मायावती से तीखा सवाल पूछने वाली उस लड़की का पत्रकारीय करियर शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया!

Zaigham Murtaza : अप्रैल 2002 की बात है। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा था। मायावती की सत्ता में वापसी की आहट के बीच माल एवेन्यु में एक प्रेस वार्ता हुई। जोश से लबरेज़ मैदान में नई-नई पत्रकार बनी एक लड़की ने टिकट के बदले पैसे पर सवाल दाग़ दिया। ठीक से याद नहीं लेकिन वो शायद लार क़स्बे की थी और ख़ुद को किसी विजय ज्वाला साप्ताहिक का प्रतिनिधि बता रही थी। सवाल से रंग में भंग पड़ गया। वहां मौजूद क़रीब ढाई सौ कथित पत्रकार सन्न।

मायावती ने पलटकर पूछा तुम कौन हो?

लड़की से पहले एक पत्रकार ने जवाब दिया बहनजी पहली बार दिखी है एक मिनट रुकिए।

किस अख़बार से हो?

मान्यता है?

अंदर कैसे आईं?

ये विजय ज्वाला क्या है?

इस नाम का अख़बार तो हमने नहीं सुना।

अरे यार सीएम बनने वाली हैं। इनका अपमान कैसे कर सकती हो

नई आई हो? तमीज़ नहीं है।

सौ से ज़्यादा सवाल और सब कथित पत्रकारों के। एक भी बहनजी का नहीं। एक पत्रकार ने पुलिस बुला ली। लड़की पूरी रात हज़रत ग॔ज थाने में रही। मायावती के ओएसडी की तहरीर पर मुक़दमा हुआ। 6 दिन बाद ज़मानत मिली और पत्रकारिता शुरू होने से पहले ख़त्म। कांफ्रेंस में मौजूद एक बड़े पत्रकार बाद में रिलायंस के नौकर हो गए। एक दो प्रेस मान्यता समिति मे रहे। कुछ को सरकारी फ्लैट और प्लॉट जैसी सुविधाएं हासिल हैं। कुछ सीधे सीधे राजनीतिक कार्यकर्त्ता बन गए हैं।

लेकिन इन सबमें न उस नौसिखिया जैसा साहस है और न नाम मात्र की नैतिकता। लखनऊ शहर में क़रीब एक हज़ार मान्यता और दो हज़ार चप्पल घिस्सू पत्रकार हैं। एक शहर मे शायद ही कहीं इतने हों मगर सवाल पूछने का साहस किसी में नहीं है। अगर इक्का दुक्का क्रांतिवीर आ भी जाता है तो सरकार से पहले कथित प्रवक्ता उसे सही रास्ते पर ले आते हैं। यही वजह है कि दसवीं पास सिपाही इनका मान मर्दन करते हुए सोमवार को प्रेस क्लब मे घुस आए और एक पूर्व डीजी सहित 31 सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करके ले गए। किसी ने नहीं पूछा कि क्या पत्रकार वार्ता करना गुनाह है? या फिर इनमें कोई चोर, उचक्का या अपराधी है?

सवाल अब भी उठाए जाएंगे लेकिन सरकार पर नहीं। प्रेस कांफ्रेंस और इसे करने वालों की नीयत सवालों के घेरे में है। सरकार आज से 20 साल पहले वाली भी सर्वोपरि थी और आज वाली भी। पत्रकारिता۔۔۔ माफ कीजिएगा, चाटुकारिता के मानक न तब बदले थे और न अब। सो प्रेस क्लब में सरकार के हमले को अघोषित इमर्जेंसी, प्रेस पर हमला या पत्रकारिता पर आघात मानने की भूल न करें। ये ज़रूर हो सकता है कि प्रेस क्लब में पुलिस किसी पत्रकार ने ही बुलाई हो। वैसे भी लखनऊ को इराक़ के कूफा शहर जैसा ऐसे ही थोड़े माना जाता है।

पत्रकार ज़ैगम मुर्तजा की एफबी वॉल से.

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यूपी के मुख्यमंत्री निवास पर संवाददाता सम्मेलन की यह तस्वीर हो रही वायरल

Dilip Mandal : यह बीजेपी कार्यकर्ताओं का सम्मेलन नहीं है. यूपी के मुख्यमंत्री निवास पर हुए संवाददाता सम्मेलन की ताजा तस्वीर है. ये सब निष्पक्ष पत्रकार हैं. इनका बताया हुआ जानकर हम अपने विचार बनाते हैं. आपके प्रिय चैनल का रिपोर्टर भी यहीं है. भारतीय मीडिया एक पोंगापंथी सवर्ण पुरुष है. यूपी के मुख्यमंत्री निवास पर संवाददाता सम्मेलन की वायरल हो रही तस्वीर. पहचानिए अपने प्रिय चैनल और अखबार के पत्रकार को. वह यहीं कहीं है. गौर से देखिए. यूपी के सीएम निवास पर संवाददाता सम्मेलन की तस्वीर.

Ambrish Kumar : यह फोटो दो दिन पहले मानसरोवर यात्रा और सिंधु दर्शन के यात्रियों को सरकार की तरफ से चेक बांटने के कार्यक्रम की है. इसमें भगवा गमछा बांटा गया था. बांटना तो मानसरोवर वाली समिति की तरफ से था पर सूचना विभाग के लोग भी बांट रहे थे. अपने परिचित पत्रकार भी गमछा ले आए हैं और इसकी पुष्टि भी की. हालांकि इस कार्यक्रम में बहुत से वरिष्ठ पत्रकार पहुंच नहीं पाए. विभाग की तरफ से समय पर सूचना न मिलने की वजह से वर्ना ज्यादातर को इस गर्मी में एक अदद गमछा तो मिलता ही. खैर अगली बार.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल और अंबरीश कुमार की एफबी वॉल से.

मूल खबर…

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जाम लड़ाने के बदले अभियुक्त बाप-बेटों की साजिशों में भागीदार रहता है अंग्रेजी दैनिक का रिपोर्टर

अब नहीं जलता ‘शरद’ ऋतु का ‘दीप’…

लखनऊ। देश को लगातार गौरवान्वित करने वाले, ओलंपिक और अन्य अंतराष्ट्रीय स्पर्धाओं में मेडल दिलाने वाले और लगातार ऊंचाइयां छू रहे बैडमिंटन खेल को कुछ स्वार्थी तत्व और बिकाऊ कलमें प्रायोजित स्टोरियों के सहारे बदनाम करने की साजिश रच रही हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि स्वार्थी-साजिशकर्ताओं का शिकार देश का एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी समाचार पत्र भी हो रहा है।

इस समाचार पत्र की मालकिन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं सुविख्यात समाजसेवी परिवार से हैं। उनके अथक परिश्रम एवं संपादकीय कौशल से आज इनका पब्लिकेशन देश के प्रतिष्ठित मीडिया समूहों में शुमार होता है और देश की सेवा कर रहा है। लेकिन इस अंग्रेजी दैनिक में एक रिपोर्टर ऐसा भी है जो अपनी करतूतों और षडय़ंत्र से इस अखबार की छवि में बट्टा लगा रहा है।

इस पत्रकार के पास शौकनुमा कई लत भी हैं। अपनी गलत आदतों के कारण ये पत्रकार, बैडमिंटन एसोसिएशान के निष्कासित पदाधिकारी और यौन शोषण व गबन के आरोपी विजय सिन्हा और उनके पुत्र निशान्त सिन्हा के हर गलत काम में भागीदार रहता है। हालांकि आजकल यौन शोषण और गबन के अभियुक्त ये पिता-पुत्र भी खासे परेशान हैं, क्योंकि विजय सिन्हा गिरफ्तार होकर जेल में है और उनके पुत्र निशान्त सिन्हा की गिरफ्तारी के लिए पुलिस पीछे पड़ी है, जगह-जगह छापेमारी कर रही है। अभियुक्त निशान्त के बंगलुरू या फिर  दिल्ली में छिपे होने की संभावना जतायी जा रही है क्योंकि इनको खेल जगत के कई लोग इन शहरों में देख चुके हैं।

इन अभियुक्त  पिता-पुत्र के साथ बीबीडी यूपी बैडमिंटन अकादमी को जाम लड़ाने का अड्डा बनाने वाला अंग्रेजी दैनिक का पत्रकार भी आजकल बहुत परेशान है क्योंकि अब  यहां  ‘शरद’ ऋतु में इनकी हरकतों का ‘दीप’ नहीं जलता। पुलिस सूत्रों के अनुसार इस रिपोर्टर को भी पूछताछ के पुलिस कभी भी उठा सकती है।

गिरफ्तार अभियुक्त विजय सिन्हा व उनके पुत्र निशान्त सिन्हा के हर षडय़ंत्र और गलत काम में सहभागी यह पत्रकार आजकल  ‘अड्डे’ की तलाश में भटक रहा है। पहले इसका अड्डा बीबीडी यूपी बैडमिंटन अकादमी हुआ करता था। अकादमी से अभियुक्त बाप-बेटों (विजय सिन्हा व निशान्त सिन्हा)के तड़ीपार होने के साथ ही इस पत्रकार का भी हुक्का-पानी बंद हो गया। अब बीबीडी यूपी बैडमिंटन अकादमी में न ‘शरद’ ऋतु आती है न ही इनकी हरकतों का ‘दीप’ जलता है।  …सो परेशानी समझी जा सकती है। आखिर जाम लड़ाने के लिए कोई पनाहगाह तो चाहिए।

अड्डा बंद होने का असर इस पत्रकार की कलम व मनोदशा पर भी पड़ा है, ऐसे में ये अपनी बेसलेस लेखनी से अपने ही संस्थान की बदनामी करा रहा है। जरा सोचिए! जिस संस्थान की सर्वेसर्वा देश के प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने की महिला हों, उस संस्था का पत्रकार दो ऐसे अपराधियों (विजय सिन्हा व निशान्त सिन्हा)का हमसफर/हमकदम बन जाये जिनके घृणित कृत्य से पूरा खेल जगत शर्मसार हुआ हो, तब आश्चर्य होता है कि कैसे यह पत्रकार इस प्रतिष्ठित संस्थान में है|

मैं और हमारा संस्थान इस अंग्रेजी दैनिक अखबार और इसकी चेयरपर्सन/मालकिन का बहुत सम्मान करते हैं। लेकिन जब इस अखबार के पत्रकार की कारस्तानी हमारे सामने आयी, तो हम अपना कर्तव्य समझकर इसे प्रकाशित कर रहे हैं ताकि इस सम्मानित अंग्रेजी दैनिक और इसकी मालकिन को पता चल सके यह रिपोर्टर कहां…कहां और कब-कब अपनी हरकतों का ‘दीप’ जलाता है।

(लखनऊ से प्रकाशित हिंदी अखबार ”वायस आफ लखनऊ” से साभार)

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सन स्‍टार लखनऊ में सैलरी को लेकर घमासान, तालाबंदी के आसार

लखनऊ से कुछ महीने पहले शुरू हुए दैनिक अखबार सन स्‍टार के सितारे गर्दिश में चल रहे हैं. यह अखबार बंद होने के कगार पर जा पहुंचा है. बताया जा रहा है कि सैलरी संकट के चलते यहां दो-तीन दिन के लिए तालाबंदी कर दी गई. अखबार का प्रकाशन भी नहीं हुआ. पैसे को लेकर यहां मारपीट और हाथापाई की नौबत कई बार उत्‍पन्‍न हो गई. अभी भी सभी लोगों की सैलरी नहीं मिल पाई है.

जानकारी के अनुसार इस अखबार में पिछले दो महीनों से पत्रकारों तथा गैर पत्रकार कर्मियों को पूरी सैलरी नहीं मिली है. सैलरी को लेकर अखबार के मालिक गोपालदास एवं मैनेजर कुबेर शर्मा लगातार आश्‍वासन दे रहे थे, लेकिन सैलरी नहीं दे रहे थे. इसी बीच कुछ दिन पहले मैनेजर कुबेर शर्मा और रिपोर्टर मंजुल के बीच सैलरी को लेकर हाथापाई और गाली-ग्‍लौज तक हो गई. कई अन्‍य लोगों से भी इस तरह की आपसी तनातनी और झड़पें हुईं.

बताया जा रहा है कि सैलरी ना मिलने से नाराज पत्रकारों ने तीन चार दिन पहले अखबार के कार्यालय पर तालबंदी कर दी. इसका परिणाम यह हुआ कि कई रोज यह अखबार प्रकाशित नहीं हो पाया. गुरुवार को सैलरी मिलने के आश्‍वासन के बाद दुबारा से अखबार का प्रकाशन शुरू हुआ है. हालांकि अभी तक सभी लोगों की सैलरी नहीं मिल पाई है. प्रबंधन ने उन्‍हीं लोगों की सैलरी दी है, जिन्‍होंने जमकर हंगामा काटा था. अन्‍य कर्मचारियों को जल्‍द सैलरी देने का आश्‍वासन दिया गया है. संभावना है कि बचे लोगों की सैलरी नहीं आई तो एक बार फिर अखबार के कार्यालय पर तालाबंदी हो सकती है.

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”इस इस्‍तीफे की कहानी का मुख्‍य किरदार यूपी कांग्रेस का एक नेता है”

मित्रों आप फेसबुक के मित्र हैं और भी मित्र हैं, फेसबुक के अस्तित्‍व में आने के पहले वाले भी हैं। अब मैं बताने वाला हूं वह कथा जिसके चलते मैंने विश्व में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबार से बीते नौ अप्रैल को रिजाइन किया था। दूसरी बार। पहली कहानी अलग है। वह आठ साल चली और यह तीन साल से थोड़ा कम। कहानी का मुख्य किरदार यूपी कांग्रेस का एक नेता है जिसका पूरा सिजरा मैं बताऊंगा।

दरसल इसको नेता कहना नेता शब्द का अपमान है, जिसके लिए ऐसे ही शख्‍स जिम्मेदार हैं। इसे विश्व में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबार के “अवस्था पार कर चुके स्थूलकाय संपादक और एक और शख् जिसका वर्णन आगे आएगा, का वरदहस्त है। थोड़ा कागज पत्र तैयार कर लूं तो फिर बताता हूं पूरी दास्तान। हां, इस बीच अगर मैं अवा मेरी पत्नी दोनों को एक साथ खत्म न कराया गया तो जो बचेगा वो पूरी दास्तां मय सुबूत रखेगा। थोड़ा इंतजार करें। धन्यवाद।

लखनऊ के तेवरदार पत्रकार राज बहादुर सिंह के एफबी वाल से साभार.

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अमिताभ ठाकुर आईजी बन कर पूरी ठसक के साथ अपने आफिस में बैठे हैं

लखनऊ : मुजफ्फरनगर दंगे के दौरान केवल सात दिन की तैनाती पाये वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक सुभाष चंद्र दुबे को दंगा न सम्‍भाल पाने को लेकर शासन ने दोषी ठहराया। दुबे को इस आरोप में मुजफ्फरनगर से हटाकर लखनऊ में पुलिस महानिदेशक कार्यालय में सम्‍बद्ध कर दिया गया और इसके 15 दिन बाद उन्‍हें निलम्बित भी कर दिया गया। अब हकीकत यह देखिये। सुभाष च्रंद्र दुबे की कार्यशैली बेदाग रही है। दुबे जहां भी रहे, अपनी कुशलता के झंडे गाड़ दिया। दंगा शुरू होने पर दुबे को शासन ने खासतौर पर सहारनपुर भेजा था। तब तक मुजफ्फरनगर में अपर महानिदेशक कानून-व्‍यवस्‍था, आर्इजी, डीआईजी समेत कई अधिकारी भी तैनात थे, ताकि वे अपनी निगरानी में दंगा सम्‍भालने की कोशिश करें। लेकिन प्रमुख गृह सचिव ने इसी बीच सात दिन की तैनाती के बाद ही दुबे को डीजीपी कार्यालय में अटैच कर दिया था।

कोई सहज बुद्धि का चपरासी या बाबू भी आसानी से समझ सकता है कि जब जहां एडीजी, आईजी, डीआईजी से लेकर भारी पुलिस बल मौजूद हो, ऐसे में एसएसपी जैसा अदना अफसर की क्‍या औकात होगी। लेकिन चूंकि इसके पहले प्रमुख सचिव गृह आरएन श्रीवास्‍तव से काफी नाराजगी हो गयी थी, इललिए आरएन श्रीवास्‍तव ने दुबे के गर्दन पर सस्‍पेंशन की आरी रख दी। दुबे पर श्रीवास्‍तव इस लिए खार खाये बैठे थे, क्‍यों कि उनके एक खासमखास आदमी और माध्‍यमिक शिक्षा के एक बड़े अफसर को दुबे ने 85 लाख रूपयों की नकदी के साथ गिरफ्तार किया था। यह रकम इंट्रेंस की घूस के तौर पर थी। लेकिन दुबे अडिग रहे, और मुजफ्फरनगर दंगे में उन पर काम लगा दिया गया।

लेकिन आज तक दुबे पर लगे आरोपों की फाइल देखने की जरूरत न तो मौजूदा प्रुमुख गृह सचिव देवाशीष पाण्‍डेय ने की, या फिर मुख्‍य सचिव आलोक रंजन ने। जानकार बताते हैं कि दुबे की यह फाइल देखते ही सच साफ दिख जाता है। इसके लिए आईएएस  बनने की जरूरत नहीं। ठीक यही हालत थी अमिताभ ठाकुर की। आठ साल पहले ठाकुर ने सरकारों की खाल खींचनी शुरू कर दिया। वजह थी, ठाकुर पर प्रताड़ना। ठाकुर का आईआईएम में दाखिला मिला, लेकिन शासन ने उसे छुट्टी नहीं दी। बोले, यह अराजकता है। अमिताभ ने उस पर ऐतराज किया तो शासन ने उसे औकात में लाने की साजिशें बुन दीं। पहले ढक्‍कन पोस्टिंग लगा दी।

यह भी सहन किया ठाकुर ने, लेकिन अपनी आवाज उठाये रखा। नतीजा यह हुआ कि शासन ने निलम्बित कर दिया। इतना ही नहीं, निलम्‍बन की तयशुदा समयसीमा खत्‍म होने के बावजूद निलम्‍बन खत्‍म नहीं किया। ठाकुर ने इसके लिए अदालत और सेंट्रल ट्रब्‍युनल पर अर्जी लगायी। आज ठाकुर आईजी बन कर अपनी पूरी ठसक के साथ अपने आफिस में बैठ रहे हैं। एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने अमिताभ के इस प्रकरण पर बहुत जोरदार चुटकी ली। बोले:- अब चाहे कुछ भी हो जाए, सरकारों और आला अफसरों की संवेदनहीनता व प्रताड़ना के चलते अमिताभ ठाकुर में प्रवेश कर चुका अदालती कीड़ा वापस नहीं जाने का।

सच भी है। आपको अगर इस लोकतंत्र में सत्ता सिस्टम से टकराना है तो राहत फिलहाल अदालत और मीडिया के माध्यम से ही मिल सकती है।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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बिना सेलरी और बिना नौकरी वाले ये लखनऊ के पत्रकार कहां से गाड़ियां, कोठियां, स्कॉच हासिल कर लेते हैं!

