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सुख-दुख

क्या ब्रह्मांड प्रकाश से भी तेज फैल रहा है?


विजय सिंह ठकुराय-

क्या ब्रह्माण्ड का कोई आरंभ बिंदु था, अथवा ब्रह्माण्ड हमेशा से ही अस्तित्व में रहा है – यह एक ऐसा प्रश्न है जिसने कई सहस्त्राब्दियों से मानवों की दिमागी क्षमता का कड़ी परीक्षा ली है।
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अगर ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ था, तो जन्म से पूर्व संसार में क्या था, सिवाय शून्य के? और अगर आप प्राचीन ग्रीकों की तरह शून्य से भयभीत होते हैं तो आप आपको मानना पडेगा कि ब्रह्माण्ड की प्राचीनता समय की धारा में अनंत है।


वैसे तो “शून्य और अनंत” दोनों ही विचार किसी भी वैज्ञानिक या दार्शनिक के लिए बुरे स्वप्न के समान हैं पर अगर सिर्फ चुनने की बात की जाए तो जहाँ पूर्व के विद्वानों ने शून्य से संसार की उत्पत्ति मानी, तो वहीं ग्रीक विद्वान पायथागोरस ने शून्य को दरकिनार कर संसार को शाश्वत और अपरिवर्तनीय माना।

और पायथागोरस की यह वैचारिक परंपरा अरस्तू, प्लेटो, टोलेमी से होते हुए यूरोप भर में अपना ली गयी और अगले दो हजार साल बीतने तक, यहाँ तक कि अल्बर्ट आइन्स्टीन जैसे आधुनिक वैज्ञानिक तक एक अपरिवर्तनीय और स्थिर ब्रह्माण्ड में अपनी आस्था का निवेश करते रहे।
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और करें भी तो क्यों नहीं करें? आप आज किसी सितारे को आसमान में देखिये, फिर 6 महीने बाद उसी तारे को वापस देखिये। इस दौरान पृथ्वी के गमन के कारण आप स्पेस में अपनी 6 महीने वाली पूर्वस्थिति से लगभग 30 करोड़ दूर मौजूद हैं। पर फिर भी, आपको किसी भी तय समय पर सितारे की पूर्वस्थिति में कोई अंतर प्रतीत नहीं होगा। इससे सहज बुद्धि को तो यही प्रतीत होता है कि सितारे अपनी जगह फिक्स हैं। पूर्व में हुए बहुतेरे मनुष्यों को यह गुमान तो स्वप्न में भी न आता था कि सितारे इसलिए भी स्थिर प्रतीत हो सकते हैं क्यूंकि ब्रह्माण्ड इंसानी बुद्धि की कल्पनाओं से भी कहीं अधिक विशाल हो सकता है।
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सितारों की तुलनात्मक प्रदीप्ति का अध्ययन कर एडविन हब्बल ने 1929 में यह सुनिश्चित कर दिया था कि ब्रह्माण्ड न केवल महाविशाल है, अपितु इसका निरंतर प्रसार हो रहा है? प्रसार का अर्थ – ब्रह्माण्ड निरंतर गुब्बारे की तरह फूल रहा है, और ब्रह्माण्ड में दो बिन्दुओं के बीच दूरी निरंतर बढती जा रही है। ऐसा क्यों हो रहा है, हमें नहीं पता इसलिए हमनें इस रहस्य की उत्तरदायी चीज को एक बेहद फैंसी नाम दे दिया है – डार्क एनर्जी !!!
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ब्रह्माण्ड के प्रसार को सीधे शब्दों में व्यक्त करूँ तो इसका अर्थ यह है कि हर दस लाख प्रकाशवर्ष के भीतर प्रति सेकंड ब्रह्माण्ड का लगभग 21 से 22 किमी का विस्तार हो जाता है, या यूँ कहें कि – नया स्पेस क्रिएट हो जाता है। यह प्रसार ब्रह्माण्ड में हर जगह, यहाँ तक आकाशगंगा, सौरमंडल बल्कि आपके शरीर के भीतर भी हो रहा है। पर जहाँ-जहाँ पदार्थ की अधिकता है, वहां ग्रेविटी का प्रभाव डार्क एनर्जी के विरुद्ध कार्य कर उसे कैंसिल कर देता है। इसलिए ब्रह्माण्ड का प्रसार मुख्यतः आकाशगंगाओं के मध्य मौजूद पदार्थ-रहित खाली स्थानों में ज्यादा प्रभावी है।
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अब ज्ञात ब्रह्माण्ड यानी किसी भी दिशा में दिखने वाले 47 अरब प्रकाशवर्ष के संज्ञान में लेकर कहा जा सकता है कि एक सेकंड में सम्पूर्ण ज्ञात ब्रह्माण्ड पहले से लगभग 21 लाख किलोमीटर बड़ा हो जाता है। तो क्या ब्रह्माण्ड के फैलने की रफ़्तार प्रकाश से भी तेज है?
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है तो, पर इससे ब्रह्माण्ड के किसी नियम का अतिक्रमण नहीं होता क्योंकि प्रकाश का नियम बेसिकली यह कहता है कि – ब्रह्माण्ड में कोई भी सूचना एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने के लिए एक सेकंड में 299792458 मीटर से ज्यादा दूरी तय नहीं कर सकती। और जो ब्रह्माण्ड का प्रसार हो रहा है, उसमें सूचना इधर से उधर थोड़े ही जा रही है। ये तो बस कुछ ऐसा है कि मानों कोई ब्रह्माण्डरुपी गुब्बारे में हवा भर रहा है और इसका आकार निरंतर हर पॉइंट पर बड़ा होता जा रहा है, पर फिर भी कोई भी ऐसे दो पॉइंट्स अपने नजदीकी पॉइंट्स से प्रकाश की गति से तेज दूर नहीं भाग रहे हैं।
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अगर भविष्य में कभी डार्क एनर्जी अपना व्यवहार बदल देती है तो एक समय बाद ब्रह्मांड वापस सिकुड़ना शुरू देगा, और सिकुड़ते-सिकुड़ते अंततः एक बार फिर ब्रह्मांड का समस्त पदार्थ एक स्थान पर इकट्ठा होकर एक नये बिगबैंग को जन्म दे देगा।
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और अगर डार्क एनर्जी का व्यवहार नहीं बदला तो ब्रह्मांड का आकार तब तक बढ़ता रहेगा, जब तक कि संसार का प्रत्येक कण खंड-खंड हो कर ब्रह्मांड गुब्बारे की तरह फट न जाये।
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और अभी तक जो डेटा प्राप्त है, उसके आधार पर यह लगभग तय है कि – गुब्बारे का फटना ही अनिवार्य है।
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डार्क एनर्जी ब्रह्मांड का प्रसार आखिर कैसे करती है? इसका तकनीकी उत्तर इंटरनेट पर बहुत स्पष्टता से मौजूद नहीं है। मैं इस भ्रम निवारण हेतु स्पष्टता से कहना चाहता हूँ कि डार्क एनर्जी नया स्पेस क्रिएट करती है। अर्थात ब्रह्मांड के मूल ढांचे यानी “स्पेसटाइम” में निहित वैक्यूम एनर्जी ही डार्क एनर्जी है।

ब्रह्मांड का केंद्र कहीं नहीं है पर चूंकि चारों तरफ का ब्रह्मांड समान रूप से प्रसारित हो रहा है इसलिए किसी भी बिंदु को सापेक्षिक रूप से ब्रह्मांड का केंद्र माना जा सकता है।

ब्रह्माण्ड नहीं था, तो फिर क्या रहा होगा ? जवाब है- Void – शून्य – अभाव!

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