जीवित, चैतन्य और संवेदनशील मनुष्यों को कारावास के पीछे धकेल देने से उन पर क्या बीतती है!

सुशोभित-

कारावास के रेखाचित्र… वर्ष 1849 में जब फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की को साइबेरिया में सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई गई, तब पहले ही उनके चार उपन्यास और एक दर्जन छोटी-बड़ी कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी थीं। वे राजनैतिक क़ैदी थे और उन्हें पेत्राशेव्स्की समूह की बैठक-गोष्ठियों में शरीक होकर प्रगतिशील-प्रश्नों पर बहस करने के इल्ज़ाम में यह सज़ा सुनाई गई थी। सज़ा तो मृत्युदण्ड की थी, किंतु ऐन समय में इसे निर्वासन में बदल दिया गया। अलबत्ता ‘मॉक-एग्ज़ीक्यूशन’ और उसमें निहित मनोवैज्ञानिक-यंत्रणा के प्रयोजन से निर्णय बदलने में कोई फ़ुर्ती नहीं दिखाई गई थी और अंतिम अनेक मिनटों को दोस्तोयेव्स्की ने यह मानकर बिताया था कि उनके जीवन का अब अंत होने जा रहा है। आसन्न मृत्यु की इस लोमहर्षक अनुभूति ने उन्हें आजीवन मानसिक रूप से संत्रास दिया। इस पर उन्होंने अपने उपन्यास ‘बौड़म’ में बाद में बात भी की।

जब दोस्तोयेव्स्की को साइबेरिया भेजा जा रहा था, तब उनके मन में मिश्रित भावनाएँ थीं। पहली यह कि मृत्युदण्ड को अंतिम समय में निरस्त कर उन्हें जो नया जीवन दिया गया है, उस पर संतोष जताएँ या सश्रम कारावास के आने वाले अनेक कठिन वर्षों के लिए स्वयं को तैयार करें। दोस्तोयेव्स्की सुशिक्षित और बौद्धिक थे और उनका परिवार कुलीन था। उनके लिए इस तथ्य को स्वीकार कर पाना कठिन था कि उन्हें हत्या और डकैती के आरोपियों के साथ ही साइबेरिया भेजा जा रहा है, जिनमें से अनेक ने ना केवल अपराध के रोमांच के वशीभूत होकर गुनाह किया था, बल्कि उन्हें इसका पछतावा तक ना था और कदाचित् साइबेरिया जाकर वो संतुष्ट ही थे।

लेकिन साथ ही दोस्तोयेव्स्की यह भी जानते थे कि बहस-जिरह का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है और उनके पास अपने दण्ड को स्वीकारने के सिवा अब कोई चारा नहीं है। साइबेरिया में उन्हें क़ैदियों के रूखे व्यवहार का भी सामना करना पड़ा, जिनमें से अधिकतर देहाती पृष्ठभूमि के थे और अपने बीच एक कुलीन-बौद्धिक को पाकर सशंक थे, वे उन्हें पराया समझते थे। इससे महज़ चार वर्ष पूर्व अपने पहले उपन्यास ‘निर्धन लोग’ के प्रकाशन के साथ ही दोस्तोयेव्स्की ने सेंट पीटर्सबर्ग के लेखक-समूह में सितारा हैसियत पा ली थी और उन्हें निकोलाई गोगोल का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया था। जबकि अब उन्होंने स्वयं को इस कारावास में पाया था, जहाँ उन्हें अपमान, क्रूरता, यंत्रणा, विस्थापन और अलगाव की भावनाओं को झेलना था, नए सिरे से अपने जीवन का प्रयोजन तलाशना था और जीवित रहने और उससे भी बढ़कर अपनी मानवीय अस्मिता को बचाए रखने के लिए हर दिन जूझना था।