Zafar Irshad : मुख्यमंत्री जी को घेरे है चाटुकार पत्रकारों की टीम..प्रदेश में कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश रखने वाले युवा मुख्य्मंत्री अखिलेश जी भी चाटुकार पत्रकारों के चक्कर में पड़ गए लगते है..उनके इर्द गिर्द वही पत्रकार चक्कर लगा रहे है,जो इससे पहले वाली सरकारों के दरबार में दण्डवत हाज़िरी लगाते थे..यकीन न हो इनका रिकॉर्ड देख लें की यह महानुभाव बड़का पत्रकार 4 साल पहले और उससे पहले कहाँ हाज़िरी लगाते थे..

मेरी एक बात समझ में नहीं आती है की यह पत्रकार कहीं नौकरी भी नहीं करते है न ही इन्हे सैलरी मिलती है, इसके बावजूद इनकी लखनऊ में बड़ी बड़ी कोठिया बंगले है, लम्बी लम्बी महंगी गाड़ियों में घुमते है, शाम को शानदार स्कॉच पीते है ..इनको यह फर्क नहीं पड़ता है किसकी सरकार है इनका जुगाड़ पानी चलता रहता है..आखिर कैसे?

मैं 20 साल से एक अच्छी नौकरी में हूँ लेकिन आज तक एक दो कमरे का घर नहीं बनवा पाया मोटर साइकिल से चलता हूँ..आखिर यह पत्रकार कहाँ से लाखों करोड़ों में खेलते है? पहले भी खेलते थे और आज भी खेलते है… मैंने सोचा था यह युवा मुख्यमंत्री ऐसे धन्धेबाज़ पत्रकारों से दूर रहेंगे, लेकिन अफ़सोस यह धन्धेबाज़ आज भी सत्ता के करीब है… कल कोई और सरकार आ गयी तो उसके भी करीब आ जाएंगे… मुख्यमंत्री जी, दूर रहें ऐसे धंधेबाजों से,  एक छोटे पत्रकार की सलाह है आपको, मानें या न मानें.. (प्लीज नोट :- मुझे कुछ भी आपसे नहीं चाहिए CM साहिब, मैं अपनी सैलरी से अपना और परिवार का पेट पाल लेता हूँ बस )…

पीटीआई कानपुर के वरिष्ठ पत्रकार जफर इरशाद के फेसबुक वॉल से. इस स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Nadir Wahab Khan ज़फर साहब, आपने ऐसी नब्ज़ पे उंगली रखी है की कि खड़े खड़े कुछ लोग बरहना हो गए… मगर उन्होंने बेहयाई की ऐसी चादर ओढ़ रखी है, जो गेंडे की खाल से भी मोटी है. अखिलेश जी चाहते हुए भी कुछ करने से माज़ूर हैं क्योंकि वह चाटुकार मतलब परस्त नेता जी तक का दबाव रखते हैंं और मठाधीश तो हैं ही… अफसोस जो वाक़ई उनके हमदर्द हैं, उन्हें साज़िश के तहेत उन से दूर रखा गया और उनके खिलाफ़ अखिलेश जी के कान भरे गए. इसका परिणाम 2017 में उन्हें फेस करना पड़ेगा, जो उनके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है. वही चाटुकार जब पब्लिक में होते हैं तो जमकर के अखिलेश जी की कामयाबियों की भर्त्सना करते हैं. यह कैसे लोग हैं भाई और इसमें उनके निजी स्टाफ के भी कुछ लोग शामिल हैं. आपने तो आईना दिखा दिया कि कुछ पत्रकार वेतन भी नहीं पाते और महंगी महंगी गाड़ियों में चल रहे हैं.

Hafeez Kidwai वाक़ई। हम तो रोज़ देखते हैं। कुछ की गाड़िया सिर्फ 5 कालिदास मार्ग जाने के लिए ही बनी हैं। हैरत होती है जब कोई cm इनके चँगुल में रोज़ फसता है। इनकी हर कद्दावर मंत्री से भी बराबर की दोस्ती होती है। ज़फर भाई यह लोग ब्रोकर हैं। आजकी तारीख में जो जितना बड़ा ब्रोकर वह उतना बड़ा पत्रकार।

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हे विक्रम राव, फ्रांस की बातें बाद में कर लेना, पहले आत्महत्या करने वाले बुजुर्ग पत्रकार त्रिपाठी जी की सुध तो ले लो

पता चला है कि मई दिवस पर IFWJ की रैली में जुटेंगे 1200 श्रमजीवी पत्रकार और के. विक्रम राव होंगे मुख्य वक्ता…. इनसे मेरा कहना है कि पहले मलिहाबाद तो जाओ, फिर कर लेना फ्रांस की बातें… लखनऊ में नाका थाना क्षेत्र में आर्थिक तंगी के चलते वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर त्रिपाठी (74) ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी. श्री त्रिपाठी नव जीवन अख़बार में काम करते थे उसके बंद होने के बाद से इनका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. लेकिन इन पत्रकार नेताओं को कभी फुर्सत नहीं मिली कि वे ऐसे पीड़ित और गरीब पत्रकारों की सुध लेते.

दिवंगत बुजुर्ग / वरिष्ठ पत्रकार के घर या घाट पर पांच पत्रकार भी नजर नहीं आये. कहने को लखनऊ में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार संगठन और पत्रकार नेता खूब सक्रिय हैं. पत्रकारों के हितों की आवाज उठाने के लिये दुनियाभर में भव्य कार्यक्रम कराते हैं. अब एक मई को सुनिएगा बड़ी-बड़ी बातें. इन दिनों सत्ताधारियों को इकट्ठा करने का कार्य प्रगति पर है. कोई पत्रकार आर्थिक तंगी से मरे या भूखा मर जाये, हमारी बला से. हम तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं. खुदा ना खास्ता किसी बड़े न्यूज चैनल / अखबार के नामी गिरामी / संपन्न पत्रकार का देहांत होता तो लाइन लग जाती. क्योंकि वहाँ बड़े नेताओं / अधिकारियों के पहुँचने की उम्मीद होती, इनसे मिलन हो जाता, चेहरा दिखा देते, हाथ मिला लेते. लेकिन त्रिपाठी जी जैसे गरीब पत्रकार के आत्महत्या करने पर कोई पत्रकार घर या घाट पर नहीं जाएगा… लखनऊ के पत्रकार भाई लोग बहुत आगे की सोचते हो… यही है लखनऊ की दलाल पत्रकारिता का सच…

त्रिपाठी जी जैसे पत्रकारों को आत्महत्या इसलिए करना पड़ता है क्योंकि उनको दी जाने वाली सुविधाओं का हक पत्रकार नेता लोग हजम कर जाते हैं… जिस लखनऊ के पत्रकार संगठन / पत्रकार नेता दुनियाभर मे पत्रकारों के हितों के लिये भव्य आयोजन / सम्मेलन कर रहे हैं, बतौर पत्रकार नेता प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियो से मिलने की होड है, आपस में मारामारी हो रही है, उसी शहर के असली / वरिष्ठ / बुजुर्ग पत्रकार भूखों मर रहे हैं, आर्थिक तंगी और तमाम परेशानियों से परेशान होकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं लेकिन कोई पत्रकार नेता / पत्रकार संगठन इसका संज्ञान नहीं ले रहा है… ऐसे दर्जनों मामले सामने आ चुके हैं।

नवेद शिकोह 
वाट्सअप- 8090180256
मोबाइल- 9369670660 
Navedshikoh84@Gmail.Com

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दलाल पीआर और फ्रॉड बिल्डर के फेर में फंसे लखनऊ के पत्रकार

लखनऊ की पत्रकारिता रो रही है….इस शहर में बड़े-बड़े संपादक हुए देश दुनिया में नाम कमाया….बीबीसी से लेकर रायटर्स और कई चैनलों में बड़े ओहदों पर पहुंचे पत्रकार इसी शहर की देन हैं….इतना ही नहीं वालस्ट्रीट जर्नल और गल्फ टुडे जैसे बड़े समूहों में अच्छे पदों पर पहुंचे कई नामचीन पत्रकार लखनऊ के पत्रकारिता से ही ककहरा सीखकर आगे बढ़े हैं..लेकिन अब जो यहां देखने को मिल रहा है उससे लग रहा है ज़हर खाकर जान दे दूं या पत्रकारिता को अलविदा कह दूं…..

यही दिन बाकी थे कि चिटफंडिया टाइप बिल्डर शाइन सिटी और एक लोकल पीआर कंपनी के संचालक के पैसे से मीडिया के लिए टी-20 कप क्रिकेट कप आयोजित किया जा रहा है….पीआर कंपनी का संचालक प्रेस कांफ्रेस में बता रहा है कि मैच किससे के बीच खेला जाएगा…कौन विजेता होगा किसको टी शर्ट और ट्राउजर मिलेगा…किसने नरलॉप का किचेन सेट …..छी-छी…

हजारों गरीब निवेशकों के पैसे जमा करा कर प्लॉट देने का वादा करने वाली शाइन सिटी का मालिक अपने पैसे से लखनऊ की पत्रकारिता से जुड़े लोगों को दारू पिलाकर नशे में कर रहा है ताकि उसके काले कारनामों का कोई चिट्ठा न खोल दे और उसका साथ देता रहे….  जेल की हवा खा चुका एक पीआर कंपनी का संचालक…. बताया तो यहां तक जा रहा है कि यह पीआर संचालक कुछ पत्रकारों की सीडी भी बना चुका है क्योंकि जो भी मुंह खोलता है उसको संपादक के जरिये नौकरी से निकवालने की धमकी देता है…

लखनऊ से नरेंद्र कुमार की रिपोर्ट. संपर्क: narenderzee02@gmail.com

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लखनऊ में पत्रकारों की राजनीति पर सवाल उठाओ तो पूछा जाता है- ‘किस गुट की तरफ से बोल रहे हो?’

हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है
वो हर एक बात पर कहना के यूँ होता तो क्या होता.

इन दो व्यक्तियों की तस्वीरों को देखिये और पहचानने की कोशिश कीजिये… जितने अति वरिष्ठ हैं और जितने भी बड़े पत्रकारों के नेता हैं, उनमें से शायद बहुत कम ही इनको पहचानते होंगे… जो नहीं पहचानते, उन्हें मैं बता देता हूं- इसमें बायीं तरफ हैं Neeraj Mishra और दाहिनी तरह है Mukesh Verma. दोनों टीवी के बहुत कनिष्ठ पत्रकार हैं लेकिन दिल के बहुत बड़े हैं और साथियों के लिए जीना-मरना जानते हैं… इनका पत्रकार दोस्त था… नाम था Santosh Kumar Gwala…

बेहद ही नेकदिल और शानदार बन्दा… लेकिन मौत से किसकी यारी है… आज हमारी कल तुम्हारी बारी है… काल के गाल ने उसको लील लिया… युवा पत्रकार, जो करियर भी न संवार सका था. पीछे पत्नी और दो बेटियाँ… समस्या और भी थी- इनके पास न स्थायी नौकरी थी… न राज्य मुख्यालय की मान्यता… न पीएफ… न फंड… न ठेके-पट्टे-ट्रांसफर-दलाली का अनुभव… न बड़े भाइयों/बड़े पत्रकारों पर विश्वास… क्योंकि जो अपने साथियों के लिए कुछ नहीं कर पाए या कुछ नहीं करना चाहा तो ये कैसे उम्मीद लगाते…. उस समय स्वर्गीय Surendra Singh का उदाहरण इनके सामने था, जिनके लिए हम सब अति वरिष्ठ पत्रकार अब तक कुछ नहीं कर पायें हैं… खैर…

दोनों दोस्तों ने समझ लिया कि उनका एक साथी चला गया है, उसके परिवार पर बहुत बड़ा पहाड़ टूट गया है. सबने तमाम अपने दोस्तों से चर्चा की, चन्दा इकठ्ठा किया और अपने एक साथी के परिवार को तत्काल एक लाख रूपये की मदद उपलब्ध करवायी… इनकी पहुँच मुख्यमंत्री तक नहीं थी तो इन्होंने अपनी वेदना डीएम राज शेखर और एसएसपी राजेश पांडेय तक पहुंचाई. सोचिये कि हम पत्रकार बड़ी-बड़ी डींगे हांक कर जिन अफसरों को गाली देते हैं लेकिन अपने ही साथियों के दर्द में नहीं खड़े होते है… उन्हीं अफसरों ने हमसे इतर इन मेहनतकश पत्रकारों के लिए अपना हाथ बढ़ाया… स्वर्गीय संतोष के दोनों बच्चे प्रमुख स्कूलों में पढ़ते हैं, ऐसी स्थिति में उनके लिए फीस का इंतजाम किया गया… जिलाधिकारी ने प्रयास कर दोनों बच्चियों की इंटर तक की फीस स्कूल प्रबंधन से अनुरोध कर माफ़ करा दी… फिर स्वयं के प्रयासों से ढाई लाख रूपये की सहायता परिवार को उपलब्ध करवाई…

इसी तरह एसएसपी राजेश पांडेय जी ने भी प्रयास कर तकरीबन ढाई लाख रूपये परिवार को दिलवाए. ये बच्चे यहीं न थमे… इन्होंने और इनके साथियों ने प्रयास जारी रखा… जिन अफसरों और नेताओं को जानते थे उनसे गुजारिश करते रहे और सफलता पायी… अपने मरहूम दोस्त को मुख्यमंत्री से बीस लाख रूपये की सहायता दिलाने में सफल हुए… इनकी कोशिशें यहीं नहीं थमी हैं. नीरज कहता है कि हमारा साथी था, ऐसे कैसे उसके परिवार को अकेला छोड़ दें… मुकेश कहता है कि हमारे प्रयास अभी ख़त्म नहीं हुए हैं. कोशिश कर रहे हैं कि उसकी पत्नी को सरकारी नौकरी मिल जाए. मैंने आज पूछ लिया कि किसी पत्रकार संगठन या गुट की मदद नहीं ली.. तो बोला- छोड़िये न सर, सब बड़े भाई हैं… लेकिन मुझे पता है, उसने कहा इसलिए नहीं क्योंकि ये जानते थे कि अगर बड़े भाइयों से कहेंगे तो वो केवल रायता फैलाएंगे और वैसी ही “मदद” करेंगे, जैसी अपने साथियों की करते हैं…

यह किस्सा इस लिख रहा हूं कि मैंने कल एक और धरना देख लिया…. राज्यपाल के साथ तस्वीरें देखीं और एक विज्ञप्ति भी देखी… जिसमें “दिल्ली और पूरे भारत” में पत्रकारों पर हमले की चिंता थी… पहले बताया गया कि धरना दिल्ली में पत्रकारों पर हमले के विरोध में है…. पर जब भाई Shalabh Mani Tripathi, भाई Gyanendra Shukla, भाई Rajendra Kumar और कुछ साथियों ने मुद्दा उठाया कि यूपी में पत्रकारों के लिए क्या सब मीठा-मीठा हो गया है? तो दुबारा भेजे गए मैसेज में यूपी की घटनाओं को भी जोड़ दिया गया… बहुत अच्छा किया… लेकिन ये तो अन्याय है कि हम अब तक अपने लखनऊ के साथियों के लिए कुछ कर नहीं पाए हैं और दिल्ली के लिए धरना दे रहे हैं…. और फिर टीवी पत्रकारों के हमले के विरोध में धरने की जो तस्वीरें फेसबुक और वाट्सएप पर नज़र आयीं, उसमें लखनऊ के टीवी पत्रकार दिख ही नहीं रहे थे…

दरअसल अब तो ये हाल है कि पत्रकारों की कुछ भी एक्टिविटी होती है तो आम पत्रकार पूछते हैं कि किस गुट की तरफ से है… Kumar Sauvir, आनंद सिन्हा, Rajendra Kumar, Mohd Kamran और नावेद शिकोह जैसे लोग पत्रकारों की राजनीति पर सवाल उठाते हैं तो पूछा जाता है कि किस गुट की तरफ से बोल रहे हैं… लेकिन दोनों गुट इन सवाल पूछने वालों तो नहीं बनाए हैं? गुटों से ज्यादा अच्छे तो Jitendra Shukla साबित हुए हैं, जो कम से कम कुछ चन्दा इकठ्ठा कर साथियों के मदद करते हैं. दो गुटों का मैंने तब भी विरोध किया था और आज भी करता हूँ… तब किसी ने मुझे Pranshu Mishra गुट का बताया तो किसी ने हेमंत तिवारी भाई के गुट के होने का आरोप मढ़ दिया….

लेकिन सच्चाई ये है कि जितने अच्छे मित्र मेरे प्रांशु हैं, उतना ही सम्मान मैं हेमंत जी का भी करता हूं… कल जो धरने में थे उनमे भी कई बड़े भाई और साथी हैं… लेकिन हमें हासिल क्या हुआ? अगर कुछ हासिल हुआ तो आम पत्रकारों को भी बता दिया जाए… वरना हमें अपने छोटी भाइयों से सीखना चाहिए, जिन्होंने किसी की आलोचना किये बगैर अपने दोस्त की मदद की… हम में से किसी ने तो सुरेन्द्र सिंह, केडी शुक्ला के साथ चाय पी होगी… कभी तो ये हमारे सुख-दुःख में खड़े हुए होंगे… अगर दिल्ली के पत्रकारों के लिए हम इतना कर सकते हैं तो जिनके साथ उठे-बैठे उनके लिए तो कुछ करें…. साथियों और बड़े भाइयों बात बुरी लगी हो तो माफी… छोटे भाइयों को एक बार फिर मेरा सलाम…

खबर थी गर्म कि ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्जे
देखने हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ…

लेखक नवल कान्त सिन्हा से संपर्क navalkant@gmail.com या +91 9415409234 के जरिए किया जा सकता है.


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प्रेस क्लब सारे पत्रकारों के लिए खोलने के प्रस्ताव का दीपक गिडवानी ने स्वागत किया

That’s a good initiative, something i have been fighting for, for a long time. After a sustained effort and a major struggle, we had managed to get temporary membership for 18 journalists. But even these members have not been made permanent members. The fear of those wielding power at UP Press Club (for indefinite terms) is that news members might tip the balance against the ‘thekedaars’ in the next Club election (whenever that happens!)

We will have to continue the pressure for opening up membership, though within the rules and norms of the Press Club.  There is no harm in or objection to the membership applications being screened by the Club’s screening committee. The point is that the applications should either be accepted or rejected (giving a valid reason). This state of limbo suits the powers-that-be but is totally unjustified and unacceptable, and needs to be condemned in the stongest terms.

We journalist who raise such a hue and cry about freedom of expression and democratic norms become a laughing stock when we ourselves make a mockery of elections and tenure of elected representatives within our fraternity, occupying  our seats and positions for years beyond our fixed term, deliberately or due to the power lust of others. Hope this renewed initiative bears fruit.

