डीएम साहब की चहेती युवती चला रही है जिला!

चहेती युवती की हर बात पर एक्शन लेते हैं डीएम साहब… आखिर क्या है दोनों का रिश्ता…. गांव और शहर में हो रही है चर्चा… पंचायत विभाग के डीपीआरओ कार्यालय में संविदा पर तैनात है चहेती युवती… युवती के कहने पर 5 संविदाकर्मियों को बिना कारण हटा चुके हैं डीएम…  डीपीआरओ और सीडीओ समेत सारे अधिकारी डरते हैं युवती से…

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एक राज्य के सबसे बड़े अधिकारी रहे इस शख्स की बेबसी देखिए

Navniet Sekera : एक राज्य के सबसे बड़े अधिकारी की बेबसी। पाप अपने बाप का नही होता, ये 24 Jan को रांची कोर्ट में देखने को मिला। ये सजल चक्रवर्ती है कुछ दिन पहले तक झारखंड के चीफ सेक्रेटरी थे लेकिन चारा घोटाला में इनका भी नाम आ गया और दोषी भी करार हो गए। सोचिये एक हमारे बिहार में दरोगा बन जाता है तो पूरे गांव प्रखंड में उसकी टशन हो जाती है। बड़े बड़े लोग झुक के हाय हेलो करते हैं। सजल चक्रवर्ती तो मुख्य सचिव थे दिन में ना जाने कितने IAS/IPS पैर छूते होंगे लेकिन आज इनकी बेबसी देख कर दिल रो गया।

इनका वजन करीब 150 किलो है। कई बीमारियों से ग्रसित हैं। ठीक से चल नहीं पाते। रांची कोर्ट में चारा घोटाले से जुड़े एक मामले में पेशी थी। सुनवाई पहले मंज़िल पर थी। जब वो ऊपर आये तब मैं कोर्ट रूम में था। उनको चढ़ते हुए नहीं देखा। लेकिन उतरते वक्त मैंने उनको देखा। वो सीढ़ी पर खुद को घसीट रहे थे। एक सीढ़ी घसीट कर उतरने के बाद फिर दूसरी सीढ़ी पहुँचने के लिए खुद को घसीट रहे थे। सोचिये जिसके सामने कल तक बड़े बड़े अधिकारी गाड़ी का दरवाज़ा खोलने के लिए आतुर रहते थे वो खुद को दुनिया के सामने जमीन पर पड़ा हुआ एक बच्चे की तरह ममता भाव से सबको देख रहा थे, जैसे कह रहा हो कोई गोद में उठा लो।

कहते हैं ना सुख के सब साथी, दुख में ना कोई। बेचारे दो शादी किये लेकिन दोनों बीबियों ने तलाक दे दिया। वजह जो भी हो। कोर्ट रूम में सबका कोई कोई ना कोई था लेकिन इनकी आँखे जैसे किसी अपने को खोज रही थीं।

मालूम किये तो पता चला कि कोई इनसे ज्यादा मिलने भी नहीं आता। माता पिता रहे नहीं। भाई भी था जो सेना में बडे़ अफसर थे, जो अब नहीं रहे। शायद किसी को गोद लिए थे। उसकी भी शादी हो चुकी है। उसे भी इनसे ज्यादा कोई मतलब नहीं रहता। घर में कुछ पालतू बन्दर और कुत्ते हैं। अपनों के नाम पर वो भी कहाँ है मालूम नहीं। ये शान ये शौकत ये पैसा सब मोह माया है परमानेंट तो कुछ भी नही है सिवाए एक चीज़ का वो है मौत।

यह विचार एक व्हाट्सएप्प फारवर्ड के माध्यम से मेरे पास आया। मुझे लगा इसमें एक जीवन का संदेश छुपा हुआ है। अतः शेयर कर रहा हूँ।

Sanjaya Kumar Singh : चारा घोटाले में सजा पाए रिटायर आईएएस, झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव सजल चक्रवर्ती की इस हालत पर सबके विचार अलग हो सकते हैं। पर मेरा मानना है कि एक अभियुक्त ही सही, लेकिन शारीरिक तौर पर लाचार व्यक्ति की इस दशा के लिए कौन जिम्मेदार है? अगर अदालत में यह हाल है तो जेलों में क्या होता होगा? अगर अभियुक्त और अपराधी के कोई अधिकार नहीं हैं और जिसकी लाठी उसकी भैंस ही होना है तो हम कैसी व्यवस्था में रह रहे हैं। देश में अदालतों की जो हालत है उसमें मुकदमा लड़ते या अपना बचाव करते हुए ही आदमी सजा से ज्यादा कष्ट भोग लेता है। इस कष्ट का कहीं कोई हिसाब नहीं है। अगर इसे प्राकृतिक न्याय माना जाए तो अदालतों में क्या होता है?

Roy Tapan Bharati : संपन्न होने पर भी सजल ने ऐसा क्यों किया, सजा मिलने के बाद आईएएस की मानसिक हालत ठीक नहीं…

-सजल चक्रवर्ती, जो झारखंड कैडर के मशहूर आईएएस अफसर रहे, की ये तस्वीरें हमारे एक करीबी ने रांची से कल ही भेजी। वे झारखंड सरकार में मुख्य सचिव पद से रिटायर हुए। वे मिलनसार थे, पत्रकारों और तमाम संघर्षशील लोगों को सहयोग करते थे। पत्रकार होने के नाते मेरे भी उनसे 1984 से 1988 तक अच्छे संबंध रहे। कुछ वर्षों के लिए वे रांची में मेरे पिता के बॉस भी रहे। पिताजी डिप्टी कलेक्टर और सजल जिले के उपायुक्त यानी जिला कलेक्टर। पिताजी कहते थे, सजलजी एक नेक इंसान हैं और उन्होंने उनके साथ हमेशा अच्छा व्यवहार किया। पर इस फोटो से पता लगा कि चारा घोटाले के दो केस में 4-5 सजा मिलने के बाद से सजल आजकल मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गये हैं और दुर्भाग्यवश अनगिनत दोस्तों ने उनसे कन्नी भी काट ली है। हे ईश्वर यह कैसा न्याय है?

-यह सत्य है कि आईएएस होने पर भी सजल की जिंदगी में खुशहाली कभी नहीं रही। उनकी शादी हुई पर जल्दी ही तलाक हो गया। उदार स्वभाव होने के कारण उन्होंने बतौर जिला उपायुक्त चारा घोटालेबाजों से शायद एक-दो बार मुलाकात कर ली और अदालत ने इसी बात को संज्ञान में ले लिया। सीबीआई ने अदालत से कह दिया कि कुछ दोस्तों के कहने पर उन्होंने चारा घोटालेबाज से एक लैपटाप उपहार भी ले लिया। जबकि वे संपन्न परिवार से थे। आईएएस होने के नाते भी वेतन, भत्ते और तमाम सुविधाओं के हकदार थे।

-चारा घोटाले में जब सजल चक्रवर्ती को सजा मिली तो मुझे बहुत दुख हुआ कि एक सज्जन आईएएएस अफसर रिटायर होने के बाद भी भ्रष्टाचार की सजा में जेल की चक्की पिस रहा है। अदालत के फैसले पर मुझे कुछ नहीं कहना। पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को विचार करना चाहिए कि बिना रकम बरामद हुए भी किसी को भ्रष्ट घोषित कर सजा दी जा सकती है?

-पर सजल चक्रवर्ती को जीवन में यह जो सजा भोगनी पड़ रही है, उससे उन अफसरों को संदेश मिलता है कि छोटे लालच या मित्रता में कानून तोड़ कर किसी की कोई मदद नहीं करो। नहीं तो उदार होने पर तुम्हारा भी सजल जैसा हाल होगा। अगर मेरी यह लाइन सजल चक्रवर्ती तक पहुंचे तो मैं यह जरूर कहना चाहूँगा कि दोषी नहीं होने पर भी जौ के साथ गेहूं कैसे पिसता है, सजल इसके ताजा उदाहरण हैं।

पुलिस अधिकारी नवनीत सिकेरा, पत्रकार द्वय संजय कुमार सिंह और राय तपन भारती की एफबी वॉल से.

इसी प्रकरण पर कुछ अन्य लोगों की राय पढ़िए….

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दागी आईएएस सत्येंद्र सिंह पर मेहरबान योगी सरकार

यूपी की योगी सरकार दागी आईएएस सत्येंद्र सिंह पर मेहरबान है. यही कारण है कि इस भाजपा सरकार में इस घोटालेबाज अफसर के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई है. आईएएस सत्येंद्र सिंह एनआरएचएम घोटाले के भी आरोपी हैं. वे अब भी एक बड़े पद पर तैनात हैं.  सत्येंद्र सिंह जब एनआरएचएम में जीएम हुआ करते थे तो उन्होंने काफी खेल किए. इसी कारण उन्हें आरोपी बनाया गया. सीबीआई जांच के दौरान सत्येंद्र सरकारी गवाह बन गए. इसी कारण उनके खिलाफ चलने वाली सभी जांच ठंढे बस्ते में डाल दी गई. पर क्या सरकारी गवाह बनने से गुनाह माफ़ हो जाते हैं?

बताया जाता है कि सत्येंद्र सिंह के गोमती नगर विस्तार, विपुल खंड, फन मॉल के पास अरबों रुपये कीमत के आवास हैं. सत्येंद्र सिंह का किडजी नाम का एक स्कूल भी है. इसके अलावा नोएडा सहित देश भर के कई शहरों में आलीशान बंगले, फ्लैट्स और बेशकीमती ज़मीनें हैं. आयकर विभाग के पास भी इस दागी अफसर की पूरी डिटेल है लेकिन कोई अदृश्य ताकत इस अफसर पर हाथ डालने से रोकती है.

एक दफे सत्येन्द्र कुमार सिंह के छह शहरों में स्थित ठिकानों पर आईटी अफसरों ने छापा मारा था. तब लाखों रुपया कैश और अरबों की संपत्ति मिली थी. विभाग के पास सूचना थी कि सत्येंद्र के पास ठीकठाक काला धन है. आयकर अफसरों की 22 अलग-अलग टीमों ने लखनऊ, मेरठ, बागपत, मैनपुरी, ग्रेटर नोएडा, दिल्ली आदि में सत्येंद्र के सभी ठिकानों पर एक साथ छापे मारे थे. वैसे तो योगी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की बात करती है लेकिन सत्येंद्र के मामले में साफ दिख रहा है कि भ्रष्टाचारी को बचाया जा रहा है. आईएएस सत्येंद्र सिंह पशुधन विभाग में विशेष सचिव के पद पर जमे हुए है. देखना है कि योगी सरकार में भी इस अफसर का बाल बांका होता है या पहले जैसा जलवा कायम रहेगा.

लखनऊ से भड़ास संवाददाता सुजीत कुमार सिंह ‘प्रिंस’ की रिपोर्ट.

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सीएम योगी के पैर छूने वाले बाराबंकी डीएम अखिलेश तिवारी को बीजेपी सांसद प्रियंका रावत ने बताया भ्रष्टाचारी

बाराबंकी : यूपी के बाराबंकी में बीजेपी सांसद प्रियंका रावत ने अपनी ही सरकार के डीएम अखिलेश तिवारी पर भ्रष्टाचार और भाजपा सरकार की छवि धूमिल करने का आरोप लगाया है। डीएम के खिलाफ शिकायत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से की है। प्रियंका ने मुख्यमंत्री से शिकायती पत्र में  डीएम अखिलेश तिवारी पर कड़ी कार्यवाही की मांग की है। पत्र में शिकायत की गयी है कि डीएम द्वारा ज़िले में विकास एवं जनकल्याणकारी कार्यों में सहयोग नहीं किया जा रहा जिसके कारण जनपद के विकास कार्य अवरुद्ध हो गए हैं। इससे भाजपा सरकार की छवि धूमिल हो रही है।

मुख्यमंत्री योगी को लिखे शिकायती पत्र में प्रियंका रावत ने डीएम पर फ़ाइल फेकने, राम लीला मैदान में ओपन थ्रेटर न बनने, सांसद निधि से विकास कार्यो को स्वीकृति न प्रदान करने,  सांसद आदर्श ग्राम दीनपनाह में विकास योजनाओ की स्वीकृत न करने और धारा 143 के तहत लखनऊ के निकट ज़मीनों पर अवैध निर्माण की स्वीकृत देने पर और हाल में ही मुहर्रम और दशहरा पर मूर्ति विसर्जन पर हुए दंगो में लापरवाही बरतने के आरोप लगाया है।

सांसद प्रियंका रावत ने कहा कि डीएम ने उनके ऊपर फ़ाइल फेंका और बदसलूकी की। सांसद प्रियंका रावत ने कहा कि डीएम सरकार को बदनाम कर रहे है, इनको सिर्फ पैसा चाहिए। डीएम भ्रष्टाचार में डूबे हैं। जन प्रतिनिधियों की भी डीएम इज़्ज़त नहीं करते हैं। प्रियंका रावत ने कहा कि हर चीज़ में डीएम साहब को पैसा चाहिए। डीएम बिलकुल निरंकुश हो रहे हैं। इनको यही ध्यान नहीं है कि सरकार बदनाम हो रही है। हम लोग बदनाम हो रहे हैं। इनको सिर्फ 24 घंटे पैसा चाहिए। जिस व्यक्ति के दिमाग में भ्रष्टाचार घुसा हुआ हो, वह जनपद का कोई काम नहीं कर सकता है। सरकार की कोई भी योजना को सही से इम्प्लीमेंट नहीं करवा सकता है। इन सभी चीजों को ध्यान में रखते हुए माननीय मुख्यमंत्री जी को मैंने लिखित शिकायत भेजी है।

उधर, कैमरे के सामने डीएम अखिलेश तिवारी से बीजेपी सांसद के आरोपों के बारे में पूछा गया तो पहले तो वह खमोश रहे फिर बोले कि इस पर मुझे कोई कमेंट नहीं करना है। उन्होंने बयान देने से मना कर दिया।

गौरतलब है कि 14 अगस्त को सीएम योगी आदित्यनाथ बाराबंकी के बाढ़ग्रस्त इलाके में लोगों से मिलने आए थे। यह मौका तब असहज हो गया जब सीएम योगी आदित्यनाथ के हेलीकॉप्टर से उतरते हुए बाराबंकी के डीएम अखिलेश तिवारी उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेने पहुंच गए। डीएम का यह कारनामा चर्चा का विषय बन गया था क्योंकि ऐसा पहले की सरकारों में ही देखने को मिलता था। इस सरकार में सीएम योगी ने खुद ही अधिकारियों और नेताओं से चापलूसी ना करने को आदेश दिया है। लेकिन फिर भी ना जाने क्यों यूपी के आईएएस और आईपीएस सीएम के पैर छूते रहते हैं। जनता से मिलने में लापरवाही बरतने के मामले में बाराबंकी के डीएम अखिलेश तिवारी को मुख्यमंत्री कार्यालय से पहले ही नोटिस मिल चुका है।

Rizwan Mustafa
rizwanmustafa68@gmail.com
Mob-9452000001

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मौत का दर्शन सुनाते इस आईएएस अफसर ने दे ही दी अपनी जान (देखें वीडियो)

शांति प्रिय और आध्यात्मिक स्वभाव वाले आईएएस अफसर मुकेश पांडेय बिहार में बक्सर के जिला मजिस्ट्रेट हुआ करते थे. एक शाम वे सर्किट हाउस में अकेले रुकते हैं और खुद का एक वीडियो रिकार्ड करने लगते हैं. यह वीडियो अब उनके जीवन का अंतिम वीडियो बन चुका है. यह वीडियो उनकी निजी जिंदगी की दिक्कतों और जीवन के प्रति उनके नजरिए का गवाह बन जाता है. सुसाइड से ठीक पहले रिकार्ड किए गए इस वीडियो में उन्होंने पांच मिनट में ही काफी सारी बातें कही हैं.

इस वीडियो को बनाने के बाद वे दिल्ली जाकर एक होटल में रुकते हैं. वहां से गाजियाबाद की तरफ निकलते हैं और एक ट्रेन से कटकर जान दे देते हैं. नीचे दिए गए वीडियो को गौर से देखिए और सुनिए. ये अफसर यूनिवर्स की बात कर रहा है. जीवन के मकसद की बात कर रहा है. शांति और अध्यात्म की बात कर रहा है. अपने स्वभाव और परिजनों के व्यवहार की बात कर रहा है.

यह आईएएस अफसर धरती और यूनिवर्स में मनुष्य के होने की किसी सार्थकता को खारिज करता है. इस दुनिया को खुद के लिए रहने लायक नहीं पाता है. वह खुद को यहां मिसफिट बताता है. भारतीय प्रशासनिक सेवा के 2012 बैच का यह अधिकारी अंत में इस नतीजे पर पहुंच जाता है कि आत्महत्या का उसका चुनाव बेहद सही रास्ता है, सबसे उचित तरीका है, सभी समस्याओं-दुखों से निजात पाने का.

मौत को गले लगाना ही एक जीवन के लिए मंजिल नजर आने लगे, वह भी इस नतीजे पर कोई युवा आईएएस अफसर पहुंच जाए, ऐसा उदाहरण शायद ही कहीं मिले.

श्रद्धांजलि मुकेश पांडेय.

आप जिस भी दुनिया में चले गए हों, वहां आप को अपने स्वभाव के अनुरूप शांति और प्रेम मिले.

आत्महत्या करने से पहले बक्सर के सर्किट हाउस में रिकार्ड किए गए मौत के दर्शन वाला वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

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यूं महाभ्रष्ट बना दी गईं नीरा यादव!

