अजीब दास्ताँ है ये! : मोदी उन दिनों हर रात मां को पत्र लिखते थे, फिर कुछ दिनों बाद फाड़कर जला देते थे, लेकिन एक डायरी बची रह गई!

संजय कुमार सिंह-

बयान तिथि- 30 मई 2022 – बयान- सौ साल पहले नानी मरीं

बयान तिथि- 18 जून 2022 – बयान- मां सौ साल की हुईं

तकनीकी रूप से ऐसा संभव नहीं है। लेकिन बोलने में सौ साल मतलब 90 से 110 हो सकता है। एक-दो महीना कम ज्यादा तो जरूर। वैसे भी मां सौ साल की हैं काफी है। लेकिन बेटा कोई खास हो तो यह छिद्रान्वेषण का मुद्दा हो सकता है। नहीं भी किया जाए तो इससे यह जरूर पता चलता है कि एक आदमी ने अपना क्या हाल बना लिया है। एक दार्शनिक की तरह कहूं तो जो नीचे है वह ऊपर ही जाएगा और ऊपर पहुंच कर कितनी देर टिकेगा। सो नीचे ही आना है। पर नीचता को लेकर अलग मामला है इसलिए उसे छोड़ता हूं और यही कहूंगा, क्या हाल बना लिया है? कुछ करते क्यों नहीं। आप तो सर्वशक्तिमान है कुछ अच्छे प्रचारकों की सेवा लीजिये।

जगत जननी और मां

बात मां की है तो मैंने भी पढ़ना – जानना चाहा। सुन रखा था मां के नाम चिट्ठियों की कोई किताब आई है। खबर थी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किताब ‘लेटर्स टू मदर’ की बुकिंग शुरू हो गई है। यह किताब अमेजन पर मिलेगी। किताब की कीमत 269 रुपये है। डिलीवरी, 20 जून 2020 के आसपास शुरू हो जाएगी। प्रधानमंत्री मोदी की ये 17वीं किताब है। छोटी सी इस किताब के बारे में जिस दिन पता चला उसी दिन ऑर्डर कर दिया था। आ कर रखी हुई थी। देख नहीं पाया था। आज ध्यान आया तो पता चला कि यह गुजराती में लिखी कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद है। और मां को पत्र नहीं, जगत जननी को संबोधित है।

भावना सौम्या का यह अनुवाद कविता की शक्ल में सिर्फ 96 पन्ने में हैं और कुछ पन्ने में कई लाइनें हाईलाइट की हुई हैं। यानी सामग्री और भी कम है। किताब की कीमत कम होनी चाहिए थी। कहने की जरूरत नहीं है कि ‘प्रधानमंत्री का लिखा है’ के नाम पर प्रकाशित इस पुस्तक की मुद्रित कीमत (स्टीकर पर) 299 रुपए है और निश्चित रूप से इसका एक लक्ष्य पैसा कमाना भी होगा। यह लक्ष्य किसका है, है भी कि नहीं, मैं नहीं जानता लेकिन मां के जन्म दिन पर जब आज मां की चर्चा हो रही है तो दो साल पुरानी इस पुस्तक की चर्चा भी बनती है। वैसे भी गुजराती से अंग्रेजी में अनूदित इस किताब की हिन्दी में चर्चा कम है। यह 2014 में प्रकाशित मूल गुजराती पुस्तक ‘साक्षी भाव’ का अंग्रेजी अनुवाद है। हार्परकॉलिंस पबलिशर्स इंडिया ने इसे प्रकाशित किया है।

इमेज पबलिशर्स

प्रकाशक के अनुसार यह 1986 में लिखा गया था। उस समय नरेन्द्र मोदी पार्टी कार्यकर्ता थे और उन्हें हर रात जगत जननी को पत्र लिखने की आदत हो गई थी। इसमें वे अपनी भावनाओं, सोच और शंकाओं को शब्दों में उकेरते थे। दिलचस्प यह भी है कि कुछ महीनों पर वे इसे फाड़कर जला भी देते थे। ऐसी ही एक डायरी बची रह गई। इसके बारे में पुस्तक की प्रस्तावना में नरेन्द्र मोदी ने लिखा है, ऐसे कितने पन्ने जलाए उसकी गिनती नहीं है। एक दिन मैं जलाने की प्रक्रिया में था तभी मित्र और आरएसएस के सम्मानित सहकर्मी नरेन्द्र भाई पंचसारा बिना बताए मेरे घर आए। मैं डायरी के पन्ने फाड़ रहा था उन्होंने बाकी बचे पन्ने मेरे हाथों से छीन लिए और कहा कि जो आपने लिखा है उसे नष्ट करना अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति को नष्ट करना है।

इसके बाद से मैंने ऐसा करना छोड़ दिया। लिखकर जला देने का कारण प्रधानमंत्री ने यह बताया है कि उनकी राय में यह कोई साहित्यिक लेखन नहीं है। आगे उन्होंने लिखा है, वर्षों बाद पता नहीं कैसे एक प्रकाशक को (संयोग से उसका नाम इमेज पबलिशर्स है) इसकी जानकारी मिली और उनलोगों ने मुझसे उन्हें प्रकाशित करने की अनुमति मांगी। पहले तो मैंने मना कर दिया लेकिन फिर पंचसारा भाई के दबाव में मान गया।

अनुवादक ने लिखा है, मुंबई में आयोजित एक रंगारंग समारोह में साक्षी भाव का लोकार्पण हुआ था। उस समय लेखक गुजरात के मुख्यमंत्री थे और मैं उन्हें सुन रही थी। मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि मैं कभी उनकी गुजराती पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद करूंगी। इसे लिखने बताने का उद्देश्य चाहे जो हो मुझे यह इतनी महत्वपूर्ण सूचना नहीं लग रही है। एक पेशेवर अनुवादक के रूप में मुझे यह अटपटा भी लग रहा है।