Best etc…

Deepak Gidwani
Lucknow
09838007255


मूल खबर :

OPEN PRESS CLUB FOR ALL JOURNALISTS

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OPEN PRESS CLUB FOR ALL JOURNALISTS

Lucknow, 11 February 2016 : The UP State Accredited correspondent committee has passed a resolution demanding Opening of doors of the UP Press Club, for all accredited and other working journalists. In the meeting of the Correspondent committee held at Press room of Vidhan Bhawan and presided by its President Pranshu Mishra, a resolution to this regard was moved by Senior journalist and member of the executive committee Mr Kazim Raza.

Mr Raza in his proposal said that a lot of journalists have a strong connect with the UP Press Club. Most of the accredited correspondents as well as non accredited ones working both in field or desk often visit the press club either due to professional reasons or else personal ones.

The UP Press Club has a glorious past in the struggle of journalist movement and freedom of speech and expression. Therefore every journalist feels proud to be associated with its legacy. For the past many years journalists have a genuine complaint that despite fulfilling the requisite qualification they have not been granted membership of the press club.

Hence it’s high time that all those accredited and non accredited journalists who are desirous of the membership of the press club and meet the prescribed criteria should be given the membership as per the By laws of the club. Member of the UPSACC’s executive committee Shri Deepak Gidwani and Shri Mudit Mathur agreed to this demand of democratisation  of the club and Journalistic organisations in general.

The proposal to this effect was passed unanimously by all present in the meeting including Vice president of the UPSACC Shri Narendra srivastava, Secretary Neeraj Srivastava, Joint secretary  Ajay srivastava, Members Abhishek Ranjan, Kashi Yadav, Juber Ahmad,, Ashish Srivastava, Faizal Fareed and others. The meeting authorised the UPSACC president Pranshu Mishra to communicate these feelings as expressed in the resolution to the President of the UP Press club to take necessary steps to pacify the resentment among the journalists.

Regards
Neeraj Srivsatava
secretary
UPSACC‎

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Upwju में अंधेरगर्दी : मुतावल्ली बन कर फ्री की बिरयानी खाने वाले नमाज ही नहीं पढते

मुतावल्ली बन कर फ्री की बिरयानी खाने वाले नमाज ही नहीं पढते. इसका आशय ये है कि पुजारी दक्षिणा तो खूब ले और पूजा ही नहीं करे. श्रमजीवी पत्रकार यूनियन आखिर है क्या? इसको समझो-जानो। इसके बाद इसकी लोकल इकाइ से जुड़ो। upwju (उत्तर प्रदेश वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन) के प्रदेश अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने किसी से ये नसीहत की और बस सिद्दीकी साहब की इस सलाह पर वो शख्स upwju को जानने समझने मे जुट गया। उस शख्स को इससे पहले तो बस ये पता था कि रोज दस्तरखान की मुफ्त में बिरयानी खाने का मतलब है upwju। इतनी सी जानकारी को मैंने आगे बढ़ाते हुए बताया- upwju का मतलब ऐसी elected body जिसमें चुनाव के अजब-गजब करिश्मे हैं। मसलन जो जीत गया वो फिर कभी हार नहीं सकता। अपनी कुर्सी के साथ वो अजेय हो जाता है और उसका ओहदा अमर।

इसके ओहदेदार बीस-तीस तीस साल से अपनी-अपनी कुर्सियों से चिपके हुए हैं। upwju में इस परम्परा को चलाने की भी बखूबी कोशिश की जाती है कि इसके वोटर आदिकाल (मतलब पुराने से पुराने) के हों। आम चुनाव में जनरल बाडी को सूचित ही नहीं किया जाता है। अपना गोल ही चुनाव लड़ता भी है और चुनाव का वोटर भी सिर्फ वही होता है। इस तरह की अनियमितताओं की इतनी लम्बी और इतनी मजाहिया फेरिस्त है कि लिखता चलूं तो पूरी novel हो जाये। अगर चंद बातों के साथ upwju की चर्चा खत्म करनी है तो इसकी जायज, अच्छी और सराहनीय गतिविधियों का जिक्र करें। मसलन एक मई को मजदूर दिवस का आयोजन। दूसरा- किसी वरिष्ठ पत्रकार या यूनियन लीडर के देहांत पर शोक सभा।

खैर, हसीब सिद्दीकी साहब की नसीहत लेकर वो शख्स जब मेरे पास आया तो मैंने अपने नजरिये से upwju का मतलब समझाया- किसी ट्रेड यूनियन का सबसे खास, सबसे जरूरी और सबसे अहम मकसद ये है कि श्रमजीवी मजदूर, कर्मचारी या पत्रकार इत्यादि का हक ना छीना जाये। उनके काम यानि नौकरी और वेतन और सुरक्षा का हनन न हो। उद्योगपतियो, पूँजीपतियों, मालिक, मैनेजमैन्ट और सरकार इत्यादि द्वारा कर्मचारियों के शोषण के खिलाफ लड़ने और कर्मचारियों को उनका हक दिलवाने के लिये ट्रेड यूनियनों का जन्म हुआ करता है।

मैं बताता चलूं की मै 20-22 सालों से लखनऊ के तकरीबन 9 जाने-पहचाने मीङिया समूहों के सम्पादकीय विभाग में लोकल रिपोर्टर से लेकर लोकल इन्चार्ज, ब्यूरो रिपोर्टर, ब्यूरो चीफ, न्यूज एडिटर से लेकर एडीटर के पदों पर रहा। इस दौरान तमाम अखबारों-न्यूज चैनलों में पत्रकारों के शोषण, वेतन न मिलने के दर्दनाक वाकियों को बहुत करीब से देखा, महसूस किया। अपने कैरियर के शुरुआती दो-चार सालों के दरमियान ही 1998 यानी 19 साल पहले स्वतंत्र भारत अखबार के कर्मचारी आन्दोलन में मैं खुद शरीक था।

इतने तजुरबों के आधार पर दावे के साथ कह रहा हूँ कि upwju ने किसी भी पत्रकार के शोषण के खिलाफ कोई लड़ाई नहीं लड़ी जबकि किसी भी ट्रेड यूनियन के अस्तित्व का मकसद ही उस क्षेत्र के कर्मचारियों के हक की लड़ाई लड़ना ही है। आजकल न जाने कैसे-कैसे लोग अखबार-चैनल शुरू करते हैं। उसमे पत्रकारों की भर्तियाँ होती हैं। दो-चार महीने वेतन मिलने के बाद वेतन मिलना बंद हो जाता है। आज-कल, आज-कल …और तारीख पर तारीख… के इन्तजार में लम्बा वेतन बकाया हो जाता है। फिर मालिक या मैनेजमेंट भुक्तभोगी पत्रकारों से कहता है कि अखबार/चैनल के नाम पर वसूली करो-ब्लैकमेलिँग करो और अपनी तनख्वाह निकालो।

लखनऊ में ये हालत बरसों से चल रहे है। श्रीटाइम्स और अन्य कई संस्थनों से जुड़े पीड़ित पत्रकार भुक्तभोगी पत्रकार मुझे बताता है/ पूछते हैं – इतने महीने से वेतन नहीं मिला…… इतने महीने से बकाया वेतन देने का झूठा वादा किया जा रहा है। डीएम आफिस में कहाँ किससे शिकायत करें। क्या वेतन की माँग को लेकर कोर्ट जा सकते हैं? क्या प्रेस काउन्सिल हमारी कुछ मदद करेगी? आरएनआई / डीएवीपी में शिकायत करने से कुछ हासिल होगा। लेबर कोर्ट में वेतन न मिलने की शिकायत लेकर गये थे। वहाँ से नोटिस भी भेजा गया, फिर भी अभी तक बकाया तन्खवाह नहीं मिली।

आज की पत्रकारिता के जंगलो मे भटकते सैकड़ों युवा पत्रकारों में से किसी की भी कभी भी upwju ने क्या कोई मदद की? ऐसे हालात में ये पत्रकार कहाँ जायें, क्या करें। अपने कैरियर के 4-6 वर्षों मे ही ये पत्रकार निराश हो जाते हैं। भटक रहे हैं। कहां जायें? इनके पास तो मलाईदार upwju का आफिस/कुर्सी/ ओहदा भी नहीं है जिसकी मुजाविरी करें। नमाज पढ़े नही और मुतावल्ली बन कर खैरात बटोरें। हर रोज फ्री की बिरयानी सूतें।

खैर, जिस शख्स को हसीब सिद्दीकी साहब ने upwju के बारे में जानने समझने की नसीहत दी थी उस शख्स को मैंने भी एक सलाह दे डाली। कहा लखनऊ के शोषित-पीड़ित और बकाया वेतन वाले पत्रकारों को upwju के हसीब सिद्दीकी साहब के पास ले जाया करो और बताओ की upwju के बारे में इतना जान गया हूं कि जो आप भूल रहे, वो भी आपको समझा दूँ। आप जिस कुर्सी पर बैठे हैं, जिस ओहदे पर काबिज हैं, उसकी पहली और आखिरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी ये है कि मालिक, सरकार या मैनेजमेन्ट किसी श्रमजीवी पत्रकार का हक न मारे, शोषण न करे, वेतन न रोके।

हसीब साहब, आपके लिये सलाह है कि किसी ट्रेड यूनियन वर्कर की तरह अब कुछ काम भी करिये। बाहर निकलये। वेतन ना देने वाले मालिकों/मैनेजमेंट से मिलिये, उन पर दबाव बनाइये। मौजूदा हालात के मारे मीडिया कर्मचारियों को लेकर लेबर कोर्ट जाईये। बकाया वेतन के लिये दर दर भटक रहे सैकड़ों पत्रकारों की कानूनी लड़ाई लड़िये। उन्हें उनका हक दिलवाने के लिये सड़कों पर उतरिये। ये सब जरूरी इसलिये है कि बिरयानी खाने वाले कुर्सी पर बैठे रहेंगे तो बिरयानी हजम कैसे होगी।

लेखक नावेद शिकोह लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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हिंदुस्तान अखबार के दफ्तर पर हमला करने वाले चार गिरफ्तार, पार्षद फरार

लखनऊ : दैनिक हिंदुस्तान के कार्यालय पर धावा बोलने वाले पार्षद और उसके गुंडे हमालवारों में से पुलिस ने चार को गिरफ्तार कर लिया है। हमले का मुख्य आरोपी पार्षद भी अभी तक गिरफ्त में नहीं आया है। मुख्यमंत्री के सूचना सलाहकार एमए खान ने इस हमले की निंदा करते हुए कहा है कि जिन लोगों ने अखबार के दफ्तर पर हमला किया है उनके खिलाफ कठोरतम कार्यवाही की जाएगी।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कल दोपहर लगभग 11 बजे हिन्दुस्तान अखबार के सामने दो मोटर साइकिल सवारों की भिंड़त हो गई थी जिसमें एक मोटर साइकिल सवार दूसरे को पीटने लगा। इसी बीच भाजपा पार्षद दिनेश यादव का भाई सोनू यादव साथियों के साथ पहुंचा और उसने भी उसी व्यक्ति की पिटाई शुरू कर दी। इस बीच हिन्दुस्तान अखबार के पत्रकारों ने उसे बचाना चाहा तो हमलावर और बेकाबू हो गए। इन गुंडों ने अपने और साथियों को बुला लिया और हिन्दुस्तान अखबार के दफ्तर पर हमला बोल दिया।  पथराव करने लगे। इस हमले में हिन्दुस्तान के एचआर हेड समेत कई पत्रकार और फोटोग्राफरों को चोट लगी। 

जब यह लोग इलाज के लिए लोहिया अस्पताल पहुंचे तो वहां भी यह गुंडे पहुंच गए और इन्होंने फिर से पत्रकारों पर हमला कर दिया। हिन्दुस्तान अखबार पर हमले की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में पीएसी और पुलिस बल अखबार के दफ्तर के बाहर तैनात कर दिया गया। कुछ हमलावरों को हिरासत में लिया गया। 

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हिन्दुस्तान के पत्रकारों पर हमला करने वालो पर गैंगेस्टर एक्ट लगाया जाय : हेमंत तिवारी

लखनऊ : हिंदुस्तान अखबार के कार्यालय पर अराजक तत्वों द्वारा हमले की उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने कड़ी निंदा करते हुए दोषियों के लिए कड़ी सजा की मांग की है. समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने घटना की जानकारी होते ही डीजीपी से बात की और कड़ी कार्यवाई की मांग की.    

समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने कहा है कि जिस तरह से अराजकतत्वों ने हिंदुस्तान के कार्यालय तक पहुंचने का दुस्साहस किया है, उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है. उत्तर प्रदेश सरकार को पत्रकारों पर लगातार हो रहे हमले का संज्ञान लेते हुए इस तरह के मामलों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए. घटना के बाद पिटते हुए राहगीरों को बचने के लिए जिस तरह की सहृदयता का परिचय हिंदुस्तान के पत्रकारों ने दिया है, वह काबिले तारीफ़ है लेकिन इसकी प्रतिक्रिया में एक सभासद और उसके गुंडों ने जो गुंडागर्दी की है, उसके खिलाफ गंगेस्टर एक्ट की कारवाई होनी चाहिए.

समिति के सचिव सिद्धार्थ कलहंस ने कहा कि सरकार और प्रशासन को इस बात को गंभीरता से लेने की जरूरत है और एक ठोस नीति बना कर पत्रकार बिरादरी की सुरक्षा के लिए सख्त कदम उठाये. यदि सभी दोषियों के खिलाफ फ़ौरन कार्रवाई नहीं होती है तो राजधानी के पत्रकार मुख्यमंत्री से मिलेंगे. 

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हेमंत तिवारी का भंडाफोड़ करने पर सतीत्व का पाठ पढ़ा रही पत्रकारिता की वेश्याएं : अनूप गुप्ता

”लखनऊ की पत्रकारिता के बड़े पत्रकार हेमंत तिवारी का खुलासा करने के बाद कुछ वेश्याएं सतीत्व का पाठ पढ़ा रही हैं…”, ये कहना है कि ‘दृष्टांत’ पत्रिका के जुझारू संपादक अनूप गुप्ता का। गौरतलब है कि ‘दृष्टांत’ के ताजा अंक की कवर स्टोरी हेमंत तिवारी पर ही फोकस है। ‘दृष्टांत’ से यहां साभार प्रस्तुत है लखनऊ के पत्रकारों के भ्रष्टाचार पर केंद्रित संपादक अनूप गुप्ता की स्टोरी – 

” लोकतंत्र का स्वयंभू ‘चतुर्थ स्तम्भ’ भ्रष्टाचार की आगोश में पूरी तरह से समाता जा रहा है। यदि कुछ प्रतिशत पत्रकारों को अपवाद मान लिया जाए तो देश के लगभग सभी पत्रकार महज सरकारी सुविधा और दलाली के लिए ही मीडिया का सहारा लेते आए हैं। यहां तक कि कुछ मशहूर औद्योगिक घराने भी मीडिया की गरिमा को तार-तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। 

” इधर, यूपी में ज्यादातर पत्रकार अपना हित साधने के लिए उन तमाम अनैतिक साधनों का इस्तेमाल करते आ रहे हैं, जो मीडिया की सेहत के लिए कतई ठीक नहीं कहा जा सकता। यदि बात सिर्फ और सिर्फ उत्तर-प्रदेश के मीडिया की हो तो, यहां की दशा बेहद दयनीय है। उंगलियों पर गिने जाने वाले चंद पत्रकारों को यदि छोड़ दिया जाए तो यूपी की पूरी मीडिया मंडी और उससे जुडे़ पत्रकार महज दलाली के सहारे अपना हित साधते चले आ रहे हैं। एवज में उन्हें सरकार की ओर से वे तमाम सुख-सुविधाएं मुहैया करायी जा रही हैं जिसके वे हकदार नहीं है। 

” यह बात वर्तमान सरकार के जिम्मेदार अधिकारियों से लेकर स्वयं मुख्यमंत्री भी अच्छी तरह से जानते हैं, इसके बावजूद उनकी चुप्पी कथित ईमानदार पत्रकारों के समक्ष चिंता का सबब बनी हुई है। इस अंक में ऐसे तथाकथित भ्रष्ट पत्रकारों के कारनामों का खुलासा किया जा रहा है, जो स्वयं को कहलाते तो वरिष्ठ हैं लेकिन उनके कारनामे किसी किसी जालसाज से कम नहीं हैं। सरकारी आवास हथियाने के लिए फर्जी हलफनामे से लेकर वे तमाम तरह की प्रक्रियाएं अपनायी जाती हैं, जिनका यदि खुलासा हो जाए तो हजारों की संख्या में सरकारी आवास खाली हो सकते हैं। ऐसे पत्रकारों की संख्या भी कम नहीं है, जो जिन्होंने वर्षों से सरकारी आवास का किराया जमा नहीं किया है। उसके बावजूद वे सरकारी आवासों पर डटे हुए हैं। राज्य सम्पत्ति निदेशालय ऐसे पत्रकारों को दर्जनों बार नोटिसें भेज चुका है, इसके बावजूद न तो मकान खाली हुए और न ही लाखों के किराए जमा हो सके। 

”सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भले ही भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के दावे करते आ रहे हों लेकिन सच्चाई उनके दावों से कोसों दूर है। जहां तक भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की बात है तो उनका स्वयं का विभाग (सूचना विभाग) ही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है। विभाग के ही कुछ अधिकारियों की मानें तो ऐसा नहीं है कि इस विभाग में तेजी से पांव पसार रहे भ्रष्टाचार की जानकारी उन्हें नहीं है। तमाम माध्यमों से समय-समय पर उनके विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की जानकारी उन्हें दी जाती रही है। यहां तक कि सूचना विभाग की यूनियन ने भी उन्हें कई बार पुख्ता प्रमाण के साथ भ्रष्टाचार की जानकारी उन्हें मुहैया करायी गयी, लेकिन ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री ने भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाए अपनी आंखे ही बंद कर ली हैं। भ्रष्टाचार से जुड़ा यह मामला उन तथाकथित वरिष्ठ पत्रकारों से जुड़ा हुआ है जो कलम के बजाए कथित दलाली के सहारे अब तक अपना हित साधते आए हैं। कुछ तो ऐसे हैं जिनका न तो पहले कभी समाचार लेखन से सम्बन्ध था और न ही वर्तमान में। 

”इसके बावजूद वे मान्यता प्राप्त पत्रकार बनकर सरकारी आवासों का लुत्फ उठा रहे हैं। गौरतलब है कि राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त पत्रकारों की संख्या लगभग 700 तक पहुंच चुकी है। जिला और मण्डल स्तर पर मान्यता की सूची हजारों का आंकड़ा पार कर चुकी है। अचम्भे की बात यह है कि मुख्यमंत्री की प्रेस वार्ता हो या फिर किसी अन्य मंत्री की। समाचारों से सरोकार रखने वाले पत्रकारों की संख्या उंगली पर गिनी जा सकती है। गिने-चुने प्रतिष्ठित अखबारों में ही प्रेस विज्ञप्तियां भी प्रकाशित होती हैं। फिर हजारों की संख्या में पत्रकारों का मान्यता देना गले नहीं उतरता। 