Dayanand Pandey : कभी थीं नीरा यादव भी ईमानदार जब वह नीरा त्यागी हुआ करती थीं। उन की ईमानदारी के नाम पर चनाजोर गरम बिका करता था। उन दिनों जौनपुर में डी एम थीं। उन के पति त्यागी जी सेना में थे। 1971 के युद्ध में खबर आई कि वह वीरगति को प्राप्त हुए। नीरा यादव ने महेंद्र सिंह यादव से विवाह कर लिया। तब यादव जी डी आई जी थे। लेकिन बाद में त्यागी जी के वीरगति प्राप्त करने की खबर झूठी निकली। पता चला वह युद्ध बंदी थे। बाद के दिनों में वह शिमला समझौते के तहत छूट कर पाकिस्तान से भारत आ गए। नीरा यादव से मिलने गए तो वह उन से मिली ही नहीं। उन्हें पति मानने से भी इंकार कर दिया। त्यागी जी भी हार मानने वालों में से नहीं थे। डी एम आवास के सामने धरना दे दिया। कहां तो नीरा यादव के नाम से ईमानदारी का चनाजोर गरम बिकता था, अब उन के छिनरपन के किस्से आम हो गए। खबरें छपने लगीं। किसी तरह समझा बुझा कर त्यागी जी को धरने से उठाया गया। जाने अब वह त्यागी जी कहां हैं, कोई नहीं जानता।

पर महेंद्र सिंह यादव ने नीरा यादव को अपनी ही तरह भ्रष्ट अफसर बना दिया। बाद के दिनों में मुलायम सिंह यादव की भी वह ख़ास बन गईं। मुलायम ने उन के भ्रष्ट होने में पूरा निखार ला दिया। अब नीरा यादव को आई ए एस अफसर ही महाभ्रष्ट कहने लगे। दुनिया भर की जांच पड़ताल होने लगी। मेरी जानकारी में नीरा यादव अकेली ऐसी आईएएस अफसर हैं जिन के भ्र्रष्टाचार की जांच के लिए बाकायदा एक न्यायिक आयोग बना। जस्टिस मुर्तुजा हुसैन आयोग। मुर्तुजा साहब ने नीरा यादव को दोषी पाया। शासन को रिपोर्ट सौंप दी। लेकिन किसी भी सरकार ने उस जांच रिपोर्ट पर पड़ी धूल को झाड़ने की नहीं सोची। हर सरकार में नीरा यादव की सेटिंग थी। बाद के दिनों में तो मुलायम सिंह यादव ने उन्हें अपना मुख्य सचिव भी बना लिया था। अदालती हस्तक्षेप के बाद उन्हें हटाना पड़ा। अब वह बाकायदा सज़ायाफ्ता हैं। और सब कुछ सब के सामने है।

लेकिन दो बात लोग नहीं जानते। या बहुत कम लोग जानते हैं। एक यह कि नीरा यादव की दो बेटियां हैं। दोनों विदेश में हैं। नीरा यादव सारी काली कमाई बेटियों को भेज चुकी हैं । बेटियों की पढ़ाई लिखाई भी विदेश में हुई और दोनों बेटियां वहां की नागरिकता ले कर मौज से हैं। दूसरे , डासना जेल में वह वी आई पी ट्रीटमेंट के तहत हैं। बैरक में वह नहीं रहतीं, स्पेशल कमरा मिला हुआ है, उन्हें। तीसरे डासना जेल ट्रायल कैदियों के लिए है, सज़ायाफ्ता के लिए नहीं। बाकी सरकार जाने और नीरा यादव। वैसे नीरा यादव भजन सुनने की खासी शौक़ीन हैं, खास कर अनूप जलोटा की तो वह बहुत बड़ी फैन हैं। हां, व्यवहार में वह अतिशय विनम्र भी हैं। कम से कम मुझ से तो वह भाई साहब, प्रणाम कह कर ही बात करती रही हैं। मेरा स्पष्ट मानना है कि अगर नीरा यादव के जीवन में महेंद्र सिंह यादव और मुलायम सिंह यादव नहीं आए होते तो शायद हम नीरा यादव को एक ईमानदार आई ए एस अफसर के रूप में आज जान रहे होते। कह सकता हूं कि नीरा यादव अपने को चंदन बना कर नहीं रख पाईं, भुजंगों के प्रभाव में आ कर विषैली और भ्रष्ट बन कर रह गईं। अफ़सोस!

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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हिंदी वाले आईएएस बनने का सपना अब छोड़ ही दें!

सफलता के हज़ार साथी होते हैं, किन्तु असफलता एकान्त में विलाप करती है। यूँ तो सफलता या असफलता का कोई निश्चित गणितीय सूत्र नहीं होता, किन्तु जब पता चले कि आपकी असफलता कहीं न कहीं पूर्व नियोजित है, तो वह स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक है। देश की सबसे बड़ी मानी जाने वाली आईएएस की परीक्षा को आयोजित करने वाली संस्था ‘संघ लोक सेवा आयोग’ आज घोर अपारदर्शिता और विभेदपूर्ण व्यवहार में लिप्त है।

हिंदी माध्यम के सिविल सेवा अभ्यर्थियों का  विशेषतः 2011 के बाद से, गिरता हुआ चयन अनुपात सारी कहानी बयान करता है। सम्पूर्ण रिक्तियों का लगभग 3 या 4% ही केवल हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के हिस्से में आ पा रहा है। हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के चयन की गिरती दर का कारण क्या उनकी अयोग्यता/अक्षमता को ठहराया जा सकता है? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है, इसके पीछे कोई तार्किक आधार नहीं है।

यह सर्वविदित है इस परीक्षा के लिए तैयारी करने वालों में सबसे ज़ियादः संख्या हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों की ही है, और उनके परिश्रम तथा क्षमताओं को ख़ारिज करने का कोई तार्किक आधार किसी के पास नहीं है। अस्ल समस्या संघ लोक सेवा आयोग के भेदभावपूर्ण रवैये और अपारदर्शिता में निहित है, उस मानसिकता में निहित है जो चाहती है कि ग्रामीण और क़स्बाई पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों के स्थान पर शहरी पृष्ठभूमि के, अंग्रेज़ी माध्यम के एंजिनियर्स और डॉक्टर्स ज़ियादः से ज़ियादः चयनित होकर आएँ।

भेदभाव और अपारदर्शिता का यह सिलसिला प्रारम्भिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार, तीनों ही स्तरों तक जारी रहता है। प्रारम्भिक परीक्षा के दोनों प्रश्न पत्रों में व्यावहारिक हिन्दी अनुवाद पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। फलस्वरूप, ‘कन्वेंशन’ की हिन्दी ‘अभिसमय’ दे दी जाती है और ‘प्रोजेक्टेड’ की हिन्दी ‘प्रकल्पित’। ऐसे ही क्लिष्ट और अलोकप्रचलित हिन्दी अनुवाद के कई उदाहरण हैं। इतने जटिल प्रश्न पत्रों में, जहाँ अभ्यर्थी की एक सेकण्ड भी क़ीमती होती है, वहाँ कई मिनट्स  इस भाषायी अनुवाद के चलते ख़राब हो जाते हैं; साथ ही, कई बार ऐसे अनुवाद की साम्यता किसी अन्य शब्द से बिठाकर, अभ्यर्थी ग़लत उत्तर का चयन कर लेता है और हज़ारों की संख्या में हर साल ऐसे अभ्यर्थी होते हैं जो एक या दो अंकों से ही प्रारम्भिक परीक्षा में ही उनका पत्ता कट जाता हैं।

कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि गलत अनुवाद के कारण छात्रों से गलत प्रश्न के सही उत्तर मांगे जाते है जो कि असंभव है। प्रारम्भिक परीक्षा की उत्तर कुंजी (answer key), अभ्यर्थियों के प्राप्तांक उन्हें इस परीक्षा के लगभग एक साल बाद बताए जाते हैं, जिसका कोई औचित्य नहीं। ओएमआर शीट की कार्बन कॉपी भी अभ्यर्थियों को दिए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है। 

हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों की मुख्य परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं को भी हिन्दी में अदक्ष मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा जाँचा जाता है। ऐसे में पूरी संभावना यह रहती है कि अभ्यर्थी का लिखा हुआ मूल्यांकनकर्ता तक सही से प्रेषित ही न हो। इस वजह से मुख्य परीक्षा में ही हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों का स्कोर, अंग्रेज़ी माध्यम के अभ्यर्थियों की तुलना में काफ़ी कम रह जाता है। अपारदर्शिता का आलम ये है कि मुख्य परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाएँ अभ्यर्थियों को दिखाए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि कुछ राज्य लोक सेवा आयोग तक आरटीआई/एप्लीकेशन के माध्यम से ऐसी सुविधा प्रदान करते हैं। साक्षात्कार में जानबूझकर कई बार हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों को असहज करने वाले प्रश्न अंग्रेज़ी में पूछे जाते हैं, साथ ही, साक्षात्कार के लिए लिये निर्धारित 275 अंक परीक्षा में आत्मनिष्ठ प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं, जो किसी भी तरह से उचित नहीं है।

यह लड़ाई हिंदी बनाम अंग्रेज़ी की लड़ाई नहीं है। अभ्यर्थी किसी भाषायी द्वेष से ग्रस्त नहीं हैं। वैसे भी, अपारदर्शिता से तो अंग्रेज़ी और अन्य भाषायी माध्यम के अभ्यर्थी भी समान रूप से त्रस्त हैं ही। लड़ाई है, भाषाओं के साथ समान व्यवहार करने की। वह हिन्दी जो पूरे देश में सबसे ज़ियादः लोगों द्वारा बोले जाने वाली भाषा है, वह हिंदी जो आज़ादी के संघर्ष के दौरान जनसंचार की भाषा बनी थी, वह हिंदी जो लोचशील है, जो ‘ट्रेन’ और ‘शायद’ जैसे अन्य भाषायी मूल के शब्दों को भी सहजता के साथ अपने में समाहित कर लेती है, वही हिंदी और हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थी आज इतने उपेक्षित क्यों हैं? “India got freedom in 1947”, जैसा वाक्य, “भारत ने 1947 में आज़ादी पाई”, से कैसे श्रेष्ठ साबित होता है? ये समस्या केवल उस मानसिकता की है जो हिंदी को तुलनात्मक रूप से अधिक वैज्ञानिक भाषा होने के बावजूद कम करके आँकती है। समस्या अंग्रेज़ी से नहीं, बल्कि अंग्रेज़ियत की उस मानसिकता से है जो आज भी देश के शीर्ष संस्थानों में छायी हुई है, जो केवल भाषा विशेष में दक्ष होने के आधार पर किसी व्यक्ति की योग्यता के सम्बंध में पूर्वाग्रह पाल लेती है।

ग्रामीण और क़स्बाई पृष्ठभूमि के लाखों अभ्यर्थी सीमित संसाधनों में, कई बार तो अमानवीय दशाओं में गुज़ारा करके इस परीक्षा के लिए अपना अमूल्य समय और ऊर्जा लगाते हैं, इसके बावजूद उनके लिए परिणाम बेहद निराशाजनक हैं। या तो देश के संचालकों/नीति निर्माताओं द्वारा स्पष्ट कह दिया जाए कि हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के लिए इस परीक्षा में कोई जगह नहीं है ताकि वे भ्रम में ना रहें और  समय, संसाधन तथा ऊर्जा को कहीं और लगा सकें ; या इस संस्था में व्याप्त घोर अपारदर्शिता और भाषायी भेदभाव को यथाशीघ्र समाप्त किया जाए।

यूपीएससी में हिंदी वालों के हक के लिए लड़ रहे निखिलेश सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9582182362

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भास्कर की लैंड डील कैंसल करने वाली महिला आईएएस अफसर का तबादला

लगता है रमन सिंह दैनिक भास्कर के सामने दंडवत हो गए हैं. तभी तो उस महिला आईएएस अधिकारी का तबादला कर दिया गया जिसने दैनिक भास्कर की रायपुर में जमीन की लैंडडील रद्द की थी. इस बारे में स्टेट्समैन अखबार में विस्तार से खबर छपी है, जिसे नीचे पढ़ सकते हैं….

मूल खबर ये है….

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भाजपा राज में भी अशोक खेमका और अमिताभ ठाकुर के साथ न्याय नहीं हुआ!

Surya Pratap Singh : मेरे सहयोगी अशोक खेमका, IAS ने आज ट्विटर पर निम्न विचार लिखा ….

“Honest officers do not complain of frequent transfers. Alternative is far worse. Sidelined without work and face multiple roving inquiries.”

-Ashok Khemka, IAS @AshokKhemka_IAS

आप क्या सोचते हैं कि ईमानदार अधिकारी इसी तरह frustrate होते रहेंगे इस देश में ? या फिर कोई way out है ? कांग्रेस ने तो नहीं, परंतु क्यों वर्तमान हरियाणा सरकार ने अशोक खेमका के साथ न्याय नहीं किया? बिना काम के क्यों sidelined रखा गया है? क्यों उनके ख़िलाफ़ झूँठी जाँचों का अंबार लगा है?

मैं अपने विषय में नहीं लिख रहा, मैं तो सेवानिवृत्त हो गया हूँ…शायद मेरे बारे में लिखने की अब कोई उपयोगिता नहीं, परंतु क्या उत्तर प्रदेश में भी अमिताभ ठाकुर IPS व अन्य ऐसे कई निष्ठावान अधिकारियों के साथ अभी तक न्याय हुआ है? क्या दाग़ी व भ्रष्ट अभी भी मलाईदार पदों पर जमे नहीं बैठे हैं…. यही सब दागी व भ्रष्ट क्यों पसंदीदा है सब नेताओं के?  लोकतंत्र में कब तक चलेगा यह सब? प्रतिभा व योग्यता को कब तक नकारा जाता रहेगा? एक लोकगीत के अंश का आनंद लें:

ई मेंहगाई, ई बेकारी…..नफ़रत कै फैली बीमारी,
दुःखी रहै जनता बेचारी, बिकी जात बा लोटा-धारी,
जियौ बहादुर, खद्दर धारी….
देसवा का कंगाल करत हौ, ख़ुद का मालामाल करत हौ…
तोहरन दम से चोर बज़ारी
जियौ बहादुर, खद्दर धारी….

यूपी के चर्चित आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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मुख्य सचिव रहते राहुल भटनागर ने सहयोगी अफसरों को बदनाम किया, कुर्सी बचाने को किए घिनौने कृत्य!

राहुल भटनागर पर आरोप है कि मुख्य सचिव रहते हुए उन्होंने न सिर्फ अपने सहयोगी अफसरों को बदनाम किया बल्कि अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए हर किस्म के घिनौने हथकंडे अपनाए. उदाहरण के तौर पर गोमती रिवर फ्रन्ट परियोजना के सम्बन्ध में जानबूझकर राहुल भटनागर ने अपने सहयोगी अधिकारियों को बदनाम करने की नीयत से अनियमित कार्यवाही की… कुछ प्वाइंट्स देखें…

1. दिनांक 01.04.2017 को मुख्यमंत्री के समक्ष हुई बैठक में यह किस आधार पर कहा गया कि पुनरीक्षित परियोजना के लिए रु. 2448 करोड़ की आवश्यकता होगी।

2. क्या पुनरीक्षित परियोजना की स्वीकृति किसी स्तर पर हुई?

3. अनुमोदित परियोजना रु. 1513 करोड़ के विरुद्ध रु. 1437 करोड़ व्यय होने के बावजूद लगभग 60 प्रतिशत काम पूरा हुआ जबकि न्यायिक जाँच समिति के समक्ष वर्तमान अभियन्ताओं द्वारा यह आंकड़े दिये गये हैं कि लगभग 95 प्रतिशत कार्य मौके पर हो गया है।

4. बैठक में मुख्यमंत्री द्वारा मुख्य सचिव को जाँच समिति के गठन करने के निर्देश दिये गये थे कि परियोजना में देरी क्यों हुई, पैसा कहाँ खर्च हुआ? उसके स्थान पर दिनांक 04.04.2017 की मुख्य सचिव द्वारा हस्ताक्षरित अधिसूचना में निम्नलिखित बिन्दु मुख्य सचिव द्वारा किस आधार पर निर्धारित किये गये? क्या विभागाध्यक्ष द्वारा कोई तकनीकी आख्या तत्कालीन मुख्य सचिव को दी गयी थी? या अपने मन से आरोप चिन्हित किये गयेः-

(क) पुनरीक्षित लागत रु. 1513 करोड़ में 95 प्रतिशत व्यय किया गया जबकि इस परियोजना का 60 प्रतिशत काम पूरा हुआ।

(ख) गोमती नदी के जल को प्रदूषण मुक्त कराने के स्थान पर अनेक गैर जरूरी कार्यों पर अत्यधिक धनराशि खर्च की गयी।

(ग) कार्यों को कराने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

(घ) कार्यों की गुणवत्ता, परियोजना में देरी तथा धनराशि अनियमित रूप से खर्च होने के आधार पर जाँच आवश्यक है।

5. उक्त उच्च स्तरीय बैठक में तत्कालीन मुख्य सचिव द्वारा निम्नलिखित तथ्यों से क्यों नहीं अवगत कराया गयाः-

(क)  95 प्रतिशत धनराशि व्यय होने के पश्चात् लगभग 95 प्रतिशत कार्य पूरा हो गया।

(ख)  32 किलोमीटर का ड्रैन प्रदूषित जल ले जाने के लिए मात्र 900 मीटर का निर्माण उनके कार्यकाल 13 सितम्बर 2016 से मार्च 2017 तक क्यों नहीं हो पाया?

(ग)  अन्तर्राष्ट्रीय का म्यूजिकल फाउण्टेन बनाने का निर्णय तत्कालीन मुख्यमंत्री जी द्वारा लिया गया था और जिस पर व्यय का अनुमोदन स्वयं श्री राहुल भटनागर द्वारा व्यय वित्त समिति की बैठक दिनांक 10.06.2016 में लिया गया।

(घ)  पर्यावरण की दृष्टिकोण से परियोजना के सम्बन्ध में प्रशासनिक विभाग द्वारा सम्पूर्ण तथ्य माननीय मंत्री परिषद की बैठक दिनांक 18.07.2016 में रखे गये थे।

(ड.)  तत्कालीन मुख्य सचिव, श्री राहुल भटनागर के कार्यकाल में उक्त परियोजना में रु. 781.26 करोड़ का व्यय हुआ और तत्कालीन मुख्य सचिव, श्री आलोक रंजन के कार्यकाल तक रु. 656.58 करोड़ का व्यय हुआ।

(च)  तत्कालीन मुख्य सचिव, श्री आलोक रंजन के द्वारा दिनांक 08.04.2015 से 30.06.2015 तक 16 बैठक अनुश्रवण समिति की गयीं। दिनांक 06.07.2016 से 13 सितम्बर 2016 तक तत्कालीन मुख्य सचिव, श्री दीपक सिंघल के कार्यकाल में 2 बैठक तथा तत्कालीन मुख्य सचिव, श्री राहुल भटनागर द्वारा सितम्बर 2016 से फरवरी 2017 तक 5 बैठक की गयीं।

(छ)  दिनांक 13 सितम्बर 2016 तक प्रोजेक्ट का क्रियान्वयन निर्धारित समय-सारिणी से आगे चल रहा था और जो भी विलम्ब हुआ वह सितम्बर 2016 के बाद हुआ।

(ज) यदि प्रोजेक्ट अधूरा था तो तत्कालीन मुख्य सचिव, राहुल भटनागर द्वारा उक्त प्रोजेक्ट का उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री जी से क्यों कराया?

