सरवाइकल का दर्द खत्म होने पर यशवंत ने क्या पाठ पढ़ा, आप भी पढ़ें

Yashwant Singh : सरवाईकल का दर्द कुछ रोज से काबू हो गया। अपने आप। दर्द के दर्जन भर दिनों में आधा दर्जन शहरों, गांवों, कस्बों में घूमा। कहीं आराम न किया। इसलिए कुछ न दवा ने काम किया। इस दर्द में दवाएं काम करती भी नहीं, केवल मन बहलाती हैं। गर्दन सीधा रखो अभियान दबंगई से जारी रखा।

जिस शहर पहुंचा, वहां के डॉक्टर से बदन पर प्रयोग कराया। एक्यूप्रेशर, फिजियोथिरेपी, होमियोपैथी, सुरापैथी से लगायत एलोपैथी तक को एक एक कर आजमाता रहा, कुछ खिलंदड़ तरीके से, कि ये क्या ठीक कर पावेंगे, होना होगा तो हो जाएगा, बस प्रयास करते रहो, न जाने किस वेश में मिल जाएं भगवान!

हुआ भी यही!

दिल्ली लौटा तो दर्द अपना ग़म कम करता गया। महसूस हुआ गर्दन की हड्डियां घर वापसी कर रही हैं। पीड़ित नस से शिकंजा हटा रही हैं। सो, पूरे नस के परिक्षेत्र में कायम टभकन युक्त संघनित तनाव में आश्चर्यजनक कमी महसूस की गई। लगने लगा, पीड़ा के दिन गयो रे भइया!

इन दुख भरे दर्जन भर दिनों में दर्जनों सु&कु-विचार उमड़े घुमड़े। जो पहले से महसूस होता रहा है वो फिर शिद्दत से महसूस हुआ कि हम सब कठपुतलियां हैं। पहले तो ये डिफाइन ही नहीं है कि सुख दुख हैं क्या। अगर हैं तो वे अपन लोग के नियंत्रण के बाहर की चीज हैं। उनका आना जाना अनायास होता है। हमें बस दोनों के लिए तटस्थ भाव से माइंड मेकअप किए रहना चाहिए।

(दर्द के दरमियां एक फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट)

मैंने इस सरवाईकल परिघटना के बाद खुद को और ढीला छोड़ दिया है। अब एकदम्मे कुछ नहीं प्लान करना है। न ही कुछ करना है। जीवन बेमकसद होता है। हमारे अहंकार हमारी बेईमानियाँ हमारे सनक हमारी समझदारी इसमें मकसद भरते जाते हैं। मंजिल सबकी एक है। वक़्त भी सबके पास एक समान है। हर किसी का माइंडसेट तय करता है कि वह उस वक़्त का कैसा इस्तेमाल करता है, अतीत-भविष्य में एक्सपैंड करके (फैलते हुए नष्ट होने की ओर बढ़ते ब्रम्हांड की माफिक) या वर्तमान में कंडेन्स करके (उगने के लिए ब्वायलिंग पॉइन्ट पर खड़े गर्भस्थ / नवजात ब्रम्हांड की माफिक)।

वक़्त / टाइम दरअसल ब्रम्हांड जैसा लगता है मुझे। नेचर जैसा लगता है मुझे। टाइम को तत्काल में जीना सीखने के एक चरण में महसूस होता है कि समय ही ब्रम्हांड है या ब्रम्हांड ही समय है या समय ही नेचर है या नेचर ही समय है। पल भर के लिए खुद को भी इन तीनो के साथ साथ और समानांतर भी पाता हूँ। यानि हर कुछ एक दूसरे में है, और अलग भी है। यात्रा गति ठहराव सृजन विनाश गुण निर्गुण अंधकार प्रकाश सब साथ साथ चल रहे हैं। अपनी लिमिटेड सेंसेज के चलते हम सब बस महसूस केवल खुद के मनोभाव-संवेदनाओं को कर पाते हैं, इसलिए सब कुछ को बांट कर, खांचे में देख पाते हैं।

जिस वक्त ये समझ आने लगे कि ये मनोभाव-संवेदना तो खुद के हैं ही नहीं, इनसे क्या राग, तो दरअसल तब शुरू होता है टाइम / यूनिवर्स / नेचर के साथ साथ और समानांतर आपकी असल यात्रा! फिर कुछ न लगेगा अलग अलग। जो कुछ हैं वो एक दूसरे से उपजे, एक दूसरे से नियंत्रित और एक दूसरे में विलीन को तत्पर। ये एक दूसरे ही बस इतनी ज्यादा मात्रा में हैं और इतने ज्यादा रूपों में हैं कि हम असीम / इनफिनिट के भ्रमजाल में फंसकर हताश हो जाते हैं और अपनी अलग थलग यूनिक आइडेंटिटी के स्थायित्व के प्रति चिंतित आशंकित हो जाते हैं।

सरवाईकल के खात्मे से शुरू कहानी समय संसार के समझने-बुझने में उलझ गई लगती है, इसलिए ब्रेक लेते हैं। बस ये समझ लीजै कि पीड़ा से मिले ज्ञान ने दो काम कर दिए…

गर्दन का डिमोशन हुआ, तकिया की सुविधा खत्म कर।

लैपटॉप को तरक्की मिला, अतिरिक्त आसन प्रदान कर।

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवन्त की एफबी वॉल से.


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