”मान्यता के पीछे का खेल कुछ और ही कहानी कह रहा है। मान्यता के सहारे न्यूनतम दर पर सरकारी आवास का आवंटन ऐसे पत्रकारों का मुख्य ध्येय है। उसके बाद उसे किराए पर उठाकर प्रत्येक माह मोटी कमाई की जा रही है। इस बात की जानकारी सूचना विभाग काफी पहले शासन को दे चुका है। आश्चर्य तब होता है जब प्रति माह किराए के रूप में मोटी रकम कमाने वाले पत्रकार सरकार का मामूली किराया तक चुकाने में आना-कानी करने लगते हैं। कुछ तो ऐसे तथाकथित पत्रकार हैं जिन्होंने लाखों का किराया नहीं दिया। दबाव पड़ा तो दूसरा सरकारी आवास आवंटन करवा लिया, जबकि राज्य सम्पत्ति निदेशालय की आवास आवंटन नियमावली में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि यदि कोई पत्रकार किराये का बकायदार हो, तो उसका आवंटन तत्काल प्रभाव से निरस्त करने के साथ ही नियमों के तहत कानूनी कार्यवाही कर उससे किराया वसूला जायेगा। गौरतलब है कि प्रथम बार आवंटन एक वर्ष के लिए किया जाता है। उसके पश्चात एक-एक वर्ष के लिए नवीनीकरण करते हुए दो वर्ष तक आवंटन किया जायेगा। 

”नियमानुसार नवीनीकरण पर तभी विचार किया जायेगा जब पूर्व आवंटन अवधि में आवंटी ने आवंटन शर्तों का किसी प्रकार से उल्लंघन न किया हो। किन्ही विशेष परिस्थितियों में राज्य सरकार द्वारा नवीनीकरण अवधि तीन वर्ष के पश्चात भी बढ़ायी जा सकती है, जो तीन वर्ष के पश्चात दो वर्ष से अधिक नहीं होगी। अत्यंत विशिष्ट परिस्थितियों में 5 वर्ष के बाद मुख्यमंत्री के अनुमोदन से ही आवंटन अवधि बढ़ायी जा सकती है। यह सुविधा पाने के लिए सर्वाधिक जरूरी है कि आवंटी समय से किराए का भुगतान करता रहे। इतनी सख्त नियमावली के बावजूद पिछले दो दशकों से जो तस्वीर उभरकर सामने आ रही है वह बेहद चैंकाने वाली है। कुछ पत्रकार ऐसे हैं जिनका कई वर्षों से किराया जमा नहीं किया गया है, इसके बावजूद न तो उनका आवंटन रद्द किया गया और न ही बकाया किराया वसूल करने में विभाग दिलचस्पी दिखा रहा है। 

”कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने किराए की भारी-भरकम राशि जमा करने के बजाए अपने सियासी और नौकरशाहों से सम्पर्कों का फायदा उठाते हुए न सिर्फ लाखों का किराया माफ करवा लिया बल्कि अपग्रेडेड मकान का आवंटन करवा कर सरकारी नियमावली को भी चुनौती देते चले आ रहे हैं। इस काम में सूचना विभाग की भूमिका प्रमुख है। इसी विभाग के सहारे उन कथित पत्रकारों की मान्यता के लिए संस्तुति की जाती है जिनका समाचारों से भले ही सम्बन्ध न रहा हो, लेकिन अधिकारियों के लिए दलाली ने उन्हें पत्रकार जरूर प्रमाणित कर रखा है। जहां तक राज्य सम्पत्ति निदेशालय की जिम्मेदारी की बात है तो वह अपने उच्चाधिकारियों के आदेशों के आगे विवश है। राज्य सम्पत्ति निदेशालय के अधिकारियों की मानें तो किराया जमा न करने वाले तथाकथित पत्रकारों की जानकारी वह कई बार शासन को दे चुका है लेकिन शासन में बैठे अधिकारी कथित पत्रकारों की इसी कमी का फायदा उठाते हुए अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। विडम्बना यह है कि सब कुछ जानते हुए भी जिम्मेदार अधिकारियों से लेकर स्वयं मुख्यमंत्री की खामोशी बेहद चैंकाने वाली है। 

”अभी हाल ही में सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के माध्यम से राज्य सम्पत्ति निदेशालय से किराए के रूप में 20 हजार रूपयों से अधिक बकायेदार पत्रकारों की सूची मांगी गयी। राज्य सम्पत्ति विभाग के जन सूचनाधिकारी/संयुक्त निदेशक पवन कुमार गंगवार ने जो सूचना उपलब्ध करवायी है वह बेहद चैंकाने वाली है। तथाकथित वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में शुमार तीन दर्जन से भी ज्यादा पत्रकार ऐसे हैं जिनका किराया 25 हजार से लेकर सवा लाख तक बकाया है। कुछ तो ऐसे हैं जो पूर्व में आवंटित मकानों का लाखों का किराया न जमा करने के बाद भी नए मकान में तो अध्यासित हैं, साथ ही वर्तमान में भी किराया जमा नहीं कर रहे हैं। इसके बावजूद राज्य सम्पत्ति निदेशालय नियमावली के तहत उनसे मकान खाली करवाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। 

”बताया जाता है कि जब-जब ऐसे बकायदारों को नोटिस भेजी जाती है तब-तब एक ऐसे आई.ए.एस. अधिकारी का फोन राज्य सम्पत्ति निदेशालय में घनघनाने लगता है जो वर्तमान में मीडिया की गरिमा को तार-तार करने वाले तथाकथित पत्रकारों का मसीहा बना हुआ है। इस अधिकारी के केबिन में हर वक्त ऐसे ही पत्रकारों का जमावड़ा लगा रहता है जो दिन-भर उसकी स्तुति करते रहते हैं। एवज में कथित पत्रकारों को मिलता है शाही संरक्षण। कुछ वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि इस अधिकारी के चमचों की फौज में शीर्ष पर हेमंत तिवारी नाम का एक ऐसा तथाकथित पत्रकार शामिल है जिसका लाखों का किराया पूर्व के मकान का माफ किया जा चुका है और वर्तमान में भी इस पत्रकार पर 66 हजार 880 रूपया किराये रूप में बकाया है। हेमंत तिवारी को वी.आई.पी. कालोनी कहे जाने वाले बटलर पैलेस में भवन संख्या बी-7 आवंटित है। वर्तमान बकाए का खुलासा आर.टी.आई. एक्ट के सहारे राज्य सम्पत्ति निदेशालय ने हाल ही में 4 अगस्त 2015 को उपलब्ध करवाया है। निदेशालय के जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि इस सम्बन्ध में हेमंत तिवारी को तो नोटिस भेजी ही गयी थी साथ ही शासन को भी अवगत कराया जा चुका है। 

”निदेशालय के एक कर्मचारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि हेमंत तिवारी से किराए की रिकवरी न करने के लिए उच्च स्तर से रोक लगायी गयी है। जाहिर है हेमंत तिवारी एक बार फिर से राज्य सम्पत्ति निदेशालय को किराए न जमा करके लाखों का चूना लगाने की फिराक में हैं। गौरतलब है कि हेमंत तिवारी को बी-7, बटलर पैलेस आवंटित होने से पूर्व इसी काॅलोनी के भवन संख्या में सी-76 आवंटित किया गया था। राज्य सम्पत्ति निदेशालय ने इस भवन को काफी समय तक अपने रिकाॅर्ड में अनाधिकृत रूप से कब्जे के तौर पर घोषित कर रखा है। अवैध कब्जा करने वाले का नाम भी हेमंत तिवारी के रूप में रजिस्टर में अंकित था। इस सम्बन्ध में विभाग का कहना था कि चूंकि हेमंत तिवारी 1 नवम्बर 2001 से राजधानी लखनऊ से बाहर थे लिहाजा उनका आवंटन रद्द कर दिया गया था। चूंकि उन्होंने मकान का कब्जा निदेशालय को नहीं दिया था लिहाजा निदेशालय ने हेमंत तिवारी को उक्त मकान का अवैध कब्जेदार घोषित कर रखा था। 

”कहा जाता है कि इस बीच विभाग की ओर से हेमंत तिवारी को कई नोटिसें भेजी गयीं लेकिन किसी का भी जवाब उन्होंने नहीं दिया और न ही उन्होंने कब्जा ही छोड़ा। ज्ञात हो मान्यता प्राप्त पत्रकारों को सरकारी आवास तभी आवंटित हो सकता है जब वे राजधानी लखनऊ में कार्यरत होने के साथ ही उनके अखबार का ब्यूरो कार्यालय भी लखनऊ में हो। हेमंत तिवारी इन नियमों में से किसी नियमों पर खरे नहीं उतरते थे इसके बावजूद सी-76, बटलर पैलेस उनके कब्जे में रहा। इधर हेमंत तिवारी की दबंगई से क्षुब्ध होकर राज्य सम्पत्ति निदेशालय के अधिकारियों के निर्देश पर विहित प्राधिकारी ने उक्त अवधि का बकाया किराया चार लाख, पांच हजार, आठ सौ, बाइस रूपए (04,05,822.00) के लिए वर्ष 2003 में उनके विरूद्ध बेदखली का आदेश भी पारित किया था। निदेशालय ने यह भी जानकारी दी कि इससे पूर्व वे पूर्ण पत्रकार के रूप में किसी अखबार में कार्यरत भी नहीं थे। 16 अगस्त 2004 को सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय ने इन्हें पूर्णकालिक पत्रकार के रूप में मान्यता दी थी। अब प्रश्न यह उठता है कि जब हेमंत तिवारी मान्यता प्राप्त पत्रकार थे ही नहीं तो इन्हें सरकारी आवास आवंटन नियमावली के खिलाफ मकान का आवंटन कैसे कर दिया गया ? क्या सम्बन्धित विभाग के जिम्मेदार अधिकारी किसी के दबाव में तथाकथित भ्रष्ट पत्रकार को संरक्षण देते रहे ? 

”ज्ञात हो जिस वक्त निदेशालय ने हेमंत तिवारी के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी उस वक्त भी सूबे में सपा की सरकार थी। चैंकाने वाला पहलू यह है कि लगभग पांच लाख रूपए किराये के रूप में जमा न करने के बाद भी हेमंत तिवारी को पहले से अच्छा मकान बी-7, बटलर पैलेस आवंटित कर दिया गया। गौरतलब है कि सम्बन्धित विभाग ऐसे पत्रकारों को दूसरा मकान आवंटित नहीं करता है जिन्होंने नियमावली का उल्लंघन किया हो। इधर हेमंत तिवारी ने अपने राजनैतिक और नौकरशाही सम्पर्कों का फायदा उठाते हुए बिना बकाया जमा किए दूसरा मकान आवंटित करवा कर यह दिखा दिया कि नियम-कानून उसके लिए कोई मायने नहीं रखते। वर्तमान में 66 हजार से ज्यादा बकाये के बारे में भी राज्य सम्पत्ति निदेशालय के अधिकारी और कर्मचारी चुप्पी साधे हुए हैं। एक कर्मचारी का कहना है कि उच्च स्तर से हेमंत तिवारी को किराए के लिए परेशान न किए जाने का मौखिक निर्देश निदेशालय को दिया जा चुका है। हालांकि इस कर्मचारी ने उच्च स्तर से मौखिक आदेश देने वाले अधिकारी का नाम नहीं बताया है लेकिन कहा जाता है कि यह आदेश देने वाले कोई और नहीं बल्कि प्रमुख सचिव सूचना नवनीत सहगल हैं। यह आरोप कहां तक सत्य है ? यह तो जांच का विषय हो सकता है लेकिन तथाकथित पत्रकार हेमंत तिवारी से किराया वसूलने की हिम्मत न तो निदेशालय के अधिकारियों में नजर आ रही है और न ही किसी उच्च अधिकारी में। 

”गौरतलब है कि राजधानी लखनऊ के एक वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर भी हेमंत तिवारी के कथित भ्रष्टाचार का खुलासा सोशल साइट (फेसबुक) में काफी समय से करते आ रहे हैं। कुमार सौवीर ने सोशल साइट पर अपनी पोस्ट में हेमंत तिवारी को दलाल, ठग और कुकर्मी तक लिखा है। कुमार सौवीर अपनी पोस्ट में लिखते हैं कि हेमंत तिवारी का ताजा किस्सा देहरादून की एक महिला के साथ दुराचार और ठगी से भी जुड़ा हुआ है। कुमार सौवीर लिखते हैं कि हेमंत तिवारी का असली धंधा गिरोहबाजों और अपराधियों को शरण देना ही है। हेमंत और उसके शातिर अपराधी और उसके गिरोह के लोग यूपी समेत पूरे देश और भूटान, नेपाल तक पसरे हुए हैं। कुमार सौवीर के अनुसार हेमंत तिवारी ऐसी गिरोहबाजो को संगठित करने के लिए पहले बाकायदा चुन-चुन कर शातिर अपराधियों को चिंहित करते हैं। इसके बाद ऐसे अपराधियों को सुरक्षित शरण देने की साजिश के तहत उसे पत्रकार अथवा वरिष्ठ पत्रकार की मान्यता दिलवा दे देते हैं। यूपी प्रेस मान्यताप्राप्त पत्रकार समिति के अध्यक्ष होने के प्रभाव के चलते यह कर पाना हेमंत तिवारी के दाहिने हाथ का काम होता है। 

”कुमार सौवीर का कहना है कि रतनलाल शर्मा नाम के एक ठग को भी हेमंत तिवारी ने मान्यता दिलवायी है। हेमंत तिवारी की कृपा से मान्यताप्राप्त कथित वरिष्ठ पत्रकार रतनलाल शर्मा ने देहरादून के स्कूल की संचालिका से लखनऊ स्थित योजना भवन के पास एक अपार्टमेंट में दुष्कर्म किया और वीडियो बना कर लाखो की वसूली भी की। दुष्कर्म के दौरान कुछ असलहाधारी लोग भी मौजूद थे। हालांकि कथित ठगी, धोखाधड़ी और बलात्कार की शिकार महिला ने हेमंत तिवारी का नाम नहीं लिया है लेकिन चर्चा यही है कि श्री तिवारी अपने मित्र रतनलाल शर्मा के साथ ही थे। हालांकि यह आरोप जांच का विषय हो सकते हैं लेकिन ठगी और बलात्कार के आरोपी रतनलाल शर्मा से उनकी नजदीकियां उन्हें संदेह के दायरे में लाने के लिए काफी हैं। 

”एक अन्य कथित पत्रकार हैं सुरेश कृष्ण यादव। ये अपने आपको उद्यमी राजधानी टाइम्स का पत्रकार कहलाते हैं। यह दीगर बात है कि इस नाम का अखबार किसी ने न देखा हो लेकिन सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय ने इन्हें मान्यता दे रखी है। इसी आधार पर इन्हें सरकार की वी.आई.पी. कालोनी कहे जाने वाले बटलर पैलेस में सी-22 नम्बर का मकान आवंटित किया गया है। इन पर 77 हजार 490 रूपया किराए के रूप में राज्य सम्पत्ति निदेशालय का बकाया है। निदेशालय इन्हें भी किराया जमा करने के लिए तमाम नोटिसें भेज चुका है लेकिन न तो किराया जमा किया गया और न ही इनसे मकान ही खाली करवाया गया। इन पर आरोप है कि इन्होंने गलत हलफनामा देकर आवास आवंटन करवाया है। यह बात राज्य सम्पत्ति निदेशालय भी भलीभांति जानता है लेकिन अधिकारियों की चापलूसी करने वालों के खिलाफ निदेशालय कार्यवाही करने से हिचक रहा है। इसी तरह से पी.टी.आई. की वरिष्ठ पत्रकार संगीता के सरकारी आवास का 24 हजार 866 रूपया किराया बकाया है। निदेशालय अनेकों बार नोटिस दे चुका है लेकिन किराया जमा नहीं किया गया। बताया जाता है कि निदेशालय की ओर से दबाव पड़ने की दशा में इन्होंने भी आला अधिकारियों के सहारे अपना स्वार्थ सिद्ध किया है। उद्यमी राजधानी टाइम्स से ही एक अन्य कथित पत्रकार प्रतिभा सिंह को भी सी-30, बटलर पैलेस का मकान पत्रकार की हैसियत से आवंटित है। इन्हें भी पत्रकार साबित करने के लिए सूचना विभाग के अधिकारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। राज्य सम्पत्ति निदेशालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रतिभा सिंह पर 1 लाख 10 हजार 614 रूपए किराए के रूप में बकाया हैं। विभाग आज तक किराए की रकम वसूल नहीं कर पाया है। 

”राज्य सम्पत्ति निदेशालय को चूना लगाने वालों में कई वरिष्ठ पत्रकार ऐसे भी हैं जिनका कद तो ऊंचा है लेकिन उनकी नीयत उनके कद से कहीं ज्यादा खराब है। खबरिया चैनल के कई पत्रकार ऐसे हैं जिन्होंने नियम-विरूद्ध तरीके से मकान आवंटित करवाने के लिए फर्जी हलफनामों का सहारा लिया। हालांकि निदेशालय की ओर से ऐसे पत्रकारों को अनेकों बार नोटिस भेजी जा चुकी हैं इसके बावजूद तथाकथित पत्रकारों ने न तो किराया जमा किया और न ही मकान खाली किया। कुछ वरिष्ठ पत्रकार ऐसे हैं जिनकी विभाग में ही बल्कि नौकरशाहों के बीच तूती बोलती है। अलबत्ता निदेशालय की ओर से ऐसे पत्रकारों केा महज मौखिक तौर पर किराया जमा करने का आग्रह किया जाता है। 

”उर्दू दैनिक ‘जायजा’ के नावेद शिकोह को डालीबाग कालोनी में मकान संख्या 1/11 आवंटित है। इन पर 24 हजार 542 रूपए किराए के रूप में बकाया है। इसी तरह से स्वतंत्र भारत समाचार-पत्र के पत्रकार हेमेन्द्र तोमर को डालीबाग में मकान संख्या 1/16 आवंटित है। इन्होंने भी 23 हजार 992 रूपए किराए के रूप में जमा नहीं किए हैं। कहा जाता है कि ये न तो निदेशालय से जारी की गयी नोटिसों का जवाब देते हैं और न ही निदेशालय इनसे मकान ही खाली करवा पा रहा है। देशबंधु समाचार पत्र के अनिल त्रिपाठी पर 33 हजार 603 रूपया किराए के रूप में बकाया है। इन्हें डालीबाग में मकान संख्या 2/7 आवंटित किया गया है। जनसत्ता एक्सपे्रस की एक संवाददाता को भी डालीबाग कालोनी में मकान आवंटित है। इन्होंने कई वर्षों से मकान का किराया जमा नहीं किया है इसके बावजूद ये सरकारी मकान में अध्यासित हैं। इन पर हजारों रूपया किराए के रूप में बकाया है। 