6. दिनांक 04.04.2017 की अधिसूचना संविधान के अनुच्छेद 162 के अन्तर्गत निहित शक्ति को करते हुए सिंचाई विभाग द्वारा की गयी। उल्लेखनीय है कि अनुच्छेद 162 संविधान के अन्तर्गत प्रारम्भिक निष्कर्ष निकालने हेतु माननीय सेवानिवृत्त न्यायधीश की अध्यक्षता में प्रशासनिक जाँच के आदेश राज्य सरकार कर सकती है लेकिन तत्कालीन मुख्य सचिव द्वारा उक्त अधिसूचना में न्यायिक जाँच करने का आदेश किस प्राविधान के अन्तर्गत दिया गया? उक्त समिति के अन्तर्गत शासकीय नियमों से सुविज्ञ कोई प्रशासनिक अधिकारी अथवा तकनीकी नियमों से सुविज्ञ कोई सेवानिवृत्त इंजीनियर इन चीफ क्यों नहीं रखने का सुझाव दिया गया?

7. उक्त तथाकथित एकपक्षीय न्यायिक जाँच की आख्या की विश्वसनीयता पर प्रथम दृष्टया रूप से प्रश्न चिन्ह लगता है। जाँच आख्या के पृष्ठ सं. 34 में टिप्पणी कि ‘‘वर्तमान मुख्य सचिव अथवा वर्तमान प्रमुख सचिव, सिंचाई का दायित्व नहीं होता है क्योंकि जून 2016 के पश्चात् कुछ ही मीटिंग उक्त समिति की हुई और यह कार्य समाप्ति की ओर अन्तिम अवधि में था’’ साफ तरह से दर्शाता है कि तत्कालीन मुख्य सचिव, श्री राहुल भटनागर द्वारा जाँच प्रभावित की गयी। प्रशासकीय विभाग द्वारा येन-केन-प्रकरेण व्यय वित्त समिति से यह योजना अनुमोदित करायी गयी जैसी गंभीर टिप्पणी किया जाना भी दुर्भाग्यपूर्ण है।

8. अनुश्रवण समिति, जिसमें कि विभिन्न विभागों के प्रमुख सचिव तथा अनेक विभागों के तकनीकी अधिकारी सम्मिलित थे, में से सिर्फ तत्कालीन मुख्य सचिव, आलोक रंजन तथा तत्कालीन प्रमुख सचिव, सिंचाई दीपक सिंघल को चिन्हित कर उन अधिकारियों, जिनके समय में रु. 800 करोड़ से अधिक व्यय हुआ, को दोष-मुक्त निर्धारित करने की प्रक्रिया संदेह से घिरी है।

9. न्यायिक जाँच समिति की आख्या आने के पश्चात् तत्कालीन मुख्य सचिव द्वारा नियमों के अन्तर्गत परीक्षण करने हेतु प्रशासनिक विभाग को क्यों नहीं भेजा गया? तत्कालीन मुख्य सचिव के पास ऐसा कौन-सा तकनीकी ज्ञान या जानकारी थी जिसके आधार पर उनके द्वारा स्वयं उक्त जाँच आख्या को प्रथम दृष्टया गोपनीय रूप से न केवल रिपोर्ट को स्वीकृत कर माननीय मुख्यमंत्री जी को गुमराह किया गया अपितु दोषी अधिकारी भी चिन्हित कर लिये गये।

10. न्यायिक जाँच आख्या में अवयवों के विश्लेषण तथा परियोजन के व्यय के विश्लेषण नियम विरुद्ध होने के बावजूद भी सिंचाई विभाग से अभिमत क्यों नहीं लिया गया?

11. दोषी अधिकारी चिन्हित करने के पश्चात् यदि अखिल भारतीय सेवा के भी अधिकारी उक्त दोषियों में थे तो किस आधार पर नियुक्ति विभाग का अभिमत नहीं लिया गया?

12. दोषी अधिकारी चिन्हित कर कार्यवाही प्रस्तावित करने हेतु माननीय उच्च स्तरीय खन्ना समिति का गठन का सुझाव भी तत्कालीन मुख्य सचिव की मानसिकता को दर्शाता है। जब न्यायिक जाँच समिति द्वारा अपने को दोष-मुक्त लिखवा लिया गया, तत्पश्चात् अपने से वरिष्ठ अधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही प्रस्तावित करने हेतु कनिष्ठ अधिकारियों को समिति में क्यों रखा गया?

13. ऐसी जाँच जिसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह हो और एकपक्षीय हो तथा जिसकी संस्तुति का परीक्षण न सिंचाई विभाग, नियुक्ति विभाग, वित्त विभाग से कराया गया हो, के आधार पर दोषी चिन्हित करने की संस्तुति देना अन्तर्गत धारा 177 सपठित 120बी, 466, 467, 468 आई.पी.सी. के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध है या नहीं, विचारणीय है।

14. यदि ईमानदारीपूर्वक तत्कालीन मुख्य सचिव द्वारा सारे तथ्य मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत किये जाते तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की इस परियोजना का कार्य मौके पर बन्द नहीं होता और अनायास विवाद न बनता।

15. जहाँ उक्त परियोजना के क्रियान्वयन में निविदा आदि या तकनीकी कार्यों में अनियमितता की गयी है, के सम्बन्ध में विस्तृत जाँच कर कार्यवाही आवश्यक है। सिंचाई विभाग में कार्यों के भौतिक सत्यापन की जिम्मेदारी जूनियर इंजीनियर की होती है तथा गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सहायक अभियन्ता की होती है। यह आश्चर्यजनक है कि राहुल भटनागर को इसका कोई ज्ञान नहीं था और पूरे प्रकरण में किसी भी जूनियर इंजीनियर तथा सहायक अभियन्ता की जिम्मेदारी निर्धारित नहीं की गयी।

अनौपचारिक रूप से यह भी ज्ञात हुआ है कि उक्त पत्रावली पर अधिकांश टिप्पणियाँ मुख्य सचिव कार्यालय में वर्षों से अवैधानिक रूप से जमे स्टाफ अफसर श्री पालीवाल द्वारा बनाकर प्रस्तुत की गयीं। तत्कालीन मुख्य सचिव द्वारा कानून, नियम, प्रशासनिक मर्यादा का बिना ध्यान रखे सिर्फ अपने राजनैतिक हित साधने के लिए तथा कुर्सी पर बने रहने के लिए इस प्रकार की घिनौनी कार्यवाही की गयी।

लखनऊ से भड़ास संवाददाता की रिपोर्ट.

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देश में 8 साल में मात्र 10 आईएएस पर विभागीय कार्यवाही, आरटीआई से हुआ खुलासा

कार्मिक तथा प्रशिक्षण विभाग, भारत सरकार के जन सूचना अधिकारी के श्रीनिवासन द्वारा आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को दी गयी सूचना दिनांक 22 जून 2017 से यह तथ्य सामने आया है कि पिछले 08 सालों में पूरे देश में मात्र 08 आईएएस अफसरों पर वृहत दंड तथा 02 आईएएस अफसर पर लघु दंड, अर्थात कुल 10 अफसरों पर विभिन्न दंड हेतु विभागीय कार्यवाही की गयी है.

इनमें वर्ष 2010 में वृहत दंड हेतु 01, 2011 में वृहत दंड हेतु 02 तथा लघु दंड हेतु 01, 2012 में वृहत दंड हेतु 01, 2013 तथा 2014 में कोई नहीं, 2015 में वृहत दंड हेतु 03, 2016 में वृहत दंड हेतु 01 तथा 2017 में लघु दंड हेतु 01 विभागीय कार्यवाही सम्मिलित हैं. नूतन के अनुसार इतनी कम संख्या में कार्यवाही से यह साफ़ हो जाता है कि आईएएस अफसर अपनी सेवा में कितने अधिक सुरक्षित हैं और तमाम गंभीर आरोपों के बाद भी उनके खिलाफ कितनी कम कार्यवाही होती है.

DE on 10 IAS officers in India in 08 years

As per the information dated 22 June 2017 provided by K Srinivasan from Department of Personnel and Training, Government of India to RTI activist Dr Nutan Thakur, proceedings for major penalties against 08 IAS officers and for minor penalty against 02 IAS officers were initiated during the last 08 years.

In 2010 proceeding for major penalty against 01 IAS officer, in 2011 for major penalty against 02 and minor penalty against 01, in 2012 for major penalty against 01, no proceedings in 2013 and 2014, in 2015 proceeding for major penalty against 03, in 2016 proceeding for major penalty against 01 and in 2017 proceeding for minor penalty against 01 IAS officer took place

As per Nutan, this extremely small number of departmental actions against IAS officers makes it clear how safe they are in their service and nothing happens against them despite all kinds of serious allegations.

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भ्रष्ट और चापलूस अफसरों ने सीएम योगी के हाथों आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे के करियर का कत्ल करा दिया!

सुभाष चंद्र दुबे तो लगता है जैसे अपनी किस्मत में लिखाकर आए हैं कि वे सस्पेंड ज्यादा रहेंगे, पोस्टेड कम. सुल्तानपुर के एक साधारण किसान परिवार के तेजस्वीय युवक सुभाष चंद्र दुबे जब आईपीएस अफसर बने तो उनने समाज और जनता के हित में काम करने की कसम ली. समझदार किस्म के आईपीएस तो कसमें वादे प्यार वफा को हवा में उड़ाकर बस सत्ता संरक्षण का पाठ पढ़ लेते हैं और दनादन तरक्की प्रमोशन पोस्टिंग पाते रहते हैं. पर सुभाष दुबे ने कसम दिल से खाई थी और इसे निभाने के लिए अड़े रहे तो नतीजा उनके सामने है. वह अखिलेश राज में बेईमान अफसरों और भ्रष्ट सत्ताधारी नेताओं की साजिशों के शिकार होते रहे, बिना गल्ती सस्पेंड होते रहे.

चुनाव के वक्त चुनाव आयोग ने सुभाष चंद्र दुबे को गाजीपुर का एसएसपी बनाकर भेजा और वहां से वह सहारनपुर सीएम योगी के कार्यकाल के शुरुआती दिनों में तब भेजे गए जब जातीय हिंसा चरम पर थी. भाजपा के लोगों ने सहारनपुर के तत्कालीन एसएसपी लव कुमार के घर पर धावा बोल दिया था. लव कुमार की पत्नी बच्चों को जान बचाने के लिए छिपना पड़ा था. ऐसी किरकिरी से ध्यान हटाने और लव कुमार को खुश करने के लिए राज्य सरकार ने उनको नोएडा जैसे प्राइम जिले की पोस्टिंग दे डाली और सहारनपुर का जिम्मा तेजतर्रार अधिकारी सुभाष चंद्र दुबे को सौंप दिया.

उधर, नोएडा के डीएम एनपी सिंह को सहारनपुर का जिलाधिकारी बना दिया गया. एनपी सिंह की पूरे सूबे में एक अलग छवि है. वह अपनी ईमानदारी, कठिन मेहनत, जन सरोकार के लिए जाने जाते हैं. माना गया कि एनपी और सुभाष दुबे की जोड़ी सहारनपुर में सब कुछ सामान्य कर देगी. ऐसा हुआ भी. लेकिन सीएम योगी और इन दो अफसरों के बीच संवादहीनता ने बीच के दलाल अफसरों को मौका दे दिया. इन दलाल अफसरों ने सीएम योगी के कान में अपने हिसाब से फीडबैक दे दिया.

एनपी और सुभाष दुबे ने अठारह अठारह घंटे तक साथ रहकर सहारनपुर में शांति लाने की कोशिश की लेकिन इन दोनों को यह आरोप लगाकर सस्पेंड कर दिया गया कि इनमें तालमेल नहीं था और इन लोगों ने मायावती को सहारनपुर में घुसने की अनुमति दे दी थी. खासकर मायावती वाले प्वाइंट को योगी ने गंभीरता से ले लिया. जबकि हकीकत यह है कि एसपीजी कवर प्राप्त मायावती दिल्ली से जब गाजियाबाद में घुसीं और मेरठ समेत कई जिलों को पार करती हुईं सहारनपुर पहुंचीं तो इसके लिए कोई एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

एसपीजी के लोग अपने वीवीआईपी के रूट पर कई दिन पहले से काम करने लगते हैं. मतलब यह कि यह सारा कुछ बड़े अफसरों के इशारे और सहमति से हुआ था लेकिन दोष मढ़ दिया गया सहारनपुर के तत्कालीन एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे और डीएम एनपी सिंह पर. कहा जाता है कि सहारनपुर की सीमा पर अगर मायावती को उस समय रोक दिया जाता तो सहारनपुर में उग्र हुए दलित समुदाय के लोग अपनी नेता को रोके जाने से नाराज होकर लंबा और बड़ा बवाल कर सकते थे जिसे फिर रोक पाना मुश्किल होता.

अपने छोटे से कार्यकाल में एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे ने सहारनपुर में ग्राउंड लेवल पर जो जो काम किए (कुछ दस्तावेज संलग्न हैं यहां), उसी का नतीजा है कि जो नए लोग वहां डीएम एसएसपी बनाकर भेजे गए, उन्हें बहुत खास कुछ नहीं करना पड़ा और नियंत्रित हालात का श्रेय खुद लेने का मौका मिल गया. वो कहते हैं न जो नींव के पत्थर होते हैं, उनका जिक्र कम होता है, उस मजबूत नींव पर खड़े महल को सब देखते सराहते हैं.

ये हैं सहारनपुर बवाल के असल कारण.. पर दोषियों पर कार्रवाई की जगह ईमानदार और मेहनती अफसरों को ही सस्पेंड कर दिया गया…

ये वह दस्तावेज है जिससे जाहिर होता है कि सहारनपुर के तत्कालीन डीएम एनपी सिंह और एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे ने ग्राउंड लेवल पर खूब सारा होमवर्क काम करने और डाक्यूमेंटेशन के बाद पब्लिक-प्रशासन-पुलिस के बीच तालमेल का एक फुलप्रूफ और जनपक्षधर तानाबाना बुना. आज इसी का नतीजा है कि सहारनपुर में सब कुछ पुलिस प्रशासन के नियंत्रण में है लेकिन इसका श्रेय एनपी-सुभाष को मिलने की जगह इन्हें निलंबन झेलना पड़ा और वाहवाही उनको मिल रही जिनका काम सिर्फ लगाना बुझाना और गाल बजाना है और अपने सियासी आकाओं का चरण चापन करना है.

आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे के खिलाफ जिस कदर जहर सीएम योगी के दिमाग में बोया गया है, उसका नतीजा यह है कि इन दोनों अफसरों को आजतक अपना पक्ष रखने के वास्ते सीएम से मिलने तक का समय नहीं दिया गया. जो बिचौलिए अफसर हैं, इस स्थिति का फायदा उठाकर अपने खास चंपू अफसरों को प्राइम तैनाती दिलाने में सफल हो जा रहे हैं और जो ईमानदार हैं, वह खुद को सपा राज जैसा ही प्रताड़ित पीड़ित महसूस कर रहे हैं. चाल चेहरा चरित्र को लेकर खुद को अलग होने का दावा करने वाली भाजपा के नेताओं को यह देखना चाहिए कि भले सौ बेईमान माफ कर दिए जाएं, लेकिन किसी एक ईमानदार के खिलाफ गलत कार्रवाई न हो जाए.

चर्चा तो यहां तक होने लगी है कि पूरा सिस्टम अब इस कदर चापलूसों और चोरों से भरा हुआ हो गया है कि अब ईमानदार, तेवरदार और जन सरोकार वाला होना अपराध हो गया है. ऐसे लोगों को न तो काम करने दिया जाता है और न ही कोई ठीकठाक पोस्टिंग देर तक दी जाती है. इनके पीछे सारे बेईमान एकजुट होकर हाथ धोकर पड़ जाते हैं. सबको उम्मीद थी कि यूपी में भाजपा शासन आ जाने से लंबे समय से चल रहे सपा और बसपा के जंगलराज से मुक्ति मिल जाएगी लेकिन हुआ ठीक उलटा. लग रहा है जैसे जंगलराज कांटीन्यू कर रहा है. वही भ्रष्ट और दागी अफसर मजबूत बड़े पदों पर जमे हैं जिन्होंने पिछले शासनकालों में जमकर मलाई खाई और अपनों को खिलाया. जिन्हें जेलों में होना चाहिए, वह योगी सरकार के गुड बुक में हैं और जिन्हें बड़ा पद कद मिलना चाहिए वे सस्पेंड बड़े हैं या कहीं कोने में फेंक दिए गए हैं.

सीएम योगी को अफसरों द्वारा दिए जाने वाले फीडबैक को परखने जांचने के लिए भी एक सिस्टम खड़ा करना चाहिए अन्यथा बेईमान और चापलूस अफसरों की झूठी बातों में आकर उनके हाथों बहुत सारा अनर्थ होता रहेगा, जैसे एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे के मामले में हुआ है. इन दो अफसरों का निलंबन लगातार जारी रहने और इनकी बात तक न सुने जाने से ईमानदार किस्म के अफसरों में बेचैनी है. यूपी में कानून व्यवस्था से लेकर ढेर सारे क्षेत्रों में हालात न सुधरने का बड़ा कारण यही है कि अब भी प्रदेश का दो तिहाई हिस्सा भ्रष्ट अफसरों के शिकंजे में है जो भाजपा नेताओं को पर्दे के पीछे से ओबलाइज कर अपनी मनमानी कर रहे हैं.