इस अनुभव ने दोस्तोयेव्स्की को बदल दिया। साइबेरिया में बिताए उन चार वर्षों का ही प्रतिफल था कि कालान्तर में दोस्तोयेव्स्की ने ‘अपराध और दण्ड’, ‘बौड़म’, ‘शैतान’ और ‘करमाज़ोव बंधु’ जैसे महान उपन्यास रचे। दोस्तोयेव्स्की ने स्वीकार किया कि साइबेरिया जाने से पहले वे एक उदारवादी, प्रगतिशील और समाजवादी चिंतक थे और शायद आजीवन वैसे ही बने रहते, किंतु कारावास की गहरी अस्तित्वगत अनुभूति ने उनकी बुनियादी मान्यताओं को बदल दिया और वे चीज़ों को अधिक तलस्पर्शी दृष्टिकोण से देखने लगे। सामाजिक-क्रांतियाँ मनुष्य की नियति को बदल सकती हैं, इसमें उनका संशय गहराया और ईश्वर के प्रति निष्ठा सुदृढ़ हुई, क्योंकि उन्होंने पाया कि मनुष्य को जीवित रहने के लिए एक महान नैतिक और आध्यात्मिक आलम्बन की ज़रूरत होती है। वह हो तो बंदीगृह में भी यंत्रणाएँ झेलते लोग जी जाते हैं और ना हो तो आत्मनाश पर अग्रसर हो जाते हैं।

साइबेरिया से लौटकर दोस्तोयेव्स्की ने एक किताब लिखी, जिसे उनकी पहली महान कृति स्वीकारा जाता है। यह पुस्तक है- ‘मृतकों का घर’ (‘नोट्स फ्रॉम द डेड हाउस’)। इसे अन्यत्र ‘हाउस ऑफ़ द डेड’ शीर्षक से भी प्रकाशित किया गया है। हिंदी में यह ‘कारावास’ शीर्षक से अनूदित हुई है। दोस्तोयेव्स्की ने इस किताब में एक महत्वपूर्ण प्रश्न का सामना किया है। वे पूछते हैं कि जब मनुष्यों को- जो अपनी तमाम बुराइयों, कमियों और अभावों के बावजूद मनुष्य ही हैं और मनुष्य होने की चेतना से भरे हैं- समाज की मुख्यधारा से छाँटकर यों पृथक कर दिया जाता है तो इसका उनके नैतिक-मनोवैज्ञानिक-आध्यात्मिक स्थापत्य पर क्या असर पड़ता है। “हमें शेष से जोड़ो”- ये श्रीनरेश मेहता की काव्य-पंक्तियाँ हैं किंतु दोस्तोयेव्स्की की इस पुस्तक में आरम्भ से अंत तक ज्यों गूँजती दिखलाई देती है। दोस्तोयेव्स्की बतलाते हैं कि दस-दस वर्षों का सश्रम कारावास झेल रहे बंदी भी एक-एक दिन यों गिनकर बिताते हैं, जैसे वे मुक्त होने के अपने लक्ष्य के और समीप चले आए हों। अगर उन्हें अंतिम वर्ष में यह बतलाया जाए कि उनकी सज़ा और बढ़ा दी गई है तो वे मानसिक रूप से टूटकर ध्वस्त हो जावेंगे या विक्षिप्त हो जावेंगे या आत्मघात कर लेंगे। किंतु अगर आरम्भ से ही उन्हें बढ़ी हुई सज़ा दी जाए तो वे उसके लिए भी अपने मन को कालान्तर में राज़ी कर लेते हैं।

जीवित, चैतन्य और संवेदनशील मनुष्यों को यों कारावास के पीछे धकेल देने से उन पर क्या बीतती है, जबकि उनमें से अनेक तो अपराधी भी नहीं थे और संयोगवशात् ही एक दुष्चक्र में फंसकर यहाँ पहुँच गए। उनमें से कुछ ने आवेश या गहरे अपमान के किसी क्षण में अपराध को अंजाम दिया, किंतु अपने सामान्य-जीवन में वे सभी के जैसे सजल-कातर-दीन थे। कुंठा, संशय, विरक्ति, हताशा और अवमानना ने उन्हें कटु बना दिया था, किंतु धैर्य से उनके भीतर झाँककर देखने पर एक निरा मनुज ही दिखलाई देता। लेखक दोस्तोयेव्स्की- जिनकी पर्यवेक्षण-क्षमता, मनोवैज्ञानिक मेधा और सुग्राह्य संवेदनशीलता पहले ही सुविख्यात हो चुकी थी- ने स्वयं को इस आत्मिक-उत्खनन से रोका नहीं और उन्होंने आत्यंतिक-परिस्थिति में फंसी मनुष्य की चेतना के महान रहस्यों का उद्‌घाटन किया। उन्हें अपनी इस पुस्तक में संजोया, जो आज भी साहित्य में कारावास के जीवन का सबसे सजीव वृत्तान्त है।