”प्रमुख सूचना के पद पर विराजमान आई.ए.एस. अधिकारी नवनीत सहगल के बेहद करीबी समझे जाने वाले कथित पत्रकार जोरैर अहमद आजमी सूचना विभाग में मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूची में शामिल हैं। इसी आधार पर इन्हें भी डालीबाग कालोनी में मकान संख्या 4/3 आवंटित हैं। पिछले कई वर्षों से इन्होंने भी राज्य सम्पत्ति निदेशालय में किराया जमा नहीं किया है। वर्तमान में किराए के रूप में इनकी बकाया राशि 64 हजार 373 हो चुकी है। जानकारों का कहना है कि आई.ए.एस. अधिकारी के बेहद करीबी इस पत्रकार के खिलाफ राज्य सम्पत्ति निदेशालय कार्यवाही करने में हिचकिचा रहा है। सूत्रों को आधार मानें तो श्री सहगल के मौखिक आदेश पर ही राज्य सम्पत्ति निदेशालय अब तक चुप्पी साधकर बैठा है। श्री सहगल से जोरैर अहमद आजमी की निकटता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि आजमी कई बार सोशल साइट पर श्री सहगल तो पृथ्वी पर अपना दूसरा खुदा लिखते रहे हैं। इनके करीबी पत्रकार मित्रों का तो यहां तक कहना है कि श्री सहगल ने अंधभक्ति के एवज में आजमी के लिए प्रिंटिंग मशीन तक मुहैया करायी है। श्री सहगल से इनकी निकटता ने इन्हें टूटी स्कूटर से लग्जरी कार तक पहुंचा दिया है। इनका स्पष्टवक्ता नाम से एक अखबार प्रकाशित होता है। आम जनता के बीच भले ही यह अखबार नजर न आता हो लेकिन सरकार की स्तुति करने वाला यह अखबार अधिकारियों और मंत्रियों की मेज तक जरूर पहुंच जाता है। 

” ‘विश्व भारत’ समाचार-पत्र के संवाददाता दिनेश शर्मा को डालीबाग में मकान संख्या 6/8 आवंटित है। इन पर भी 22 हजार से ज्यादा का किराया बकाया है। पिछले लगभग एक वर्ष से न तो इन्होंने किराया जमा किया है और न ही राज्य सम्पत्ति निदेशालय इनसे मकान ही खाली करवा पा रहा है। यूनाईटेड भारत के संवाददाता एस.पी. सिंह भी बकायेदारों की सूची में शामिल हैं। इन पर भी 22 हजार से ज्यादा का किराया बकाया है। इन्हें डालीबाग की सरकारी कालोनी में मकान संख्या 7/2 आवंटित है। हिन्दुस्तान टाइम्स के प्रमुख संवाददाता मनीष चन्द्र पाण्डेय को भी अपने बकायेदार पत्रकार साथियों का रोग लग गया। इन्हें डालीबाग में मकान संख्या 8/15 आवंटित है। इन्होंने भी पिछले लगभग दो वर्षों से किराया जमा नहीं किया है। इन पर 28 हजार 473 रूपया किराए के रूप में बकाया है। राज्य सम्पत्ति विभाग इनसे भी किराए की वसूली नहीं कर पा रहा है। फोटो न्यूज एजेंसी के तथाकथित पत्रकार के.सी. बिश्नोई को डालीबाग कालोनी में मकान संख्या 9/5 आवंटित है। इन पर 25 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। फिलवक्त ये किस मीडिया से जुडे़ हुए हैं ? इसकी जानकारी किसी को नहीं है। विभाग ने न तो जांच करवायी और न ही नियमावली का उल्लंघन करने के एवज में इनसे मकान ही खाली करवाया। एशिया डिफेंस न्यूज की संवाददाता नायला किदवई को पत्रकार की हैसियत से पार्क रोड स्थित सरकारी कालोनी में मकान संख्या ए-3 आवंटित है। 

”इनका समाचार-पत्र महज फाइलों तक सीमित है। इसके बावजूद इन्होंने फर्जी हलफनामा देकर सरकारी मकान आवंटित करवाने में सफलता हासिल कर ली। इन पर भी राज्य सम्पत्ति का 27 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। ये उत्तर-प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति की सदस्य भी हैं। यू.एन.आई. के वरिष्ठ संवाददाता जय प्रकाश त्यागी को पार्क रोड स्थित सरकारी आवास संख्या ए-12 आवंटित है। आवास आवंटन की नियमावली तो यही कहती है कि यदि आवंटी समय से किराया जमा नहीं करता है तो उसका आवास निरस्त कर दिया जायेगा लेकिन जय प्रकाश त्यागी के मामले में भी राज्य सम्पत्ति निदेशालय चुप्पी साधकर बैठा है। या यूं कह लीजिए निदेशालय अपने आला अधिकारियों को नाराज कर अपने स्तर से फैसला नहीं ले सकता। क्योंकि कहा यही जा रहा है कि श्री त्यागी के मामले में भी उच्च स्तर से हस्तक्षेप करने की इजाजत विभाग को नहीं दी गयी है। श्री त्यागी पर 34 हजार 466 रूपया किराया के रूप में बकाया है। विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि श्री त्यागी ने पिछले लगभग दो वर्षों से किराया जमा नहीं किया है। इस दौरान कई बार नोटिस भी जारी की जा चुकी है। पंजाब केसरी के प्रमुख संवाददाता अविनाश चन्द्र मिश्रा को सरकारी आवास संख्या सी-6,पार्क रोड़ आवंटित है। इन्होंने भी पिछले दो वर्षों से मकान का किराया जमा नहीं किया है। इन पर किराए के रूप में 32 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। यही हाल अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित समाचार-पत्र अमर उजाला के प्रमुख संवाददाता अजीत कुमार खरे का भी है। उन्हें सी-15, पार्क रोड का आवास आवंटित है। इन पर 35 हजार 280 रूपया किराए के रूप में बाकी है। 

”राष्ट्रीय सहारा के वरिष्ठ पत्रकार देवकी नन्दन मिश्रा पर भी 22 हजार से ज्यादा किराए के रूप में बकाया है। इन्हें अलीगंज का सरकारी आवास संख्या एम.आई.जी. 49 आवंटित है। कथित पत्रकार मिथिलेश कुमारी को गोमती नगर में बने सरकारी आवास संख्या बी-106 आवंटित है। इनका कौन सा अखबार प्रकाशित होता है? इसकी जानकारी सूचना विभाग के पास मौजूद नहीं है इसके बावजूद इन्हें सरकारी आवास आवंटित किया गया है और वह भी मान्यता प्रदान करने के साथ ही। जाहिर है कि मिथिलेश कुमारी को मान्यता देने के मामले में भी नियमों की अनदेखी की गयी है। मिथिलेश कुमारी पर 21 हजार 825 रूपया किराए के रूप में बकाया है।  दैनिक समाचार-पत्र ‘आज’ के वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश सिंह के नाम से भी सरकारी आवास संाख्या 405, लाप्लास आवंटित है। इन्होंने पिछले कई वर्षों से मकान का किराया जमा नहीं किया है। इसके बावजूद सरकारी आवास पर इनका कब्जा बना हुआ है। श्री सिंह पर राज्य सम्पत्ति निदेशालय का 54 हजार 487 रूपया किराए के रूप में बकाया है। सम्बन्धित विभाग पिछले कई वर्षों से किराए की मांग करता आ रहा है। यहां तक कि जिम्मेदार आला अधिकारियों को भी विभाग सूचित कर चुका है इसके बावजूद न तो किराया जमा हुआ और न ही मकान खाली किया गया। वरिष्ठ पत्रकार के रूप में पहचान रखने वाले किशोर निगम पर सरकारी आवास का 35 हजार 787 रूपया किराए के रूप में बकाया है। इन्हें लाप्लास कॉलोनी में मकान संख्या 504 आवंटित है। 

”सहारा समय के आलोक पाण्डेय पर किराए के रूप में 85 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। राज्य सम्पत्ति निदेशालय अपने स्तर से इन्हें दर्जनों नोटिसें भेज चुका है। इसके बावजूद न तो कब्जा हटा और न ही किराए की वसूली ही हो सकी। लाप्लास कालोनी का आवास संख्या 803, सहारा समय के संवाददाता आलोक पाण्डेय के नाम पर आवंटित है। मोहसिन हैदर रिजवी को सूचना विभाग ने वरिष्ठ पत्रकार का तमगा दे रखा है। इसी आधार पर इन्हें लाप्लास कालोनी में मकान संख्या 901 आवंटित है। इन पर 46 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। इसके बावजूद ये सरकारी कालोनी में वर्षों से अध्यासित हैं। सूचना विभाग की सूची में विशेष संवाददाता के रूप में अंकित राजबहादुर सिंह को लाप्लास कालोनी का बंगला संख्या 1202 आवंटित है। इन पर राज्य सम्पत्ति निदेशालय का किराए के रूप में 31 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में गिने जाने वाले राजबहादुर सिंह के मकान का किराया वसूलने की हिम्मत कोई भी नहीं जुटा पा रहा। हिन्दुस्तान टाइम्म्स के वरिष्ठ फोटोग्राफर अशोक दत्ता भी बकायेदारों की सूची में शामिल हैं। समाचार-पत्र से मोटा वेतन पाने के बावजूद इन्होंने पिछले डेढ़ वर्षों से किराया जमा नहीं किया हैं। इन पर 21 हजार से भी ज्यादा का किराया बाकी है। पायनियर के पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस पर भी 21 हजार से ज्यादा का बकाया है। इन्हें राज्य सम्पत्ति विभाग की ओर से तालकटोरा में सरकारी आवास संख्या ई.डी.-30 आवंटित है। सिद्धार्थ कलहंस उत्तर-प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति में सचिव भी हैं। श्री कलहंस के उच्च स्तरीय सम्बन्धों के चलते राज्य सम्पत्ति निदेशालय खाना-पूर्ति के लिए नोटिस तो भेज देता है लेकिन किराए की वसूली नहीं कर पा रहा है। 

”सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय ने अशोक राजपूत को स्वतंत्र पत्रकार की हैसियत से प्रेस मान्यता दे रखी है। इसी आधार पर इन्हें डायमण्ड डेरी की सरकारी कालोनी में मकान संख्या ई.डी. 31 आवंटित है। इन पर 52 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। रेखा तनवीर ने प्रेस मान्यता हासिल कर मकान आवंटित करवाने के लिए अपना पद ‘उप सम्पादक’ बताया है। वर्तमान में वे किस अखबार में उप सम्पादक के पद पर कार्यरत हैं ? विभाग के पास इसकी जानकारी नहीं है। यही वजह है कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी हासिल करने के दौरान विभाग ने जो दस्तावेज उपलब्ध करवाए हैं उसमें अखबार का नाम अंकित नहीं किया गया है। फिलहाल रेखा तनवीर को गुलिस्तां कालोनी का मकान संख्या 12 आवंटित है। इन पर किराए के रूप में 25 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। गुलिस्तां कालोनी के मकान संख्या 25 में राष्ट्रीय सहारा के विशेष संवाददाता मनमोहन का सरकारी आवास है। इस आवास में वे पिछले कई वर्षों से जमे हुए हैं। इन पर 29 हजार से भी ज्यादा की देनदारी किराए के रूप में है। 

”कई नोटिसें इन्हें दी जा चुकी हैं इसके बावजूद मनमोहन के खिलाफ कार्यवाही नहीं की जा सकी। मकान आवंटन निरस्त करना तो दूर किराए की वसूली के लिए दबाव तक नहीं बनाया गया। वर्तमान में दैनिक जागरण के पत्रकार बसन्त श्रीवास्तव ने समस्त बकायेदारों को पीछे छोड़ दिया है। इन पर 1 लाख 43 हजार से भी ज्यादा का किराया बाकी है। हालांकि विभाग इन्हें दर्जनों नोटिसें मुहैया करा चुका है इसके बावजूद न तो मकान खाली कराया जा सका और न ही किराए की वसूली ही की जा सकी। इनके बारे में कहा जाता है कि ये सुरा के बेहद शौकीन हैं। दिन हो या फिर रात। इन्हें पीने का बहाना चाहिए। विभाग का कहना है कि बसंत श्रीवास्तव के पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। इनकी आर्थिक हालत खराब होने के कारण विभाग नर्मी बरत रहा है। विभाग के दावों में कितना दम है ? यह तो जांच का विषय हो सकता है लेकिन लाखों का किराया जमा न करने के बावजूद सरकारी मकान में जमे रहना, साफ बताता है कि इन्हें भी आला अधिकारियों का वरदहस्त प्राप्त है। बसंत श्रीवास्तव को ओ.सी.आर. बिल्डिंग के ए भवन में मकान संख्या 905 आवंटित है। निकट के लोगों का कहना है कि शाम होते ही यहां पर पीने वालों की महफिल जम जाती है। 

”सुश्री कामना हजेला पर 22 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। सूचना विभाग की सूची में कामना हजेला का नाम संवाददाता के रूप में अंकित है। प्रेस मान्यता के आधार पर इन्हें ओ.सी.आर. बिल्डिंग में भवन संख्या ए-1006 आवंटित है। राज्य सम्पत्ति निदेशालय कहता है कि, इन्हें किराया जमा करने के लिए अनेकों बार नोटिसें जारी की जा चुकी हैं लेकिन इन्होंने न तो किराया जमा किया और न ही मकान खाली किया। सह राजनैतिक सम्पादक के रूप में अंकित ताविसी श्रीवास्तव को ओ.सी.आर. बिल्डिंग में आवास संख्या बी-206 आवंटित है। इन पर भी 33 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। 

”ये तो उन तथाकथित पत्रकारों की सूची है जिन पर 20 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है जबकि राज्य स्तर और जिला स्तर पर 20 हजार तक के बकाया किरायेदारों की संख्या हजारों में है। राज्य सम्पत्ति निदेशालय ऐसे पत्रकारों को सैकड़ों बार नोटिसें भेज चुका है। कुछ के घरों में विभाग के अधिकारियों ने स्वयं छापेमारी की कार्यवाही की और मकान आवंटन निरस्त करने के साथ ही जल्द से जल्द मकान खाली करने का आदेश भी दिया लेकिन जब तक कार्यवाही अंतिम चरण पर पहुंचती इससे पहले ही अधिकारियों का फोन निदेशालय के जोश को ठण्डा करने के लिए पहुंच जाता है। विभाग चाहकर भी न तो किराए की वसूली कर पा रहा है और न ही वर्षों से अवैध रूप में जमे पत्रकारों से मकान ही खाली करवा पा रहा है। खास बात यह है कि इस बात की जानकारी राज्य सम्पत्ति विभाग अपने प्रमुख सचिव के माध्यम से मुख्यमंत्री तक भी पहुंचा चुका है। इसके बावजूद सपा सरकार का यूं मुंह चुराना कुछ अजीब नजर आता है और वह भी उस मुख्यमंत्री से जिसने सत्ता में आते ही भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान किया था। यह विडम्बना नहीं तो और क्या है ? मुख्यमंत्री अपने अधीनस्थ विभाग सूचना विभाग के माध्यम से जारी भ्रष्टाचार को समाप्त करने के बजाए पत्रकारों को खुश रखने की गरज से कार्रवाई करने से हिचक रहे हैं। सिर्फ उन्हीं पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है जो सरकार की स्तुति करने से इंकार करते चले आए हैं। 

”फिलहाल इस मामले को तमाम दस्तावेजों के साथ जल्द ही जनहित याचिका के सहारे चुनौती दिए जाने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी है। जानकार लोगों का कहना है कि यदि न्यायालय ने इस मामले को गंभीरता से संज्ञान में लिया तो निश्चित तौर पर हजारों की संख्या में न सिर्फ मान्यता की आड़ में दलाली का धंधा करने वालों को चुनौती मिलेगी बल्कि हजारों की संख्या में सरकारी आवास भी खाली हो जायेंगे।

”मुख्यमंत्री कार्यालय भी असुरक्षित : लोकतंत्र के स्वयंभू ‘चतुर्थ स्तम्भ’ मीडिया को संविधान में भले ही कोई स्थान न मिला हो, लेकिन मीडिया जगत के तथाकथित मठाधीश खुलकर नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। ज्ञात हो किसी भी सरकारी भवन में सुरक्षा की दृष्टि से किसी भी निजी संस्थान अथवा समिति का कार्यालय नहीं खोला जा सकता। यदि बात सूबे के मुख्यमंत्री कार्यालय की सुरक्षा से जुड़ी हो तो मामला और अधिक संवेदनशील हो जाता है। यहां बात हो रही है ‘‘उत्तर-प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति’’ के कार्यालय की। इस समिति का सरकार से भले ही कोई सम्बन्ध न हो, लेकिन इसका कार्यालय लाल बहादुर शास्त्री भवन में खुला है। ज्ञात हो भवन में सूबे के मुख्यमंत्री का कार्यालय है। यहीं पर महत्वपूर्ण शीर्ष अधिकारियों के भी कार्यालय हैं। सुरक्षा की दृष्टि से इस भवन में चैबीसों घण्टे विशिष्ट सुरक्षा कर्मी तैनात रहते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की चाक-चैबन्द सुरक्षा में सेंध लगाने वाली समिति के कार्यालय पर शायद किसी की नजर नहीं पड़ी, अन्यथा मुख्यमंत्री की सुरक्षा में इतनी बड़ी लापरवाही को नजरअंदाज न किया जाता। मुख्यमंत्री की सुरक्षा में सबसे बड़ी सेंध लगाने का कार्य समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने किया है। हेमंत तिवारी ने अपने कथित मित्र रतनलाल शर्मा को पहले प्रेस मान्यता दिलवायी, उसके बाद उसका मुख्यमंत्री कार्यालय स्थित एनेक्सी मीडिया सेंटर में आना-जाना शुरू करवा दिया। गौरतलब है कि ये वही रतनलाल शर्मा हैं जिनके खिलाफ देहरादून की एक महिला ने बलात्कार और 20 लाख रूपए ठगे जाने का आरोप लगाया था। हेमंत तिवारी संग रतनलाल शर्मा की नजदीकी को लेकर पत्रकार खेमे में यह चर्चा आम है कि हेमंत तिवारी अपनी इसी दागी साथी के सहारे ठगी के धंधे को अंजाम देते आ रहे है। ये आरोप कहां तक सत्य हैं ? यह जांच का विषय हो सकता है लेकिन एक कथित बलात्कारी और ठग का मुख्यमंत्री कार्यालय में आना-जाना मुख्यमंत्री की सुरक्षा में सेंध लगा सकता है। समिति के वर्तमान अध्यक्ष ‘हेमंत तिवारी’ अपने विजिटिंग कार्ड और लेटरहेड पर समिति के कार्यालय का पता ‘मुख्यमंत्री कार्यालय’ का छपवाकर अधिकारियों से लेकर नेताओं तक रौब गांठते हैं। कुछ वरिष्ठ पत्रकारों की मानें तो सरकार की यह चूक किसी भी समय किसी बड़े हादसे को अंजाम दे सकती है।