उम्मीद करना चाहिए कि सीएम योगी के जो खास लोग हैं, वह आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे और आईएएस एनपी सिंह मामले में योगी को सच्चाई बताएंगे और इनका निलंबन खत्म कराने की दिशा में काम करेंगे. अभी अगर कोई भ्रष्ट अफसर सस्पेंड हुआ होता तो वह तगड़ी लाबिंग करके हफ्ते-दो हफ्ते में ही बहाल हो गया होता. लेकिन एनपी और सुभाष लाबिंग जैसे खेल तमाशों से दूर रहने वाले लोग हैं और अपने लिए राजनीतिक आका नहीं बनाए इसलिए अलग-थलग पड़कर भोगने के लिए मजबूर हैं. उनके पक्ष में कोई भी अफसर सीएम के सामने एक शब्द बोलने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि टाप लेवल पर बैठे अफसरों को अपनी नौकरी बचाने और कुर्सी हथियाए रहने की कला खूब आती है.

आईएएस और आईपीएस एसोसिएशन भी लगभग रीढ़ विहीन मुद्रा में ही रहते हैं. इनके पदाधिकारी भी कानों में तेल डाले चुप्पी साधे पड़े हुए हैं. यहां तक कि डीजीपी सुलखान सिंह से लेकर मुख्य सचिव राहुल भटनागर तक में अपने ईमानदार अफसरों को प्रोटेक्ट करने, उनका पक्ष रख उन्हें बिना वजह दंडित किए जाने से बचाने का दम नहीं दिख रहा अन्यथा आज एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे यूं निलंबित होकर बनवास नहीं काट रहे होते. ये उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य है कि यहां बदलाव के पक्ष में वोट तो पड़ते हैं लेकिन भारी भरकम नोटों के तले जनभावना कुचली जाती है, सत्ता सिस्टम का करप्टर चरित्र पहले जैसा ही बना रहता है. जो ईमानदारी से ग्राउंड लेवल पर जनसरोकार के साथ काम करता है, उसकी नियति एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे बन जाना होता है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे के व्यक्तित्व को लेकर यशवंत द्वारा लिखी गई इस पुरानी पोस्ट को भी पढ़ें…

ये भी पढ़ें, योगी राज में अफसरशाही का हाल….

एक नज़र इधर भी….

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यूपी के दागी चीफ सेक्रेट्री की विदाई तय, केंद्र से लौटे राजीव कुमार सिंह को मिलेगी जिम्मेदारी

यूपी के दागी नौकरशाह और चीफ सेक्रेट्री राहुल भटनागर ने भाजपा राज में भी कई महीने तक निर्विरोध बैटिंग कर ली, यह उनके करियर की प्रमुख उपलब्धियों में से एक माना जाना चाहिए. जिस राहुल भटनागर के कार्यकाल में और जिस राहुल भटनोगर के अनुमोदन से यूपी में दर्जनों गोलमाल हुए, वही राहुल भटनागर आज भी खुद को पाक साफ दिखाकर मुख्य सचिव की कुर्सी हथियाए हुए हैं.

यहां तक कि गोमती रिवर फ्रंट घोटाले की जांच रिपोर्ट तक को मैनेज करने का उन पर आरोप है. घोटाले न्यायिक जांच रिपोर्ट के बारे में लोगबाग कहने लगे हैं कि यह रिपोर्ट सिर्फ राहुल भटनागर को बचाने की एक कोशिश का हिस्सा भर है. इस रिपोर्ट के आधार पर दर्ज एफआईआर में सिर्फ इंजीनियरों को बलि का बकरा बनाया गया है. जो असली घोटालेबाज अफसर और नेता हैं, वे मौज काट रहे हैं. आरोप है कि जांच रिपोर्ट और उसके बाद हुई कार्रवाई के जरिए हजारों करोड़ के घोटाले के असली गुनाहगारों को प्रभावशाली पद पर बैठे हुए लोग बचाने की कोशिश कर रहे हैं.

74 पेज की जांच रिपोर्ट में जांच कर रहे न्यायमूर्ति ने कहीं भी यह सवाल खड़ा नहीं किया कि प्रमुख सचिव वित्त रहते राहुल भटनागर ने पहले ही चरण में योजना को वित्तीय अनुमोदन किया. जब दूसरे चरण में योजना की धनराशि दोगुने से अधिक कर दी तब भी सूबे के प्रमुख सचिव राहुल भटनागर पर न्यायिक जांच में सवाल नहीं उठाए गए. कई महीनों तक परियोजना की उच्च स्तरीय अनुश्रवण समिति के अध्यक्ष के रूप में जब वह चीफ सेक्रेट्री थे, मीटिंग की गई और परियोजना का निरीक्षण किया गया, मगर पूरी जांच रिपोर्ट में इस बिन्दु पर कोई सवाल नहीं उठाया गया. यह सब इसलिए हुआ क्योंकि राहुल भटनागर जिन पर वित्तीय संसाधनों को संभालने की जिम्मेदारी थी, वह इस धांधली में शामिल थे, वे सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठे हैं, तो कोई भी जांच निष्पक्ष हो पाएगी, इसकी उम्मीद करना बेमानी है.

यूपी के बदनाम चीफ सेक्रेट्री राहुल भटनागर को आखिर कौन बचा रहा है… चर्चा है कि शुगर लॉबी ने सूबे के सबसे ताकतवर एक बाहरी नेता को 10 करोड़ रुपया दिया.. शुगर लॉबी चाहती है कि राहुल भटनागर से शुगर लॉबी का साथ न छूटे.. आाजदी के बाद से यह पहला मौका है कि जब किसी चीफ सेक्रेट्री ने किसी विभाग के प्रमुख सचिव का पद भी अपने पास रखा हो… चुनाव से पहले यही भाजपा राहुल भटनागर के भ्रष्टïचार की शिकायत चुनाव आयोग से की थी और उन्हें तत्काल चीफ सेक्रेट्री के पद से हटाने की मांग की थी लेकिन चुनाव जीतने के बाद भाजपा का राहुल भटनागर के प्रति अचानक प्रेम उमड़ने लगा. पर कहा जा रहा है कि लगातार शिकायतों और बदनामियों से परेशान भाजपा नेतृत्व ने योगी सरकार के चीफ सेक्रेट्री पद से राहुल भटनागर को हटाने का मन बना लिया है. इस बाबत जिस अफसर का नाम लिया जा रहा है वो हैं राजीव कुमार सिंह.

भारत सरकार ने 81 बैच के आईएएस अधिकारी राजीव कुमार को समय पूर्व अपने गृह प्रदेश में जाने को मंजूरी दे दी है. इस संबंध में नियुक्त समिति ने पत्र भी जारी कर दिया है. संभावना जताई जा रही है कि राजीव कुमार को यूपी का अगला चीफ सेक्रेटरी बनाया जा सकता है. इस तरह आईएएस राजीव कुमार के समय पूर्व प्रतिनियुक्ति से वापसी से भ्रष्ट चीफ सेक्रेटरी राहुल भटनागर की विदाई की घड़ी करीब आ गई है. अपने भ्रष्टाचारों को लेकर प्रदेश के वर्तमान चीफ सेक्रेटरी मीडिया में सुर्खियों पर रहे हैं. सरकार बदलने के बाद भी अपने पद पर जमे राहुल भटनागर के पीछे भाजपा के कुछ नेताओं का हाथ बताया जा रहा है. फिलहाल खन्ना समिति ने रिवर फ्रंट मामले में सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी है. ऐसे में यदि सीबीआई जांच में मौजूदा चीफ सेक्रेट्री राहुल भटनागर फंसते हैं तो सरकार की काफी किरकिरी हो जाएगी. इसलिए सरकार ने राहुल भटनागर की ओर से अपना हाथ खींच लिया है.

आईएएस राजीव कुमार सिंह को लेकर भाजपा नेता और पूर्व आईएएस अधिकारी सूर्य प्रताप सिंह अपनी एफबी वॉल पर ये लिखते हैं-

उत्तर प्रदेश में मुख्यसचिव पद पर ‘बहुप्रतिक्षित’ बदलाव की दस्तक….. १९८१ बैच IAS राजीव कुमार सिंह अगले मुख्यसचिव होंगे। बहुत ही सुलझे हुए अधिकारी की छवि लिए राजीव कुमार सिंह को केंद्र से प्रदेश के मुख्यसचिव की कमान सम्भालने के लिए कार्यमुक्त किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश विकास से कोसों दूर अपनी दुर्दशा-भयंकर बेरोज़गारी, किसानों / मज़दूर की बेबसी, ग़रीबी से जूझ रहा है। सरकारें बड़े-२ वादों के साथ आती रही और जाती रहीं… उत्तर प्रदेश विकास से उपेक्षित जाति, धर्म की राजनीति में ही उलझा रहा….पूर्व दो सरकारों द्वारा गिफ़्ट में मिली क़ानून व्यवस्था व भ्रष्टाचार आज भी बड़ी समस्या… अनियंत्रित है। कड़क, दृढ़संकल्पित मुख्यमंत्री के रहते भी उत्तर प्रदेश आज भी ढीली-ढाली प्रशासनिक व्यवस्था से उलझ रहा है। नौकरशाही के आधी-अधूरी प्रतिबद्धताएँ, टीमवर्क के अभाव, व मंत्रिगणों की अनुभवहीनता जनमानस व मीडिया में चर्चा का विषय है। १०० दिन में सरकार के पास दिखाने के लिए ‘प्रत्यक्ष’ कुछ विशेष भी नहीं है, फिर भी कुछ-न-कुछ तो बताना ही होगा। आने वाले मुख्यसचिव राजीव कुमार सिंह, यद्यपि अत्यंत कर्मशील अधिकारी की छवि के साथ आ रहे हैं, के समक्ष चुनौतियाँ- ऊपर से निचले स्तर तक ‘आदत-ख़राब’ अकर्मणय नौकरशाही,लच्चर वित्तीय प्रबंधन, भ्रष्टाचार, ख़राब क़ानून व्यवस्था… मुँहवाहे खड़ी हैं। आने वाले नए मुख्यसचिव को मेरी सहृदय शुभकमाएँ ….

लखनऊ से भड़ास संवाददाता की रिपोर्ट.

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योगी जी को अखिलेश यादव के जमाने वाले मुख्य सचिव राहुल भटनागर उर्फ शुगर डैडी से इतना प्रेम क्यों?

Yashwant Singh : यूपी का मुख्य सचिव एक ऐसा दागी आदमी है जिसे खुलेआम लोग शुगर डैडी कहते और लिखते हैं. शुगर डैडी बोले तो शुगर लॉबी का दलाल. बोले तो शुगर मिल मालिकों का चहेता. बोले तो यूपी की चीनी मिलों के प्रबंधन का प्रतिनिधि. बोले तो यूपी के गन्ना किसानों का दुश्मन.

ये राहुल भटनागर नामक शुगर डैडी महोदय अखिलेश यादव के जमाने में जब दीपक सिंघल को हटाकर मुख्य सचिव बनाए गए थे तो किसी को कुछ भी खराब नहीं लगा क्योंकि अखिलेश यादव के राज में पूरा कुनबा लूटपाट जमकर करता था और अपने अपने हिसाब से मोहरे फिटफाट कराता था. लेकिन अब योगी जी के राज में क्या मजबूरी है कि ये शुगर डैडी कांटीन्यू किए जा रहे हैं, पूरी बेशरमी के साथ. यहां तक कि आईएएस की नौकरी से वीआरएस लेकर भाजपा नेता के रूप में सक्रिय चर्चित शख्सियत Surya Pratap Singh सिंह को खुलकर शुगर डैडी की पोल खोलते हुए लिखना पड़ा और अपनी ही सरकार पर सवाल उठाना पड़ा. उन्होंने योगी जी के किसी चांडाल चौकड़ी से घिरे होने की बात कही.

ये सही है कि आदित्यनाथ योगी की प्रशासनिक अनुभवहीता का अफसर खूब फायदा उठा रहे हैं और ट्रांसफर पोस्टिंग के खेल में भी नब्बे फीसदी इन्हीं चांडाल चौकड़ी वालों की ही चल रही है लेकिन राहुल भटनागर मुख्य सचिव के मामले में योगी जी की आंख पर पट्टी क्यों पड़ी है. ऐसे भ्रष्ट और दलाल किस्म के आईएएस अधिकारी को मुख्य सचिव की कुर्सी से तुरंत उठा फेंकना चाहिए ताकि यूपी में प्रशासनिक लेवल पर अब भी कायम जड़ता को खत्म किया जा सके.

याद रखिए जब मुख्य सचिव ही दागी हो तो वह पूरे प्रदेश में दागियों का सरगना बन जाता है और उसका अघोषित काम अपने और दूसरों के दाग को छुपाना बचाना होता है, साथ ही इस क्रमबद्धता को कायम रखते हुए जमकर उगाही वसूली करते कराते हुए अपने सियासी आकाओं को खुश रखना होता है ताकि उनकी कुर्सियां सलामत रहे. उम्मीद करते हैं कि जल्द ही दागी राहुल भटनागर उर्फ कुख्यात शुगर डैडी को मुख्य सचिव के कार्यभार से सीएम योगी जी मुक्त कर उत्तर प्रदेश की जनता पर एक बड़ा एहसान करेंगे.

हालांकि जनता तो जमाने से कह रही है कि हे नेताओं, बस अब एक एहसान करना की आगे से कोई एहसान मत करना लेकिन नेता हैं कि मानते ही नहीं. वो जनता की दुहाई दे देकर जार जार रोते हुए एहसान दर एहसान करते जा रहे हैं और इस चक्कर में बेचारी जनता को खुद का गला लगातार दबता घुटता हुआ महसूस होने लग रहा है.

आखिर में फेसबुक के समाजवादी पार्टी के छिपे-खुले चिंतकों से कहूंगा कि वो भाजपाइयों से पूछें कि आखिर अखिलेश भइया के दागी मुख्य सचिव राहुल भटनागर योगी जी को इतना पसंद काहें आ गए कि उन्हें ही कांटीन्यू किए पड़े हैं. फिर तो मानना ही पड़ेगा कि अखिलेश राज में सब कुछ सही था, भाजपा ने केवल जुमलेबाजी के दम पर चुनाव जीता और अब यथास्थिति कायम रखे रहने के लिए पूरे प्रशासकीय तंत्र को पहले जैसा ही बनाए हुए है. जै हो योगी जी. जै जै शुगर डैडी जी. कमाल करते हो आप लोग जी.

भड़ास के फाउंडर और एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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यूपी के दाग़ी मुख्य सचिव राहुल भटनागर को क्यों दिया गया बदनामी भरा ‘शुगर डैडी’ का Title, आइए जानें

Surya Pratap Singh : उ.प्र. में क्या निजी चीनी मिलों के ‘एजेंट’ हैं ‘शुगर डैडी’….. कब योगी जी की ‘वक्र’ दृष्टि पड़ेगी इन महाशय पर?  दाग़ी मुख्य सचिव, राहुल भटनागर को क्यों दिया गया बदनामी भरा ‘शुगर डैडी’ का Title….क्या लम्बे समय से वित्त के साथ-२ गन्ना विभाग के प्रमुख सचिव की कुर्सी पर विराजमान रहे ‘शुगर डैडी’ सशक्त शुगर लॉबी का लाड़ला है….. हो भी क्यों न…इन्होंने गन्ना किसानों को रु. 2,016 करोड़ का जो चूना लगाकर चीनी मिलों को सीधा लाभ जो पहुँचाया है….किसानों को देय गन्ना मूल्य पर रु. 2,016 का ब्याज एक झटके में माफ़ कर दिया….. चीनी मिलों पर इस रहमत के लिए कितना माल ‘शुगर डैडी’ की जेब में गया और कितना अखिलेश यादव की, यह तो कहना मुश्किल है लेकिन इसे समझना काफ़ी आसान है। हाईकोर्ट ने ‘शुगर डैडी’ को न केवल कोर्ट में तलब कर फटकार लगाई अपितु ‘किसान विरोधी’ होने का तमग़ा देकर तीखी टिप्पणी भी की……

उच्च न्यायालय ने सरकार के इस ‘किसान विरोधी’ निर्णय पर रोक लगाने के साथ ही चार माह में मामले को निस्तारित करने के निर्देश भी दिए थे, लेकिन शुगर डैडी इसे दबा कर बैठ गए। दो माह बीत जाने के बावजूद ‘शुगर डैडी’ ने CM योगी को अंधेरे में रखकर इस फ़ाइल को दबा दिया…CM योगी किस दबाव में ये सब बर्दाश्त कर रहे है , समझ से परे है। वैसे चीनी मिलों के करोड़पति मालिकान सभी सत्ताधिशों के नज़दीक हो ही जाते हैं। शराब व पंजीरी माफ़िया पॉंटी चड्ढा ग्रूप भी ‘शुगर डैडी’ के बड़ा नज़दीक बताया जाता है।

शुगर डैडी के नाम से कुख्यात मुख्य सचिव के कई अन्य कारनामों से जहां गन्ना किसानों में जबरदस्त रोष है…ठगा महसूस कर रहे हैं गन्ना किसान..इन्होंने पेराई सत्र 2012-13 और 2013-14 का 1306 करोड़ रुपए और फिर अक्टूबर 2016 में 2014-15 का 710 करोड़ रुपए का मिलों द्वारा किसानों को देय ब्याज माफ कर किसानों का ख़ूब ख़ून चूसा… मुख्य सचिव पद के इतिहास में यह पहला मौक़ा है जब कोई मुख्य सचिव अपने पद के साथ-२ प्रमुख सचिव, गन्ना विभाग का पद भी हथियाए हुए है….क्या लालच है कि राहुल भटनागर, प्रमुख सचिव गन्ना विभाग का पद नहीं छोड़ पा रहे हैं……. न अपनी और न सरकार की बदनामी की महोदय को कोई चिंता नहीं है।

कोई IAS/IPS अधिकारी जब न्याय की कुर्सी पर बैठता है तो उसकी कोई जाति या धर्म नहीं होनी चाहिए, उन्हें यही ट्रेनिंग दी जाती है लेकिन आज लोग ख़ूब चटकारे लेकर बात कर रहे है कि मुख्य सचिव, राहुल भटनागर , CM योगी जी की आँख में भी धूल झोंक कर हाल में हुए IAS/IPS अधिकारियों के ट्रान्स्फ़र में मलाईदार पदों पर अपने कई ‘स्वजातीय’ अधिकारियों को तैनात कराने में सफल रहे …. यदि सही है, तो शर्मनाक है एक उच्च IAS अधिकारी का इस प्रकार का जातिवाद…. क्या फ़र्क़ रह गया अखिलेश यादव/मुलायम व एक IAS में…

आज प्रदेश में अस्पतालों का बुरा हाल है..शिक्षा व्यवस्था चौपट है… गन्ना किसान ही क्या सभी किसान/मज़दूर परेशान हैं…. भर्तियाँ बंद हैं… बेरोज़गारी मुँहबायें खड़ी है…. सड़के टूटी हैं….भ्रष्टाचार का बोलबाला है ….क़ानून व्यवस्था का बुरा हाल है.. एक मुख्य सचिव इस सबके के लिए सीधे जिम्मेदार होता है…. प्रदेश में ढीला ढाला प्रशासन भी ‘शुगर डैडी’ की हो देन है….अखिलेश सरकार के नॉएडा/इक्स्प्रेस्वे/एलडीए/जीडीए में मचे भ्रष्टाचार व भ्रष्ट अधिकारियों को भी बचाए है, शुगर डैडी… भ्रष्ट इंजीनियर यादव सिंह को भी इन्हि के नेतृत्व में बचाया था।

प्रमुख सचिव, ग्रह के जाने के बाद अब अखिलेश की लम्बी ‘नाक के बाल’ व अपने से कई वरिष्ठ IAS अधिकारियों को धक्का मार कुर्सी पर बैठे ‘कम्बल ओढ़कर घी पीने वाले’ दाग़ी मुख्य सचिव, राहुल भटनागर उर्फ़ ‘शुगर डैडी’ के जाने का इंतज़ार है , उत्तर प्रदेश के जनमानस को …..एक ईमानदार, कर्मशील मुख्यसचिव चाहिए इस प्रदेश को जो भाजपा के ‘सबका साथ-सबका विकास’ के agenda को गति प्रदान कर सके …..