बंदियों का काम पर जाना, सार्वजनिक स्नानागार में स्नान करना, एक-एक पैसा कमाने के लिए जूझना, तस्करी से पाई शराब में अपना सर्वस्व गँवाकर एक दिन का उत्सव मनाना, बड़े दिन की राह तकना, उसके लिए बंदीगृह से मिले सुथरे कपड़ों को महीनों तक सहेजकर रखना, नाट्य प्रस्तुति आयोजित करना और मनोरंजन के दुर्लभ सुख को कण-कण भोगना, इस प्रस्तुति को कहीं अधिकारियों के द्वारा निरस्त ना कर दिया जावे इस भय से अपने आचरण को स्वत: ही सुधार लेना और अनुशासित हो जाना, आदि अनेक जीवंत चित्र दोस्तोयेव्स्की ने इस पुस्तक में खींचे हैं। कारावास के प्रयोजन पर सबसे गहरा चिंतन फ्रांसीसी-दार्शनिक मिशेल फ़ूको का है, जिन्होंने यह जानने की कोशिश की है कि इस पद्धति की शुरुआत कब से हुई और इसका बुनियादी प्रयोजन क्या है- बंदी को सुधारना, उसे अनुशासित करना, दण्डित करना, या केवल समाज से पृथक करके यह मान बैठना कि अब हम बुरी चीज़ों से मुक्त हो चुके हैं और सुरक्षित हैं? दोस्तोयेव्स्की इस पुस्तक के हर पन्ने पर यही प्रश्न पूछते मालूम होते हैं कि यह क्यों किया गया, इसका क्या औचित्य था, इतनी जीवन-ऊर्जा को यहाँ बाँधकर क्यों विनष्ट कर दिया गया, इससे क्या मिला?

तॉल्सतॉय को दोस्तोयेव्स्की की यही इकलौती किताब सर्वाधिक पसंद थी। तुर्गेनेव भी इसके मुरीद हुए थे। दोस्तोयेव्स्की को अन्यथा उनके अतिनाटकीय वृत्तांत के लिए जाना जाता है, जिसमें स्नायु-तंत्र को झंझोड़ देने वाले दृश्यबंध एक के बाद एक चले आते हैं, किंतु इस पुस्तक में उनकी शैली शांत, प्रगल्भ और प्रसादपूर्ण है, उसमें वह सौष्ठव है जो उन्नीसवीं सदी के उपन्यासकारों का कलात्मक-लाघव था, यह एक सौम्य, और इतिवृत्तात्मक होने के बावजूद मानवीय-अस्मिता का गुणगान करने वाला गद्य है। इसका एक कारण यह भी था कि यह आख़िरकार दोस्तोयेव्स्की की आरम्भिक कृति ही है और 1860 के दशक के बाद उनके लेखन में जो नाटकीय बदलाव आए थे- जिनका बीज साइबेरिया में ही पड़ा- वे इस पुस्तक तक उससे ग्रस्त नहीं हुए थे। यहाँ दोस्तोयेव्स्की की संयत भंगिमा देखते ही बनती है। अनेक पाठक इसे उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति मानते हैं और इससे असहमत होने का कोई कारण नहीं।

बीते चार महीनों से मैं दोस्तोयेव्स्की को ही पढ़ रहा हूँ। उनके सिवा किसी और लेखक का एक पेज नहीं पढ़ा। यह पुस्तक मेरे लिए इसी निश्चय का उपहार है। इसने जाड़े के विषादपूर्ण दिनों को मेरे लिए उज्ज्वल और ऊष्ण बना दिया है और मैं इसके साथ होने की राह तकता हूँ। महान साहित्य हमें उदात्त बनाता है। इस पुस्तक के साथ बिताए दिन मेरे लिए वैसी ही भावभीनी याद हैं।

सुशोभित



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