गंगोत्री और केदारनाथ की यात्रा : एक संस्मरण

पतंजलि योगपीठ फेज-2 के पास उतरकर संस्थान में प्रवेश किया तो बड़ा ही सुरम्य वातावरण था। यहाँ आयुर्वेद पद्धति से रोगों का उपचार होता है और आचार्य बालकृष्ण की देखरेख में संस्थान संचालित होता है। यहाँ से पाँच मिनट की दूरी पर सड़क की दूसरी ओर पतंजलि योगपीठ फेज-1और पतंजलि रिसर्च सेंटर स्थापित है। कई एकड़ में फैले ये दोनों संस्थान अद्भुत और दर्शनीय हैं लेकिन यहाँ आम आदमी को जाने की अनुमति नहीं है। सिर्फ फेज-2 में ही बाबा रामदेव की विभूतियों और ऐश्वर्य के दर्शन हो सकते हैं। यहाँ कार्यरत कर्मचारियों से बातचीत करने पर पता चला कि बाबा रामदेव फेज-1 में रहते हैं और वहीं यदा कदा योग शिविर लगता है। अब तो उनका अधिकांश योग शिविर बाहर ही लगा करता है। फेज-2 मे पहले माले तक गाड़ियाँ जाती हैं।

उस दिन आचार्य बालकृष्ण से मिलने कोई नेता जी आए हुए थे जिनके साथ दो तीन बंदूकधारी भी थे। सफेद कुर्ता और लुंगी पहने आचार्य उन्हें गाड़ी तक छोड़ने आए तो वहाँ रखवाली कर रहे गार्डों में पाँव छूने की होड़ मच गई। परिसर में कई ऋषियों की शांत मुद्रा में मूर्तियाँ लगी हुई हैं। चक्राकार फव्वारे और उनके आस पास लगे पेड़ पौधे आँखों को बहुत सुकून दे रहे थे,  सूर्यास्त होने के बाद बिजली की चमक में ये नजारे और भी खूबसूरत लग रहे थे।  चूँकि मुझे अलसुबह गंगोत्री की यात्रा पर निकलना था इसलिए वहाँ से जल्द प्रस्थान करना उचित लगा।

मैं 10 जून की सुबह हरिद्वार बस डिपो से गंगोत्री जानेवाली बस में बैठ गया। गंगोत्री का किराया 478 रुपए था। बस में इतनी लंबी यात्रा के लिए मैं पहली बार बैठ रहा था। बस ऋषिकेश तक मैदानी भाग में थी लेकिन ऋषिकेश के बाद पहाड़ों पर चढ़ने लगी। खिड़की से बाहर देखने पर चारों तरफ पहाड़ ही पहाड़ दिख रहे थे। बस पहाड़ पर सीधे चढ़ती ही जा रही थी। पहाड़ के शिखर तक चढ़ने के बाद बस दूसरी तरफ उतरनी शुरू हुई। देर तक उतरती रही फिर दूसरे पहाड़ पर चढ़ने लगी….इस तरह कई पहाड़ों पर चढ़ते उतरते दो बजे के आसपास उत्तरकाशी पहुँची। यहाँ यात्रियों के भोजन के लिए आधे घंटे रुकी।