क्या मैंने ग़लत कहा, मित्रों? सुना है कि ‘शुगर डैडी’ को शुगर लॉबी के साथ-२,LDA में कार्यरत बड़े बिल्डर व भाजपा के एक स्वजातीय बड़े नेता, ओम् ..ॐ का भी संरक्षण भी है….कैसे अपनी धुन के पक्के योगी जी पार पाएँगे उत्तर प्रदेश के ऐसे नौकरशाहों से, देखना रुचिक़र होगा !!!

यूपी कैडर के सीनियर आईएएस रहे और फिलवक्त भाजपा नेता के रूप में सक्रिय सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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आज 17 मई, आज अनुराग तिवारी का जन्मदिन… लेकिन यह युवा आईएएस नहीं रहा… अलविदा दोस्त

Abhishek Upadhyay : आज अनुराग का जन्मदिन है। सुबह से सोच रहा था, कि अब फोन मिलाऊं। अच्छा नहा लूं। फिर मिलाता हूं। पूजा रह गई है। वो करके तफ्सील से बात करूंगा। जब तक मोबाइल हाथ में उठाया, 9.45 हो चुके थे। टीवी चल रही थी। अब तक लखनऊ में एक आईएएस की मौत की खबर ब्रेकिंग न्यूज बनकर चलना शुरू हो चुकी थी। मैं पागलों की तरह चैनल बदल रहा था। गलत खबरें भी चल जाती हैं, कभी-कभी। मगर हर चैनल पर वही खबर। कर्नाटक काडर का आईएएस अधिकारी अनुराग तिवारी।

मेरा बचपन का दोस्त। मेरे ही चैनल पर उसके न होने की खबर। हम दोनो का जन्मदिन एक दिन के फासले पर होता है। कुछ दिन पहले ही बात हुई थी। आईएएस एकेडमी मसूरी में था। मुझसे बोला कि 16 मई को तुझे फोन करूंगा और कमीने 17 को तुम याद कर लेना। इतनी प्यार भरी चासनी में घोलकर वो “कमीने” बोलता था कि लगता था इस एक लफ्ज के बगैर ये दोस्ती ही अधूरी है। 16 को उसका फोन नही आया। 17 को मैं फोन कर सकूं, इसकी खातिर बहुत कम वक्त दिया उसने। अभी पूरा दिन पड़ा है और मैं हाथों में मोबाइल लिए उसका नंबर देखे जा रहा हूं। ये फोन अब किसको करूं?

कर्नाटक में बीदर जिले का डीसी (डिप्टी कमिश्नर)/कलेक्टर था अनुराग। 36 साल के इस युवा आईएएस ने सूखे से बुरी तरह प्रभावित बीदर की तस्वीर बदलकर रख दी थी। कुएं/तालाब/बावड़ी की सफाई से लेकर टैकरों से पानी पहुंचाने तक, इस लड़के ने बीदर को उम्मीद की नई शक्ल दे दी थी। पूरे कर्नाटक में बीदर मॉडल की चर्चा थी। अनुराग अक्सर फोन करता और कहता, “कमीने, ये जो सेंसेशन जर्नलिज्म करते रहते हो, कभी इधर भी आओ, देखो जमीन पर कितना अच्छा काम रहो रहा है।”

मेरे एक से जवाब, “बहुत जल्दी आउंगा मेरे भाई, बहुत सी बातें करनी है तुझसे” को सुनकर वो पहले 20-25 प्यार भरी गालियां बकता फिर बोलता, “सुन बे, माल्या के बारे में बड़ी टाप की खबर है यहां, पर साले पहले आना होगा, फिर बताउंगा।” हम दोनो देर तक हंसते रहते। मसूरी में जब बात हुई तो उसने पहली बार पत्नी से अलगाव की बात बताई। मैने जैसे ही पूछा कि पर हुुआ क्या, वो फिर शुरू हो गया, “अबे ये जिंदगी है, सुख-दुख लगे रहते हैं, तुम मसूरी आ जाओ। गजब का मौसम है, इस समय। आओ, बेटा, जमकर घूमाता हूं तुम्हें।” उसने बात टाल दी। मैने फिर कुछ नही पूछा।

अनुराग तिवारी (फाइल फोटो)

उसने मुझे बताया था कि कुछ दिन बाद मसूरी से लखनऊ जाना है, तो दिल्ली होते हुए जाएगा। दिल्ली में मिलना तय हुआ था। आज 17 मई है। अनुराग तिवारी का जन्मदिन। बहराइच में सेंवेंथ डे स्कूल में हॉफ पैंट पहनकर पढ़ने जाता अनुराग। महाराज सिंह इंटर कालेज के मैदान में फुटबाल खेलने के दौरान, अचानक घूमकर आई क्रिकेट की लेदर वाली बाल की चोट से सन्न हो चुके मेरे सिर को देर तक गोद मे लेकर बैठा अनुराग। दीप यज्ञ में साथ-साथ गांठ जोड़कर बैठता अनुराग। एक के बाद दूसरी तस्वीरें।

लखनऊ पुलिस का इंवेस्टीगेशन जो भी कहे, जिस अनुराग को मैं जानता हूं, वो कभी भी किसी डिप्रेशन या तनाव से नहीं हार सकता। जबरदस्त इच्छाशक्ति और खुशनुमापन था मेरे दोस्त में। ये जिंदगी बड़ी अतार्किक होती है। कब तक है और कब नही, ये भी मालूम नही होता। हम सब उसी सफर के यात्री हैं जिसे वो समय से पहले पूरा कर गया। ये 17 मई ठहर गई है। ये अब कभी आगे नही बढ़ेगी। जन्मदिन की मुबारकबाद का लफ्ज मेरे होठों पर अटका हुआ है, ये भी यहीं अटका रहेगा। गति की इस दुनिया में ठहराव का भी एक निर्मम सच होता है। बेहद ही निर्मम। अलविदा दोस्त।

इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से.

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योगी को जेल भेजने वाले आईएएस अधिकारी हरिओम पर आज उनका ही अपना एक गाना एकदम फिट बैठ रहा

म्यूज़िक कंपनी ‘मोक्ष म्यूज़िक’ और संगीतकार राज महाजन के करीबी माने जाने वाले आईएएस अधिकारी डॉ. हरीओम से ऐसी क्या गलती हुई जिसका हर्जाना उन्हें आज 10 साल बाद भरना पड़ रहा है? आज के हालातों में गाया हुआ उनका अपना ही गाना ‘सोचा न था, जाना न था, यूँ हीं ऐसे चलेगी ज़िन्दगी’ उन पर एक दम सूट कर रहा है. आज से दस साल पहले IAS अधिकारी डॉ. हरीओम ने सांसद ‘योगी आदित्यनाथ को भेजा था जेल.  बस… यही थी उनकी खता जिसे आज वह भुगत रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में योगी की सरकार बनते ही प्रशासनिक अधिकारियों के ट्रान्सफर शुरु हो गए. प्रदेश में कुल 20 बड़े अधिकारियों के तबादले किए गए जिनमें से 9 को वेटिंग लिस्ट में रखा गया है.  इसी वेटिंग लिस्ट में से एक अधिकारी डॉ. हरिओम भी हैं, जिन्होंने 10 साल पहले वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था.

डॉ. हरिओम ने अभी हाल ही में संगीतकार राज महाजन के निर्देशन में ‘मोरा पिया’ नामक गाना भी गाया है जिसकी विडियो-शूटिंग भी संपन्न हो चुकी है और गाने की मिक्सिंग का काम चल रहा है. म्युज़िक विडियो में डॉ. हरिओम और राज महाजन साथ में सुर मिलाते नज़र आयेंगे. गाने की शूटिंग मोक्ष म्युज़िक के दिल्ली स्थित स्टूडियो में ही हुई है.

क्या था योगी आदित्यनाथ और डॉ. हरिओम का पूरा मामला

दरअसल, यह घटना 26 जनवरी 2007 की है, जब गोरखपुर में सांप्रदायिक तनाव जोरों पर था और तत्कालीन सांसद योगी जी ने गोरखपुर में धरना करने का ऐलान कर दिया था. पूरे शहर में कर्फ्यू लगे होने की वजह से डीएम डॉ. हरिओम ने उन्हें गोरखपुर में घुसने से पहले ही रोक दिया था. लेकिन सांसद योगी अपनी जिद पर अड़ गए. जिसके बाद प्रशासन ने आखिरकार उन्हें गिरफ्तार करने का निर्णय किया.

इस बारे में खुद तत्कालीन डीएम डॉ. हरिओम ने बताया था कि वह योगी आदित्यनाथ को गिरफ्तार नहीं करना चाहते थे. लेकिन सांसद योगी ने ही उन पर दवाब बनाया था कि उन्हें कारागार में रखा जाए. हालांकि हरिओम सांसद आदित्यनाथ को सर्किट हाउस में रखना चाहते थे जहां अमूनन सांसदों या विधायकों को गिरफ्तारी के बाद रखा जाता है. लेकिन सांसद आदित्यनाथ की ज़िद के आगे वह नतमस्तक हो गये. इसके बाद गोरखपुर की जिला कारागार में सांसद योगी 11 दिन तक बंद रहे.

जेल से रिहा होने के बाद जब सांसद योगी पहली बार संसद पहुंचे तो वह अपनी गिरफ्तारी की बात बताते-बताते रो पड़े. सांसद योगी का संसद में दिया गया ये भाषण काफी चर्चा में रहा. इसी भाषण में योगी ने सवाल उठाया था कि कैसे किसी सांसद को 11 दिन तक कारागार में रखा जा सकता है जबकि कानूनन किसी सांसद को 24 घंटे से ज्यादा नॉन क्रिमिनल ऑफेंस में कारागार में नहीं रखा जा सकता. गिरफ्तारी के चौबीस घंटे के बाद ही डॉ. हरिओम को सरकार ने सस्पेंड कर दिया और उनकी जगह ड्यूटी संभालने के लिए उस समय सीतापुर के डीएम राकेश गोयल को रातों-रात हेलिकॉप्टर से गोरखपुर भेजा गया. इससे भी दिलचस्प यह है कि डॉ. हरिओम को सस्पेंशन के एक हफ्ते के भीतर ही वापस बहाल कर दिया गया.

फिलहाल हरिओम वेटिंग लिस्ट में है. इससे पहले तक वो संस्कृति विभाग के सचिव के तौर पर कार्यरत थे. डॉ. हरिओम के प्रशासनिक अनुभव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वो उत्तर प्रदेश के 11 जिलों (जैसे कानपुर, गोरखपुर, मुरादाबाद, इलाहाबाद, सहारनपुर आदि) के डीएम रह चुके हैं. वजह चाहे जो भी रही हो लेकिन तब का सांसद आज का मुख्यमंत्री है. मुख्यमंत्री योगी जी के अगले आदेश के आने तक आला अधिकारियों को इंतज़ार ही करना पड़ेगा.

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आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे, ये दो अफसर क्यों हैं तारीफ के काबिल, बता रहे यशवंत

Yashwant Singh : इधर बीच 2 अफसरों से मिलना हुआ। एक आईएएस और दूसरे आईपीएस। क्या कमाल के लोग हैं दोनों। इनसे मिल कर ये तो संतोष हुआ कि ईमानदारी और दबंगई की जुगलबन्दी के जो कुछ स्पार्क शेष हैं इस महाभ्रष्ट सिस्टम में, वे ही जनाकांक्षाओं में उम्मीद की लौ जलाए हुए हैं। इन दोनों अफसरों के बारे में थोड़ा-सा बताना चाहूंगा। इनके नाम हैं- आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे। एक नोएडा के डीएम, दूजे गाजीपुर के पुलिस कप्तान।

NP Singh

SC Dubey

वैसे बता दूं, अफसरों से मिलना मुझे पसंद निजी तौर पर पसंद नहीं, मेरे स्वभाव का हिस्सा नहीं। चाहे दैनिक जागरण में रहा या अमर उजाला में या आई नेक्स्ट में… चाहे सिटी चीफ रहा या संपादक रहा… अफसरों के यहां खुद चल के एक्का दुक्का बार ही गया हूंगा… दिमाग में ज्यादातर अफसरों के रीढ़ विहीन और बेईमान होने की छवि गुंथे होने से शायद उनसे मिलने जुलने से परहेज रखता रहा हूं। पिछले 8 वर्षों में, भड़ास संचालित करने के दौरान, जिन कुछ ईमानदार और कलेजे में दम रखने वाले लोगों के बारे में सुना जाना उनमें से एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे भी हैं।

एनपी का पंगा आज़म खान से हुआ था, अखिलेश के सीएम बनने के ठीक बाद। ये अफसर डटा रहा। आज़म खान कोपभवन में जाकर ही अखिलेश को मजबूर कर पाए एनपी को उनके मंत्रालय से हटाने के लिए। लेकिन तब तक अखिलेश इस अफसर की ईमानदारी, लोकप्रियता और साहस के बारे में जान चुके थे। दंगा रोकने के लिए शामली भेजे गए एनपी। अभी डीएम नोएडा हैं, काजल की कोठरी में दामन दागदार होने से बचाए हुए हैं। इन्होंने गरीब बच्चों के लिए दो रोजगार परक तकनीकी स्कूल संचालित करके कमाल का काम किया है। एक चंदौली के नक्सल एरिया में। दूसरा बनारस के अपने पिंडरा इलाके वाले गांव में। इन स्कूलों के संचालन में अपने परिवार की संपत्ति होम की और भला किया उन बच्चों का जिनका समाज में कोई नहीं। दर्जनों इनके ऐसे सामाजिक काम हैं जिनको देख सुन के कहने का मन करता है कि क्या लूटतंत्र में ऐसे भी जन सरोकारी, ईमानदार और सोशल एक्टिविस्ट टाइप अफसर हैं, जो आम जन के प्रति अपनी पक्षधरता का चुपचाप निर्वहन किए जा रहे हैं!

आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे की ईमानदारी, जन पक्षधरता और सिस्टम से भिड़ जाने का माद्दा रखने के बारे में ज्यादातर लोगों को समय समय पर मीडिया से पता चलता ही रहता है। यही कारण है कि वो या तो सस्पेंड रखे जाते हैं या फिर प्रतीक्षारत। उन्हें अक्सर चुनाव आयोग याद करता है और चुनावों के दौरान महत्वपूर्ण जिममेदारी देता है। इस दफे गाज़ीपुर भेजे गए। इनने फर्जी वोटिंग के खेल का ऐसा रैकेट पकड़ा कि सात बार चुनाव जीत चुके ओमप्रकाश सिंह इस बार तीसरे पोजीशन पर अटक गए। अपने करियर में हजार से ज्यादा निर्दोषों को जेल जाने से बचाया, निष्पक्ष पुलिसिंग के मिशन को मिशनरी भाव से जीते हुए। सुभाष चंद्र दुबे की हिम्मत और ईमानदारी के दर्जनों वाकये हैं। अदभुत जीवट का पुलिस अफसर है ये। न आका टाइप अफसरों के यहां सिर नवाया न मठाधीश टाइप मंत्रियों को सलाम ठोंका। हल्लाबोल अंदाज़ में, बिना भेदभाव किए, जो गुनाहगार मिला, उसे धर दबोचा। अजगरों को उनके बिलों में घुसकर पकड़ने वाले सुभाष को सत्ता जनित बदमाशी कमीनगी और धूर्तता के जाल में फांसकर साजिशन जो उत्पीडन उपेक्षा मुहैया कराए गए उसे उनने ईश्वर की नेमत / करियर का मेडल मान कर तहेदिल से कुबूला और भरपूर एन्जॉय किया।

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के एडिटर यशवंत के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Golesh Swami Both are nice officers. Np singh is my good friend and subhash chandra dubey as younger brother. Np ki khasiyat yeh hai ki Lucknow mai DM koi bhee raha, jila NP singh ne hi chalya. Subhash bhai ke baare mai kya kahu heera officers mai se hai. NP aur subhash jaise officer u.p. mai unglio par ginne layak hai. Aise officer ho to u.p. sudhar jaye.

