‘देशद्रोह’ कानून अंग्रेजों ने बनाया और अपने यहां इंग्लैंड में खत्म भी कर दिया तो फिर भारत में क्यों?

जेपी सिंह

देशद्रोह कानून खत्म करने के कांग्रेसी वादे पर भाजपा आगबबूला

कांग्रेस ने मंगलवार को कहा कि अगर वह सत्ता में आती है कि भारतीय दंड संहिता की देशद्रोह को परिभाषित करने वाली धारा 124ए को खत्म करेगी, क्योंकि इसका दुरुपयोग किया गया है। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा है कि नागरिक स्वतंत्रता हमारे लोकतांत्रिक गणराज्य की पहचान है। कानूनों का उद्देश्य स्वतत्रंता को मजबूती देना होता है। कानून सिर्फ और सिर्फ हमारे मूल्यों को दर्शाने के लिए होने चाहिए। भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (देशद्रोह) का दुरुपयोग हुआ है और बाद में नए कानून बनाए जाने के बाद इसकी महत्ता भी खत्म हो गई है । इसलिए इसे अब खत्म किया जाएगा। इसके साथ ही इसपर राजनीति शुरू हो गयी है और इसका भाजपा ने भारी विरोध शुरू कर दिया है और कांग्रेस के घोषणा पत्र को देश तोड़नेवाला बताया है। दरअसल मोदीराज में जिस तरह उत्पीडक कानूनों और सरकारी एजेंसियों का दुरूपयोग हो रहा है उसे देखते हुये पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाने के उद्देश्य से कांग्रेस ने इन्हें अपने घोषणापत्र में शामिल किया है।

कांग्रेस ने यह भी वादा किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 499 को हटाकर मानहानि को दीवानी अपराध बनाया जाएगा। कांग्रेस ने यह भी कहा है कि हिरासत में पूछताछ के लिए थर्ड डिग्री के उपयोग को रोकने के लिए कानून बनाया जाएगा।कोई भी जांच एजेंसी जिसके पास तलाशी लेने, जब्त करने, संलग्न करने, पूछताछ करने और गिरफ्तार करने की शक्तियां है, वह सभी भारतीय दण्ड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम और भारतीय संविधान के अधीन होंगे। इसके लिए कांग्रेस कानूनों में आवश्यक संशोधन करेगी।अभी तक मोदीराज में राजनितिक विरोधियों को उत्पीडित करने के लिए इनका जमकर दुरूपयोग किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने दिया था केदारनाथ मामले का हवाला

उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2016 में एकं बार फिर स्पष्ट कर दिया था अगर कोई व्यक्ति सरकार की कड़ी आलोचना करता है तो उसपर देशद्रोह का मुकदमा तो दूर आपराधिक मानहानि का मामला भी नहीं बनता। पीठ ने सभी अथॉरिटी को केदार नाथ सिंह बनाम बिहार मामले में 1962 में संविधान पीठ द्वारा दी गई व्यवस्था का पालन करने के लिए कहा था । 1962 के केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य के मामले में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले में पहले ही स्पष्ट है। आदेश में कहा गया था कि देशद्रोही भाषणों और अभिव्‍यक्ति को सिर्फ तभी दंडित किया जा सकता है, जब उसकी वजह से किसी तरह की हिंसा, असंतोष या फिर सामाजिक असंतुष्टिकरण बढ़े।

देशद्रोह कानून के कुछ मामले

  • 1870 में बने इस कानून का इस्तेमाल ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी के खिलाफ वीकली जनरल में ‘यंग इंडिया’ नाम से आर्टिकल लिखे जाने की वजह से किया था। यह लेख ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लिखा गया था।
  • 2010 को बिनायक सेन पर नक्‍सल विचारधारा फैलाने का आरोप लगाते हुए उन पर इस केस के तहत केस दर्ज किया गया. बिनायक के अलावा नारायण सान्‍याल और कोलकाता के बिजनेसमैन पीयूष गुहा को भी देशद्रोह का दोषी पाया गया था। इन्‍हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, लेकिन बिनायक सेन को 16 अप्रैल 2011 को उच्चतम न्यायालय की ओर से जमानत मिल गई थी।
  • 2012 में तमिलनाडु सरकार ने कुडनकुलम परमाणु प्‍लांट का विरोध करने वाले 7 हजार ग्रामीणों पर देशद्रोह की धाराएं लगाई थीं।
  • 2015 में गुजरात में पाटीदारों के लिए आरक्षण की मांग करने वाले हार्दिक पटेल को गुजरात पुलिस ने देशद्रोह के मामले तहत गिरफ्तार किया गया था। जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को भी देशद्रोह के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। जेएनयू में दो साल पहले हुई कथित नारेबाजी के मामले में दिल्ली पुलिस ने हाल में कन्हैया कुमार और अन्य के खिलाफ चार्जशीट दायर की है, जिसमें धारा 124ए भी लगाई गई है हालाँकि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने चार्जशीट को अभी मंजूरी नहीं दी है।
  • बेंगलुरु पुलिस ने हाल में एबीवीपी की शिकायत पर एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के खिलाफ देशद्रोह के आरोप दर्ज किए थे।संगठन ने जम्मू कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन और न्याय नहीं मिलने के आरोपों पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया था।