साठ रुपए थाली में चार रोटी, हाफ प्लेट चावल और सब्जी। खाने का स्वाद अच्छा था। लौटकर बस में आया तो क्या देखता हूँ कि एक महिला अपनी दो बेटियों के साथ मेरी सीट पर कब्जा जमाए हुए हैं और बस में ढ़ेर सारे यात्री औने पौने होकर खड़े हैं। जब मैंने कहा कि यह मेरी सीट है तो चुप, कुछ बोल ही नहीं रही हैं …..मैंने पूछा कि मेरा जैकेट किधर है तो भी कुछ नहीं बोल रही हैं, दो तीन बार पूछने पर बोलीं –मुझे क्या पता….पीछे से एक आदमी ने दिखाया- यह तो नहीं है? मैंने कहा- हाँ यही है। मैंने कंडक्टर को बुलाकर कहा कि हरिद्वार से मैं इस सीट पर आ रहा हूँ,  आपने इन्हें यह सीट कैसे दे दी …तो उसने कहा- मैंने तो इनसे साफ कहा कि सीट नहीं है, खड़े होकर चलना हो तो चलिए लेकिन ये मैडम मानी नहीं और आपकी सीट पर आकर बैठ गईं। इन्हें बैठने दीजिए…आप खड़े हो जाइए- कंडक्टर ने कहा लेकिन वह महिला टस से मस नहीं हुईं  ….वह मेरे साथ दो और यात्रियों का जगह घेरे हुए थीं…वे दोनों यात्री भी बेचारा बनकर बगल में खड़े थे। मैंने कंडक्टर से कहा-मेरा पैसा वापस करिए, मैं दूसरी बस से जाऊँगा….कंडक्टर ने जब फिर महिला से ऊँचे स्वर में कहा कि इन्हें बैठने दीजिए तो महिला ने एक बेटी को गोद में बिठाकर एक सीट खाली कर दी। मैं किसी तरह स्थापित हुआ। मन खिन्न हो गया लेकिन क्या करता…थोड़ी देर बाद समझ में आया कि यह दक्षिण भारतीय महिला हैं और इनके साथ दो पुरुष भी हैं।

उत्तरकाशी से सड़क की बनावट दूसरे तरह की थी। दोनों तरफ पहाड़…बीच में कई सौ फीट नीचे गंगा और  गंगा के समानांतर बनी हुई सड़क….कहीं बहुत ऊपर, कहीं थोड़ा पास पास। बस तेजी से इतने झटके और मोड़ लेते हुए जा रही थी कि आगे की सीट को पकड़कर सहारा न लिया जाय तो इधर उधर चोट लग जाय या व्यक्ति अपनी सीट से गिर पड़े। इस रस्ते पर हर दो मिनट बाद या उससे भी पहले अंधे मोड़ हैं, इसलिए ड्राइवर बहुत सावधानी से हार्न बजाते हुए वाहन चलाते हैं। इतनी सावधानी के बावजूद कई जगह बस सामने से आ रहे दूसरे वाहनों के आसपास इमरजेंसी ब्रेक लगाकर रुकी। इससे आप इस यात्रा के रोमांच को समझ सकते हैं। सुबह साढ़े छह बजे हरिद्वार से चली बस शाम को साढ़े छह बजे गंगोत्री पहुँची ….यानी पूरे बारह घंटे लगे इस यात्रा में।

बस से उतरकर मैंने पता किया कि सुबह यहाँ से केदारनाथ के लिए कोई बस है या नहीं। मालूम हुआ कि यहाँ से कोई सीधी बस नहीं जाती। उत्तरकाशी से पहले श्रीनगर जाना होगा, वहाँ से दूसरी बसें बदलकर सोनप्रयाग तक पहुँचना होगा जो केदारनाथ यात्रा का अंतिम पड़ाव है। उत्तरकाशी से सुबह दो बसें हैं, एक छह बजे और दूसरी साढ़े आठ बजे… लेकिन दोनों बसें गंगोत्री से उत्तरकाशी तक पहुँचने से पहले छूट जाएंगी क्योंकि गंगोत्री से वहाँ पहुँचने में कम से कम चार घंटे लगते हैं और सुबह छह बजे से पहले वहाँ के लिए कोई बस नहीं है …यानी किसी भी सूरत में दूसरे दिन उत्तरकाशी में रुकना होगा। यह जानकारी प्राप्त करने के बाद मैं सीधा गंगा मंदिर की ओर बढ़ने लगा। बीच मे कई लोग पीछे पीछे लगे…..रूम चाहिए क्या ….चलो देख लो…नहीं कहते हुए मैं आगे बढ़ता रहा और गंगा मंदिर परिसर में जाकर ही रुका। मंदिर थोड़ी ऊँचाई पर है…नीचे बहुत वेग से गंगा जी बह रही हैं।