अशोक कुमार शर्मा सही बात की यशवंत आपने! मुझे मालूम है कि आप ताकत से प्रभावित नहीं होते उत्तराखंड के मुख्यमंत्री कार्यालय के ओएसडी के रूप में मैंने दो मामलों में आपसे संपर्क किया. आपने सरकार का पक्ष तो दिया मगर कोई समझौता या मांग नहीं मानी. सूत्र भी नहीं बताया अपना. लालच में आप आये नहीं. मैंने भी अपने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय के कार्यकाल में यही पाया कि इन दोनों अफसरों में अनेक ख़ास बातें है: एनपी साहब ओजस्वी और कड़क अफसर होकर भी आम आदमी के हक़ में सेवाभाव से खड़े रहते हैं. आसान नहीं उनको डिगाना. प्रेस क्लब के एक समारोह में मैंने उनको पहली बार बोलते सूना था. उन्होंने पत्रकारों को भी समझाया कि ईमानदारी और शासन के इकबाल का पुराना दौर वापस लाना है तो खबरों में ‘लिहाज’ ना करें किसी का. सुभाष जी क्रांतिकारी अफसर हैं. सीधे एक्शन लेते हैं. लपझप बिलकुल नहीं करते. उत्तर प्रदेश में इन जैसे अच्छे अफसरों की कमी नहीं है. लेकिन सत्ता को कदर कहाँ है? मैंने सूचना विभाग में ही देखाकभी वहां कमीशन और दलाली तंत्र शैशव और वामाना अवस्था में था. और अब? करप्शन का कारपोरेट..

Vinod Bhardwaj एन पी सिंह के बारे में खबरिया जानकारियां हैं , पर सुभाष चंद्र दुबे को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ । आज के सड़ांध मारते सिस्टम में भी दोनों ने अपनी महक और चमक को बरकरार रखा है । ये दोनों ही एक शानदार नजीर हैं , इनको दिल से सलाम !  … और जिसकी निष्पक्षता और काविलियत को लिखने के लिए यशवंत सिंह जैसे पत्रकार की कलम मचलने लगे , उसे किसी और के सर्टीफिकेट की जरूरत ही नहीं ! यशवंत भाई कभी मौका मिले तो डी जी सुलेखान सिंह से लखनऊ जाकर जरूर मिलना । उनसे मिलकर और उनका अतीत जानकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाओगे । ये मोस्ट सीनियर आई पी एस भी अब रिटायरमेंट के करीब ही हैं ।

S.p. Singh Satyarthi अगर यशवंत जी किसी का मूल्य लगा रहे हैं तो निश्चित ही वह हीरा होगा।

Care Naman अगर भड़ासी किसी अधिकारी की तारीफ़ कर रहा है तो सच में बंदे में है दम इस बात पर आँख बंद कर के यकीन किया जा सकता हैं

Shambhunath Shukla एनपी सिंह ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ अफसर हैं। सुभाषचंद्र दुबे से कभी मिला तो नहीं पर उनके बारे में सुना अवश्य है।

Ramji Mishra हमारे महोली में एक उपजिलाधिकारी के एन उपाध्याय जी आये थे बहुत ईमानदार रहे लेकिन उनसे अतिरिक्त कमाई सपने में भी नहीं की जाती थी नतीजा यह हुआ प्रमोशन में लोहे लगते रहे हक़ मारा जाता रहा। बनारस भेज कर आबकारिविभाग में कर दिए गए लेकिन उपजिलाधिकारी का पद छीन लिया गया। और तो और अब उनकी जगह महोली की कमान उपजिलाधिकारी अतुल को दी गई है जो कई सालों से राज कर रहे हैं। अतुल इससे पहले गोरखपुर में तहसीलदार रहे हैं और वहाँ पर भी लोग दबी जुबान न जाने क्या क्या बातें इनके बारे में कहते थे। अब महोली में तो इनके संरक्षण में ही खुले आम खनन , घूसखोरी और दबंगई फलफूल रही है। यहीं नहीं अगर अतुल को जरा सा गुस्सा आता है तो सामने वाले को मारने और पीटने से भी उन्हें दनिक भी गुरेज नहीं है। फिलहाल जिन दो अधिकारियो के बारे में सर आपने लिखा उनको जय हिंद और आपकी पोस्ट सराहनीय है।

Poonam Scholar ऐसे समाज सुधारकों और अफसरों से अन्य समाजसेवियों और भावी अफसरों को अवश्य ही प्रेरणा लेनी चाहिए। आभार साझा करने के लिए।

Siddhartha Malviya ई सही पकडे हैं… दुबे जी बड़े रॉयल आदमी हैं। अच्छो के अच्छा और बुरो के लिए बहुत बुरा।

Kumar Anup Jha सर मैंने तो अभी इन दोनों सर को नहीं देखा हूँ.. नोएडा में ही रहता हूँ. जब बिहार में था तो वहां शिवदीप लांडे सर को देखा था.. वो मुझे अब तक काफी अच्छे अफसर लगे. हालांकि मैने कुछ अफसर को ही देखा है.

Varun Panwar एनपी सिंह शामली में जिलाधिकारी रहे, बेहतर सामाजिक कार्यकर्ता, कुशल अधिकारी और एक अच्छे दोस्त… वैसे तो उनमें अनेको ऐसी प्रतिभा है जो शब्दों में व्यक्त करेगे तो काफी लंबा चौड़ा लिखना पड़ेगा… शामली में वो लगभग डेढ़ वर्ष रहे.. यहां के लिये उन्होंने बहुत कुछ किया… सुभाष जी मुज़फ्फरनगर में कुछ ही दिनों के लिये एसएसपी बनकर आये थे, दंगो के दौरान, एक बार मुलाकात हुई, अपने कार्य के प्रति सजग थे, जो कि वहाँ के सत्ता धारी नेताओ को रास नहीं आये.. दोनों की जोड़ी बहुत कुछ करने का माद्दा रखती है

Shahnawaz Qadri श्री एन पी सिंह के बारे मे जो आपने लिखा है वह कम है… उत्तर प्रदेश मे इस तरह के अधिकारी देखने को कम ही मिलते हैं..

Chandan Srivastava मान लीजिए मैं दिलीप मंडल हूं। तो मेरा फीड बैक यह है कि आप अव्वल दर्जे के जातिवादी, सवर्णवादी हैं। आपको दो अफसर ईमानदार मिले, एक ब्राह्मण दूसरा ठाकुर।  क्या आप यह कहना चाहते हैं कि पिछड़ों दलितों में कोई ईमानदार अफसर ही नहीं। 🙂

Shyam Singh उप्र. के डाकू छविराम और पातीराम गैंग को ध्वस्त करने वाले तथा दो-दो बार राष्ट्रपति पदक हासिल करने वाले तेज-तर्रार आइपीएस. विक्रम सिंह जी जब नैनीताल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थे तब उनसे अक्सर मिलना होता था। बाद में उन्हें कुमाऊं का डीआइजी. भी बनाया गया। मैंने उन्हें कर्तव्यनिष्ठ व ईमानदार पाया। अन्य पुलिस अधिकारियों की तरह उन्होंने किसी नेता को दंडवत् नहीं किया होगा। अध्यात्म में रुचि के कारण वे यहां स्थित अरविन्द आश्रम में जाकर उसके साधना व अन्य दैनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। उन्होंने मेरे से भी अध्याम विद्या सम्बंधी कुछ पुस्तकें लेकर पढीं। पुलिस में ऐसे अधिकारी मैंने कम ही देखे हैं।

Hero Dubey एनपी सिंह से तो परिचित नहीं हूँ सर! लेकिन सुभाष चंद्र दुबे कन्नौज के एसपी रहे हैं। वह बहुत ही शानदार अफसर हैं। जय हिन्द

Pranay Batheja सर आपको पहली बार देखा ऊपर की चंद लाईने पढा कि जिससे इतना पता चला आप पत्रकार हैं अफसरों से मिलना आपको पसंद नहीं फिर भी आप मिले शायद उनकी ईमानदारी आपको उनके ओर आकर्षित करके ले गई। इनके बारे में आप आगे विस्तार से लिखेंगे। लेकिन कोई पत्रकार के वर्तमान स्थिति को क्यों नहीं लिखता उन्हें क्यों नहीं परिभाषित करता जिसे सरकार, सरकारी तंत्र और जनता के बीच सेतु व लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। जो पत्रकारिता हमारे वीर क्रांतिकारी करते थे और जो पत्रकारिता वर्तमान में हो रही है इसकी वास्तविकता क्या है?

A.k. Roy वैसे मुझे भी अफसरों से मिलना अच्छा नहीं लगता मैं राजनीति एवं पत्रकारिता में रहते हुए कम से कम इन लोगों से मिलना चाहता हूं अब आपने बताया है तो कभी किसी एक कार्य हेतु मिलना हुआ अभी इनके बारे में कोई अपनी राय दी जा सकती है अगर इमानदार है तो इन्हें उसकी सजा भी आज के भ्रष्ट सिस्टम से मिलेगी चाहे वह सरकार किसी भी पार्टी की है..

Singhasan Chauhan सलाम है ऐसे ऑफिसर्स को , ऐसे ही एक IPS श्री प्रभाकर चौधरी आये थे हमारे बलिया में | काम करने का तरीका वाकई काबिले तारीफ , कच्ची दारू, सड़कों पर अतिक्रमण, थाने में दलाली वगैरह सब बंद करवा दिए थे मगर भ्रष्ट नेताओ ने 2 महीने में ही उनका ट्रांसफर करा दिया …..इमानदारी अभी भी जिन्दा है .

Ramhet Sharma आपने जो लिखा है, उससे उनका का मऩोबल बढता है.. अच्छे अधिकारियों के अच्छे कार्य की सराहना की जानी चाहिए…

Ashwani Tripathi एनपी सिंह जी, शामली के डीएम रहे। बेहद गजब की नेतृत्व क्षमता है उनमे। एक अफसर और नेता दोनों की कुशल प्ररिभाओं का समावेश है, उनके अंदर। जब तक शामली में रहे, सभी नेताओं के घरों में बने चौपाल खाली रहे। वहां तो यह कहा जाने लगा था कि इस जिले में एक ही नेता है वो है एन पी सिंह। एन पी सिंह के दरवाजे हर समय जनता के लिए खुले रहते थे। पत्रकारों के लिए भी एन पी सिंह से अच्छा कोई अफसर नहीं हो सकता। पत्रकारों के मान सम्मान को हमेशा उन्होंने बढ़ाया। रास्ते में भी कोई पत्रकार मिलता तो गाड़ी रोक कर पत्रकारों से हाल लेते। भाषण देने की उनकी क्षमता तो गजब है।

Ghanshyam Dubey N. P से सिर्फ पाला ही नहीं पड़ा , निजी तौर पर उन्हें जानता हूँ । वह एक रीढ़ की हड्डी रखने वाले कर्मठ अफसर हैं। सुभाष से कभी मिला नहीं हूँ , स्टेट लॉ एंड आर्डर देखने वाले कुछ कनिष्ठ पर काम मे तेज पत्रकारों से उनके बारे मे सुना है । सबने उनके काम – स्वभाव की तारीफ ही की है।


भड़ासानंद कहिन…

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यादव सिंह को बहाल कर प्रमोशन देने वाले भ्रष्टाचारी आईएएस रमा रमण का बाल भी बांका नहीं हुआ

Surya Pratap Singh :   ‘भ्रष्टाचारों’ पर मज़े की बात… नॉएडा/ग्रेटर नॉएडा/यमुना इक्स्प्रेस्वे अथॉरिटिज़…. वर्तमान सरकार द्वारा भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए किए जा रहे ‘अश्वमेघ यज्ञ’ के असली (भ्रष्ट) घोड़ों को कौन पकड़ेगा… इन घोड़ों ने प्रदेश की अस्मिता को रौंदा है…. जेल की ऊँची दीवारें व बेड़ियाँ प्रतिक्षरत हैं…… सीबीआइ की गिरफ्त में भ्रष्ट इंजीनियर यादव सिंह इन दिनों सीबीआइ का मुजरिम हैं और जेल में निरुद्ध हैं। जिस रमा रमण आईएएस ने यादव सिंह का निलम्बन बहाल किया और प्बिना डिग्री प्रोन्नति देकर तीनों नोएडा, ग्रेटर नोएडा तथा यमुना एक्सप्रेस अथारिटी में इंजीनियर-इन-चीफ़ बनाया, उसका बाल भी बाँका नहीं।

सीबीआई की जाँच के अंतर्गत यादव सिंह द्वारा सम्पादित 229 अनुबंधों लागत रु. 433 करोड़ के स्वीकृति/ अधिकार प्रतिनिधायन किसने किया? रामा रमण ने ….यह महाशय इतना बड़ा मैनेजर निकला कि उच्च न्यायालय व सीबीआई को ऐसे मैनेज किया है कि वह न केवल जेल से बाहर है अपितु वर्तमान सरकार के कुछ प्रभावशाली लोगों को भी मैनज करने की जुगत लगा रहा है ताकि पिछली सपा-बसपा सरकारों की तरह इस सरकार में भी नॉएडा/ग्रेटर नॉएडा/यमुना इक्स्प्रेस्वे में क़ाबिज़ रह सके।

यादव सिंह पर नोएडा, ग्रेटर नोएडा तथा यमुना एक्सप्रेस अथारिटी में तैनाती के दौरान अकूत संपत्ति अर्जित करने के आरोप हैं। उसने विभिन्न प्रोजेक्ट्स के 229 अनुबंधों पर 433 करोड़ का कार्य संपादित करवाया, जिसमे बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी होने का इल्जाम लगा है… 1.5 किलो हीरों का मालिक है ये… इसका असली मुलाजिम अर्थात यादव सिंह को सभी अधिकार देने वाला स्वीकृतिकर्ता तो रामा रमण ही है …इसके अलावा बिना टेंडर प्लॉट आवंटन, बिल्डर्ज़ जो नॉएडा इक्स्टेन्शन में दिए लाभ, ब्याज/दंड माफ़ी, नक़्शा पारित करने की अनिमितताएँ, ठेका/टेंडर के घपले, IAS फ़ार्म घोटाला, निर्माण कार्य घोटाले तमाम मामले तभी सामने आएँगे जब नॉएडा के मठाधीश ‘रमा रमण’ को वहाँ से रुख़सत किया जाएगा….

यादव सिंह प्रकरण में सीबीआई द्वारा इन बिंदुओं पर जांच आवश्यक है:

– विभिन्न स्तरों पर यादव की पदोन्नतियों में निर्धारित प्रक्रिया व मापदंडों का पालन हुआ है या नहीं।

– विनिर्माण से संबंधित दिए गए ठेकों में निर्धारित प्रक्रिया और मापदंडो का अनुपालन हुआ या नहीं।

– नॉएडा के अन्य बड़े भ्रष्टाचार और वहाँ तैनात रहे आईएएस अधिकारियों के आचरण की जांच।

नयी सरकार के लिए पिछली दो सरकारों में भ्रष्टाचार के प्रतीक मठाधीश १५ अधिकारियों को तत्काल हटा कर उनकी जाँच आवश्यक है …

वरिष्ठ और चर्चित आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की फेसबुक वॉल से.

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आईएएस रमा रमण के कार्यकाल में नोएडा और ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरणों में हुए घपले-घोटालों की जांच की मांग

Yashwant Singh : चर्चित आईएएस सूर्य प्रताप सिंह अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं :

”कोई ताज़िन्दगी येनकेन प्रकारेण नॉएडा / ग्रेटर नॉएडा में ही रहना चाहता है.. उसने मायावती व अखिलेश यादव/रामगोपाल को ख़ूब खिलाया और ख़ुद ‘ऐड़ा-बनके-पेड़ा’ खाया… नॉएडा/ग्रेटर नॉएडा में पिछले १० वर्षों के commercial, industrial व housing प्राजेक्ट्स के लैंड आवंटन घोटाले की जांच हो…. भू उपयोग परिवर्तन, builders के रु. 15,000 करोड़ के ब्याज माफ़ी की जांच हो… नॉएडा इक्स्टेन्शन में बिल्डर्स को भू आवंटन व नियमों में दी गयी छूट की जांच हो… ग्रीन बेल्ट आवंटन की जांच हो…. निर्माण कार्यों के घोटाले की जांच हो… DND टोल घोटाला, बिल्डर्र्स पर लम्बित बकायों की माफ़ी की भी जांच हो… बिल्डर्ज़ द्वारा आवंटीयों के साथ नॉएडा अथॉरिटी से मिलकर की गयी धोखाधड़ी की जांच हो… भू अधिकरण व मुआवजों का पेमेंट घोटाला जो करीब रु.५०,००० करोड़ का घोटाले अनुमानित है, की जांच हो… IAS अधिकारियों को farm आवंटन की लोक आयुक्त द्वारा की गयी जाँच में लीपापोती की भी जांच हो…”

जाहिर है यह सारा घोटाला रमारमण के नेतृत्व में हुआ जो नोएडा और ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण पर लगातार कब्जा जमाए हैं और मायावती से लेकर अखिलेश तक के कार्यकाल में अपने हुनर के दम पर कुर्सी से चिपके रहे हैं…यही नहीं जब यमुना एक्सप्रेसवे विकास प्राधिकरण बनाया गया तो भी इसका शीर्ष अफसर रमा रमण को ही बनाया गया. सवाल है कि क्या योगी सरकार इच्छा शक्ति दिखाते हुए रमा रमण के कार्यकाल के सारे फैसलों की जांच कराएगी और सूर्यप्रताप सिंह द्वारा उल्लखित उपरोक्त घोटालों-गड़बड़ियों की जांच कराएगी?