”जब मुख्यमंत्री कार्यालय को निजी संस्थाएं अपना कार्यालय बताने लगें तो निश्चित तौर पर मुख्यमंत्री की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो सकते हैं। जब तथाकथित पत्रकारों का संगठन गैर पत्रकारों को भी मुख्यमंत्री कार्यालय में बुलाकर चाय-नाश्ता करवाने लगे और वह भी सुरक्षा प्रहरियों पर दबाव बनाकर, तो यह मान लेना चाहिए कि मुख्यमंत्री की सुरक्षा में किसी भी वक्त सेंध लग सकती है। जब उत्तर-प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष की संस्तुति पर एक कथित बलात्कारी और ठग को प्रेस मान्यता मिल जाए और वह भी मुख्यमंत्री कार्यालय के एनेक्सी मीडिया सेंटर में बैठकी करने लगे तो निश्चित तौर पर मुख्यमंत्री की सुरक्षा बरकरार नहीं रह सकती। मामला उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय लाल बहादुर शास्त्री भवन (सचिवालय, एनेक्सी भवन), लखनऊ की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है, और संदेह के दायरे में हैं उत्तर-प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी। यह जानकार आश्चर्य होगा इस पत्रकार समिति ने अपने कार्यालय का पता मुख्यमंत्री कार्यालय का दे रखा है। बकायदा लेटरहेड और समिति के अध्यक्ष से लेकर सदस्यों तक ने अपने विजिटिंग कार्ड में कार्यालय का पता सचिवालय एनेक्सी भवन का दे रखा है। 

”जहां तक समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी पर अविश्वास की बात है तो इन पर पत्रकारों का समूह भी उंगली उठाता आया है। हाल ही में घटित एक घटना ने इनकी विश्वसनीयता को और अधिक संदेह के दायरे में ला खड़ा किया है। ज्ञात हो रतनलाल शर्मा नाम का एक व्यक्ति देहरादून की एक महिला के साथ बलात्कार और लाखों रूपए ऐंठने के मामले में चर्चा में आया था। बकायदा हुसैनगंज थाने में नामजद प्राथमिकी भी दर्ज की जा चुकी है। पुलिस जांच कर रही है। जांच का परिणाम क्या होगा ? यह तो भविष्य के गर्त में है लेकिन जहां तक आरोपी रतनलाल शर्मा की बात है तो ये पत्रकार समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी के बेहद करीबी लोगों में शुमार है। बताया जाता है कि हेमंत तिवारी की कृपादृष्टि से ही इन्हें पत्रकार मान्यता प्राप्त हुई थी। रतनलाल शर्मा भी स्वयं यह बात कहते हैं कि वे एक मीडिया ग्रुप से जुड़े हुए हैं। ये ग्रुप हेमंत तिवारी का ही है। 

”एक ठग और तथाकथित बलात्कारी से हेमंत के सम्बन्धों को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। एक वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर सोशल साइट पर इस बात का उल्लेख कर चुके हैं कि ठग और बलात्कारी रतनलाल शर्मा के संग हेमंत तिवारी के गहरे सम्बन्ध हैं। कई पोस्टरों में रतनलाल शर्मा के साथ हेमंत तिवारी को भी देखा जा सकता है। अब प्रश्न यह उठता है कि एक तथाकथित अपराधी से सम्बन्ध रखने वाले हेमंत तिवारी को संदेह के दायरे में लाते हुए जांच क्यों नहीं की गयी? इन सबसे विरत महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उत्तर-प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति का कार्यालय मुख्यमंत्री कार्यालय में खोलने की अनुमति किसने दी? क्या नियमानुसार और सुरक्षा की दृष्टि से एक निजी समिति का कार्यालय मुख्यमंत्री कार्यालय में खोला जा सकता है? इसके पीछे दोष किसका है? समिति के अध्यक्षों का या फिर मुख्यमंत्री कार्यालय में पत्रकारों की समिति का कार्यालय खोले जाने की अनुमति देने वाले अधिकारियों का? वह अधिकारी कौन है जिसने यह अनुमति प्रदान की? खास बात यह है कि सूचना डायरी में भी पत्रकारों की इस समिति का कार्यालय मुख्यमंत्री कार्यालय दर्शाया गया है। 

”पत्रकारों के एक वर्ग का साफ कहना है कि मुख्यमंत्री कार्यालय की सुरक्षा का दायित्व संभालने वालों ने मुख्यमंत्री की सुरक्षा को नजरअंदाज करते हुए पत्रकार समिति के कार्यालय की अनुमति देकर मुख्यमंत्री की सुरक्षा में सेंध लगायी है। यदि मुख्यमंत्री की सुरक्षा में कभी सेंधमारी होती है तो निश्चित तौर पर इस पत्रकार समिति के कार्यालय के माध्यम से ही होगी।”

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लखनऊ में दैनिक हिंदुस्तान के दफ्तर पर भीड़ के साथ सभासद का हमला, कई घायल, फोर्स तैनात

लखनऊ : दबंग सत्ताधारियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि अब पत्रकार ही नहीं, प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान भी उनके निशाने पर आ गए हैं। लखनऊ में गोमतीनगर स्थित दैनिक हिन्दुस्तान के कार्यालय पर सभासद के भाई ने अपने समर्थकों के साथ हमला कर दिया। हमले में एचआर हेड आशीष मित्तल का सिर फट गया। कई अन्य कर्मियों को भी चोटें आई हैं। 

बताया गया है कि आफिस के सामने सभासद के भाई की बाइक स्वास्थ्य विभाग के एक कर्मचारी से भिड़ गई थी। उसे हिन्दुस्तान के कर्मचारी बचा कर दफ्तर के अंदर ले आए थे। इसी बात पर भीड़ ने पहले हिंदुस्तान कार्यालय, फिर लोहिया अस्पताल में इलाज कराने पहुँचे कर्मचारियों पर हमला कर दिया। 

कहा जा रहा है कि हिंदुस्तान कार्यालय के पीछे ही यादव समुदाय की बस्ती है। सभासद के उकसावे पर वहीं के लोगों ने धावा बोला। रीजनल एचआर हेड को लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया है। दो रिपोर्टरों सहित कई कर्मी चोटिल हैं। सहीं संख्या का अभी पता नहीं चल सका है। अस्पताल और हिंदुस्तान कार्यालय दोनों जगह फोर्स तैनात कर दिया गया है।

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जागरण संवाददाता को पितृ-शोक

लखनऊ : दैनिक जागरण उत्तर प्रदेश व्यूरों के विशेष संवाददाता अवनीश त्यागी के छियासी वर्षीय पिता रामेश्वर प्रसाद त्यागी के निधन पर भारतीय जनता पार्टी ने दुखः व्यक्त किया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डा0 लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने दिवगंत आत्मा को अपनी भावभीनी श्रद्घांजलि देते हुए कहा कि समाज की अपूरणीय क्षति हुई है। दुख की इस घड़ी में भाजपा परिवार उनके साथ है।

प्रदेश भाजपा प्रवक्ता डा. चन्द्रमोहन, विजय बहादुर पाठक, डा0.मनोज मिश्र, हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव, आई.पी. सिंह, प्रदेश मीडिया प्रभारी मनीष शुक्ला, सह मीडिया प्रभारी मनीष दीक्षित, अनीता अग्रवाल, मुख्यालय प्रभारी भारत दीक्षित, सह प्रभारी चौ. लक्ष्मण सिंह ने स्व. रामेश्वर प्रसाद त्यागी सेवानिवृत्त एडीओ के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं।

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यूपी : डॉ.नूतन ठाकुर की जमीन पर सहकारिता मंत्री शिवपाल सिंह यादव की कुदृष्टि

उत्पीड़न और दमन के सारे संभव तरीके हम पर अपनाए जा रहे हैं. मेरे निलंबन, विभागीय जांच, सतर्कता जाँच के बाद नूतन द्वारा विधिवत खरीदी गयी और 11 साल से शांतिपूर्ण कब्जे की जमीन पर सहकारिता मंत्री शिवपाल सिंह यादव व्यक्तिगत रुचि लेकर सम्बंधित सहकारी समिति द्वारा कई प्रकार के विवाद खड़े करने के प्रयास कर रहे हैं. 

विश्वास दिलाता हूँ साथियों कि मेरी या नूतन की सारी संपत्ति चली जाए, हम पूरी तरह तबाह कर दिए जाएँ पर हम अपने पथ से विचलित नहीं होंगे. इतना तय है कि सत्ता में मदांध व्यक्ति देर-सवेर जरुर अपनी औकात में आ जाएगा. यह भी स्पष्ट कर दूँ कि हमारा संघर्ष किसी व्यक्ति या पार्टी विशेष से नहीं है, हमारा संघर्ष सत्ता के हर खुलेआम दुरुपयोग से है, चाहे वह कोई भी हो.

अमिताभ ठाकुर के एफबी वाल से

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यूपी : सरकार और शासन की ज्यादती के खिलाफ IPS अमिताभ फिर सड़क पर उतरे

 ”लखनऊ पुलिस द्वारा श्री गायत्री प्रजापति एवं अन्य द्वारा हमें फर्जी फंसाने के प्रयास के सम्बन्ध में हम थाना गोमतीनगर में दर्ज नूतन की एफआईआर में राजनैतिक दवाब में आनन-फानन में लगाई गयी अंतिम रिपोर्ट के सम्बन्ध में गाँधी प्रतिमा, हजरतगंज पर अपनी पीड़ा व्यक्त करने जा रहे हैं.” ये शब्द हैं निलंबित वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के। वह एक बार फिर सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ सड़क पर उतर पड़े।

अभिताभ ठाकुर पुलिस की मनमानी का खुलासा करते हुए हैं – लखनऊ पुलिस ने बहुत गहराई से विवेचना की और यह जान लिया कि मेरी पत्नी नूतन द्वारा खनन मंत्री श्री गायत्री प्रजापति, राज्य महिला आयोग अध्यक्ष सुश्री जरीना उस्मानी आदि द्वारा गाजियाबाद की महिला की सहायता से उनके तथा मेरे खिलाफ किये गए षडयंत्र के सम्बन्ध में थाना गोमतीनगर पर लिखवाये गए मुकदमे में न सिर्फ कोई सच्चाई नहीं है बल्कि यह स्पष्टतया झूठा मुक़दमा है. अर्थात लखनऊ पुलिस अब यह बात दावे से कह सकती है कि नूतन ठाकुर झूठी हैं, झूठे मुकदमे लिखवाती हैं और श्री प्रजापति और सुश्री जरीना उस्मानी बेदाग़ और सच्चे लोग हैं.

हमें यह जानकारी तब हुई, जब हम थाना गोमतीनगर गए। वहां ज्ञात हुआ कि इस मामले में कुल नौ पर्चों काट कर यह निष्कर्ष निकाल लिया गया कि मंत्री श्री प्रजापति आदि द्वारा ऐसा कोई भी षडयंत्र नहीं रचा गया था और नूतन ने यह झूठा मुक़दमा लिखवाया है. यह भी ज्ञात हुआ कि पहले इसकी विवेचना दरोगा श्री कृष्णबली सिंह ने की जिन्होंने 20 जून से 10 जुलाई के बीच कुल 05 केस डायरी लिखे पर लगता है कि वे एक सीमा के बाहर अन्याय और अपराध करने से डर रहे थे कि अचानक 10 जुलाई को यह विवेचना पूर्व एसओ श्री मोहम्मद अब्बास को दे दी गयी, जिन्होंने 10 से 13 जुलाई के बीच ताबड़तोड़ 3 पर्चे काट कर यह निष्कर्ष निकाल लिया.

मजेदार बात यह है कि इस मामले में नूतन से भी सिर्फ एकबार पूछताछ की गयी थी और पहले विवेचक ने कहा था कि अभी और पूछताछ करनी है. मुझसे तो पूछताछ तक नहीं हुई और श्री अब्बास ने निष्कर्ष निकाल लिया.

साथियों को बताना चाहूँगा कि 10 जुलाई वही तारीख है, जिस दिन श्री मुलायम सिंह का टेप सामने आया था और 13 जुलाई वही तारीख है जिस दिन मैं निलंबित किया गया, मेरे खिलाफ आरोपपत्र दिया गया और अब मालूम हुआ कि मेरी पत्नी के खिलाफ झूठा मुक़दमा लिखवाने की रिपोर्ट भी दी गयी.

जाहिर है कि अब यह सत्य और असत्य की लड़ाई बन चुकी है जिसमे तमाम आसुरी ताकतें अलग-अलग रूप में हमें बर्बाद करने, परेशान करने, बदनाम करने, फर्जी फंसाने जैसे सभी चिर-परिचित घटियापन पर उतर आये हैं और मेरी जानकारी के अनुसार इसमें पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है पर मुझे आशा और विश्वास है कि ये सब लोग बहुत जल्दी बेनकाब होंगे.

इसी आशा और विश्वास के साथ मैं यह लड़ाई लड़ रहा हूँ पर साथ ही यह भी सोचता हूँ कि क्या पद और लालच के लिए आदमी इस हद तक अपना ईमान बेच डालता है जैसा मैं अपने ही मामले में तमाम लोगों को देख रहा हूँ.

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जब पत्रकार नौकरशाह-मंत्रियों को लड़कियां पहुंचाने लगें तो पत्रकारिता की गरिमा तार-तार होगी ही

गणेश शंकर विद्यार्थी जो अतीत से आज तक और आगे भी मिशन पत्रकारिता के पितामह जाने जाते रहेंगे, गांधी जी भी पत्रकार थे, अटल बिहारी वाजपेयी ने भी पत्रकारिता के गौरव पूर्ण काल के इतिहास को जिया है। लाल कृष्णा आडवाणी भी पत्रकार थे, बाला साहेब ठाकरे भी कार्टूनिस्ट पत्रकार थे लेकिन इन सभी ने कभी भी मिशन पत्रकारिता और उसकी गरिमा पर आंच नहीं आने दी. 

वर्तमान पत्रकारिता किस दौर से गुजर रही है ये स्थिति पूरे देश का एक एक नागरिक जानता है। पहले के अखबारों के मालिक कभी भी अपने संपादकों के काम में हस्तछेप नहीं किया करते थे और कभी कभार किया भी तो संपादक का चरित्र इतना मजबूत हुआ करता था कि संपादक मालिक को अपने काम में हस्तक्षेप करने के लिए मना कर दिया करता था लेकिन आज स्थिति इसके बिलकुल उलट है। आज अखबारों के मालिकों को संपादक नहीं विज्ञापन मैनेजर चाहिये। होते हैं और मिल भी रहे हैं।जब अखबारों के सम्पादक मालिकों के चाटुकार होंगे तो रिपोर्टर कैसा होगा, ये आप अनुमान लगा सकते हैं। 

आज आपको आसानी से भांड मिल जाएगा, दलाल मिल जाएगा, पत्रकार आसानी से नहीं, ब्लैक मेलर मिल जाएगा। स्थिति इससे और अधिक भयानक है, जब पत्रकार नौकरशाहों और मंत्रियों को लड़कियां पहुंचाने लगें तो मिशन पत्रकारिता की गरिमा तार तार होने ही लगेगी।

मैं पूछना चाहता हूँ उन पत्रकारों से, एक सीमित वेतन पाने वाला पत्रकार अकूत सम्पति का मालिक कैसे बन बैठा, बड़ी-बड़ी गाड़ियों का मालिक कैसे बन बैठा। ये सम्पन्नता किसी भी तरह से ईमानदारी से नहीं आ सकती है। इस सम्पन्नता को पाने के लिए पत्रकार को सबसे पहले भांड बनना होगा, दलाल बनना होगा, ब्लैक मेलर बनना होगा अथवा चकला घर का दलाल बनना होगा। कितनी शर्मनाक बात है। आज का पत्रकार कोठे का दलाल हो गया।

मेरी सभी ईमानदार पत्रकार भाइयों से अपील है कि मिशन पत्रकारिता को इस कठिन दौर से निकालने में अपनी भूमिका अदा कीजिये, नहीं तो कहीं देर हो गई तो आगे की पीढ़ियां हम सब को माफ़ नहीं करेंगी। हम सब मिलकर शपथ लें कि मिशन पत्रकारिता को भांड, दलाल, ब्लैकमेलर और कोठे के दलालों के हाथों से निकाल कर ईमानदार पत्रकारों के हाथों में कमान सौंपे। अब समय आ गया  है कि भ्रष्ट पत्रकारों के खिलाफ आंदोलन चलाया जाए और इनको पूरी तरह से उखाड़ फेंका जाए।

आप सभी ईमानदार पत्रकार इस आन्दोलन से जुड़ना चाहें तो आपका बहुत स्वागत है और एक बड़ी पहल की शुरुआत की जाए। आप सभी लोग इस पोस्ट को पढ़ने के बाद अपना मोबाइल नंबर जरूर देने का कष्ट करें।

लेखक एवं ‘दृष्टान्त’ मैगज़ीन के संपादक अनूप गुप्ता से संपर्क : 9795840775

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आडियो टेप से खुला प्रभु झिंगरन की भर्ती का राज, बैकडेट में दिया इस्तीफा

भोपाल/लखनऊ : अपराध करने के बाद सरकारी अफसर किस तरह से अपनी पीठ थप-थपाते हैं, यदि यह जानना है तो केंद्रीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थान के संयुक्त निदेशक आरबी शिवगुड़े की बातचीत का आडियो टेप सुनना होगा। इस आडियो टेप से पता चलता है कि डेढ़ साल पहले उन्होंने किस तरह से रिश्वत लेने के मामले में आरोपी को संस्थान में नियुक्त कर दिया था। जब इस बात की पोल खुली तो उन्होंने बैकडेट में इस्तीफा लेकर मामले को दबा दिया। डेढ़ साल बाद अपनी पीठ थप-थपा रहे अधिकारी का आडियो टेप हाथ लगा है।

दरअसल कोई डेढ़ साल पहले केंद्रीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थान में संविदा भर्तियां हुई थीं, जिसमें मीडिया परामर्शदाता, असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। इसमें अनेक आवेदन प्राप्त हुए थे। इन आवेदनकर्ताओं में से एक लखनऊ के प्रभु झिंगरन का आवेदन भी शामिल था। जिस दिन आवेदनकर्ताओं को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया, उस दिन प्रभु झिंगरन भोपाल नहीं आ सके। साक्षात्कार लेने वाली समिति ने संयुक्त निदेशक आरबी शिवगुड़े के निर्देश पर साक्षात्कार निरस्त कर दिए। 

निरस्त करने का कारण बताया कि एक भी आवेदनकर्ता पद के लिए उपयुक्त नहीं था। पुन: साक्षात्कार हुआ और प्रभु झिंगरम की नियुक्ति कर दी गई। प्रभु झिंगरन तीन दिन संस्थान में कार्य करते हुए दिखाई दिए। इसके बाद वह लखनऊ चले गए। जब वह कई दिनों तक संस्थान में कार्यस्थल पर दिखाई नहीं दिए तो संयुक्त निदेशक से उनके संबंध में पूछा गया। निदेशक ने कहा कि प्रभु लखनऊ से ही काम कर रहे हैं। 

इसके बाद जब यह खबर सामने आई कि 10 साल पहले एक मामले में प्रभु झिंगरन को सीबीआई विशेष न्यायालय ने सजा सुना दी है, तब आनन-फानन में संयुक्त निदेशक आरबी शिवगुड़े ने उनसे बैकडेट में इस्तीफा ले लिया। इस इस्तीफे में प्रभु ने वेतन नहीं देने की भी बात लिखी। इसकी जानकारी मुख्यालय एनसीआरटीई को नहीं दी गई। इस जानकारी को छुपा कर अवैध नियुक्ति मामले में उस समय संयुक्त निदेशक शिवगुड़े ने लाभ लिया।

एक आडियो टेप में संयुक्त निदेशक आरबी शिवगुड़े अपनी करतूत खुद ही बयान कर रहे हैं। उन्होंने बताया है कि एक अखबार में प्रकाशित खबर के बाद उन्होंने तत्काल प्रभु झिंगरन को फोन लगाया। उस समय तक उनकी जमानत हो गई थी। फोन पर संयुक्त निदेशक ने कहा कि वह उनकी नियुक्ति के मामले में उलझ गए हैं, क्या किया जाए, तब प्रभु ने उधर से कहा कि डोंट-वरी मैं बैकडेट में अपना इस्तीफा आपको भेज देता हूं, जिसमें मैं, वेतन नहीं चाहिए भी लिखता हूं। इसी बैक डेट के इस्तीफे की वजह से संयुक्त निदेशक आरबी शिवगुड़े उस समय बच गए थे।

संयुक्त निदेशक शिवगुड़े के साथ प्रभु झिंगरन अपने संबधों के कारण नियुक्ति के प्रति इस सीमा तक आश्वस्त थे कि केंद्रीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थान द्वारा उनकी मीडिया परामर्शदाता के रूप में नियुक्ति के पूर्व, संस्थान द्वारा आयोजित उनकी पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में उन्होंने मंच से खुलकर बोला कि वे संस्थान में भविष्य में क्या-क्या करेंगे। 

आखिर, संयुक्त निदेशक रिश्वत लेने वाले प्रभु झिंगरन पर इतने मेहरबान क्यों थे? यदि संस्थान को मीडिया परामर्शदाता के रूप में प्रभु की ही नियुक्ति करना थी तो पद का विज्ञापन और साक्षात्कार क्यों लिए गए। दरअसल संयुक्त निदेशक आरबी शिवगुड़े और सीबीआई द्वारा रिश्वत के आरेाप में गिरफ्तार किए प्रभु झिंगरन के बीच गहरी दोस्ती है। दोनों एनआईटीटीईआर भोपाल में एक साथ दो-तीन साल पदस्थ थे। दोनों के बीच नजदीकी संबध होने के बाद भी संयुक्त निदेशक शिवगुड़े को प्रभु के रिश्वत मामले की जानकारी कैसे नहीं हो सकती?

