स्टिंग के सूत्रधार अशोक पांडेय जब संपादक थे तो जमीनों पर इनकी भूखी निगाहों की चर्चाएं लगातार होती रहती थीं!

स्टिंग देख लगता है ये मोहम्मद शाहिद कोई आईएएस अफसर न होकर अवैध कारोबार करने वालों का कोच है!

Indresh Maikhuri : उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव पद पर तैनात आई.ए.एस. अफसर मोहम्मद शाहिद का एक स्टिंग ऑपरेशन सार्वजनिक हुआ है. अगर यह स्टिंग वास्तविक है तो जनता की कुर्बानियों से बने राज्य में जनहितों के कुठाराघात और माफियापरस्ती की एक और मिसाल है. इन्टरनेट पर इस स्टिंग ऑपरेशन का 15 मिनट का वीडियो उपलब्ध है. इस वीडियो को देखें तो प्रत्यक्ष रूप से कोई धन का लेन-देन इसमें नहीं है. लेकिन बातचीत शराब व्यापार को लेकर है. यह स्टिंग एक बार फिर यह स्पष्ट करता है कि संविधान और कानून की रक्षा की शपथ लेकर कुर्सियों पर बैठे लोग सिर्फ दलाल हैं, जिन्हें दलाली के बदले अपनी हिस्सेदारी में ही रुचि है. 25 परसेंट दे देंगे, जैसे जुमले सुनाई दे रहे हैं पर पैसे का लेन-देन नहीं दिखता है. लेकिन जो दिख रहा है वह कुछ कम गंभीर नहीं है.

मुख्यमंत्री सचिवालय में तैनात गुजरात कैडर का अफसर, जिसे मुख्यमंत्री हरीश रावत विशेष तौर पर अपने साथ दिल्ली से उत्तराखंड ले कर आये हैं, वह शराब के व्यापरियों के साथ बातचीत में लीन है. वह उनको उत्तराखंड राज्य में हर बात पर मचने वाले हल्ले से आगाह कर रहा है और उन्हें नसीहत भी दे रहा है कि मामले की ज्यादा इधर-उधर चर्चा न करें. ऐसा लगता है कि मोहम्मद शाहिद कोई आई.ए.एस. अफसर न होकर अवैध कारोबार करने वालों के कोच हैं जो उन्हें धंधे का गुर सिखा रहे हैं. वह शराब का कारोबार पाने के इच्छुक लोगों को बता रहे हैं कि “जो शोर मचाये उनको थोडा सा खामोश भी करना पड़ता है”. वे शराब के कारोबार के इच्छुकों को यह गुरु ज्ञान भी दे रहे हैं “जैसे खनन वाले हैं, उनको पता है कि मीडिया को कैसे मैनेज करना है, किसी को कैसे मैनेज करना है.” शराब डीलरों से डील करते हुए मो.शाहिद का उक्त वक्तव्य काफी राजफाश करता है. सत्ता, माफिया और मीडिया के गठजोड़ को भी यह वाक्य, एक बार फिर उजागर करता है. इस वाक्य की रोशनी में आप उन अशोक पाण्डेय का चेहरा भी देख सकते हैं, जो इस स्टिंग को करवाने के सूत्रधार कहे जा रहे हैं. यही पाण्डेय साहब जब देहरादून में दैनिक जागरण के सम्पादक की कुर्सी पर विराजमान थे तो जमीनों पर इनकी भूखी निगाहों की चर्चाएं लगातार होती रहती थीं.