(IAS Rama Raman)

अगर यह जांच नहीं हुई तो माना जाएगा कि सत्ता में चाहें जो विचारधारा आ जाए, वह असली खेल भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने में ही होता है. हां, ये हो सकता है कि वह भ्रष्टाचारी अपनी विचारधारा के ढूंढ ले. लेकिन बदलता कुछ नहीं है. उम्मीद करते हैं कि योगी आदित्यनाथ बड़े भ्रष्टाचिरयों को जेल भेजेंगे. अन्यथा उनके और अखिलेश-मायावती के कार्यकाल में कोई खास अंतर नहीं रह पाएगा.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रमा रमण की लगातार तैनाती को लेकर गंभीर टिप्पणी की थी और इस अफसर को हटाने के लिए आदेश भी दिया था जिसकी खबरें उन दिनों मीडिया में आई थीं. लेकिन बाद में सब कुछ लीप पोत के बराबर कर दिया गया. देखिए वो खबर जिसमें हाईकोर्ट ने इस शख्स को तीनों प्राधिकरणों नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे से हटाने से संबंधित आदेश दिया था…

HC questions SP, BSP’s clemency on Noida Authority chairman Rama Raman; restricts IAS officer of duties… Allahabad HC has seized all the powers of UP’s IAS officer Rama Raman. The court has come down strictly on the chairman of the Noida authority. This order came down as a shocker not only for the Akhilesh Yadav government in the state but also for the IAS officer. Rama Raman is the chairman of Noida, Greater Noida and Yamuna Development Authority for the past seven years. The court in its order has asked the UP government to take the decision on the transfer of the IAS officer within 2 weeks. The court’s order comes as a result of a PIL filed by Jitin Goel in Allahabad HC. Also, the court has demanded the state government to give an answer as to why did they make Rama Raman the chairman of three authorities. Raman faces corruption charges. Rama Raman was also the chairman of these various authorities during the chief ministerial ship of BSP Supremo Mayawati. The IAS office has been restricted of his duties and power by the court.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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यूपी में भ्रष्ट नौकरशाहों का गैंग भाजपा राज में भी मलाई चाटने-चटाने के लिए तैयार : सूर्य प्रताप सिंह

Surya Pratap Singh : उत्तर प्रदेश की ‘नौकरशाही के भ्रष्ट चेहरे’ अपनी पसंद के मुख्यमंत्री व मंत्री बनवाने में लगे! उत्तर प्रदेश में कुछ नौकरशाहों की ‘भ्रष्ट लेकिन धनाढ़्य’ गैंग (CAUCUS) की आज ये हिम्मत / हस्ती है कि दिल्ली से लेकर नागपुर तक अपने पसंद के मुख्यमंत्री व मंत्री बनवाने के किए पैरवी में लगे हैं…. पिछली दो सरकारों में जिस नौकरशाह गैंग की तूती बोलती थी वे ‘पैसे व रसूक़’ के बल पर ‘मलाई चाटने व चटाने’ के लिए फिर से तैयार हैं…

सम्भावित नामों में १-२ चेहरे इसी गैंग की पसंद है…. इस गैंग के दो सदस्य उत्तर प्रदेश में शपथ ग्रहण समारोह की व्यवस्था में भी लगे व भाजपा नेताओं की चमचागिरी करते समारोह स्थल पर देखे गए… मित्रों, शायद आप में से कुछ लोग जिन्हें इस गैंग की ताक़त का अहसास नहीं है, मेरी बात पर विश्वास नहीं कर रहे…. विश्वास करें! मेरी जानकारी अत्यंत सटीक है …

उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री का चयन ‘नौकरशाही की चयन समिति’ ने किया…. नाम लगभग तय! उ० प्र० के मुख्यमंत्री के चयन में उत्तर प्रदेश के दिल्ली में तैनात ३ बड़े अधिकारियों की अहम भूमिका मानी जा रही है …लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि का मतलब अब जनता की पसंद नहीं बल्कि जो नौकरशाही को पसंद हो, वही भविष्य में बनेगा उ०प्र० का मुख्यमंत्री….इन ३ नौकरशाहों में से दो के उ० प्र० की पूर्व की दो सरकारों (सपा व बसपा) में नॉएडा में तैनात रहे बड़े अधिकारियों (जिन्होंने भ्रष्ट इंजीनियर यादव सिंह को बचाया है) व उत्तर प्रदेश के पूर्व सरकार के महा बदनाम बड़े लंबे-२ से भ्रष्ट IAS से भी गरमा-गरम सम्बंध बताए जा रहे हैं….

इन नौकरशाहों की टोली ने CM पद के कई ‘लोकप्रिय’ दावेदारों की छुट्टी करा दी….. तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा ….शायद इनमें से कई के साथ इन भ्रष्ट नौकरशाहों की दाल नहीं गलती…. अब ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उ०प्र० का आने वाला मुख्यमंत्री Proxy CM सिद्ध न हो…..

यूपी के चर्चित आईएएस अधिकारी रहे और अब भाजपा नेता के रूप में सक्रिय सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

सूर्य प्रताप का लिखा ये भी पढ़ें…

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यूपी में इस वक्त प्रशासन नाम की चीज नहीं है, नकल माफिया कर रहे नंगा नाच : आईएएस सूर्यप्रताप सिंह

Surya Pratap Singh : उत्तर प्रदेश में नक़ल माफ़िया का नंगा नाँच…. नयी सरकार की ‘ट्रैंज़िशन-अवधि’ में उ० प्र० में प्रशासन नाम की चीज़ नहीं है…. भारी ‘जनादेश’ देकर भी नक़ल माफ़िया के सामने जनता बेबसी से ‘कौन होगा मुख्यमंत्री’ के खेल का मंचन देख रही है… नक़ल के लिए कुख्यात कौशाम्बी, इलाहाबाद में यूपी बोर्ड परीक्षा में धुंआधार नकल, यहां इमला बोलकर लिखाया गया एक-एक उत्तर… नीचे देख सकते हैं प्रमाण के तौर पर संबंधित वीडियो…

नकल के लिए बदनाम कौशांबी जिले मे इस बार 112 परीक्षा केंद्र बनाए गए हैं। जिला प्रशासन ने नकल विहीन परीक्षा करने का दिखावे पूर्ण दावा किया था लेकिन उसके दावे की हवा पहले दिन ही निकल गई। जिले के विभिन्न परीक्षा केंद्रों पर जमकर नकल हुई। कक्ष निरीक्षक कहीं इमला बोलकर नकल कराते दिखे तो कहीं परीक्षार्थी की कापी भी लिखते दिखाई दिये। कहने को नकल रोकने के लिए सचल दस्ते परीक्षा केंद्रों तक पहुंचे। सचल दल मे शामिल लोग महज खाना पूर्ति करके वापस लौट जाते रहे। जिला प्रशासन के दावों की पोल खोलने के लिए मीडिया के कैमरों मे कैद तस्वीरे हकीकत को बयां करने के लिए बहुत हैं। निम्न दो वीडियो देखें तो माजरा समझ में आ जाएगा ….

https://youtu.be/0vaUptWANMw

https://youtu.be/8rUviGRU4Ow

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आज आरंभ हुई उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल का बोलबाला….. नयी सरकार के संकल्प को चुनौती! आपको याद हो की गोण्डा की चुनावी रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश में व्याप्त नक़ल के अभिशाप के मुद्दे को उठाया था …इस वर्ष भी मैंने अपना नक़ल के विरुद्ध ‘सविनय सुचिशिक्षा अभियान’ यानि ‘नक़ल रोको अभियान’ चलाने का संकल्प लिया है…

मैं कल अलीगढ़ में आपने ‘नक़ल रोको अभियान’ के सम्बंध में गया था और अपने इस अभियान को इस वर्ष भी निजी प्रयासों के रूप में चालू रखने के लिए वालंटीर्स के साथ कार्ययोजना बनायी गयी…. आज इस अभियान के तहत मेरठ, ग़ाज़ियाबाद, व हापुड़ जनपदों का भ्रमण पर हूँ। ज्ञात हुआ कि अलीगढ़ के नक़ल के लिए कुख्यात वीआईपी तहसील “अतरोली” में खुले आम सामूहिक नक़ल हुई। जब कि मेरे अभियान के अलीगढ़ में शुरुआत पर अलीगढ़ के अख़बारों के प्रतिनिधियों के पूछे जाने पर राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह ने कल ही कहा था कि ‘अतरोली इस वर्ष अपने ऊपर से नक़ल के दाग़ की नहीं लगने देगा’…..परंतु आज यह सत्य साबित नहीं हुआ और अतरोली में धड़ल्ले से सामूहिक नक़ल हुई।

ज्ञात हो कि बोर्ड परीक्षा में पैसे देकर नक़ल से बोर्ड परीक्षा पास करने अतरोली में मिज़ोरम, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर तक के बच्चे आते हैं। नयी सरकार के लिए बोर्ड की परीक्षाओं में नक़ल रोकना बड़ी चुनौती बनेगी….. प्रमुख सचिव माध्यमिक शिक्षा विभाग के रूप में मैंने परीक्षा केंद्रों पर CCTV कैमरा लगाने व नक़ल रोकने जे किए छात्रों, अभिववकों, अध्यापकों, प्रबंधकों की हर मंडल में बैठकें कर नक़ल के विरुद्ध अभियान चलाया था…. मात्र ३ महीने में ही सपा सरकार ने मेरा ट्रान्स्फ़र कर दिया था….. मैंने २५५ परीक्षा केंद्रों को ब्लैकलिस्ट किया था जिन्हें सपा सरकार ने मेरे ट्रान्स्फ़र के बाद बहाल कर दिया था। यदि नक़ल रोकने के लिए आने वाली सरकार नक़ल रोकने जे किए मेरे अनुभव का लाभ उठाना चाहती है तो युवाओं के जीवन जे हित में, मैं सहर्ष अपना योगदान देने के किए तैयार हूँ…..

यूपी कैडर के चर्चित आईएएस रहे और इन दिनों भाजपा नेता के रूप में सक्रिय सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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यूपी के इस बवाली और तानाशाह डीएम ने मीडियाकर्मियों को सरेआम हड़काया (देखें वीडियो)

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के जंगलराज में विविध प्रजातियों के अधिकारी खूब फलते-फूलते पाए जाते हैं. एक महोदय हैं बहराइच जिले के डीएम उर्फ जिलाधिकारी. इन्हें लोग प्यार से अब ‘बवाली DM’ कह कर पुकारने लगे हैं. ये खुद ही बवाल करते कराते रहते हैं. इन महाशय को तानाशाही पसंद है. जब चाहेंगे तब मीडिया को दौड़ा लेंगे. कैमरे बंद करा देंगे. डांट लगा देंगे. जब चाहेंगे तब किसी होमगार्ड को डंडे से पीट देंगे. होमगार्ड की पिटाई करने वाले डीएम के रूप में कुख्यात जिलाधिकारी अभय का ताजा कारनामा है पत्रकारों को डांट डपट कर कैमरा बंद कराना और कवरेज से रोकना.

बहराइच के विवादों में घिरे रहने वाले जिलाधिकारी अभय ने आचार संहिता की आड़ में मीडिया कवरेज के दौरान चालू कैमरे को न केवल बन्द कराया बल्कि पत्रकारों को डांट लगाते हुए धारा 144 का हवाला देकर कार्यवाही की धमकी दी. नीचे दिए गए वीडियो को देखिए. डीएम साहब के ये बोल आपको सुनाई पड़ेंगे : ”बन्द करो कैमरा, तुमको बोला सबको बोला.. समझकर बात किया कीजिये… आवाज मत करो वहां पर….इसकी रिकार्डिंग हटाओ….”.

दरअसल बहराइच पालीटेक्निक कालेज की छात्र छात्राएं अपने प्रिंसिपल द्वारा छात्राओं का शोषण किये जाने से आक्रोशित होकर जिलाधिकारी का घेराव कर अपना दर्द बयां कर रही थी. इसी दौरान पत्रकार जब डीएम के घेराव को कैमरे से शूट करने लगे तो जिलाधिकारी भड़क गए. उन्होंने तमाम अफसरों, पुलिस कर्मियों व छात्र छात्राओं की मौजूदगी में पत्रकारों को अभद्रता पूर्वक डांट लगाते हुए न केवल उनका कैमरा बन्द कराया बल्कि उन्होंने अपने स्टाफ से रिकार्डिंग देखने को भी कह दिया. साथ ही धारा 144 का हवाला देकर कार्यवाही की धमकी दी. जिलाधिकारी बहराइच की बेअंदाजी को देखकर सारे लोग हतप्रभ हो गए.

जिलाधिकारी अभय का ये कारनामा कोई नया नहीं है. इससे पहले अपने बंगले पर तैनात सुरक्षा कर्मियों (होमगार्ड) की डंडे से पिटाई करने पर उनके विरुद्ध कार्यवाही की मांग को लेकर हजारों की तादात में होमगार्डों ने कई दिन धरना प्रदर्शन किया था. सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता के रूप में काम करने वाले डीएम अभय के विरुद्ध अब तक कई बार शिकायत हुई है लेकिन हर बार वो सत्ताधरी दल के करीबी होने के कारण कार्यवाही से बचते रहे हैं. शायद यही कारण है जिलाधिकारी की बेअंदाजी बदस्तूर कायम है. जिलाधिकारी के बर्ताव को लेकर जिले के मीडियाकर्मियों में भारी रोष है. पत्रकारों ने प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से बात कर कार्यवाही की मांग की है.

देखें वीडियो >>

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इंटरव्यू : टी. जार्ज जोसेफ (वरिष्ठ आईएएस अधिकारी, रिटायर्ड)

यूपी कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी टी. जार्ज जोसेफ भले ही कई बरस पहले रिटायर हो गए हों लेकिन उनको जानने चाहने वालों की कमी लखनऊ में नहीं है. ईमानदारी और सादगी के मामले में चर्चित जार्ज जोसेफ साहब पिछले दिनों वो दृष्टांत मैग्जीन की तरफ से आयोजित एक कार्यक्रम में लखनऊ आए तो उनसे नौकरशाही, राजनीति, जीवन समेत कई आयामों / मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने.

केरल के मूल निवासी जार्ज साहब अब मुंबई में रहते हैं. वे एक किताब लिख रहे हैं. अपने जीवन और करियर के अनुभवों को समेटते हुए एक फिक्शन कंप्लीट करने की तैयारी में हैं. अपने करियर में मुख्यमंत्रियों तक के दबावों को न मानने वाले टी. जार्ज जोसेफ का कहना है कि उनसे जूनियर को मुख्य सचिव बना दिया गया लेकिन उन्हें इसका मलाल नहीं हुआ क्योंकि उनके वरिष्ठता और ईमानदारी का इस्तेमाल न किया जाना सिस्टम / शासन का नुकसान है, मेरा कोई निजी नुकसान नहीं. पूरी बातचीत को सुनने देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

interview : T. George Joseph (Senior IAS)

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देवरिया के खरवनिया गांव में क्यों जुटते है बड़े-बड़े आईएएस और आईपीएस अधिकारी?

अफसरों को नतमस्तक करने वाली कौन सी जादू की छड़ी है नन्द लाल जायसवाल और रामजी जायसवाल के पास?  देवरिया 17 नवम्बर : एक तरफ प्रदेश के मुखिया अखिलेश यादव जहां प्रशासनिक अधिकारियों को ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता का पाठ पढ़ाने में सदैव आगे रहते है वहीं प्रशासनिक वरिष्ठ अधिकारी मुख्यमंत्री के उक्त आदेश को ठेंगा दिखाने में पीछे नहीं रहते है। वे भूमाफिया और अनेकों आरोपों से घिरे विवादित धन्ना सेठों के यहां पहुंच कर उनका महिमा मंडन करते हैं तथा उपकृत होते है। यहीं नहीं, ये प्रशासनिक अधिकारी जहां आम जनता से बड़ी मुश्किल मिलते हैं वहीं धन कुबेरों के घरों पर जाकर घण्टों बैठकर आनन्दित होते रहते है तथा महफिल सजाते हैं। 

वह जगह है देवरिया जिला मुख्यालय से लगभग 65 कि मी दूर खरवनिया गांव। जहां लगभग हर बड़ा अधिकारी जाने के लिए लालायित रहता है तथा जायसवाल बन्धुओं का अतिथि बनने का मोह नहीं त्याग पाता है। शहर और गांव की आम जनता आज तक यह नहीं समझ पाई कि आखिर उस गांव में पिछले एक दशक से बड़े बड़े अधिकारी और नेता किस तिलिस्म के तहत एक़त्रित होते हैं। बात हो रही है मंगलवार को गोरखपुर मण्डल के लभगग सभी आला अधिकारियों का देवरिया जिले के खरवनिया गांव में एकत्रित होने एवं प्रभावती देवी महावि़द्यालय के वार्षिक समारोह में उपस्थित होने के सम्बन्ध में।

कमाल यह देखिये कि सरकारी वरिष्ठ अधिकारियों ने आम जनता को धोखा देने के उददेश्य से भाटपाररानी तहसील दिवस मे शामिल का होने का बहाना खोज लिया। तहसील दिवस में एक साथ गोरखपुर के मण्डलायुक्त अनिल कुमार, गोरखपुर जोन के पुलिस महानिरीक्षक मोहित अग्रवाल, पुलिस उप महानिरीक्षक शिव सागर सिंह, जिलाधिकारी देवरिया अनिता श्रीवास्तव व पुलिस अधीक्षक मोहम्मद इमरान सहित लगभग पांच दर्जन अन्य सरकारी अधिकारी और उनके मातहत उपस्थित हुए तथा एसडीएम व सीओ आदि तहसील दिवस की खाना पूर्ति करने के बाद सभी अधिकारी जायसवाल बन्धुओं का आतिथ्य स्वीकार करने के लिए खरवनिया गांव पहुंच गए।

इन अधिकारियों ने खरवनिया गांव में पहुंच कर किया क्या। कुछ नहीं। गांव के विकास से कोई मतलब नहीं। जायसवाल बन्धुओं के निजी विद्यालय के वार्षिक समारोह में भाग लिया तथा वहां उपस्थित लोगों को सम्बोधित करने का कोरम पूरा किया। तत्पश्चात जायसवाल बन्धुओं द्वारा दिए गए विशेष सम्मानों को तहे दिल से स्वीकार कर लिया। आम लोगों को घोर आश्चर्य होता है कि राम जी जायसवाल, नन्द लाल जायसवाल, आदि बन्धुओं का ऐसा कौन सा सामाजिक कृत्य है कि आला अधिकारी इन जायसवाल बन्धुओं का एक तरह से तलवे चाटने के लिए तैयार रहता हैं। इनके घर का कोई व्यक्ति दुश्मन देशों से युद्ध में लड़ते हुए न तो शहीद हुआ है और न ही इन लोगों ने समाज सेवा का कोई बड़ा कोई काम किया है। जबकि लोगों का आरोप है कि इन जायसवाल बंधुओं की एक गुटखा कम्पनी है जिसमें एमडी की हैसियत से जायसवाल बन्धु कार्यरत हैं तथा करोड़ों का व्यापार करते है एवं वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को हर तरह का शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सुख उपलब्ध कराते रहते हैं।

कहा जाता है कि इन अधिकारियों को नोएडा में बुलाकर खूब मेहमान नवाजी कराया जाता है जबकि दिखावे के लिए इन जायसवाल बन्धुओं का एकाध विद्यालय और फर्नीचर की दुकानें आदि हैं। बाकी भू माफिया के रूप में जमीनों को कब्जा करने तथा खुल कर दंबगई करना और अधिकारियों का ट्रान्सफर / पोस्टिंग इनका असली खेल है। इन जायसवाल बन्धुओं के अति घनिष्ठ सम्बन्ध लगभग सभी राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं के साथ भी है। चाहे वह सत्ताधारी दल सपा हो या विपक्ष की भाजपा या बसपा। आम लोगों के दिमाग में उक्त प्रकरण में सदैव यह प्रश्न बना रहता है कि नन्द लाल जायसवाल, रामजी जायसवाल आदि के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है कि बड़े-बड़े आईएएस और आईपीएस अधिकारी इनके आगे नतमस्तक बने रहते हैं? लोगों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री से इसकी जांच कराने की मांग की है कि आखिर खरवनिया गांव में ऐसा क्या है कि शासन प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी वहां पिछले एक दशक जुटते चले आ रहे है।

देवरिया से ओपी श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

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यूपी में सत्ता के करीबी बड़े अफसरों में भी अंदरखाने शह-मात देने की खूब हो रही लड़ाई!

