, कहां निवेश करें, कितना निवेश करें क्रिप्टो करेंसी में पैसा लगाएं या न लगाएं..वगैरह वगैरह।

दोस्तों की बैठकी में गपबाजी थी तो सवाल भी थे। मसलन अमरेंद्र को ये शिकायत थी कि राजीव उसे देखकर मुस्कुरा क्यों रहा है.? सबको उत्सुकता ये थी कि सुभाष का चेहरा अभी भी इतना लाल कैसे है..? पवन जिंदल की नौजवानों को भी मात देने वाली ऐसी फिटनेस का राज क्या है..? संगीता की उम्र बरसों से वहीं ठहरी क्यों है..? अमरेंद्र अब तक ‘किशोर’ क्यों है..?

एक साथी हैं नाम है तरुण कुमार। 5 साल बाद सरकारी नौकरी से रिटायर होने वाले हैं। जज्बा ये है कि जवानी अभी शुरू हुई है। पहले सादे कपड़े पहनता था, दाढ़ी रखता था। अब क्लीन शेव हो गया है, गहरे रंगों के रंगीन कपड़े पहन रहा है। सुप्रिय प्रसाद ने भी घनघोर डायटिंग से अपना वजन कम कर लिया है।

रवीश के अधिकतम बाल पक गए हैं, लेकिन वो हमारे बैच में सबसे कम उम्र वाले साथियों में से एक है। बाल कभी रंगा नहीं, बाल उसकी वरिष्ठता साबित करने में उसकी मदद करते हैं। हमारे बैच में अमरेंद्र, मनोज, पवन और सुभाष ये चारों सिंगल हैं। इनका अलग ही संगठन है-मैप्स (मनोज, अमरेंद्र, पवन, सुभाष MAPS)।

हमारे बैच के इस सालाना मिलन में एक परंपरा ये भी है कि ग्रुप के साथी का सम्मान किया जाए। इससे पहले रवीश कुमार और सुप्रिय प्रसाद को सम्मानित किया जा चुका है। इस बार सतीश और अमृता को सम्मानित किया गया। सतीश वैसे तो बैंक में है, लेकिन महीने में कम से कम 20 लेख, कविताएं या गजलें उसकी तमाम पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ करती हैं। शाम को पार्क में बैठकी के दौरान सतीश ने शानदार गजलें सुनाईं। मैंने पूछा-इन गजलों की प्रेरणा कौन हैं..? उसने कहा- मैंने अपनी पत्नी की मुहब्बत में गजलें लिखी हैं। अगर ये सच है तो ये भाई दो-तीन पत्नियां डिजर्व करता है।

हमारे बैच को आईआईएमसी से निकले 26 साल से ज्यादा हो चुके हैं। हमारे बैच में मीडिया के एक से बढ़कर एक धुरंधर हैं। देश के नंबर वन न्यूज चैनल आजतक के हेड सुप्रिय प्रसाद हमारे बैच से हैं, तो देश के मशहूर न्यूज एंकर रवीश कुमार भी हमारे बैच के ही हैं। संगीता तिवारी, उत्पल चौधरी, राजीव रंजन, प्रमोद चौहान, अमन जैसे साथी बड़े न्यूज चैनल्स के शीर्ष पदों पर है। अमृता मौर्या राजस्थान की वरिष्ठ पत्रकार है और डेजर्ट टेल नाम का अपना अखबार निकालती है। भारत में आदिवासियों पर सबसे ज्यादा काम करने वालों में से एक अमरेंद्र किशोर की तो बात ही निराली है। डेवलपमेंट फाइल्स का संपादक है अमरेंद्र।

हमारे बैच का कोई साथी मलेशिया है तो कोई अमेरिका। कोई शिक्षक है तो कोई संपादक तो व्यवसायी। कई साथी सरकारी नौकरी में हैं। जब भी मुलाकात की बात आती है तो कोई मुंबई से कोई गया से, कोई लखनऊ से तो कोई मध्य प्रदेश पंजाब और राजस्थान भागा चला आता है।

हमारे बैच के ज्यादातर साथी 50 साल की उम्र पार कर चुके हैं। दो या चार मित्र 50 के बॉर्डर पर हैं। लेकिन जब हम मिलते हैं तो बस वही रहते हैं 1994-95 वाले आईआईएमसीएन। वही नौजवानी का जोश, वही बेफिक्री, वही ठहाके और वही अलमस्ती।

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One comment on “फिर मिले 1994-95 वाले आईआईएमसीएन!”

  • Satish Singh says:

    दिल्ली की सुंदर नर्सरी में फिर से एक बार कुछ अपनी कही और कुछ दोस्तों की सुनी। नलिन के गुमशदी के चर्चे सभी मित्रों की ज़ुबान पर थे, ख़ुदा से उसकी वापसी की दुआ शिद्दत से सभी ने की। चेहरों की चमक कैमरे में हमेशा के लिए कैद हो गये, तो हँसी और ठहाकों की ख़ुशबू जहन के पन्नों की इबारत बनकर अमिट बन गई। कुछ की तोंद निकली हुई थी, तो कुछ के सर को देखकर चाँद का दीदार किया जा सकता था। कुछ के बालों की सफेदी ने सर्फ़ एक्सेल की सफेदी को फ़ेल कर दिया था। वैसे , 27 सालों के बाद वय का बदलना लाजिमी भी है।

    इस महफ़िल में ग़ुरूर का सेंसेक्स किसी अंधेरे कोने में लहालोट हो रहा था। बस जिद्द थी हर पल के कतरे-कतरे को जीने की। हर तरफ फैली हरियाली, फव्वारे की मुस्कराहट, झूले की रूनझुन, मोरनी की अठखेलियां और फैब इंडिया के खानसामों द्वारा बिछाये गये दस्तरख़ान पर लजीज़ पकवानों के स्वाद को जिहवा पर जीते हुए इंद्रधनुषी पलों का सभी आंनद ले रहे थे।

    आभासी दुनिया के मित्रों से गुफ़्तगू करने के ज़माने में और लाइक और कमेंट्स देखकर नागिन डांस करने वाले फ़ेसबुकियों के बजाये मुझे अपने ऐसे यारबाज दोस्तों से बेइंतहा मोहब्बत है। हम हेलो-हाय और सेल्फ़ी पर नहीं मरते हैं। हम प्रेम की आग में जलते हैं और यारबाजी में ज़िंदगी ढूंढते हैं।

    हमारी मित्रता में हैसियत नहीं देखी जाती, हम दूसरों की सीरत-सूरत भी नहीं माँगते हैं, मिलते हैं तो मोबाईल में कतई नहीं झाँकते हैं और न ही ख़ुदा पर सवाल दागते हैं। न किसी के मन में ईर्ष्या रहती है और न ही लोभ और न ही अभिमान। इस बार भी सभी दोस्ती के धागे में बंधकर सुंदर नर्सरी चले आये थे।

    दोस्तों को भी है, मुझसे नमक वाली इश्क़, आंखों में है बेहिसाब प्रीत और सोच में है मुख़्तसर सी नज़ाकत। इसलिए, उनकी तम्मनाओं की रूमानी रुतें गुलदस्ते बन गये और नूरे एहसासात गले की हार। शुक्रिया दोस्तों सम्मानित करने के लिये। आप लोगों ने यादगार बनी दी यह साल मेरे लिए….

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