बाकी की तो छोड़िए, आईएएस वरूण ने बेटी को गोली मारी थी, गणेश ने उसकी बेटी परोसी थी!

लखनऊ: आप सरकारी अफसर-मुलाजिम हैं ना। फिर ठीक है। आइये, अब मैं ताल ठोंक कर दावा करता हूं कि आप में से काफी लोग अपनी बेटी-बहन के प्रति या तो इतना अत्‍याचार करते हैं, कि उनकी नृशंस हत्‍या तक कर सकते हैं, उसके साथ अमानवीयता की पराकाष्‍ठा तक पहुंच जाते हैं। और तो हमारे इसी समुदाय के कुछ लोग तो अपनी भूख शान्‍त करने के लिए उस लड़की के पास पहुंच जाते हैं जो खुद अपनी ही बेटी होती है। उनमें से कुछ लोग उस वक्‍त क्‍या करते होंगे, यह तो मैं नहीं बता सकता, लेकिन कुछ लोगों के बारे में तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वे अपनी ऐसी कमीनगी का ठीकरा अपनी ही ऐसी बहन-बेटी की हत्‍या के तौर पर फोड़ते हैं। मकसद यह कि हम पाक-साफ हैं और हमेशा रहेंगे।

आज मेरी बिटिया की बरसी है। वही मेरी बिटिया जिसे एक साल पहले आज के ही दिन कुछ वहशियों ने पूरी नृशंसता के साथ मार डाला था और उसकी नंगी लाश पुलिस की करतूतों के चलते सोशल साइट्स पर वायरल हो गयी थी। वही बिटिया, जिसके असली हत्‍यारों को बचाने के लिए सरकार और आला अफसरों ने हरचन्‍द कोशिशें कीं। वही बिटिया, जिसकी हत्‍या की जांच के नाम पर माखौल उड़ाते हुए पुलिस की महानिदेशक सुतापा सान्‍याल ने पूरी जान लगा दी, और असली हत्‍यारों को छुट्टा छोड़ते हुए एक निरीह गार्ड को फंसा कर उसे जेल भेज दिया था। दूसरे क्‍या करेंगे, मैं नहीं जानना चाहता, लेकिन मैं आज जा रहा हूं उस बालसिंह खेड़ा के इस स्‍कूल, जहां उस मेरी बिटिया को नरभक्षी हत्‍यारों ने तड़पा-तड़पा कर नंगी लाश के तौर पर तब्‍दील कर दिया था। लेकिन इसके पहले आप ऐसी कहानी जरूर सुनते जाइये कि सरकार के बड़े अफसर अपनी मां-बहन-बेटियों के साथ क्‍या-क्‍या सुलूक करते हैं। सुतापा सान्‍याल ने तो मोहनलालगंज मेें मारी गयी बच्‍ची के हत्‍यारों को बचाने की सारी कवायद की थी, लेकिन यूपी की ब्‍यूरोक्रेसी में ऐसे अफसरों की तादात कम नहीं है, जो सुतापा सान्‍याल से भी सैकड़ों कदम आगे निकल जाते हैं। 

सबसे हौलनाक हादसा तो है सन-74 का। हजरतगंज में मेफेयर सिनेमा के सामने हलवासिया मार्केट के ऊपर एक फ्लैट में एक प्रौढ ने एक युवती को अपनी पिस्‍तौल से गोली मार दी, जो उस युवती की कमर में रीढ़ की हड्डी में फंस गयी। नतीजा यह कि वह आजीवन अपाहिज ही रही।

दरअसल, इस फ्लैट में गणेश मिश्रा नामक एक युवक रहा करता था। आप आसपास के इलाके में पूछ लीजिए, हर दूकानदार बता देगा कि गणेश की रेडियोग्राम वाली दूकान कहां है। गणेश का असल धंधा हुआ करता था लखनऊ विश्‍वविद्यालय समेत अनेक विश्‍वविद्यालयों के परीक्षा में तैयार किये गये सवालों को लीक करना। चूंकि उसकी पहुंच खासी थी, इसलिए उसका धंधा चकाचक चलता था। इतना ही नहीं, चूंकि गणेश से सवाल हासिल करने वालों में लड़कियां भी आया-भेजी जाती थीं, इसलिए गणेश ने उन लड़कियों में से अनेक को पैसा लेने के बजाय अपने क्‍लाइंट्स को खुश करने का धंधा शुरू कर दिया। ऐसी लड़कियां अब सवाल तो हासिल करती ही थीं, पैसा भी कमाने लगीं।ज्‍यादातर आने वाली ऐसी लड़कियों को गणेश उसी तरह का लॉलीपॉप थमाया करता था। नतीजा, धंधा इसी तरह चलता ही रहा। 