मैं सीढ़ियों से नीचे उतरकर गंगा जी तक पहुँचा। हाथ में गंगाजल लेकर माथे से स्पर्श किया और दो घूँट पिया भी। मोबाइल निकालकर देखा तो किसी भी सिम  का नेटवर्क नहीं। मेरे पास टाटा के दो, एक जिओ और एक एयरसेल कंपनी का सिम था लेकिन अफसोस किसी में नेटवर्क नहीं था। लोगों से पता चला कि यहाँ सिर्फ बीएसएनएल का सही नेटवर्क है। एक दो और कंपनियों का है मगर उतना अच्छा नहीं। ऊपर माइक से घोषणा हो रही थी- आठ बजे गंगा जी की आरती होगी। श्रद्धालुओं से निवेदन है कि जूते चप्पल उतारकर मंदिर परिसर में पंक्तिबद्ध हो जाएँ ताकि दर्शन में किसी को असुविधा न हो। आरती के समय तक काफी भीड़ हो गई। आधे घंटे तक आरती चली और लगभग एक घंटे तक यात्रियों ने पंक्तिबद्ध होकर मंदिर में गंगा जी की मूर्ति के दर्शन किए। करीब साढ़े नौ बजने लगे तो मुझे महसूस हुआ कि अब रात्रि विश्राम के लिए जगह देखनी चाहिए।

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Comments on “गंगोत्री और केदारनाथ की यात्रा : एक संस्मरण

  • Kashinath Matale says:

    रासबिहारी पाण्डेय
    bahot hi rochak aur romanchak yatra varnan hai.
    Safal Yatra ke liye Badhai.

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  • Kashinath Matale says:

    2016 ke February me hamare group ke 72 log Katara/ Maa Vaishnov Devi ke darshanarth gaye the.
    Dusre din hum log Shiv Khodi gupha (Katara se kariban 95 k.m. ) dekhne gaye the, vahapar bhi Pandav ke Swarg me jane ka rasta hai aisa bataya gaya tha. Aur Vahase Amarnath ke liye bhi rasta hai, parntu abhi bandh kiya hai aisi bhi jankari vahake pandit/pujari jee ne batai thi.

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  • श्याम सिंह रावत says:

    इस लेखमाला में यत्र-तत्र ‘गंगोत्तरी’ को ‘गंगोत्री’, ‘यमुनोत्तरी’ को ‘यमनोत्री’ और ‘बदरीनाथ’ को ‘बद्रीनाथ’ लिखा गया है। कहीं-कहीं ‘बदरीनाथ’ को सही भी लिखा गया है।

    ‘गंगोत्तरी’ का आशय है जहाँ गंगा अवतरित हुई, जबकि ‘गंगोत्री’ में ‘त्री’ तीन की संख्या को प्रदर्शित करता है। जिसकी यहाँ कोई प्रासंगिकता नहीं है।

    ‘बदरी’ बेर को कहा जाता है। किंवदंती के अनुसार यहाँ एक बदरी-वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती को शिशु रूप में दर्शन दिये थे। इसीसे इस स्थान का नाम ‘बदरीनाथ धाम’ पड़ गया।

    इसके अतिरिक्त एक और बात यह है कि पांडव केदारनाथ के रास्ते स्वर्ग नहीं गए थे। उन्होंने बदरीनाथ धाम से आगे माणा, वसुधारा होते हुए स्वर्ग जाने वाला यात्रापथ चुना था। जिसका अंतिम प्रस्थान बिंदु स्वर्गारोहणी आज भी वहाँ विद्यमान है। हालांकि विगत अनेक दशकों से वहाँ तक जाने की अनुमति किसी को नहीं दी जाती।

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