एक सजायाफ्ता अपराधी और सरकारी अफसर की सांठगांठ देखिए कि बैक डेट में इस्तीफा देने पर प्रभु को ये अफसर भला आदमी बता रहा है। आरबी शिवगुड़े इस ऑडियो टेप में यह कहते सुनाई दे रहे हैं कि प्रभु बहुत भला आदमी है। उसने बैकडेट में इस्तीफा दिया और वेतन भी नहीं लेने को लिखा। 

आरबी शिवगुड़े भर्तियों के मामले में नियमों का पालन नहीं करते हैं। उनकी भूमिका शुरू से ही संदिग्ध रही है। हाल ही में इसी पद मीडिया परामर्शदाता के लिए साक्षात्कार के लिए चयन हुए आवेदनकर्ताओं के नामों में साक्षात्कार के ठीक पहले चंद्रिका पांडे नाम जोड़ा गया। जबकि चयन सूची में यह नाम नहीं था।

वर्ष 2004 में प्रभु झिंगरन लखनऊ दूरदर्शन केंद्र के निदेशक थे, इस दौरान उन्होंने धारावाहिक निर्माता विशाल चतुर्वेदी से चैनल पर उनका धारावाहिक प्रसारित करने के लिए दो लाख रुपए रिश्वत मांगी थी। इसकी शिकायत विशाल चतुर्वेदी ने सीबीआई से की थी। विशाल की शिकायत पर सीबीआई ने प्रभु झिंगरन को उनको डालीबाग कालोनी स्थित उनके आवास से दो लाख रुपए की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया। इस मामले में ही प्रभु को 17 फरवरी 2014 को सीबीआई की विशेष आदालत ने तीन साल की सजा और एक लाख दस हजार जुर्माना अर्थदंड का फैसला सुनाया था। इस दौरान ही प्रभु झिंगरन भोपाल स्थित केन्द्रीय व्यवसायिक शिक्षा संस्थान में पदस्थ थे और बकौल संस्थान के संयुक्त निदेशक, वह लखनऊ में रहकर काम कर रहे थे।

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल कुष्ण छिब्बर कहते हैं कि सीबीआई जैसी जांच ऐजेसी द्वारा रिश्वत के इतने बड़े मामले में गिरफ्तारी के बाद नियुक्ति असंवैधानिक है। इस तरह के आरोपी की किसी सरकारी संस्था में नियुक्ति नहीं की जा सकती।

लेखक श्रवण मवई से संपर्क : shrawanmavai@gmail.com

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यूपी में लोकायुक्त नियुक्ति पर फिर झटका, राज्यपाल ने सीएम को फाइल बैरंग लौटाई

लखनऊ : लोकायुक्त नियुक्ति पर उत्तर प्रदेश सरकार को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी है। सुप्रीम कोर्ट की फटकार सुनने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लोकायुक्त नियुक्ति के लिए कैबिनेट से जो प्रस्ताव पारित करा लिया था, गवर्नर राम नाईक ने उसे मंजूरी देने से इनकार करते हुए फाइल सीएम को वापस कर दी है, जबकि सरकार किसी भी कीमत पर जस्टिस रवींद्र सिंह को ही लोकायुक्त नियुक्त कराने पर आमादा है।

राज्यपाल राम नाइक ने सरकार से हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के साथ लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए किए गए सभी पत्राचारों की फाइल भी तलब कर ली है। जस्टिस रविन्द्र सिंह की लोकायुक्त पद पर नियुक्ति के लिए अखिलेश सरकार ने कैबिनेट से प्रस्ताव पास कराया था। उसके बाद कार्यवाही के लिए उस फाइल को राज्यपाल के पास भेजा गया। 

फ़रवरी में सरकार ने नेता प्रतिपक्ष की सलाह से जस्टिस रवींद्र सिंह का नाम तय करके इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के पास परामर्श के लिए भेजा था। चीफ जस्टिस डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ ने जस्टिस रवींद्र के नाम पर आपत्ति जताते हुए राज्यपाल और मुख्यमंत्री को पत्र से अवगत करा दिया था। इसके बाद सरकार ने लोकायुक्त की चयन प्रक्रिया से चीफ जस्टिस की भूमिका ही समाप्त कर दी थी। 

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लखनऊ सहारा के पत्रकार ने वेतन न मिलने पर पांच माह का अवकाश मांगा

राष्ट्रीय सहारा लखनऊ के वरिष्ठ उप संपादक रवि कुमार ने शीर्ष प्रबंधन को प्रेषित एक पत्र में बताया है कि नियमित वेतन न मिलने से उनके परिवार को आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इससे वह भारी मानसिक कष्ट से गुजर रहे हैं। हर महीने किसी तरह से सिर्फ आधा वेतन दिया जा रहा है और काम पूरा लिया जा रहा है। वह चाहते हैं कि 6 अगस्त 2015 से दिसंबर 2015 तक उन्हें अवैतनिक अवकाश दे दिया जाए ताकि वह जीविकोपार्जन का कोई और रास्ता ढूंढ सकें।

 

रवि कुमार का अवकाश प्रार्थनापत्र इस प्रकार है –

 

 

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सूचना सचिव से लड़ाई भारी पड़ी, ‘दृष्टांत’ के संपादक अनूप गुप्ता का मकान आवंटन निरस्त

लखनऊ : हिंदी पत्रिका ‘दृष्टांत’ के संपादक अनूप गुप्ता और उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव सूचना नवनीत सहगल की आपसी खींचतान चरम पर पहुंच चुकी है। बताया जाता है कि एक खबर को लेकर दोनो के बीच पैदा हुई रंजिश के चलते सहगल के इशारे पर अनूप गुप्ता का मकान आवंटन निरस्त कर दिया गया है। इस समय अनूप गुप्ता उसी मकान में रह रहे हैं। संभावना जताई जा रही है कि शासन की इस मनमानी को गुप्ता कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं। 

गौरतलब है कि अनूप गुप्ता ने अपनी पत्रिका के दों अंकों में प्रमुख सचिव सूचना नवनीत सहगल के खिलाफ कवर स्टोरी छापी थी। स्टोरी में यह भी बताया गया था कि नवनीत सहगल ने अनेक बेगुनाहों को सत्ता के बल पर जेल भिजवा दिया था। इसके बाद सहगल ने गुप्ता के खिलाफ मान हानि का केस दायर कर दिया था, जिसमें उन्हें जैसे तैसे जमानत मिल पाई थी। कोई भी पत्रकार विज्ञापन के लालच में सहगल के प्रभाव का रिस्क लेने को तैयार नहीं था। इस समय मामला अदालत में विचाराधीन है। सहगल दो तारीखों 22 जुलाई और 2 अगस्त पर कोर्ट नहीं गए है, जिससे उनका बयान दर्ज न होने के कारण अभी मामले की आगे कार्यवाही शुरू नहीं हो पा रही है। 

इस बीच सूत्रों से पता चला है कि विगत दो अगस्त को राज्य संपत्ति अधिकारी बृजराज यादव ने राजकीय आफीसर्स कालोनी, निराला नगर के सी-16 में रह रहे अनूप गुप्ता के मकान का आवंटन निरस्त कर दिया। अनूप गुप्ता मान्यता प्राप्त पत्रकार रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले महीने उन्होंने अपनी मान्यता ये कहते हुए लौटा दी थी कि उन्हें सरकार या शासन का कोई एहसान या मदद नहीं चाहिए। अब उनके मान्यता प्राप्त पत्रकार न होने को ही मकान आवंटन निरस्त करने का आधार बनाया गया है। सूत्रों से पता चला है कि वह मकान खाली कर सकते हैं। 

नियमतः मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही मकान आवंटित होना चाहिए लेकिन लखनऊ में उस तरह के अन्य  लगभग दो दर्जन लोग और हैं। यदि उनके भी मकान खाली नहीं कराए जाते हैं तो गुप्ता संभवतः इस मामले को हाईकोर्ट ले जा सकते हैं। बताया गया है कि अवैध तरीके से अनावंटित मकानों में इस वक्त रहने वालों में अन्य पत्रकारों के अलावा अमर उजाला, दैनिक जागरण के पूर्व संपादक और जागरण के मालिक तक हैं। यदि गुप्ता मामले को कोर्ट ले जाते हैं तो अन्य अवैध आवंटन भी निरस्त किए जाने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। 

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यूपी में आपात काल : धमकी मिलीं, प्रतीक्षा सूची में डाला, लो मैं सड़क पर आ गया, प्रदेश छोड़ना पड़ेगा

अखबारों से ज्ञात हुआ कि आज मेरा स्थानांतरण कर ‘प्रतीक्षा’ में रख दिया गया। किसी विभाग से किसी प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी को हटाकर ‘प्रतीक्षा’ में तभी डाला जाना चाहिए, जब उस विभाग में कोई ‘घोटाला’ या कदाचार किया गया हो, तथा उस अधिकारी को निष्पक्ष जांच हेतु हटाना जरूरी हो। आज कई चेतावनी, धमकियां मिलीं। लगता है कि अब प्रदेश ही छोड़ना पड़ जायेगा या फिर छिपे-छिपे फिरना पड़ेगा। अंग्रेजी उपनिवेशवाद की याद आती है। आपातकाल जैसा लगता है।

मैंने तो ऐसा अपनी समझ से कुछ नहीं किया। अब मुख्य सचिव के समकक्ष वरिष्ठ आईएएस अधिकारी, अर्थात मैं, बिना कुर्सी-मेज व अनुमन्य न्यूनतम सुविधाओं का पात्र भी नहीं रहा और सड़क पर पैदल कर दिया गया। चलो, व्यवस्था के अहंकार की जीत हुई । ज्ञात हुआ है कि लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव की ‘अहंकारी व बलशाली’ इच्छा के सामने सारी व्यवस्था ‘नतमस्तक’ है, ‘हुजूरेवाला’ चाहते हैं कि मुझे तत्काल सड़क पर पैदल किया जाये, निलंबित कर तरह-तरह से अपमानित किया जाये, दोषारोपित किया जाए, कलंकित कर ‘सबक’ सिखाया जाये। जन-उत्पीड़न और कदाचार के खिलाफ कोई आवाज न उठे। व्यवस्था को लगता है कि जब बाकी नौकरशाह ‘जीहजूरी’ कर सकते हैं तो हम जैसे लोग क्यों नहीं, हमारी मजाल क्या है ?

मैंने तो नौकरी छोड़ने(VRS) की इच्छा भी व्यक्त का दी, अब बचा क्या है ? ये मेरा कोई दाब नहीं …मैं व्यवस्था से अलग होकर जन-पीड़ा से जुड़ना चाहता हूँ और प्रभावी ढंग से जनता की बात उठाना चाहता हूँ ..इसमें भी क्या कोई बुराई है…मेरा कोई निजी स्वार्थ नहीं…मेरे लिए ‘रोजी-रोटी’ का सवाल नहीं है .. ? अब क्या विकल्प है ?…..या तो मेरे VRS के प्रस्ताव को स्वीकार किया जाये या अस्वीकार, यदि कोई कार्यवाही लंबित है तो मुझे न बता कर अख़बारों के माध्यम से क्यों सूचित किया जा रहा है। मुझे नोटिस/जांच के बारे में कागजात/नोटिस उपलब्ध कराये जाएँ ताकि मैं उसका जबाब देकर न्याय पा सकूँ या फिर मैं अपने ‘अकारण उत्पीडन’ के खिलाफ माननीय न्यायलय की शरण में जा सकूँ | इस सब का उदेश्य क्या केवल मेरे VRS को सेवा निवृत्ति तक लटकाए रखने का है ?… ताकि मैं व्यवस्था से बाहर जा कर जन-सामान्य की समस्याओं को और प्रभावी ढंग से न उठा सकूँ…मेरी आवाज को दबाये रखा जाये.. ? 

वाह री ! उत्तर प्रदेश की ‘लोकतांत्रिक’ व्यवस्था, जहां लोकतंत्र के ‘कई स्तम्भ’ बाहर से बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं परन्तु ऊपर सब मिलकर (निजी स्वार्थार्थ घाल-मेल कर) गरीब, पीड़ित जनता के लिए स्थापित ‘व्यवस्था’ का शोषण करते हैं, मौज मनाते हैं। यह व्यवस्था केवल ‘Hands-in-Glove’ नहीं अपितु ‘Greesy Hands-in-Glove’ लगती है, जिसमे Greese अर्थात मलाई का सब कुछ खेल लगता है, चाटो मलाई, मक्खन बाकी सब ढक्कन।

चलो, अब ‘जातिवादी’ अनिल यादव जैसे अहंकारी मौज मनाये, हंसें हमारी विवशता पर। हम तो आ गए सड़क पर। औकात दिखा दी हमें हमारी। बड़े वरिष्ठ आईएएस अधिकारी बने फिरते थे हम। अब आया न ऊंट ‘शक्तिशाली (कु) व्यवस्था’ के पहाड़ के नीचे। कहां गयी जनता की आवाज। कहां गयीं जनसमस्याएं। अनिल यादव ने सारी व्यवस्था को रौंद डाला। हर आवाज को कुचल डाला। आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे के ‘मिट्टी भराव’ में अब दब जाएँगी विरोध की सभी आवाजें और उसके ऊपर उड़ेंगे ‘(कु)-व्यवस्था’ के पंख लगे ‘फाइटर प्लेन’ के छदम सपने .. किसानों के मुआवजे की बात बेमानी हो जाएगी…. नक़ल माफिया …भूमाफिया ..खनन माफिया…. ‘जातिवाद’ …. क्षेत्रवाद…. परिवारवाद…. जीतेगा ….. हारेगी जन-सामान्य की आवाज हारेगी ‘माताओं-बहनों, गरीबों की चीत्कार, जीतेगा बलात्कारी का दुस्साहस।

वाह री ….वर्तमान व्यवस्था…कहीं आंसू पोंछने को भी हाथ नहीं उठ रहे। कहीं जश्न ऐसा कि थिरकने से फुर्सत ही नहीं। लो चलो हम सड़क पर आ गए……कबीर का यह कथन अच्छा लगता है …कबिरा खड़ा बजार में मांगे सबकी खैर….. ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर !

आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के एफबी वाल से

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लखनऊ के डीएम की चमचागिरी में खबर चुराने की खुल गई पोल

कभी-कभी अफसरों की चमचागिरी भी भारी पड़ जाती है. ऐसा तब देखने को मिला, जब ‘समाचार प्लस’ के पत्रकार आलोक पाण्डेय ने लखनऊ के डीएम की चमचागिरी में अपने अखबार ‘द मिड डे एक्टिविस्ट’ में  एक खबर लिखी और ग्रुप में डाल दी. पलक झपकते ही एक अन्य पत्रकार ने अपनी खबर लगाते हुए कहा कि यह खबर तो उसकी है. आलोक ने चमचागिरी के लिए उसकी खबर हूबहू कॉपी करके छाप दी है. इस पोस्ट के बाद तो आलोक को साप सूंघ गया.

 

यह ग्रुप डीएम राजशेखर ने बनाया है. इसमें सभी अफसर और पत्रकार शामिल हैं. डीएम इस ग्रुप में और पत्रकार भी इस ग्रुप में अपनी जानकारी डालते रहते हैं. शुरुआत में कुछ पत्रकार इस ग्रुप में अपनी खबर डाल दिया करते थे मगर फिर डीएम ने मना किया कि अपनी लिखी खबर इस ग्रुप में न डालें. इसके बाद कोई पत्रकार अपनी खबर इसमें नहीं डालता. 

कुछ रोज पहले आलोक पाण्डेय ने द मिड डे एक्टिविस्ट में ‘लूट लो लखनऊ’ शीर्षक से छपी खबर डीएम के ग्रुप में लगा दी. इस खबर में बॉक्स में डीएम का फोटो छापा गया था. मतलब साफ़ था कि डीएम की चमचागिरी की जाये. खबर में था कि कर्मचारी मिल कर जमीनों का अवैध धंधा करते हैं. हकीकत यह है कि आलोक पाण्डेय ही आजकल जमीनों का धंधा करने में लगा है. अखबार इतने गंदे कागज पर छपता है कि उसकी पचास कॉपी भी नहीं बिकती मगर सबको व्हॉट्सएप्स और मेल करके अखबार भेजता है और खबरें दूसरे अखबारों से चोरी करता है. 

जैसे ही इसने डीएम के ग्रुप में यह खबर डाली तो तुरंत ही डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट के नीरज मिश्रा ने अपनी खबर डाल दी और कहा कि सब लोग देख लो, यह खबर तो उन्होंने एक दिन पहले ही लिखी है, इसमें शब्द तक नहीं बदले गए. नीरज मिश्रा तेज तर्रार पत्रकार हैं. उन्होंने लिखा कि डीएनए में प्रकाशित खबरें दोपहर को द मिड डे में प्रकाशित हो रही हैं और इसके बाद ग्रुप में पोस्ट  की जा रही हैं. नीरज के ऐसा लिखते ही सभी पत्रकारों को आलोक की हैसियत पता चल गई. 