कल किसी वक्त चर्चा बहुत तेज छिड़ गई कि मुलायम सिंह यादव फिर से सीएम बनेंगे और सारे झगड़े को शांत कराएंगे तो देखते ही देखते यह खबर भी दौड़ने लगी कि मुलायम के सीएम बनने पर दीपक सिंघल तब मुख्य सचिव बनाए जाएंगे. इसके बाद तो कई बड़े अफसरों की हालत पतली होने लगी. दबंग और तेजतर्रार अफसर की छवि रखने वाले दीपक सिंघल की इमेज खराब करने के लिए कई अफसरों की टीम अलग अलग एंगल से सक्रिय हो गई.

अपने कुछ महीने के कार्यकाल में दीपक सिंघल ने यूपी की नौकरशाही पर नकेल कस कर उसे बेहद सक्रिय कर दिया था और हर तरफ सक्रियता दिखने लगी थी. अब फिर से हालात एकदम पहले जैसे हो गए हैं. अफसर अपनी कुर्सी पर जमे हुए मस्त हैं और धैर्य से सत्ता की लड़ाई देख रहे हैं. विकास कार्य ठप हैं. कोई किसी की सुन नहीं रहा. फाइलें जहां तहां अटकी पड़ी हैं.

ऐसे में दीपक सिंघल के ज्यों फिर से मुख्य सचिव बनने की संभावना को लेकर चर्चा छिड़ी तो यूपी के मुख्यमंत्रियों के पैसे विदेश में सेटल करने और मीडिया मैनेज करने के लिए कुख्यात एक बड़े अफसर ने अपने मीडिया रसूख का इस्तेमाल करते हुए सीएनएन आईबीएन वालों को एक फर्जी सूचना प्लांट करा दी कि दीपक सिंघल तो अमर सिंह का एक गलत काम कराने के लिए नोएडा जाने के चक्कर में नप गए थे. मजेदार यह कि आईबीएन सीएनएन वालों ने बिना छानबीन किए इसे चला भी दिया.

अखिलेश यादव अभी हाल के भाषण में कह चुके हैं कि उन्हें नेताजी यानि मुलायम सिंह यादव का फोन आया कि गायत्री प्रजापति को हटा दो तो उन्होंने प्रजापित को हटा दिया और इसी तरह यह भी बता दिया कि नेताजी का फोन आया कि दीपक सिंघल को हटा दो तो इन्हें हटा दिया. यानि स्पष्ट है कि दीपक सिंघल को हटाया जाना किसी किस्म के गलत काम या किसी नकारात्मक फीडबैक के चलते नहीं बल्कि यह विशुद्ध मुलायम सिंह यादव का फैसला था.

मुलायम सिंह की राजनीति को जानने वाले यह भी जानते हैं कि वो जो बोलते हैं, करते नहीं और जो करते हैं उसे बोलते नहीं. उनके इसी धोबिया पाट दांव के कारण समय समय पर बड़े धमाके सामने आते रहे हैं. बात हो रही थी अफसरों की लड़ाई की. चर्चा है कि गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल से पहली बार हटाए जाने के बाद कुछ अफसरों ने फीडबैक दिया था कि आपको दीपक सिंघल ने हटवा दिया. तब प्रजापति मुलायम सिंह यादव के पास गए और बोले कि हमको दीपक सिंघल ने अखिलेश का कान भरके हटवा दिया.

चर्चा के मुताबिक इस बात से भड़के मुलायम ने अखिलेश को फोन करके सिंघल को हटाने के लिए कह दिया और गलत फीडबैक के कारण दीपक सिंघल पर गाज गिर गई. जानकारों की मानें तो यादव कुल के झगड़े के पल पल बनते बिगड़ते समीकरण पर नजर गड़ाए यूपी के बड़े अफसरों में एक दूसरे को शह मात देने का खतरनाक खेल चल रहा है जिसमें मीडिया का निहित स्वार्थों के तहत इस्तेमाल किया जा रहा है. देखते रहिए, अगले कुछ दिनों में मीडिया वाले कैसी कैसी एकतरफा खबरें अफसरों को लेकर छापते दिखाते हैं.

लखनऊ से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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डासना जेल में कैद आईएएस राजीव कुमार क्या ईमानदार अधिकारी है?

-कुमार सौवीर-

लखनऊ : बेहद पढ़ाकू और परिश्रमी रहा है राजीव कुमार। शुरू से ही उसका सपना रहा है कि वह अपने देश और अपने देशवासियों की सेवा के लिए अपनी हर सांस अर्पित कर देगा। अपने इस सपने को साबित करने के लिए राजीव ने कठोर परिश्रम किया और वह आईएएस बन ही गया। लेकिन नौकरी की शुरूआती पेंचीदगियों ने उसे तोड़ना शुरू कर दिया। वह संशय में फंस गया कि उसके जीवन और उसके सपनों की नैया राजनीतिज्ञ निबटायेंगे या फिर उसके संवर्ग के वरिष्‍ठ सहयोगी। सोचा तो पता चला कि जिस तरह उसके वरिष्‍ठ सफलता की पींगें में लात उचका रहे हैं, वह ही रास्‍ता सर्वश्रेष्‍ठ है।

राजीव कुमार को उसके वक्‍त ने तोड़ा, उसकी नौकरी ने तबाह किया या फिर हताश खिलाड़ी जैसा हश्र हुआ राजीव का। आज तक पता नहीं। ले‍किन आजकल अंदाज यह लगाया जाता है कि राजीव एक ईमानदार और कम बोलने वाला शख्‍स है। वह मीडिया-फ्रेंडली कभी भी नहीं रहा। व्‍यवहार में हमेशा रूखापन रहा राजीव में। पत्रकार उसकी इस प्रवृत्ति से खासे नाराज रहे हैं।

लेकिन हकीकत यही है कि राजीव नीरा यादव के शिकंजे में फंस चुका था। नीरा ने अपने उसकी पोस्टिंग करा दी। बस, फिर क्‍या था। नीरा यादव ने उसकी इस ख्‍वाहिशों को पहचान लिया और उसे लपक कर अपने गले लगा दिया। राजीव नया लड़का था, नीरा की लालच में फंस गया। नीरा ने उसे अपना डिप्‍टी बनवा लिया। और फिर उसके माध्‍यम में ऐसे-ऐसे धोखाबाजियों करा लिया कि फिर तौबा-तौबा। नीरा यादव का हर धोखा उसने ईमानदारी में साबित करने में अपनी जिन्‍दगी भिड़ा दी। सन-95 में नोएडा में नीरा के अधीनस्‍थ बन कर उसने नीरा की जूतियां तक चाटना शुरू कर दिया।

लेकिन मामला फंस गया। राजीव भूल गया कि वह मूलत: नौकर है, शाहंशाह नहीं। नतीजा, मामला अदालतों तक पहुंच गया। सुप्रीम तक ने उसे तीन साल की सजा दे दी। साबित कर दिया कि राजीव कुमार बेईमान था, जिसने धोखाधड़ी के चलते सरकार को चूना लगाया। लेकिन जानने वाले आज भी जानते हैं कि राजीव कुमार वाकई ईमानदार शख्‍स है। लेकिन उसने अपने आकाओं की शह पर बेईमानियों पर ईमानदारियों का ठप्‍पा लगा दिया।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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FB पर दीनदयाल उपाध्याय का achievement पूछने वाले IAS का रमन सिंह ने किया तबादला

जनसंघ के विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय पर टिप्पणी करना भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी शिव अनंत तायल को भारी पड़ गया है. कांकेर में ज़िला पंचायत के मुख्य कार्यपालक अधिकारी शिव तायल को सरकार ने उनके पद से हटाते हुए राजधानी रायपुर के मंत्रालय में अटैच कर दिया है. फेसबुक पर की गई उनकी टिप्पणी को सिविल सेवा आचरण संहिता का उल्लंघन मानते हुये सरकार ने शिव अनंत तायल को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है. तायल ने शुक्रवार को अपनी फेसबुक वाल पर दीनदयाल उपाध्याय के बारे में लिखा था कि उनका लेखक या विचारक के रूप में एक भी ऐसा काम नहीं, जिससे उनकी विचारधारा समझी जा सके.

आईएएस तायल ने फेसबुक पोस्ट में कहा था ”वेबसाइटों में एकात्म मानववाद पर उपाध्याय के सिर्फ चार लेक्चर मिलते हैं. वह भी पहले से स्थापित विचार थे. उपाध्याय ने कोई चुनाव भी नहीं लड़ा. इतिहासकार रामचंद्र गुहा की पुस्तक मेकर्स ऑफ मार्डन इंडिया में आरएसएस के तमाम बड़े लोगों का जिक्र है लेकिन उसमें उपाध्याय कहीं नहीं है. मेरी अकादमिक जानकारी के लिए कोई तो पंडित उपाध्याय के जीवन पर प्रकाश डाले.”

जब विवाद बढ़ा तो तायल ने शुक्रवार देर रात को अपना पोस्ट हटा दिया और अपने पोस्ट के लिए माफ़ी भी मांगी. लेकिन इस माफ़ीनामे का कोई असर नहीं हुआ. राज्य की भारतीय जनता पार्टी की सरकार के कई मंत्री और विधायक तायल के ख़िलाफ़ मैदान में उतर आए हैं. पार्टी प्रवक्ता और विधायक श्रीचंद सुंदरानी ने कहा कि तायल को फिर से प्रशिक्षण के लिए भेजे जाने की ज़रूरत है. वहीं वरिष्ठ मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने भी नाराज़गी जताई.

भारतीय जनता पार्टी के ही प्रवक्ता सच्चिदानंद उपासने ने पूरे मामले पर तायल के ख़िलाफ़ मानहानि का मामला दर्ज करने की बात कही है. उपासने ने कहा, “मैं पंडित दीनदयाल उपाध्याय का अनुयायी हूं और इस तरह की टिप्पणी मेरा निजी अपमान है.” कुछ दिनों पहले ही बलरामपुर ज़िले के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन ने भी फेसबुक पर दलितों को लेकर न्यायपालिका में होने वाले भेदभाव पर टिप्पणी की थी, जिसके बाद राज्य सरकार ने कई नोटिस जारी किए थे. मेनन ने पिछले सप्ताह ही इस मामले में सरकार से लिखित माफ़ी मांगी, जिसके बाद विवाद खत्म हुआ था.

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मंत्री यशपाल आर्य के लगातार अनैतिक दबाव बनाने के चलते आईएएस अक्षत गुप्ता की गई जान!

कल रात को खबर आई कि राज्य में तैनात आईएएस अधिकारी श्री अक्षत गुप्ता नहीं रहे. बताया जा रहा है कि दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया. जैसा कि पिछले दिनों से समाचार पत्रों में खबरें आ रही थी कि मंत्री यशपाल आर्य उन्हें बदले जाने को दबाव बना रहे थे तो ये हार्ट अटेक उसी दबाव की परिणति तो नहीं. अक्षत गुप्ता का उदाहरण कोई पहला उदाहरण नहीं है कि उत्तराखंड की सत्ता में रहे बहुत से मंत्रियों ने अपने मन का काम ना होने पर अपने अधिकारो का दुरूपयोग किया है और अधिकारी विशेष को जितना हो सकता था जलील करने के साथ जमकर प्रताड़ित भी किया है. हां बहुत से कार्मिक उस दबाव को काउंसलिंग के चलते झेल गए और जो नहीं झेल पाये वे हार्ट अटेक जैसे हादसों के शिकार हो गए. कई अधिकारियों के पारिवारिक सदस्य उस दबाव का शिकार हुए हैं जो उनके सेवारत पारिवारिक सदस्य झेल रहे होते हैं.

इस बात की पूरी तरह से एक स्वतंत्र एंव निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, आखिर 39 वर्ष की उम्र में किसी स्वस्थ व्यक्ति को हार्ट अटेक यूँ ही तो नहीं आ जाता, जब तक कि वह व्यक्ति गम्भीर अवसाद में ना हो और अक्षत गुप्ता हार्ट पेशेंट तो कही से भी नहीं होंगे? अब मूल सवाल उस अवसाद का जो शायद अक्षत गुप्ता झेल रहे थे. आखिर क्यों चाहते थे यशपाल आर्य उधमसिंहनगर के जिलाधिकारी और एसएसपी में बदलाव? ऐसा कौन सा काम था जो डीएम अक्षत गुप्ता, यशपाल आर्य के कहने पर नहीं कर रहे थे और यशपाल उनसे जबरन करवाना चाहते थे और ना करने पर वे उन्हें हटवाने के लिए राज्य सभा चुनाव के बहाने से सरकार से सौदेबाजी तक करने लगे.

अक्षत गुप्ता की मृत्यु के बहाने से ही सही सवाल बहुत से हैं और अधिकारी भी बहुत से जो इन सत्तामद में चूर मंत्रियों की सनक के शिकार हुए है या होते रहेंगे. अक्षत गुप्ता के इतर तीन परिवारो को मैं स्वयं व्यतिगत रूप जानता हूँ जिन्हें बर्बाद करने में उत्तराखंड के मंत्रियों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, जिनके चलते वे और उनका परिवार आज भी अवसादग्रस्त जीवन जी रहें हैं. हाँ वे किसी जिले के डीएम ना हुए इसलिए मीडिया में उन्हें तवज्जो नहीं मिल पाई. लेकिन याद रहे, दुःख सभी का एक-सा ही होता है, डीएम हो या अनुसेवक.

उत्तराखंड के पत्रकार चंद्रशेखर करगेती के एफबी वॉल से.

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IAS Amit Kataria ने Journalist Kamal Shukla को धमकाया- ‘दो कौड़ी का आदमी, साले, कीड़े, चूजे, मच्छर, मक्खी… तुझे तो ऐसे ही मसल दूंगा’ (सुनें टेप)

अमित कटारिया, कलक्टर, बस्तर (फोटो सौजन्य : फेसबुक)

छत्तीसगढ़ में तैनात आईएएस और आईपीएस विवादों में रहते हैं. दमन करने से लेकर धमकाने तक के लिए. बस्तर जिले के कलक्टर अमित कटारिया काला चश्मा पहनकर पीएम नरेंद्र मोदी से मिलने के मामले में कुख्यात रहे तो अब यही आईएएस एक पत्रकार बुरी तरह और गंदी भाषा में धमकाने के लिए चर्चा में है. दरअसल जेएनयू से कई प्रोफेसर बस्तर के एक गांव में गरीबों से मिलने और सामाजिक अध्ययन करने गए थे. उन्होंने बातचीत में ग्रामीणों को नक्सलियों और राज्य की पुलिस दोनों से दूर रहकर खुद का जीवन बेहतर करने की सलाह दी थी. मौके की ताक में बैठे रहने वाली रमन सरकार के कारिंदों ने गांव वालों को चढ़ाया, भड़काया और उनसे इन प्रोफेसरों के खिलाफ शिकायत ले ली कि ये लोग ग्रामीणों को भड़का रहे थे.

इस शिकायत को डीएम अमित कटारिया ने अपने फेसबुक वॉल पर डाल दिया और मीडिया को इस तरह ब्रीफ किया गया मानों प्रोफेसर लोगों ने गांव वालों को नक्सलियों के साथ मिलजुल कर लड़ने का गुर दिया हो. ऐसा ही कुछ हर जगह छपा और ऐसा ही राज्य मशीनरी ने प्रचारित किया. इसी मसले को लेकर पत्रकार कमल शुक्ला ने डीएम अमित कटारिया को फोन किया और गंदी मानसिकता के तहत प्रोफेसरों को बदनाम किए जाने की शिकायत की. इतना सुनकर आईएएस अमित कटारिया आपा खो बैठा और लगा पत्रकार को धमकाने. पूरी बातचीत सुनिए और सोचिए कि जिन्हें जनता का सेवक कहा जाता है, वो खुद को किसी सद्दाम हुसैन से कम नहीं समझते.

लोकतंत्र में आईएएस – आईपीएस नामक प्रजाति किस कदर रक्षक से भक्षक कैटगरी में शिफ्ट हो रही है, इसकी मिसाल यह टेप है. कायदे से तो कलक्टर को विनम्रता पूर्वक पत्रकार द्वारा कहे गए शब्द पर आपत्ति प्रकट कर फोन काट देना चाहिए था. आखिर पद की गरिमा भी होती है. लेकिन आईएएस अमित कटारिया ने सड़क छाप मवालियों वाली भाषा का इस्तेमाल कर अपना ओरीजनल चेहरा दिखा दिया. आप इस आईएएस से कैसे जनप्रिय और निष्पक्ष अधिकारी होने की उम्मीद कर सकते हैं जो थोड़ा सा आरोप लगने पर इस कदर बिलबिला जाता कि अपने पद गरिमा दायित्व सब कुछ को भूल कर धमकाने लग जाता है.

टेप सुनने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें….

https://www.youtube.com/watch?v=VxJH8p7Tmr0

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