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गंगोत्री और केदारनाथ की यात्रा : एक संस्मरण

रासबिहारी पाण्डेय

बहुत दिनों से उत्तराखंड भ्रमण की इच्छा थी। वैसे तो उत्तराखंड को देवभूमि कहा गया है। यहाँ बहुतेरे तीर्थस्थल और ऐतिहासिक महत्त्व के दर्शनीय स्थल हैं लेकिन उन सबमें यमुनोत्री, गंगोत्री,  केदारनाथ और बदरीनाथ प्रमुख हैं। अक्सर ये यात्राएं लोग समूह में करते हैं, बसों से या छोटी गाड़ियाँ रिजर्व करके। ये बस और छोटी गाड़ियों वाले ड्राइवर यात्रियों को एक निश्चित समय देते हैं जिसके भीतर यात्रियों को लौटकर एक निश्चित स्थान पर आना होता है। मेरे एक मित्र ने बताया कि निश्चित समय होने की वजह से कभी कभी कई लोग बिना दर्शन लाभ लिए बीच रास्ते से ही लौटकर उक्त स्थान पर चले आते हैं ताकि अगली यात्रा के लिए प्रस्थान कर सकें।

गंगोत्री के रास्ते में भटवारी के पास 4 जून को एक जीप नदी में गिरी थी जिसमें अब तक मात्र दो लोगों की लाशें बरामद हुई थीं, बाकी लोगों और जीप का कोई पता ही नहीं चला। इन पहाड़ी रास्तों पर ऐसी घटनाएँ आम हैं। खैर शिव शिव करते हुए रुद्रप्रयाग आ पहुँचा। यहाँ भी 60रुपए थाली वाला खाना मिला। पूरे उत्तराखंड में थाली वाले खाने का लगभग यही रेट है। यहाँ से गुप्तकाशी की जीप में बैठा। गुप्तकाशी तक का किराया 80 रुपए था। एक घंटे चलने के बाद एक स्थान पर जीप रोककर ड्राइवर कहीं गया तो स्थानीय सवारियों ने कहा-इन ड्राइवरों की यही आदत खराब है। दिन में भी दारू पीते हैं, इसीलिए एक्सीडेंट होते हैं। यात्रा के दौरान सभी ड्राइवरों को मैंने यत्र तत्र गाड़ी रोककर मद्यपान करते हुए देखा। गंगोत्री जाते समय भी ड्राइवर ने एक स्थान पर मदिरापान किया था। खैर प्रशासन द्वारा कोई चुस्ती नहीं है, वर्ना ऐसा न होता।

दो घंटे बाद हम गुप्तकाशी में थे। वहाँ सोनप्रयाग के लिए एक बस खड़ी मिली। अब हल्की बूँदाबाँदी होने लगी थी। अब तक पहाड़ पर चलती हुई बसों में बस्तियाँ बिल्कुल नहीं दिखती थीं लेकिन गुप्तकाशी से सोनप्रयाग तक पहाड़ पर कई कस्बे नजर आए। कई कंपनियों के हेलीपैड दिखे। साथ ही खड़े और आते जाते हेलीकॉप्टर भी दिखे। सोनप्रयाग के बाद यात्री बसों और जीपों की सीमा समाप्त हो जाती है। यहाँ एक चेकपोस्ट बना हुआ है। यहीं पर आनेवाले यात्रियों का बायोमेट्रिक कार्ड बनता है जिसके लिए पहचान पत्र जरूरी है। आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटिंग कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस में से कुछ भी रहे तो यह कार्ड बन जाता है। मैं पौने छह बजे यहाँ पहुँच गया था। छह बजे कार्ड वाली खिड़की बंद होने का समय था। पाँच-छह लोग लाइन में थे। मैं भी खड़ा हो गया। कार्ड बन गया। इस तरह मैं सुबह लाइन में लगने से मुक्त हुआ। सोनप्रयाग बहुत छोटी सी बस्ती है। 2013 में आई आपदा के बाद यहाँ दुबारा बस्ती बसी है।