दरअसल मैंने पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरामन के लिखे को हिन्दी के पाठकों तक पहुंचाने के लिए अनुवाद की अपनी सेवा कुछ पैसों के बदले देने की पेशकश की और बाकी काम प्रकाशकों ने आराम से कर दिया। मुझे काम मिला, नाम और पैसा भी। लेकिन कभी किसी उपलब्धि का अहसास नहीं हुआ। मेरा पहला बड़ा काम था तब भी। हालांकि, यह अलग मुद्दा है।

सबसे बड़ी संतान

आज प्रधानमंत्री ने फिर एक भावपूर्ण पत्र लिखा है। ट्वीट भी किया है, मां, ये सिर्फ एक शब्द नहीं है, जीवन की वो भावना है, जिसमें स्नेह, धैर्य, विश्वास, कितना कुछ समाया है। मेरी मां, हीराबा आज 18 जून को अपने सौवें वर्ष में प्रवेश कर रही हैं, उनका जन्म शताब्दी वर्ष प्रारंभ हो रहा है। मैं अपनी खुशी और सौभाग्य साझा कर रहा हूं। narendramodi.in पर मां शीर्षक से उन्होंने लिखा है, मेरी मां को अपनी मां यानि मेरी नानी का प्यार नसीब नहीं हुआ था। एक शताब्दी पहले आई वैश्विक महामारी का प्रभाव तब बहुत वर्षों तक रहा था। उसी महामारी ने मेरी नानी को भी मेरी मां से छीन लिया था। मां तब कुछ ही दिनों की रही होंगी। …. मां को अक्षर ज्ञान भी नसीब नहीं हुआ, उन्होंने स्कूल का दरवाजा भी नहीं देखा। उन्होंने देखी तो सिर्फ गरीबी और घर में हर तरफ अभाव। ….बचपन के संघर्षों ने मेरी मां को उम्र से बहुत पहले बड़ा कर दिया था। वो अपने परिवार में सबसे बड़ी थीं और जब शादी हुई तो भी सबसे बड़ी बहू बनीं। इसमें गौर करने वाली बात है कि जन्म से कुछ ही दिन पहले मां (नानी) का निधन हो गया था तो वे अकेली संतान हो सकती हैं, सबसे छोटी हो सकती हैं, सबसे बड़ी नहीं।

संभव है यह सब नरेन्द्र मोदी ने खुद नहीं लिखा हो किसी को बताया हो और उसने उनके लिए लिखा हो फिर भी पुष्टि लेखक की जिम्मेदारी थी और चूंकि प्रधानमंत्री के नाम से लिखा गया है इसलिए ऐसी चूक तो नहीं ही होनी चाहिए थी। अगर दो लोगों ने लिखा है तो क्या लिखा जा रहा है उसमें तालमेल होने चाहिए। इसी तरह अंतिम डायरी जलने से बच गयी और तय हुआ कि जलाया नहीं जाएगा तो आगे क्या लिखा वह नहीं है। क्यों नहीं है बताना चाहिए था खासकर तब जब 299 रुपए में 10-20 पन्ने और जुड़ सकते थे। यही नहीं, उसके बारे में जानने की जिज्ञासा किसी को भी होगी।

गैर जरूरी प्रशंसा

प्रधानमंत्री के बारे मैं वही सब जानता हूं जो सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है। मैं उनसे कभी मिला नहीं। उनके बारे में पढ़कर सवाल उठते हैं और जानता हूं कि उन्हें सवाल पसंद नहीं हैं। इसलिए जवाब पाने की कोशिश भी नहीं करता और जो पढ़ता हूं उसपर यकीन नहीं होता है। बड़ी दुविधा है। लोग कहते हैं कि मैं उनके बारे में अपनी राय बदलूं। वैसे नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा करने वालों की बात अलग है। उनका प्रचार तो होता ही है प्रतिद्वंद्वी का दुष्प्रचार भी उसी गंभीरता से चलता है। ऐसे में उनके इस लेखन के बारे में कहा गया है कि उसमें एक नौजवान का उत्साह था और बदलाव की शुरूआत करने का जुनून। मेरे ख्याल से ऐसी प्रशंसा की कोई जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री बनने के लिए नहीं थी अब तो बिल्कुल नहीं। लेकिन प्रचारकों की दुनिया का यह एक विचित्र किस्सा है।


अनिल जैन-

कल हुए एक मीडिया ईवेंट की कुछ ‘प्रेरक’ तस्वीरें अभी देखने में आईं। सारी तस्वीरें ‘प्रेरणा’ देती हैं कि माँ के जन्मदिन पर कैसे उनके पैर परात में रख कर पानी से धोए जाते हैं, फिर उन्हें तौलिए से पोछा जाता है, फिर माँ के पैरों की धोवन को आंखों से लगाया जाता है और आखिरी में माँ को शाल ओढ़ा कर मिठाई खिलाई जाती है।

वे तस्वीरें इस बात की भी ‘प्रेरणा’ देती हैं इन सारी गतिविधियों के दौरान घर का कोई और सदस्य, एक भी अन्य भाई-बहन और यहाँ तक कि परिवार का कोई बच्चा भी वहां मौजूद न हो।

उन तस्वीरों से ‘सबसे बड़ी प्रेरणा’ यह तो मिलती ही है कि जब भी माँ से मिलने जाओ तो कैमरामैन अपने साथ रखो, अपनी मातृभक्ति को मीडिया ईवेंट बनाओ यानी मातृभक्ति की मार्केटिंग करो। लेकिन यह सब करने के लिए खून में व्यापार होना जरूरी है।



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