इसी दौरान सुजाता वरूण नामक एक छात्रा से भी गणेश से परिचय हुआ और उसने अपनी कमजोर पढ़ाई की दिक्‍कत बताते हुए मदद करने की कोशिश की। बहुत ऐश्‍वर्यशाली परिवार की थी सुजाता वरूण। गणेश ने सीधे-सीधे प्रस्‍ताव रख दिया कि उसका एक ग्राहक है। उसे खुश कर दो, तो सारे क्‍वेश्‍चन पेपर तुम्‍हें दे दूंगा। कुछ ना-नुकुर के बाद सुजाता वरूण राजी हो गयी। वरूण ने उसे बेडरूम में भेज दिया। कुछ देर बाद जो शख्‍स वहां पहुंचा, उसे देखकर दोनों ही बौखला गये। बेडरूम में आने वाला शख्‍स प्रदेश का एक बड़ा दबंग नौकरशाह था। वरिष्‍ठतम आईएएस अफसरों में से एक। नाम था डीपी वरूण। खास बात यह कि वह सुजाता वरूण का पिता था।

बौखलाये डीपी वरूण ने अपनी पिस्‍तौल निकाली और सुजाता को गोली मार दी। बदकिस्‍मती यह कि वह गोली सुजाता वरूण की रीढ़ में फंस गयी और उसके बाद वह हमेशा-हमेशा के लिए अपाहिज हो गयी। बाद में तो यह काफी बाद मर-खप गये, लेकिन मामला वरूण के लोगों ने दबवाने की खूब कोशिश जरूर की। ठीक वैसे ही, जैसे मोहनलालगंज काण्‍ड में सुतापा सान्‍याल ने असली कहानी को अपने झूठ के बल पर खूब मरोड़ा-तोड़ा और असल अपराधियों को खुला छुट्टा छोड दिया। सिर्फ इसके लिए, कि उनकी नौकरी और उनका प्रमोशन की सम्‍भावनाओं पर कोई दिक्‍कत न हो। 

यूपी की ब्‍यूरोक्रेसी में व्‍यभिचारियों की संख्‍या कम नहीं है। करीब दो-ढाई दशक पहले तक गोमती नगर के मिठाईवाला चौराहा के पास गाजियाबाद, मेरठ और खुर्जा विकास प्राधिकरण की और से एक संयुक्‍त गेस्‍ट हाउस तैयार कराया गया था। बेहद सुसज्जित। सुरक्षित भी, क्‍योंकि उसमें आधा दर्जन गार्ड हमेशा रहते थे ताकि कोई परिन्‍दा न पर उठा सके। लेकिन आज तक कोई भी गेस्‍ट वहां नहीं आया या रूका। यहां केवल तब के आवास सचिव जैसे पदों पर रख चुके लोग ही रूकते थे। जिनमें से कई की रासलीलाओं के तराने एलएडी के लोगों की जुबान पर आज तक गुनगुनाते हैं। इस रासलीलाओं में कई बड़ी ओहदेदार महिलाओं के अलावा करीब आधा दर्जन महिलाएं नियमित रूप से रमण किया करती थीं। 

यह तो बड़े अफसरों की करतूत है। छोटे अफसरों की भी करतूतें देख लीजिए। इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के एक पूर्व उपाध्‍यक्ष खुद तो बेइन्तिहा घोषित महिला-खोर थे। लेकिन उन्‍हें अपनी पत्‍नी पर बहुत शक था। शक उस ठेकेदार पर था। लेकिन उनकी पत्‍नी का दावा था कि उन दोनों के बीच भाई-बहन का रिश्‍ता है। मगर यह अफसर साहब माने नहीं। एक दिन लखनऊ के एक निर्माणाधीन मकान में उस ठेकेदार को अपने गुण्‍डों से बेतरह पीट डाला कि वह चार महीने तक चारपाई पर खिसक तक नहीं सका।

एक अन्‍य प्राधिकरण के उपाध्‍यक्ष ने तो अपने प्‍लाट में खोद कर एक नौकर को दफ्न कर दिया था। शक था कि उसका उनकी पत्‍नी से नाजायज रिश्‍ता है। ठीक यही कहानी थी एक मुख्‍य वन संरक्षक की, जिनके मकान के ठीक पीछे की जमीन में एक युवक की लाश मिली थी। तर्क यही नाजायज रिश्‍ता। लेकिन सूत्रों का कहना है कि इन सारे मामले चूंकि खासे हाई-प्रोफाइल थे, इसलिए उनपर राख डाल दी गयी। 

कुछ भी हो, मैं ऐसी नृशंस हत्‍याओं और हमलों की कड़े शब्‍दों में निन्‍दा और भर्त्‍सना करता हूं। और आज मेरी बिटिया की इस बरसी के मौके पर सभी से अश्रुपूरित आहृवान करता हूं कि अपनी मर्दानगी को सुरक्षित रखिये, लेकिन पहली शर्त यह है कि पहले अपनी बेटियों को संरक्षित रखिये। भले वह आपके घर में हो या फिर अपने मायके में।

कुमार सौवीर के एफबी वाल से

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