पत्रकार योगेन्द्र अवस्थी और पत्रकार शकील रिजवी ने इस पर हैरानी जताई. पत्रकार मनीष श्रीवास्तव ने कहा ग्रुप के एडमिन इसकी जांच करवायें. डीएम लखनऊ ने माहौल को हल्का करते हुए कहा कि सीबीआई जांच? इस खुलासे से साफ़ हो गया कि आलोक पाण्डेय और द मिड डे एक्टिविस्ट के लोग किस तरह के धंधों में लगे हैं. हकीकत यह है कि आलोक पाण्डेय को पत्रकारिता का क-ख-ग भी नहीं आता. वो बस उमेश कुमार की चापलूसी में लगा रहता है . डीएम के ग्रुप के स्क्रीन शॉट आप देख सकते है. 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 

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जान लेने के इरादे से जनसंदेश टाइम्स के रिपोर्टर पर हमला

लखनऊ : जनसंदेश टाइम्स के रिपोर्टर सलाहउद्दीन शेख पर पिछले दिनो जान लेने की नीयत से हमला किया गया। स्थानीय लोगों के जमा हो जाने से उनकी जान बच गई। उन्होंने घटना के संबंध में हजरतगंज कोतवाली पुलिस को लिखित रूप से अवगत करा दिया है।

रिपोर्टर सलाहउद्दीन शेख ने पुलिस को बताया है कि वह रोजाना की तरह जब अपनी ड्यूटी समाप्त कर कसमंडा स्थित कार्यालय से घर लौट रहे थे, ऑफिस के गेट पर बाहर निकल कर अपने साथी आशीष यादव से बातचीत करने लगे। इसी दौरान इंदिरा नगर निवासी अशोक चतुर्वेदी अपने दर्जन भर साथियों समेत वहां आ धमके और उन्होंने ललकारते हुए कहा कि इसे जान से मार डालो। 

उन्होंने बताया है कि अशोक ने अपने साथियों की मदद से उन पर लाठी-डंडों और धारदार हथियारों से हमला कर दिया। उनके शोर मचाने पर कार्यालय और आसपास के लोग मौक पर इकट्ठे हो गए। इसके बाद हमलावर जान से मारने की धमकी देते हुए वहां भाग खड़े हुए। उन्होंने संदेह जताया है कि पत्रकार हिमांशु त्रिपाठी और संजय त्रिपाठी के कहने पर उनकी जान लेने की कोशिश की गई। उन्होंने घटना की रिपोर्ट दर्ज करने की अपील की है।   

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क्या राजनीति का अर्थ केवल भूमाफिया, चोर- उच्चकों और फर्जी डिग्री धारकों से है!

आज जब मैं अपनी स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति पर आये मित्रों के मत पर अपनी सफाई पेश कर रहा हूँ, तो कबीर की याद आ रही है और ” झीनी चादर ” अपने जीवन में ओढ़ने वाले सभी मित्रों को नमन कर सफाई देने का मन है। मैंने ३४ साल की नौकरी की है तथा इस का मतलब यह नहीं कि मैंने इतनी लम्बी सेवा घुटन या विवशता के साथ की। यथा शक्ति, मनोयोग से जिन पदों पर रहा, काम किया। 

सन २००० से जो व्यवस्था में बदलाव आया, उससे २००४ तक मैं जूझते रहा तथा इसी क्रम में मन को समझा कर मिले अवसर का लाभ उठाकर अध्यन अवकाश लेकर २००४ में अमेरिका चला गया और २०१३ में मिशिगन यूनिवर्सिटी से MBA, PhD, CPA कर वापिस आया। आप में से जो लोग विदेश में रहे हैं, वे जानते ही होंगे कि विदेश में रहकर अपने देश-प्रदेश की बहुत याद आती है। यहां की पापड़ी-चाट, समोसा, शुद्ध देसी घी भी याद आता है। यद्यपि शायद अब ये भी यहां मिलावटी मिलता है। यहां मेरी वृद्ध मां जब फ़ोन पर अमेरिका में मुझसे बात करती थीं तो बहुत रोती थीं और कहती थीं कि अब तू लौट कर नहीं आएगा। मेरे मरने पर ही आएगा। 

ये शब्द मुझे बहुत पीड़ा देते थे। माँ की याद और अपने अंतर्मन की आवाज सुनकर सन २०१३ में अपने प्यारे उत्तर प्रदेश वापिस लौट आया। मेरे मन में भाव था कि जो ज्ञान मैंने अमेरिका में अर्जित किया है, शायद उसके उपयोग से मैं अपने प्रदेश के गये-गुजरे हालात ठीक करने में जरूर मदद कर सकूँगा, परन्तु ऐसा हो न सका क्योंकि यहां का नज़ारा काफी कुछ बदल चुका था। न केवल राजनैतिक अपितु प्रशासनिक व्यवस्था जाति व धर्म आधारित कुव्यवस्था में परिवर्तित हो चुकी थी। मैं लगभग १८ साल तक ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ नामक संस्था का टीचर रहा हूँ।

अमेरिका से वापिस आने के बाद से पिछले दो वर्षों में प्रमुख सचिव के रूप में मैंने सात विभागों का मुंह देखा, जिससे मुझे आभास होने लगा कि उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था भी जाति व पार्टी लाइन पर विभाजित हो चुकी है, मठाधीश हर महत्वपूर्ण जगह पर बैठकर राजनेताओं के साथ गठजोड़ कर बैठे हैं, कोई भी सरकार आये, यह गठजोड़ कायम रहता है। मैं अपने पिछले दो वर्ष के कार्यकाल में कई विभागों से गुजरते हुए जब माध्यमिक शिक्षा विभाग में आया तो अच्छा लगा और मैंने एक माह 10 दिन खूब लगन से काम कर उ.प्र. बोर्ड परीक्षाओं में अंदर तक घुसे नक़ल माफिया को समूल नष्ट करने का संकल्प लिया परन्तु वहां भी माफिया ने मुझे टिकने नहीं दिया। 

अंत में मैं अपने वर्तमान कम महत्व वाले ‘सार्वजनिक उद्यम विभाग’ में आया तो मेरे पास काफी खाली समय था, सप्ताह में २-४ ही फाइलें आती थीं।  मैंने सोचा कि क्यों न खाली समय में कुछ सार्वजनिक रूप से महत्वपूर्ण मुद्दे उठाकर काम किया जाए। बोर्ड परीक्षाएं आ गयीं। अतः ‘नक़ल रोको’ अभियान चलाया। छत्तीस जनपदों का अपने खर्चे पर निजी कार से छुट्टी लेकर भ्रमण किया। यह अभियान कुछ हद तक सफल भी रहा। मैं कम से कम जन सामान्य का ध्यान इस विकृति की ओर आकर्षित करने में सफल रहा। 

फिर अन्य कई मुद्दे और उठाने शुरू किये। आप उनके बारे में सब जानते हैं। ये मुद्दे सरकार या किसी व्यक्ति की आलोचना के उद्देश्य से नहीं उठाये गए। चाहे आज कुछ लोग ऐसा सोचते हैं। २८ जनवरी २०१५ से ‘सामाजिक मुद्दों की सक्रियता’ का दौर आरम्भ हुआ। इन मुद्दों को उठाते-उठाते, पिछले ६ माह में लोगो का इतना प्यार व समर्थन मिला कि मैं आत्मविभोर हूँ। इस दौरान मैंने दो जनपदों फैजाबाद व अम्बेडकरनगर के ‘प्रभारी प्रमुख सचिव’ का स्वेच्छा से काम देखना शुरू किया। एक प्रमुख सचिव को केवल एक ही जिला ‘प्रभारी’ के रूप में दिया जाता है , परन्तु मैंने स्वेच्छा से दो जनपद मांगे, क्यों कि ‘सार्वजनिक उद्यम विभाग’ में काम कम था और मैं अपने को व्यस्त रखना चाहता था। 

वस्तुतः मैं इन जनपदों में ‘बालिका-कुपोषण’ कार्यक्रम चलाना चाहता था। यह विषय मेरे हृदय के काफी करीब है। मैंने पिछले ६ माह से निजी खर्चे पर सार्वजनिक/निजी अवकाश लेकर ४८ जनपदों का भ्रमण कर ‘जन-समस्याओं’ को महसूस किया और उठाया भी। प्रदेश की टूटी सड़कें देखी हैं। टूटी सड़कों पर चलकर कमर तोड़ी। बड़े नेता तो ‘हेलीकाप्टर’ में उड़कर सड़क देखते हैं। मैंने ग्रामीण क्षेत्र में घोर ‘बाल-कुपोषण’ देखा, ओला वृष्टि में किसानों को मरते देखा, उनके परिवारों को रोते बिलखते देखा। प्रदेश का कोई वरिष्ठ अधिकारी या मंत्रीगण पीड़ित किसान के घर तक नहीं गया। लाख चीत्कार के बाद भी। आज तक मुआवजा नहीं बंटा है। सत्तर प्रतिशत बिजली मूल्य की बढ़ोत्तरी व लोकसेवा आयोग में अनिल यादव के कदाचार का अपने तरीके से विरोध किया, आदि आदि |

फिर जब, ये सभी अति गंभीर सार्वजनिक मुद्दे उठाते-उठाते सत्ता शीर्ष के अहंकार को चोट पहुंची तो मदद के लिए मैं कई बड़े अखबारों के संपादकों से संपर्क किया और उनमें से कई ने मदद का भरोसा भी दिलाया और अधिकांश का साथ आज मिल भी रहा है। कई मीडिया के दोस्त आज मेरे मुद्दों के साथ अडिग खड़े भी हैं। मैं उनका हृदय से आभारी हूँ परन्तु कई ने निराश भी किया है। कई कभी-कभार अपने अहंकार में बीच-बीच में फँस जाते हैं, जो स्वाभाविक भी है। मैं उन्हें प्रेम-स्नेह के सिवाय दे ही क्या सकता हूँ। तब मुझे पता चला कि सत्ता ‘शक्ति’ कितनी बलशाली है। सब कुछ मैनेज हो जाता है। कॉर्पोरेट घराने भारत या प्रदेश में चाहे कोई भी सत्ता में हो, नजदीक हो ही जाते हैं। नेता और नौकरशाहों से घालमेल कर उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्य के जल, जमीन और जंगल का शोषण-दोहन करते रहते हैं और करते रहेगें। जनमानस से उनको क्या सरोकार। जनता को तो दो-जून रोटी की ही पड़ी रहती है। यदि कोई ‘कस्बाई’ पत्रकार किसी शोषण के खिलाफ आवाज उठाता भी है तो प्रदेश का नया कानून/न्याय व्यवस्था उसे जलाकर मार डालती है |

इस दौरान कुछ नेतागण को यह अटपटा लगा कि जहां ज्यादातर नौकरशाह आत्मसम्मान खो ‘गुलाम’ बनकर जी हजूरी करते हैं,वही मुझ जैसे ‘अदने’ से जनसेवक द्वारा टीवी या जनता के बीच जाकर उनके ‘झूठ  पोल’ कैसे खोलनी शुरू कर दी, उनके अहंकार को ठेस पहुंची और उन्होंने हमें ‘इस्तीफा’ देकर राजनीति में आने की चुनौती दे डाली।  जैसे कि ये नौकरी उन्होंने ही हमे दी हो। फोन पर गाली गलौज करायी जाने लगी, घर पर गुंडे भेज दिए गए, उससे भी बात नहीं बनी तो डराने व कलिंकित करने के हथकंडे के रूप में ‘नोटिस/चार्जशीट’ की धमकी अख़बारों में छपवानी शुरू कर दी। 

अब आप ही बताइए, क्या ऐसे वातावरण में मैं पद से चिपका रहूं और ये सब सहता रहूँ। जो मुद्दे मैंने उठाये हैं, क्या उनसे पीछे हट जाऊँ ? क्या कोई ‘नौकरी या पद’ आत्मसम्मान से बड़ा है, क्या मैं पद से चिपककर प्रताड़ना झेलूं या फिर मन लगाकर शांति से जन-समस्याओं को उठाऊं? जानने वाले मेरे साथी-संगी जानते हैं कि व्यवस्था में रहकर मैंने अपनी पूरी नौकरी में संघर्ष किया है अर्थात यह सब केवल आज ही नहीं कर रहा हूँ और न ही ये सब आज किसी राजनैतिक उद्देश्य के लिए कर रहा हूँ। विश्वास करिए कि यदि आज मैं किसी व्यस्त विभाग में होता तो शायद यह सब करने का समय ही नहीं मिलता। मैं विभागीय काम करते-करते दिसम्बर, २०१५ में चुपचाप नियतिवश सेवा निवृत हो जाता। अमेरिका वापिस चला जाता। ऐसी उच्च शिक्षा के बाद प्रोफेसर या अन्य कोई नौकरी कर भारत में भी शांति से रहता और यह अभी भी कर सकता हूँ।

कई लोग कयास लगा रहे हैं कि मैं २०१७ के चुनाव/राजनैतिक उद्देश्य के लिए यह सब कर रहा हूँ। मैं साफ़ कह चुका हूँ, अभी ऐसा कोई विचार नहीं। मुझे आगे नहीं पता, मेरी नियति में क्या लिखा है ? क्या बताऊँ, आदमी को अपने एक दिन का तो पता नहीं, २०१७ के बारे में कैसे बता दूं। साथ ही, मैं यह भी पूछता हूँ कि क्या राजनीति का अर्थ केवल चोर- उच्चकों, अपराधियों, फर्जी डिग्री धारकों, भूमाफिया से है? क्यों न पढ़े लिखे, साफ़ छवि के योग्य, कर्मठ, निष्ठावान युवा, पत्रकार, वकील, छात्र, अध्यापक, प्रोफेसर, सेवा निवृत जन-सेवक-कर्मचारी चुनाव लड़ें ताकि राजनिति से जातिवाद, परिवारवाद, अपराधवाद, दबंगई, धन-बाहुबल, जैसी गन्दगी का सफाया हो सके, जैसा विकसित देशों में होता है।

यदि ऐसा ही चलता रहा तो, यह लोकतंत्र जो ‘चोर-तंत्र’ में तब्दील हो चुका है, के कारण उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े राज्य को रसातल में जाने से कोई रोक नहीं सकता। अनिल यादव जैसे चोर, भर्ती आयोगों में मेधावी युवाओं के साथ जात-पांत के आधार पर घृणा फैला कर अन्याय करते रहेंगे, बेरोजगार युवा प्रताड़ित होते रहेंगे, बिना जुगाड़ के कोई नौकरी नहीं मिलेगी, कोई काम नहीं होगा। बिजली चोरी रोकने के बजाय ७०% मूल्य वृद्धि होती रहेगी, क्षेत्रवाद व भूमाफिया के लाभार्थ एक्सप्रेस-वे बनते रहेंगे, चीनी मिलें निजी लाभार्थ बिकती रहेंगी, गन्ना किसान, युवा, गरीब किसान पिसता रहेगा, माँ-बेटियों की इज्जत लुटती रहेगी, विरोध करने पर बलात्कार के प्रयास में असफल होने पर पुलिस थाने में जला कर मारी जाती रहेंगी,  सत्ता पक्ष के गुंडों द्वारा बेटी की छेड़खानी की शिकायत पर पुलिस द्वारा कार्रवाई न होने पर बेटियां आत्महत्या करती रहेंगी, जैसा हमीरपुर में हुआ।

मित्रों, मैंने स्वैछिक सेवा निवृति मांग कर, हार नहीं मानी है बल्कि अपने सिर का भार उतारा है। मैं पदमुक्त होकर आपके साथ आपकी पीड़ा बांटते हुए जनसामान्य के दर्द की बात ऐसे ही उठाता रहूँगा। पहले ‘सिस्टम में रहकर’, अब ‘सिस्टम के बाहर’ से लड़ाई जारी रहेगी। दिक्कत यह है कि हमने अपने अन्दर बसे आत्मा रुपी ईश्वर-अल्लाह की कही हुई बातें सुनना बिलकुल बंद कर दिया है। हम सब जीवन संघर्ष, झंझावात में इस कदर फंसे हैं कि हमें कुछ रास्ता दिखाई नहीं पड़ता। रास्ता दिखाना तो दूर, यदि कोई संघर्ष भी करता है तो उसपर विश्वास नहीं होता। इतने धोखे जो खाए हैं, हम संघर्ष करने वाले को ही पागल घोषित कर देते हैं। मेरे भी दिमाग का स्क्रू ढीला बता दिया, क्या करूं, जबकि मैं तो अपने को एक अदना सा व्यक्ति मानता हूँ।

ऐसी परिस्थिति मैं भी बताइए, क्या मेरा निर्णय आपको अभी भी गलत लगता है। मानता हूँ कि इतनी बड़ी नौकरी का एक भी दिन छोड़ना आसान नहीं। DGP जैसे पद के तीन-३ माह के सेवा विस्तार को लोग एड़ी-चोटी का जोरे लगा देते हैं। कुछ लोग अज्ञानतावश समझते हैं कि मैं कार्रवाई से बचने के लिए ऐसा कर रहा हूँ। आज भी कितने नौकरशाहों पर कार्रवाई हो रही है, क्या वे कार्रवाई से बचने के लिए सेवा निवृति ले लेंगे ? मेरा ३४ साल का ‘बेदाग़’ ट्रैक-रिकॉर्ड है। चलो अपनी-अपनी सोच है। उनकी सोच पर हमारा क्या जोर चलता है। भगवान सबको सद्बुधि दे।….चलो जन-मानस को उसकी शक्ति की याद दिलाएं !

वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के एफबी वाल से

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अमिताभ को घेरने में डीजीपी, डीआईजी, एसएसपी का हाथ

लखनऊ : सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर ने अपने पति आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर के खिलाफ गाजियाबाद की एक महिला द्वारा बलात्कार का एफआईआर लिखवाने में बड़े पुलिस अफसरों की साफ़ मिलीभगत का आरोप लगाया है। कहा है कि डीजीपी, डीआईजी और एसएसपी की यह असामान्य तत्परता और पुलिस द्वारा इस तरह फूहड़ तरीके से धारा 420 लगाना इस मामले में भारी ऊपरी दवाब को पूरी तरह स्थापित करता है।

उन्होंने कहा है कि इस मामले में कथित बलात्कार पीड़िता 11 जुलाई की शाम सीधे डीजीपी जगमोहन यादव के पास पहुंची, जहां से उन्हें तत्काल डीआईजी आरके चतुर्वेदी के पास भेजा गया। उन्होंने उसी तारीख को एसएसपी लखनऊ को प्रार्थनापत्र पर मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए। वहां से प्रार्थनापत्र तत्काल एसएसपी के पास पहुंचा, जिन्होंने एसओ गोमतीनगर को एफआईआर के आदेश दिए। 

नूतन के मुताबिक प्रार्थनापत्र उसी रात थाने पहुंच गया और रात 10.20 बजे एफआईआर दर्ज हो गया, जिसमें धारा 420 आईपीसी भी डाल दिया गया। जबकि यह सर्वविदित है कि यह अपराध संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की ठगी से संबंधित है, न कि बलात्कार से।

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