इस स्टिंग में मुख्यमंत्री कार्यालय के अन्दर दलाली के लिए चल रही गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा की भी झलक देखी जा सकती है. मोहम्मद शाहिद शराब कारोबारियों से पूछ रहे हैं कि वे इस सौदे के सम्बन्ध में किनसे मिले? ”रणजीत भाई से मिले, हरिपाल से मिले”. शराब कारोबारी बताते हैं कि वे हरिपाल से मिले. हरिपाल के चरित्र का ब्यौरा देते हुए शाहिद कह रहे हैं कि “दे मत देना कुछ हरिपाल को, घूमते रहोगे आगे-पीछे, वो आगे-आगे, तुम पीछे-पीछे”. यानि दलाली के धंधे की दुकान अकेले मोहम्मद शाहिद ने सजाई हुई है, ऐसी ही दुकान हरिपाल ने भी सजाई हुई है और बकौल मोहम्मद शाहिद ऐसे कामों के लिए “रणजीत भाई” से भी मिला जा सकता है. यह भी रोचक है कि हरिपाल को मुख्यमंत्री हरीश रावत दिल्ली से लाये हैं. वे संभवतः उस विशेष कार्याधिकारियों की फ़ौज का हिस्सा हैं, जो मुख्यमंत्री के यहाँ तैनात हैं. तो क्या दलाली ही है विशेष कार्य जिसके लिए विशेषकार्याधिकारी तैनात किये गए हैं? मोहम्मद शाहिद को भी हरीश रावत दिल्ली से ही अपने साथ लेते हुए आये थे. इस तरह दोनों ही हरीश रावत के चहेते हैं. लेकिन दलाली के धंधे की प्रतिस्पर्धा है कि शाहिद, शराब वालों को समझा रहे हैं कि हरिपाल के चक्कर में न पड़ो, मैं हूँ तो तुम्हारी सेवा के लिए. बेईमानी के धंधे में इमानदारी रहनी चाहिए. संभवतः शाहिद साहब भी इस उसूल के कायल हैं. इसीलिए वे नहीं चाहते कि कानून की बाहें मरोड़ कर सौदा हासिल करने के इच्छुक शराब कारोबारी गलत लोगों के हाथों में पड़ कर ठगे न जाएँ.

आम तौर पर आई.ए.एस. अफसरों को देखिये तो वे एकदम अंग्रेजियत से लबरेज, सुविधा भोगी, सूटेड-बूटेड और सामान्य लोगों से सीधे मुंह बात न करने वाले होते हैं. लेकिन इस स्टिंग में देखें तो आई.ए.एस. मोहम्मद शाहिद बताया जा रहा शख्स बड़ी बेतकल्लुफी से एक डबल बेड के कोने पर बैठा हुआ है, जिनके साथ बातचीत में लीन है, वो उसे शाहिद भाई बुला रहे हैं, वह सड़क छाप शोहदों की तरह उनसे कह रहा है कि “शराब ऐसी चीज होती है, जैसे गन्दी औरत.” सचिवालय की कुर्सी पर बैठे रौबदार आई.ए.एस. से ऐसे डायलाग की कल्पना कर सकते हैं आप? उससे आम लोगों के प्रति किसी सहानुभूति की उम्मीद कर सकते हैं? नहीं न, तब इन लोगों में ऐसी क्या खासियत है कि मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात आई.ए.एस. अफसर को इनके लुटने की बड़ी चिंता है, इनको अपनी बात समझाने के लिए वह सारी अंग्रेजियत छोड़ सड़क छाप शोहदों की भाषा में उतर आता है? ये “लोकसेवक” क्या सिर्फ माफिया “लोक” के सेवक हैं? शाहिद साहब के पास तो आबकारी, सूचना के अलावा भ्रष्टाचार उन्मूलन, स्वराज व जनसेवा जैसे विभाग हैं. जिस रास्ते पर वे चल रहे हैं, उस रास्ते तो माफिया राज और माफिया सेवा ही संभव है.

यह अजब विडम्बना है कि दूसरे के भ्रष्टाचार पर ऊँगली उठा कर कांग्रेस-भाजपा अपने को पाक साफ़ दर्शाना चाहते हैं. ललित मोदी, सुषमा, वसुंधरा और व्यापम जैसे घोटालों में घिरी हुई भाजपा इस स्टिंग को उक्त घपलों से उबरने का आधार बनाना चाहती है. उसी तरह कांग्रेस चाहती है कि भाजपा के दामन के दागों को दिखा कर लोगों को ध्यान अपने दागों से हटा दिया जाए. देश की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों की यह बेशर्मी, शर्मनाक है. ऐसा लगता है कि ये पार्टियाँ जनता की नहीं बल्कि भ्रष्टाचारियों के अपने-अपने गुटों की प्रतिनिधि हैं.