यहाँ रुकने के लिए मैं होटल खोज रहा था, तभी एक संत मिले। बोले-यहाँ से पुल पार करके गौरीकुंड चले जाइए, यात्रा वहीं से शुरू करनी है। यहाँ रूक करके आप सबेरे एक घंटे पीछे हो जाएंगे।  होटलों का जो भाव यहाँ है, वहाँ भी वही है। 6 जून के बाद सीजन ऑफ हो जाता है। बच्चों की छुट्टियाँ मई में होती हैं, अधिकांश लोग मई में ही आते हैं। इसलिए उस समय सस्ते होटल भी महँगे हो जाते हैँ। मुझे उनकी बात सही लगी। मैंने चेकपोस्ट के बाद पड़नेवाला पुल पार किया। यहाँ ड्राइवर जीप की सीट भरने का इंतजार कर रहा था। एक सज्जन ड्राइवर से पूछने लगे कि 2013 की आपदा के समय के बाद यहाँ क्या बदलाव हुआ। ड्राइवर ने अपने मोबाइल से चित्र दिखाते हुए कहा- पहले ऐसा था, अब ऐसा है। यह पुल दो बार बना, ढ़ह गया। अबकी अमरीकी इंजीनियरों ने बनाया तो टिका हुआ है। वहाँ से 4 किलोमीटर दूर गौरीकुंड पहुँचने का किराया 20 रुपए था। गौरीकुंड बहुत छोटी सी जगह है। आपदा के बाद यहाँ नये निर्माण के लिए कोई अनुमति नहीं है। फिर भी कुछ नव निर्माण हुआ है।

यहाँ तीन सौ रुपए में एक कमरा मिल गया। सीढ़ियों से नीचे उतरकर मैं गौरी मंदिर के पास पहुँचा। लोगों ने बताया –यहीं माँ गौरी ने भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिए तप किया था, इसलिए इस स्थान का नाम गौरीकुंड पड़ा। गौरीकुंड स्थित गर्म पानी का कुंड तो आपदा में बर्बाद हो गया लेकिन प्रशासन ने एक पाइप लगाकर उस स्रोत को चलायमान रखा है जिससे गर्म पानी आता रहता है। मैं सुबह के चार बजे होटल का मग और बाल्टी लेकर वहाँ पहुँचा और इतमीनान से स्नान किया। सुबह काफी ठंड थी लेकिन इस पानी से स्नान कर जिस आनंद की अनुभूति हुई, वह जीवन में पहले कभी नहीं हुई थी। होटल में आकर तैयार हुआ और एक प्लास्टिक बैग में छाता, जैकेट, टोपी, नमकीन-बिस्किट और पानी का बोटल लेकर 18 किलोमीटर की केदारनाथ पहाड़ की चढ़ाई के लिए निकल पड़ा। अपना पिठ्टू बैग जिसमें दो तीन कपड़े और कुछ अन्य जरूरी सामान थे, लॉकर में जमा करा दिया। बाहर निकलकर मैंने बीस रुपए में एक बाँस की छड़ी और बीस रुपये में ही मिलनेवाला एक पतले प्लास्टिक का बरसाती खरीदा जो चढ़ाई में मेरा हमसफर बनने वाले थे।

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3 Comments

3 Comments

  1. Kashinath Matale

    August 6, 2017 at 12:01 pm

    रासबिहारी पाण्डेय
    bahot hi rochak aur romanchak yatra varnan hai.
    Safal Yatra ke liye Badhai.

  2. Kashinath Matale

    August 10, 2017 at 2:20 pm

    2016 ke February me hamare group ke 72 log Katara/ Maa Vaishnov Devi ke darshanarth gaye the.
    Dusre din hum log Shiv Khodi gupha (Katara se kariban 95 k.m. ) dekhne gaye the, vahapar bhi Pandav ke Swarg me jane ka rasta hai aisa bataya gaya tha. Aur Vahase Amarnath ke liye bhi rasta hai, parntu abhi bandh kiya hai aisi bhi jankari vahake pandit/pujari jee ne batai thi.

  3. श्याम सिंह रावत

    August 6, 2017 at 3:24 pm

    इस लेखमाला में यत्र-तत्र ‘गंगोत्तरी’ को ‘गंगोत्री’, ‘यमुनोत्तरी’ को ‘यमनोत्री’ और ‘बदरीनाथ’ को ‘बद्रीनाथ’ लिखा गया है। कहीं-कहीं ‘बदरीनाथ’ को सही भी लिखा गया है।

    ‘गंगोत्तरी’ का आशय है जहाँ गंगा अवतरित हुई, जबकि ‘गंगोत्री’ में ‘त्री’ तीन की संख्या को प्रदर्शित करता है। जिसकी यहाँ कोई प्रासंगिकता नहीं है।

    ‘बदरी’ बेर को कहा जाता है। किंवदंती के अनुसार यहाँ एक बदरी-वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती को शिशु रूप में दर्शन दिये थे। इसीसे इस स्थान का नाम ‘बदरीनाथ धाम’ पड़ गया।

    इसके अतिरिक्त एक और बात यह है कि पांडव केदारनाथ के रास्ते स्वर्ग नहीं गए थे। उन्होंने बदरीनाथ धाम से आगे माणा, वसुधारा होते हुए स्वर्ग जाने वाला यात्रापथ चुना था। जिसका अंतिम प्रस्थान बिंदु स्वर्गारोहणी आज भी वहाँ विद्यमान है। हालांकि विगत अनेक दशकों से वहाँ तक जाने की अनुमति किसी को नहीं दी जाती।

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