मुकुल सिंह चौहान-
पत्रकारों के मारे जाने वाली सूची में एक नाम और जोड़ दीजिए राजीव प्रताप का नाम. राजीव के मारे जाने की ख़बर से कोई आश्चर्य नहीं हुआ. राजीव पहले पत्रकार नहीं हैं और न ही आख़िरी जिनकी मौत किसी जांच वाली फ़ाइल में धूल खाएगी.
2-4 दिन 2-4 लोग बात कर लेंगे फिर उसके बाद किसी नए राजीव की ख़बर का इंतज़ार किया जाएगा.
अभी कुछ दिन पहले हमने एक पत्रकार की मौत पर रोना रोया, गुस्सा किया और चिल्ला चिल्लाकर बोला कि मुकेश चंद्राकर को मारा गया है मगर क्या हुआ? अभी भी परिवार यही बोल रहा है की राजीव प्रताप को मारा गया मगर क्या ही हो जाएगा?
लेह में रिपोर्टिंग करने आया हूं सरकार और प्रशासन की तरफ से मीडिया पर ऐसी पाबंदी है की पीड़ितों से मिलने तक नहीं दिया जा रहा. जनता सीधा मीडिया को देखते ही गोदी मीडिया की लेबलिंग कर देती है.
हर रिपोर्टिंग असाइनमेंट के बाद हताशा और निराशा बढ़ती जा रही है. हम मुर्दों का देश बनते जा रहे हैं माफ़ करिएगा हम बतौर नागरिक मुकेश या राजीव जैसे पत्रकारों को डिज़र्व ही नहीं करते. सौ बात की एक बात है जो इस पागलपन में शामिल नहीं होगा वो मार दिया जाएगा.
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