यह सही बात है कि इस पूरे स्टिंग में मुख्यमंत्री हरीश रावत का जिक्र भर है. वे इसमें कहीं नहीं हैं. लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात एक ऐसा अधिकारी जिसे वे विशेष तौर पर अपने साथ दिल्ली से राज्य में लाये हैं, वह मुख्यमंत्री सचिव पद पर तैनात होने का लाभ उठा कर शराब के कारोबारियों से सौदेबाजी की गोटियाँ बिठा रहा है. मुख्यमंत्री कार्यालय में ही तैनात एक गैरसरकारी व्यक्ति पर मोटा पैसा लेने के आरोप इस स्टिंग में शराब कारोबारी लगा रहे हैं. ऐसे में मुख्यमंत्री की जानकारी से यह कारनामा अंजाम दिया जा रहा हो, या उनकी बिना जानकारी के, दोनों ही स्थिति में हरीश रावत मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे रहने के लायक तो नहीं ठहरते हैं. अगर उनके जानते-बूझते यह सौदेबाजी हो रही थी तो हरीश रावत को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है. अगर उनकी नाक के नीचे, उनके चहेते कारिंदे, यह कारनामा अंजाम दे रहे थे और उन्हें भनक भी नहीं लगी, तब तो वे प्रशासन चलाने के लिए कतई उपयुक्त नहीं हैं.

जैसा की पहले कहा जा चुका है कि अशोक पाण्डेय नाम के जो महानुभाव इस स्टिंग को करवाने के सूत्रधार हैं, उनका अपना दामन भी बहुत पाक-साफ़ नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि सत्ता से गलबहियां करने में उन्हें कोई गुरेज रहा हो. उनके दावे के अनुसार वे साठ दिनों से यह स्टिंग कर रहे थे. लेकिन महीना भर पहले उनकी फेसबुक पर लगाई गयी तस्वीरों में वे हँसते-खिलखिलाते हरीश रावत के बगलगीर हुए देखे जा सकते हैं. जिस सत्ता के भ्रष्टाचार का आप खुलासा करने का अभियान चलाये हुए हैं, उसी के मुखिया के साथ आप बगलगीर हैं, यह सहज स्थिति तो नहीं है. तो जाहिर सी बात है कि मसला वही है जिसकी ओर शाहिद ने इशारा किया. यानि कि पाण्डेय साहब ठीक से ‘मैनेज” नहीं किये जा सके. लेकिन चाहे अपनी खुन्नस निकालने के लिए ही सही, यह स्टिंग सत्ता और उसके कारिंदों के दलाल चरित्र पर से कुछ-कुछ पर्दा उठाता तो है. इसलिए यदि यह स्टिंग असली है तो न केवल मोहम्मद शाहिद, बल्कि हरिपाल और अन्य दलाल जिनके नाम मोहम्मद शाहिद के मुंह से इस स्टिंग में सुने जा सकते हैं, जैसे ऋषभ अग्रवाल, नकुल चौधरी, राजीव त्यागी आदि-आदि के दलाली के गठजोड़ का भंडाफोड़ होना चाहिए. मुख्यमंत्री कार्यालय दलालों और दलाली के धंधे से मुक्त होना चाहिए और अपराधियों को सलाखों के पीछे होना चाहिए. इसके लिए एक व्यापक, समयबद्ध, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जरूरत है, जिसके दायरे में मुख्यमंत्री समेत पूरा मुख्यमंत्री कार्यालय होना चाहिए. स्टिंग इस लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं: https://www.youtube.com/watch?v=JWnmfCO9plg

उत्तराखंड के एक्टिविस्ट इंद्रेश मैखुरी के फेसबुक वॉल से.

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Comments on “स्टिंग के सूत्रधार अशोक पांडेय जब संपादक थे तो जमीनों पर इनकी भूखी निगाहों की चर्चाएं लगातार होती रहती थीं!

  • मैखुरी भाई अशोक पाण्डेय के बारे मे दुनिया जानती है. वो कितना बड़ा वाला आशाराम बापू रहा है, और आज भी है. जिस शहर मे रहा, वह अपनी एक नई गृहस्थी बसाई. शशि शेखर जी को समय रहते पता चल गया था, यही कारन था कि उन्होंने हिंदुस्तान से विदा कर दिया था. अमर उजाला मे पाले रहे. जब पोल खुली दलाली और रासलीलाओं कि तो देर हो चुकी थी. koi शहर नहीं छोड़ा. जमीन हो या जोरू, हर शहर मे किस्मत के धनी रहे, तुरंत मिली. तभी तो पत्रकारिता से अलग हटकर उन्नाव मे शानदार कॉलेज से लाखो कम रहे है. सब अखबार से कि gai दलाली ka paisa है.

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