समाजशास्त्री आशीष नंदी ने गुजरात दंगों पर गुजरात सरकार की आलोचना करते एक लेख के लिए तत्कालीन राज्य सरकार ने 2008 में नंदी के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया था।इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने इस पर सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए उसके इस फैसले को हास्यास्पद बताया था। छत्तीसगढ़ में सामाजिक कार्यकर्ता बिनायक सेन और इलाहाबाद में पत्रकार सीमा आजाद के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। 2012 में हरियाणा के हिसार में कुछ दलितों पर भी देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया था। उनका कसूर यह था कि वे दबंगों के जुल्म की शिकायत करते हुए डीएम दफ्तर के बाहर धरने पर बैठे थे। 22 दिन के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्होंने मुख्यमंत्री का पुतला जलाया था। इसके बाद उन पर 124ए लगा दी गई।

दरअसल कामन कॉज की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने इस मामले को वर्ष 2016 में उच्चतम न्यायालय में उठाया था। उन्‍होंने कोर्ट में कहा था कि राजद्रोह एक गंभीर अपराध है और असहमति को दबाने के लिए इससे संबंधित कानून का काफी दुरुपयोग किया जा रहा है। उन्होंने इस संबंध में कुछ उदाहरण दिये, जिनमें कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारियों, कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी और कुछ अन्य लोगों पर राजद्रोह के मामले शामिल थे।इस पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र की अगुवायी वाली पीठ ने ने कहा था कि हमें राजद्रोह कानून की व्याख्या नहीं करनी। 1962 के केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य के मामले में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले में पहले ही यह स्पष्ट है। इसी के साथ कोर्ट ने गैर सरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ की याचिका का निस्तारण कर दिया था।

दुरुपयोग की आशंका

दरअसल देशद्रोह की परिभाषा काफी व्यापक है और इस कारण इसके दुरुपयोग की आशंका लगातार बनी रहती है। इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सीआरपीसी की धारा-196 में प्रावधान किया गया कि देशद्रोह से संबंधित दर्ज मामले में पुलिस को चार्जशीट के वक्त मुकदमा चलाने के लिए केंद्र अथवा राज्य सरकार से संबंधित प्राधिकरण से मंजूरी लेना जरूरी है। लेकिन यदि सम्बन्धित सरकार के ही इशारे पर किसी पर देशद्रोह का मुकदमा कायम हो तो सरकार को मंजूरी देने में देर नहीं होगी। सवाल यह भी है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करने वाले देश में ‘देशद्रोह’ जैसे शब्द को जगह क्यों मिलनी चाहिए? इस तर्क में इसलिए भी दम है कि इस धारा को बनाने वाले देश इंग्लैंड में भी इसे खत्म किया जा चुका है।

क्‍या है देशद्रोह कानून?

इंडियन पीनल कोड के सेक्शन 124ए के तहत लिखित या मौखिक शब्दों, चिन्हों, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर नफरत फैलाने या असंतोष जाहिर करने पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया जा सकता है। 124ए के तहत केस दर्ज होने पर दोषी को तीन साल से उम्रकैद की सजा हो सकती है। पहली बार देश में 1860 में देशद्रोह कानून बना और फिर 1870 में इसे आईपीसी में शामिल कर दिया गया। अंग्रेजों ने उनकी हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाले भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को जेल में डालने के लिए यह देशद्रोह का कानून बनाया था।

लेखक जेपी सिंह इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं.

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One comment on “‘देशद्रोह’ कानून अंग्रेजों ने बनाया और अपने यहां इंग्लैंड में खत्म भी कर दिया तो फिर भारत में क्यों?”

  • केशव पंडित says:

    इस धरा को हटाना देश हित में नहीं है बल्कि कुछ चीजें अंग्रेजों की हटनी चाहिए देश द्रोह का मुकदमा अफजल गुरु पर चला तभी फंसी दी गयी थी मतलब कल को पाकिस्तान का झंडा लहराना देश द्रोह है पाकिस्तान जिंदाबाद बोलना देशद्रोह है हिंदुस्तान मुर्दाबाद बोलना देशद्रोह है पत्थरबाजी भी देशद्रोह है देश से जुडु हुयी तमाम वो चीजें जो नहीं होनी चाहिए देश द्रोह हैं अगर धरा हट गयी तो काया लगाओगे इन देशद्रोहियों पर बम्बू | अल्लाहु अकबर गैंग टुकड़े टुकड़े गैंग जैसे तमाम देशी विदेशी अत्न्क्बदी संगठनों के भाग्य खुल जायेंगे | हम सत्ता परिवर्तन चाहते हैं लेकिन इस कीमत पर नहीं | रही बात इंग्लैण्ड की तो उससे हमारा कोई लेना देना नहीं कई देशो में तलक बैन फिर भी काफी लोगों ने समर्थन नहीं दिया छोडो अब जनता जाग चुकी है २३ मई कांग्रेस गयी

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