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‘अजेय’ – संघर्ष, संवेदना और प्रोपेगेंडा के बीच का सिनेमाई अनुभव

पीयूष पांडेय-

एक मित्र के बहुत आग्रह पर आज मैं योगी आदित्यनाथ की बायोपिक ‘अजय-एक योगी की अनकही कहानी’ देखने गया। थिएटर में जाने से पहले फिल्म दिमाग में साफ था कि ये तकनीकी रुप से बेहद कमज़ोर, उबाऊ और एक प्रोपेगेंडा फिल्म होगी। लेकिन, फिल्म देखने के बाद मेरा पूर्वाग्रह टूट गया। फिल्म शांतनु गुप्ता की किताब ‘The Monk Who Became Chief Minister’ पर आधारित है।

कहानी उत्तराखंड के एक सामान्य से युवा छात्र के आध्यात्मिक और राजनीतिक जीवन में प्रवेश और फिर मुख्यमंत्री बनने तक की है। मैंने आज तक के लिए ‘कहानी’ शो लिखते हुए योगी आदित्यनाथ के बारे में बहुत पढ़ा था। फिर भी कुछ एक बातें नयी मालूम पड़ीं। फिल्म तकनीकी रुप से कमज़ोर नहीं है और ना उबाऊ है।

फिल्म योगी के संघर्ष की कहानी है, जिसे वो बखूबी दिखाती है लेकिन लेखक-निर्देशक ने उन मुद्दों से दूरी बना ली, जिन्हें लेकर योगी आदित्यनाथ को कठघरे में खड़ा किया जाता है। कुछ महत्वपूर्ण प्रसंग छोड़ दिए गए हैं लेकिन वो निर्देशक तय करता है क्योंकि फिल्म की लंबाई भी एक मुद्दा होती है।

योगी आदित्यनाथ की भूमिका निभाने वाले अनंत जोशी ने उनकी भाव भंगिमा पकड़ने की अच्छी कोशिश की है। परेश रावल और पवन मल्होत्रा मंझे हुए कलाकार हैं तो उन्होंने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। योगी आदित्यनाथ के वर्तमान मीडिया सलाहकार मृत्युंजय कुमार की भूमिका निरहुआ ने निभाई है, और उनके बहाने मृत्युंजय कुमार की भूमिका के बारे में कुछ नया पता चला।

लेकिन, इस समीक्षानुमा टिप्पणी को लिखने की वजह ये है कि मुझे लगा था कि योगी आदित्यनाथ के बारे में पहले से लोग बहुत जानते हैं, और फिल्म उनका गुणगान करेगी तो फिल्म दर्शकों को भावनात्मक स्तर पर नहीं छू पाएगी। लेकिन अजय सिंह बिष्ट के घर छोड़ने से पहले परिवार के साथ होली मनाने के एक दृश्य को देखते हुए मैं कुछ भावुक हुआ.. और उस वक्त मैंने देखा कि मेरे बगल में बैठा भाई आंसू पोंछ रहा है।

इसके बाद, जब फिल्म में योगी की माँ उन्हें वापस घर ले जाने मठ पहुंचती हैं तो मेरे आगे बैठी एक महिला आंसू पोंछ रही थी। यानी कुछ दृश्य सीधे दिल में उतरे और दर्शकों के ये अनुभव मेरे पूर्वाग्रह पर चोट थे..।

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